खूनी हवेली की वासना compleet

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raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:26

खूनी हवेली की वासना पार्ट --40

गतान्क से आगे........................

तकरीबन 11 बजे वो बैठा पायल के आने का इंतेज़ार कर रहा था. पायल तो ना आई पर उसके सामने आ खड़ा हुआ ठाकुर पुरुषोत्तम सिंग.

"कहिए" ख़ान ने उससे हाथ मिलाते हुए पुछा

"रिपोर्ट लिखनी है" पुरुषोत्तम ने बैठते हुए कहा

"ज़रूर" ख़ान ने अपने सामने पड़ा रिजिस्टर खोला "किस बारे में?"

"गुमशुदा"

"कौन गुमशुदा है?" ख़ान ने हैरानी से पुछा

"हमारा भाई"

"ठाकुर तेजविंदर सिंग या ....?"

"तेज" पुरुषोत्तम बीच में बोल पड़ा

"काब्से?"

"कई दिन हो गये हैं"

"आखरी बार कब देखा गया था उन्हें?"

"जिस रात हमारे पिता का खून हुआ था"

"हां उस रात हवेली में मिला था मैं उनसे"

"उसके बाद सुबह घर से निकले तो वापिस नही आए" पुरुषोत्तम ने कहा

"ओके" ख़ान रिपोर्ट लिखने लगा पर फिर अचानक सिर उठाकर पुछा "पर जब मैं उस दिन आपसे हवेली में मिला था तो आपने कहा था के वो उस दिन सुबह ही कहीं गये थे"

"हां हमें लगा के वो रात को हवेली में आए थे"

"लगा? मतलब?"

"मतलब ये का हमने रात को हवेली के बाहर एक गाड़ी रुकने की आवाज़ सुनी थी. तेज की आदत थी के वो अक्सर यूँ ही देर से घर आते थे तो हमने सोचा के वही आए होंगे. सुबह हमने देखा तो गाड़ी नही थी तो हमें लगा के वो कहीं गये हैं"

"और ये भी उनकी आदत थी? यूँ बिन बताए सुबह सुबह घर से निकल जाना?"

"जी हां" पुरुषोत्तम ने सख़्त आवाज़ में जवाब दिया जैसे ख़ान को इशारा कर रहा हो के अपनी हद में रहो.

"ठीक है सर" ख़ान ने रिजिस्टर पुरुषोत्तम की तरफ करते हुए कहा "आप यहाँ साइन कर दीजिए, मुझे जैसे ही कुच्छ पता चला है मैं आपको खबर कर दूँगा"

"तुम्हारी रूपाली तो क्वाइट ए कॅरक्टर निकली यार" किरण ख़ान को फोन पर बता रही थी

"क्यो ऐसा क्या हुआ?" ख़ान ने पुछा

"वेल इट टर्न्स आउट के उसपर बचपन में एक रेप अटेंप्ट हुआ था"

"यॅ आइ नो अबौट दट" ख़ान ने जवाब दिया "और कुच्छ?"

"और ये के शी ईज़ ए कॉलेज ड्रॉप आउट"

"क्यूँ?"

"मॅ'म प्रेग्नेंट हो गयी थी जिसके चलते उनको कॉलेज से हटाया गया और उसे बाप ने जल्द बाज़ी में उसकी शादी करा दी"

"वाउ. सो इट ईज़ इनडीड ट्रू" ख़ान ने कहा

"वेट ए मिनिट. यू न्यू अबौट ऑल दिस?"

"यआः सुनने में आया था बट यकीन नही था"

"आंड व्हेन वर यू एग्ज़ॅक्ट्ली प्लॅनिंग ऑन टेल्लिंग मी?"

"यार कहा तो के बस उड़ती उड़ती अफवाह सुनी थी. ऐसा कोई पूरा यकीन नही था के ऐसा हुआ है"

"ओके" किरण ने कहा "बट आइ बेट दट यू डू नोट नो व्हाट आइ आम गोयिंग टू टेल यू नाउ"

"ओके. आइ आम रेडी. शूट"

"उसपर जो रेप अटेंप्ट हुआ था उसमें उसके घर की नौकरानी का भी नाम आया था दट शी वाज़ ए पार्ट ऑफ सेट्टिंग दा एंटाइयर डील उप. यू सी देयर मेल सर्वेंट अटेंप्टेड दा रेप बट इट ईज़ साइड दट ए फीमेल सर्वेंट वाज़ इन्वॉल्व्ड टू आंड शी प्लेड अन ईक्वल पार्ट"

"वेर आर यू गेटिंग विथ दिस?" ख़ान उलझता हुआ बोला

"डमी" किरण ऐसी बोली जैसे ख़ान बहुत बड़ा बेवकूफ़ हो "पूरी बात सुनो. रूपाली के बाप ने उस मेल सर्वेंट को तो उसी रात मार दिया था, जिसके लिए बाइ दा वे उसके खिलाफ कोई रिपोर्ट भी फाइल नही हुई, पर वो फीमेल सर्वेंट बच गयी और यहीं शहर में एक महिला आश्रम में रहती है"

"वो बच गयी तक तो मुझे ऑलरेडी पता था पर कहाँ रहती है दट शुवर केम अस ए सर्प्राइज़. वेर डिड यू दिग ऑल दिस फ्रॉम इन ए डे?"

"जर्नलिस्ट हूँ यार. आधी जासूस कह सकते हो"

"आधी नही पूरी जासूस हो तुम. बट आइ स्टिल डोंट अंडरस्टॅंड वेर आर यू गेटिंग विथ ऑल दिस. आइ स्टिल डोंट सी दा पॉइंट"

"हे भगवान" किरण ने कहा "अर्रे यार अगर रूपाली के बारे में कोई बात पता करनी है, उसके पास्ट में कुच्छ ऐसा है जिसके चलते हमें इस केस में मदद मिल सके तो हमें उस नौकरानी से बात करनी चाहिए"

"नौकरानी से क्यूँ?"

"देखो उस वक़्त सब ये कह रहे थे के रूपाली एक लूज कॅरक्टर लड़की थी जो खुद अपने नौकर के साथ लगी हुई थी. बाद में जब वो कॉलेज में प्रेग्नेंट हुई तो ये बात जैसे अपने आप साबित ही हो गयी. और उपेर से उसके पति को सब नमार्द कहते हैं. तो बहुत ज़ाहिर है के उसका शादी के बाद कोई अफेर वगेरह रहा हो जो शायद ठाकुर के खून की वजह बना हो"

"वाउ" ख़ान हैरानी से बोला "तुम तो सही में पूरी जासूस निकली यार. एक दिन में ठाकुर के पूरे खानदान की हिस्टरी खोद निकाली"

"ऑफ कोर्स" किरण बच्ची की तरह इठलाती हुई बोली

"बट आइ डोंट थिंक के हमें उस नौकरानी से बात करके कुच्छ पता चलने वाला है"

"वर्त ए शॉट. वैसे ही हमारे पास इस केस में कोई ज़्यादा लीड्स नही हैं. तो जो हैं, वही फॉलो करके देख लेते हैं"

"यॅ. साउंड्स लॉजिकल. आंड आइ गेस तुम्हें ऑलरेडी पता है के वो नौकरानी किस महिला आश्रम में रहती है"

"ओह यॅ"

"ठीक है. 2 घंटे दो मुझे. यहाँ कुच्छ काम निपटा के अभी निकलता हूँ. कहाँ मिलना है?"

किरण ने उसको अड्रेस लिखवा दिया.

"यू नो किरण एक बात समझ नही आ रही" फोन रखते रखते ख़ान बीच में बोल पड़ा

"ये केस है ही ऐसा. शुरू से एंड तक कुच्छ भी समझ नही आ रहा. तुम कौन सी बात की बात कर रहे हो?"

"यही के तुम ये सब क्यूँ कर रही हो?" ख़ान ने धीमी आवाज़ में कहा जैसे डर रहा हो के किरण बुरा ना मान जाए "आइ मीन ये सब भाग दौड़, ये तुम सिर्फ़ एक कहानी के लिए नही कर रही"

थोड़ी देर फोन पर खामोशी रही.

"यू नो मुन्ना कभी मेरी वजह से तुम्हारी नौकरी जाते जाते बची. मेरी वजह से तुम जैसा काबिल ऑफीसर एक छ्होटे से गाओं में पोस्टेड है. तो मैं इस केस में तुम्हारी मदद करके बस अपनी ग़लती सुधारना चाह रही हूँ. तुम्हें तुम्हारी इज़्ज़त वापिस दिलवाना चाह रही हूँ"

"ह्म्‍म्म्म" ख़ान के गले से आवाज़ आई.

"मैं ये तुम्हारे किए कर रही हूँ" और किरण ने फोन रख दिया.

2 मिनिट बाद ही सेल फिर बजा. मेसेज था. ख़ान को इस मेसेज के आने का जैसे पूरा यकीन था. उसने पढ़ना शुरू किया.

तू कहीं भी रहे सर पर तेरे इल्ज़ाम तो है,

तेरे हाथों की लकीरों में मेरा नाम तो है.

मुझे तू अपना बना या ना बना तेरी मर्ज़ी,

तू ज़माने में मेरे नाम से बदनाम तो है.

देखकर मुझे लोग तेरा ही नाम लेते हैं,

शुक्र है मोहब्बत का ये अंजाम तो है.

तू सितम्गर ही सही फिर भी तेरे दीदार से,

मेरे दिल-ए-बीमार को आराम तो है.

उसी दोपहर ख़ान और किरण दोनो कल्लो के सामने बैठे हुए थे. महिला आश्रम का पता ढूँदने में कोई तकलीफ़ नही हुई थी पर कल्लो बड़ी मेहनत और मिन्नत से उनके साथ बात करने को राज़ी हुई थी.

......................................

उस रात कल्लो के साथ बिस्तर पर बेहोश होने बाद रूपाली को फिर पूरी रात होश नही आया. बेहोशी से वो सीधा नींद के आगोश में चली गयी और फिर सीधा सुबह ही आँख खुली.

"क्या हुआ था कल रात?" मौका देख कर वो किचन में कल्लो के पास पहुँची और पुछा

"बेहोश हो गयी थी आप" कल्लो मुस्कुराते हुए बोली

"ऐसा क्यूँ हुआ?" रूपाली ने डरते हुए पुछा

"डरने की कोई बात नही. मज़ा अगर बहुत ज़्यादा आ रहा हो तो अक्सर बिस्तर पर ऐसा हो जाता है और फिर आपका तो पहली बार था"

"ह्म्‍म्म्म" रूपाली मुस्कुरा उठी "फिर तूने क्या किया?"

"क्या करती. आपको कपड़े पहनाए और फिर अपने कपड़े पहेनकर अपने कमरे में चली गयी"

तभी रूपाली की माँ किचन में आ गयी और दोनो चुप हो गयी. इसके बाद पूरा दिन रूपाली को कल्लो से अकेले में बात करने का कोई मौका नही मिला.

रात को डिन्नर टेबल पर कल्लो को बहुत हैरानी हुई जब रूपाली ने उसको बताया के आज रात और अगली कुच्छ रात वो उसके कमरे में ही रुकेगी. उसने अपनी माँ से बहाना कर लिया था के अक्सर रात को उसकी तबीयत खराब लगने लगती है इसलिए वो कुच्छ दिन तक कल्लो को अपने कमरे में सुलाना चाहती है.

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --40

gataank se aage........................

Takreeban 11 baje vo betha Payal ke aane ka intezaar kar raha tha. Payal toh na aayi par uske saamne aa khada hua Thakur Purushottam Singh.

"Kahiye" Khan ne usse haath milate hue puchha

"Report likhani hai" Purushottam ne bethte hue kaha

"Zaroor" Khan ne apne saamne pada register khola "Kis baare mein?"

"Gumshuda"

"Kaun gumshuda hai?" Khan ne hairani se puchha

"Hamara bhai"

"Thakur Tejvinder Singh ya ....?"

"Tej" Purushottam beech mein bol pada

"Kabse?"

"Kai din ho gaye hain"

"Aakhri baar kab dekha gaya tha unhen?"

"Jis raat hamare pita ka khoon hua tha"

"Haan us raat haweli mein mila tha main unse"

"Uske baad subah ghar se nikle toh vaapis nahi aaye" Purushottam ne kaha

"Ok" Khan report likhne laga par phir achanak sir uthakar puchha "Par jab main us din aapse haweli mein mila tha toh aapne kaha tha ke vo us din subah hi kahin gaye the"

"Haan hamen laga ke vo raat ko haweli mein aaye the"

"Laga? Matlab?"

"Matlab ye ka hamne raat ko haweli ke bahar ek gaadi rukne ki aawaz suni thi. Tej ki aadat thi ke vo aksar yun hi der se ghar aate the toh hamne socha ke vahi aaye honge. Subah hamne dekha toh gaadi nahi thi toh hamen laga ke vo kahin gaye hain"

"Aur ye bhi unki aadat thi? Yun bin bataye subah subah ghar se nikal jana?"

"Ji haan" Purushottam ne sakht aawaz mein jawab diya jaise Khan ko ishara kar raha ho ke apni hadh mein raho.

"Theek hai sir" Khan ne register Purushottam ki taraf karte hue kaha "Aap yahan sign kar dijiye, mujhe jaise hi kuchh pata chala hai main aapko khabar kar doonga"

"Tumhari Rupali toh quite a character nikli yaar" Kiran Khan ko phone par bata rahi thi

"Kyn aisa kya hua?" Khan ne puchha

"Well it turns out ke uspar bachpan mein ek rape attempt hua tha"

"Yeah i knw about that" Khan ne jawab diya "Aur kuchh?"

"Aur ye ke she is a college drop out"

"Kyun?"

"Ma'm pregnant ho gayi thi jiske chalte unko college se hataya gaya aur use baap ne jald baazi mein uski shaadi kara di"

"Wow. So it is indeed true" Khan ne kaha

"Wait a minute. You knew about all this?"

"Yeah sunne mein aaya tha but yakeen nahi tha"

"And when were you exactly planning on telling me?"

"Yaar kaha toh ke bas udti udti afvaah suni thi. Aisa koi poora yakeen nahi tha ke aisa hua hai"

"Ok" Kiran ne kaha "But i bet that you do not know what i am going to tell you now"

"Ok. I am ready. Shoot"

"Uspar jo rape attempt hua tha usmein uske ghar ki naukrani ka bhi naam aaya tha that she was a part of setting the entire deal up. You see their male servant attempted the rape but it is said that a female servant was involved too and she played an equal part"

"Where are you getting with this?" Khan ulajhta hua bola

"Dummy" Kiran aisi boli jaise Khan bahut bada bevakoof ho "Poori baat suno. Rupali ke baap ne us male servant ko toh usi raat maar diya tha, jiske liye by the way uske khilaff koi report bhi file nahi hui, par vo female servant bach gayi aur yahin shehar mein ek mahila aashram mein rehti hai"

"Vo bach gayi tak toh mujhe already pata tha par kahan rehti hai that sure came as a surprise. Where did u dig all this from in a day?"

"Journalist hoon yaar. Aadhi jasoos keh sakte ho"

"Aadhi nahi poori jasoos ho tum. But i still dont understand where are you getting with all this. I still dont see the point"

"Hey Bhagwan" Kiran ne kaha "Arrey yaar agar Rupali ke baare mein koi baat pata karni hai, uske past mein kuchh aisa jiske chalte hamen is case mein madad mil sake toh hamen us naukrani se baat karni chahiye"

"Naukrani se kyun?"

"Dekho us waqt sab ye keh rahe the ke Rupali ek loose character ladki thi jo khud apne naukar ke saath lagi hui thi. Baad mein jab vo college mein pregnant hui toh ye baat jaise apne aap saabit hi ho gayi. Aur uper se uske pati ko sab namard kehte hain. Toh bahut zaahir hai ke uska shaadi ke baad koi affair vagerah raha ho jo shayad Thakur ke khoon ki vajah bana ho"

"Wow" Khan hairani se bola "Tum toh sahi mein poori jasoos nikli yaar. Ek din mein thakur ke poore khandaan ki history khod nikali"

"Of course" Kiran bachchi ki tarah ithlati hui boli

"But i dont think ke hamen us naukrani se baat karke kuchh pata chalne wala hai"

"Worth a shot. Vaise hi hamare paas is case mein koi zyada leads nahi hain. Toh jo hain, vahi follow karke dekh lete hain"

"Yeah. Sounds logical. And i guess tumhein already pata hai ke vo naukrani kis mahila aashram mein rehti hai"

"Oh yeah"

"Theek hai. 2 ghante do mujhe. Yahan kuchh kaam niptake abhi nikalta hoon. Kahan milna hai?"

Kiran ne usko address likhva diya.

"You know Kiran ek baat samajh nahi aa rahi" Phone rakhte rakhte Khan beech mein bol pada

"Ye case hai hi aisa. Shuru se end tak kuchh bhi samajh nahi aa raha. Tum kaun si baat ki baat kar rahe ho?"

"Yahi ke tum ye sab kyun kar rahi ho?" Khan ne dheemi aawaz mein kaha jaise darr raha ho ke Kiran bura na maan jaaye "I mean ye sab bhaag daud, ye tum sirf ek kahani ke liye nahi kar rahi"

Thodi de phone par khamoshi rahi.

"You know Munna kabhi meri vajah se tumhari naukri jaate jaate bachi. Meri vajah se tum jaisa kaabil officer ek chhote se gaon mein posted hai. Toh main is case mein tumhari madad karke bas apni galti sudharna chah rahi hoon. Tumhein tumhari izzar vaapis dilvana chah rahi hoon"

"Hmmmm" Khan ke gale se aawaz aayi.

"Main ye tumhare kiye kar rahi hoon" Aur Kiran ne phone rakh diya.

2 minute baad hi cell phir baja. Message tha. Khan ko is message ke aane ka jaise poora yakeen tha. Usne padhna shuru kiya.

Tu kahin bhi rahe sar par tere ilzaam toh hai,

Tere haathon ki lakeeron mein mera naam toh hai.

Mujhe tu apna bana ya na bana teri marzi,

Tu zamane mein mere naam se badnaam toh hai.

Dekhkar mujhe log tera hi naam lete hain,

shukr hai mohabbat ka ye anjaam toh hai.

Tu sitamgar hi sahi phir bhi tere deedar se,

Mere dil-e-bimaar ko aaram toh hai.

Usi dopahar Khan aur Kiran dono Kallo ke saamne bethe hue the. Mahila aashram ka pata dhoondne mein koi takleef nahi hui thi par Kallo badi mehnat aur minnat se unke saath baat karne ko raazi hui thi.

Us raat Kallo ke saath bistar par behosh hone baad Rupali ko phir poori raat hosh nahi aaya. Behoshi se vo sidha neend ke aagosh mein chali gayi aur phir sidha subah hi aankh khuli.

"Kya hua tha kal raat?" Mauka dekh kar vo kitchen mein Kallo ke paas pahunchi aur puchha

"Behosh ho gayi thi aap" Kallo muskurate hue boli

"Aisa kyun hua?" Rupali ne darte hue puchha

"Darne ki koi baat nahi. Maza agar bahut zyada aa raha ho toh aksar bistar par aisa ho jaata hai aur phir aapka toh pehli baar tha"

"Hmmmm" Rupali muskura uthi "Phir tune kya kiya?"

"Kya karti. Aapko kapde pehnaye aur phir apne Kapde pehenkar apne kamre mein chali gayi"

Tabhi Rupali ki maan kitchen mein aa gayi aur dono chup ho gayi. Iske baad poora din Rupali ko Kallo se akele mein baat karne ka koi mauka nahi mila.

Raat ko dinner table par Kallo ko bahut hairani hui jab Rupali ne usko bataya ke aaj raat aur agli kuchh raat vo uske kamre mein hi rukegi. Usne apni maan se bahana kar liya tha ke aksar raat ko uski tabiat kharab lagne lagti hai isliye vo kuchh din tak Kallo ko apne kamre mein sulana chahti hai.

kramashah........................................


raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:27

खूनी हवेली की वासना पार्ट --41

गतान्क से आगे........................

उस रात जब रूपाली के कमरे का दरवाज़ा बंद हुआ, तो कल्लो भी उसके साथ अंदर थी और पकड़े जाने का भी कोई डर नही था क्यूंकी उसके माँ बाप भी जानते थे के वो दोनो साथ हैं.

कुच्छ देर तक दोनो यूँ ही इधर उधर की बातें करती रही और जब यकीन हो गया के बाकी सब लोग सो चुके हैं तो एक बार फिर 1 औरत और एक लड़की के बीच वासना का खेल शुरू हुआ.

"क्या कर रही है?" रूपाली ने पुछा. कल्लो ने उसको बिस्तर पर सीधा लिटा दिया था और एक चुन्नी से उसके दोनो हाथ बिस्तर के साथ बाँध रही थी.

"कल रात आप बहुत हाथ पावं पटक रही थी इसलिए" कल्लो ने उसके दोनो हाथों को बिस्तर के साथ अच्छी तरह बाँध दिया "आज रात आप बस मज़े लो. जन्नत की सैर कराती हूँ आपको"

रूपाली अब चाह कर भी अपने हाथ नही हिला पा रही थी.

"आज की रात मैं एक मर्द हूँ और आप एक लड़की जिसको मैं लड़की से औरत बनाऊँगी"

"कैसे?" रूपाली के दिल की धड़कन तेज़ हो चली

"आपको चोद कर" कल्लो ने धीरे से उसके कान में कहा. रूपाली को समझ नही आया पर वो चुप रही.

कल्लो रूपाली से थोड़ा दूर होकर हटी और बिस्तर के साथ खड़ी होकर उसको देखने लगी. कमरे में लाल रंग की हल्की रोशनी थी जिसमें वो एक दूसरे को साफ देख सकती थी.

"जल्दी कर ना कल्लो" रूपाली बेचैनी से अपनी टाँगें एक दूसरे के साथ घिसते हुए बोली "बर्दाश्त सा नही हो रहा"

"ष्ह्ह्ह" कल्लो ने अपने होंठो पर अंगुली रख कर कहा और अपनी सारी खोलने लगी.

रूपाली आँखें फाडे उसको देख रही थी.

कल्लो ने धीरे धीरे अपनी सारी को ऐसे खोला जैसे किसी मर्द को रिझाने के लिए स्ट्रीप डॅन्स कर रही हो. सारी धीरे धीरे करके खुली और नीचे ज़मीन पर जा गिरी.

कल्लो ने ब्लाउस के उपेर से अपनी चूचियाँ दबाई.

"मुझे नंगी देखना बहुत पसंद है ना आपको? आज की रात अपने शरीर का भोग लगाऊंगी आपको और आपके शरीर का भोग मैं खुद लूँगी" कल्लो ने कहा

रूपाली बस उसको देख कर अपनी गर्दन ही हिला सकी.

"क्या देखोगी सबसे पहले" कल्लो ने अपनी चूचियाँ को ब्लाउस के उपेर से यूँ ही दबाते हुए कहा

"तेरी चूचियाँ" रूपाली ने फ़ौरन जवाब दिया

"मैं जानती थी" कल्लो ने मुस्कुरा कर जवाब दिया "पर आपके मुँह से सुनने में कितना मज़ा आता है"

अब बारी ब्लाउस की थी. एक एक करके ब्लाउस के सारे बटन खुले और फिर सामने से उसका वाइट रंग का ब्रा दिखाई देने लगा.

"उतार दे ब्लाउस" रूपाली ने कहा

"क्यूँ?"

"मुझे चूचियाँ देखनी हैं तेरी"

"क्यूँ?"

"क्यूंकी पसंद हैं मुझे"

"क्या पसंद है"

"साइज़. कितनी बड़ी हैं"

"एक शर्त पर दिखाऊँगी" कल्लो मुस्कुराती हुई बोली "आपको देखने के साथ साथ चूसनी भी पड़ेंगी"

रूपाली को वो पल ध्यान आया जब कल्लो ने ज़बरदस्ती उसके मुँह में अपना निपल घुसा दिया था.

"चूसोगी नही तो दिखाऊँगी भी नही" कल्ल ने उसको सोचते देखा तो कहा

"ठीक है. चूस लूँगी. अब खोल जल्दी" बिस्तर पर बँधी रूपाली किसी मच्चली की तरह तड़पति हुई बोली.

कल्लो ने खड़े खड़े ही सामने से अपना ब्रा नीचे खींचा और एक छाती बाहर निकाल दी.

"ब्लाउस उतार दे ना" रूपाली बेचैन होती हुई बोली

कल्लो ने मुस्कुराते हुए दूसरी छाती भी ब्लाउस से बाहर खींच ली.

"कैसा लगा?" उसने रूपाली से हस्कर पुछा

"ब्लाउस उतार" रूपाली ने फिर वही बात कही

कल्लो ने इस बार उसकी बात रख ली और मुस्कुराते हुए अपना ब्लाउस उतार दिया. अब वो सिर्फ़ एक पेटिकट और ब्रा में थी. दोनो चूचियाँ ब्रा के उपेर से बाहर झाँक रही थी.

"किसी दूसरी औरत को नंगी देखने में मज़ा आता है आपको?" उसने पुछा.

रूपाली ने फ़ौरन हां में सर हिलाया.

"मुझे फिर से नंगी देखोगी?" उसने पुछा तो रूपाली ने फिर हां में सर हिलाया. हाथ बँधे होने की वजह से

वो सिर्फ़ इतना ही कर पा रही थी.

कल्लो अपने हाथ धीरे धीरे चूचियो से हटाकर अपनी कमर तक लाई और अपने पेटिकट का नाडा एक झटके से खोल दिया. ढीला होते ही पेटिकट सरसरता हुआ नीच जा गिरा.

पॅंटी कल्लो ने पहनी नही थी इसलिए पेट्कोट के नीचे गिरते ही वो पल में नीचे से पूरी नंगी हो गयी. अब जिस्म पर सिर्फ़ एक ब्रा ही था जिसमें चूचियाँ बाहर निकली हुई थी.

रूपाली बस आँखें फाडे कल्लो को देख रही थी. मुँह से बोल एक नही फूट रहा था.

कल्लो धीरे धीरे चलती बिस्तर पर उसके करीब आई. रूपाली उसको ऐसे देख रही थी जैसे कोई बकरा कसाई को देखता हो पर दिल ही दिल में हलाल हो जाने की चाहत भी हो.

कल्लो बिस्तर पर चढ़ गयी और अपनी टाँगें रूपाली के दोनो तरफ करके उसके पेट पर बैठ सी गयी. वज़न की वजह से रूपाली एक पल के लिए ज़रा परेशान हुई पर जब नज़र उठाकर उपेर की और देखा तो ब्रा से बाहर निकली 2 बड़ी

बड़ी चूचियाँ जैसे उसके दिल दिमाग़ पर छा सी गयी. अजीब सा मंज़र था उसकी निगाहों के सामने. उन बड़ी बड़ी चूचियो के पिछे जैसे अपने उपेर बैठी कल्लो का चेहरा भी उसको नज़र नही आ रहा था.

कल्लो ने अपने आपको थोड़ा अड्जस्ट किया और रूपाली के उपेर ऐसे सवार हो गयी जैसे रूपाली को लंड लग गया हो जिसे कल्लो ने अपने अंदर ले लिया हो. हाथ कमर के पिछे ले जाकर उसने अपना ब्रा खोल दिया और पूरी तरह से नंगी

रूपाली पर झुक गयी.

उसकी बड़ी बड़ी चूचियाँ सीधा रूपाली के चेहरे पर आ गिरी. उसका चेहरा जैसे कहीं उनके बीच खो सा गया था.

कल्लो ने पहले उसका माथा चूमा, फिर उसकी आँखें, फिर उसके गाल और सरक कर उसके गले पर अपने होंठ फिराने लगी. रूपाली के होश धीरे धीरे फिर गायब से होने लगे. जिस्म एक बार फिर ढीला पड़ता जा रहा था

और हाथ बँधे होने की वजह से उसके कंधो में हो रहा दर्द भी धीरे धीरे गायब होने लगा.

कल्लो बड़ी देर तक उसके चेहरे और गले को चूमती रही. फिर वो थोड़ा उपेर की और उठी और रूपाली की नज़र से नज़र मिला कर मुस्कुराइ.

"चूसोगी मेरी चूचियाँ?" उसने रूपाली से पुछा

रूपाली के दिल में तो आया के मना कर दे पर उसने कल्लो से वादा किया था इसलिए हां में सर हिला दिया.

"मैं दिखाती हूँ के कैसे चूस्ते हैं"

कहकर वो रूपाली के उपेर सीधी होकर बैठ गयी और अपनी एक चूची को पकड़ कर उपेर को उठाया और अपना ही निपल अपने होंठो के बीच ले लिया.

रूपाली फिर हैरानी से उसकी और देखने लगी. ऐसा भी किया जा सकता है उसने कभी ख्वाबों में नही सोचा था.

उसकी चूचियाँ छ्होटी छ्होटी थी जिनको वो लाख कोशिश के बाद खुद अपने मुँह तक नही ला सकती थी पर कल्लो की इतनी बड़ी थी के बिना किसी मुश्किल से उसका बड़ा सा निपल उसके अपने ही मुँह में चला गया.

"ऐसे चूस्ते हैं" कल्लो ने एक पल के लिए रुक कर कहा और फिर से अपना निपल चूसने लगी. रूपाली बड़े ध्यान से उसको देख रही थी. अपने उपेर बैठी एक दूसरी नंगी औरत जो अपने ही जिस्म से खेल रही थी, रूपाली की कच्ची

उमर के लिए इतना ही बहुत ज़्यादा था.

थोड़ी देर बारी बारी अपने निपल्स चूसने के बाद कल्लो ने अपनी चूचियो को छ्चोड़ दिया और फिर से एक बार आगे को झुक गयी. उसकी चूचियाँ उसके और रूपाली के शरीर के बीच झूलने लगी और एक निपल सीधा रूपाली के

होंठों से आ लगा.

"मुँह खोलिए" कल्लो ने कहा तो रूपाली ने झिझकते हुए अपने होंठ खोल दिए. मुँह खुलते ही कल्लो थोड़ा सा और आगे को झुकी और उसका एक निपल रूपाली के मुँह में आ गया.

"चूसो" वो बोली.

रूपाली ने ना चाहते हुए भी अपने होंठ बंद किए और धीरे धीरे उस निपल को चूसने की कोशिश करने लगी. एक अजीब सा टेस्ट उसके मुँह में भर गया. उसको समझ नही आया के ये टेस्ट उसे पसंद आ रहा है या नही पर कल्लो से किए वादे के मुताबिक वो चुप चाप निपल चूसने लगी.

"आआअहह" कल्लो के मुँह से आह निकली "ज़ोर से चूसो ना"

उसने एक हाथ से रूपाली के बाल पकड़ लिए थे और उसका मुँह अपनी छाती की तरफ और दबाए जा रही थी . निपल के साथ साथ उसकी छाती का थोड़ा सा हिस्सा भी रूपाली के मुँह के अंदर आ गया था जिसको वो बड़ी मुश्किल से चूसने की कोशिश कर रही थी.

कल्लो ने अपने पहला निपल निकल कर दूसरा उसके मुँह में दिया जिसको रूपाली ने फिर वैसे ही चूसने की कोशिश की. इस खेल में अब थोड़ा थोडा मज़ा उसको भी आने लगा था.

"पहली बार है इसलिए आपसे ठीक से हो नही रही है. मैं सिखाती हूँ" कहते हुए कल्लो ने उसके मुँह से अपनी चूची बाहर निकाल ली और रूपाली के उपेर से हटकर बिस्तर पर बैठ गयी.

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --41

gataank se aage........................

Us raat jab Rupali ke kamre ka darwaza band hua, toh Kallo bhi uske saath andar thi aur pakde jaane ka bhi koi darr nahi tha kyunki uske maan baap bhi jaante the ke vo dono saath hain.

Kuchh der tak dono yun hi idhar udhar ki baaten karti rahi aur jab yakeen ho gaya ke baaki sab log so chuke hain toh ek baar phir 1 aurat aur ek ladki ke beech vasna ka khel shuru hua.

"Kya kar rahi hai?" Rupali ne puchha. Kallo ne usko bistar par sidha lita diya tha aur ek chunni se uske dono haath bistar ke saath baand rahi thi.

"Kal raat aap bahut haath paon patak rahi thi isliye" Kallo ne uske dono haathon ko bistar ke saath achhi tarah baand diya "Aaj raat aap bas maze lo. Jannat ki sair karati hoon aapko"

Rupali ab chah kar bhi apne haath nahi hila pa rahi thi.

"Aaj ki raat main ek mard hoon aur aap ek ladki jisko main ladki se aurat banaoongi"

"Kaise?" Rupali ke dil ki dhadkan tez ho chali

"Aapko chod kar" Kallo ne dheere se uske kaan mein kaha. Rupali ko samajh nahi aaya par vo chup rahi.

Kallo Rupali se thoda door hokar hati aur bistar ke saath khadi hokar usko dekhne lagi. Kamre mein laal rang ki halki roshni thi jismein vo ek doosre ko saaf dekh sakti thi.

"Jaldi kar na Kallo" Rupali bechani se apni taangen ek doosre ke saath ghiste hue boli "Bardasht sa nahi ho raha"

"Shhhh" Kallo ne apne hontho par anguli rakh kar kaha aur apni saree kholne lagi.

Rupali aankhen phaade usko dekh rahi thi.

Kallo ne dheere dheere apni saree ko aise khola jaise kisi mard ko rijhane ke liye strip dance kar rahi ho. Saree dheere dheere karke khuli aur neeche zameen par ja giri.

Kallo ne blouse ke uper se apni chhatiyan dabayi.

"Mujhe nangi dekhna bahut pasand hai na aapko? Aaj ki raat apne shareer ka bhog lagaoongi aapko aur aapke shareer ka bhog main khud loongi" Kallo ne kaha

Rupali bas usko dekh kar apni gardan hi hila saki.

"Kya dekhogi sabse pehle" Kallo ne apni chhatiyon ko blouse ke uper se yun hi dabate hue kaha

"Teri chhatiyan" Rupali ne fauran jawab diya

"Main jaanti thi" Kallo ne muskura kar jawab diya "Par aapke munh se sunne mein kitna maza aata hai"

Ab baar blouse ki thi. Ek ek karke blouse ke sare button khule aur phir saamne se uska white rang ka bra dikhai dene laga.

"Utaar de blouse" Rupali ne kaha

"Kyun?"

"Mujhe chhatiyan dekhni hain teri"

"Kyun?"

"Kyunki pasand hain mujhe"

"Kya pasand hai"

"Size. Kitni badi hain"

"Ek shart par dikhaoongi" Kallo muskurati hui boli "Aapko dekhne ke saath saath choosni bhi padengi"

Rupali ko vo pal dhyaan aaya jab Kallo ne zabardasti uske munh mein apna nipple ghusa diya tha.

"Choosogi nahi toh dikhaoongi bhi nahi" Kall ne usko sochte dekha toh kaha

"Theek hai. Choos loongi. Ab khol jaldi" Bistar par bandhi Rupali kici machhli ki tarah tadapti hui boli.

Kallo ne khade khade hi saamne se apna bra neeche khincha aur ek chhati bahar nikal di.

"Blouse utaar de na" Rupali bechain hoti hui boli

Kallo ne muskurate hue doosri chhati bhi blouse se bahar khinch li.

"Kaisa laga?" Usne Rupali se haskar puchha

"Blouse utaar" Rupali ne phir vahi baat kahi

Kallo ne is baar uski baat rakh li aur muskurate hue apna blouse utaar diya. Ab vo sirf ek petticot aur bra mein thi. Dono chhatiyan bra ke uper se bahar jhaank rahi thi.

"Kisi doosri aurat ko nangi dekhne mein maza aata hai aapko?" Usne puchha.

Rupali ne fauran haan mein sar hilaya.

"Mujhe phir se nangi dekhogi?" Usne puchha toh Rupali ne phir haan mein sar hilaya. Haath bandhe hone ki vajah se

vo sirf itna hi kar pa rahi thi.

Kallo apne haath dheere dheere chhatiyon se hatakar apni kamar tak laayi aur apne petticot ka nada ek jhatke se khol diya. Dheela hote hi petticot sarsarata hua neech ja gira.

Panty Kallo ne pehni nahi thi isliye pettcot ke neeche girte hi vo pal mein neeche se poori nangi ho gayi. Ab jism par sirf ek bra hi tha jismein chhatiyan bahar nikli hui thi.

Rupali bas aankhen phaade Kallo ko dekh rahi thi. Munh se bol ek nahi phoot raha tha.

Kallo dheere dheere chalti bistar par uske kareeb aayi. Rupali usko aise dekh rahi thi jaise koi bakra kasai ko dekhta ho par dil hi dil mein halal ho jaane ki chahat bhi ho.

Kallo bistar par chadh gayi aur apni taangen Rupali ke dono taraf karke uske pet par beth si gayi. Wazak ki vajah se Rupali ek pal ke liye zara pareshan hui par jab nazar uthakar uper ki aur dekha toh bra se bahar nikli 2 badi

badi chhatiyan jaise uske dil dimag par chha si gayi. Ajeeb sa manzar tha uski nigahon ke saamne. Un badi badi chhatiyon ke pichhe jaise apne uper bethi Kallo ka chehra bhi usko nazar nahi aa raha tha.

Kallo ne apne aapko thoda adjust kiya aur Rupali ke uper aise sawar ho gayi jaise Rupali ko lund lag gaya ho jise Kallo ne apne andar le liya ho. Haath kamar ke pichhe le jakar usne apna Bra khol diya aur poori tarah se nangi

Rupali par jhuk gayi.

Uski badi badi chhatiyan sidha Rupali ke chehre par aa giri. Uska chehra jaise kahin unke beech kho sa gaya tha.

Kallo ne pehle uska matha chooma, phir uski aankhen, phir uske gaal aur sarak kar uske gale par apne honth phirane lagi. Rupali ke hosh dheere dheere phir gayab se hone lage. Jism ek baar phir dheela padta ja raha tha

aur haath bandhe hone ki vajah se uske kandho mein ho raha dard bhi dheere dheere gayab hone laga.

Kallo badi der tak uske chehre aur gale ko choomti rahi. Phir vo thoda uper ki aur uthi aur Rupali ki nazar se nazar mila kar muskurayi.

"Chhosogi meri chhatiyan?" Usne Rupali se puchha

Rupali ke dil mein toh aaya ke mana kar de par usne Kallo se wada kiya tha isliye haan mein sar hila diya.

"Main dikhati hoon ke kaise chooste hain"

Kehkar vo Rupali ke uper sidhi hokar beth gayi aur apni ek chhati ko pakad kar uper ko uthaya aur apna hi nipple apne honthn ke beech le liya.

Rupali phir hairani se uski aur dekhne lagi. Aisa bhi kiya ja sakta hai usne kabhi khwabon mein nahi socha tha.

Uski chhatiyan chhoti chhoti thi jinko vo lakh koshish ke baad khud apne munh tak nahi la sakti thi par Kallo ki itni badi thi ke bina kisi mushkil se uska bada sa nipple uske apne hi munh mein chala gaya.

"Aise chooste hain" Kallo ne ek pal ke liye ruk kar kaha aur phir se apna nipple choosne lagi. Rupali bade dhyaan se usko dekh rahi thi. Apne uper bethi ek doosri nangi aurat jo apne hi jism se khel rahi thi, Rupali ki kachchi

umar ke liye itna hi bahut zyada tha.

Thodi der baari baari apne nipples choosne ke baad Kallo ne apni chhatiyon ko chhod diya aur phir se ek baar aage ko jhuk gayi. Uske chhatiyan uske aur Rupali ke shareer ke beech jhoolne lagi aur ek nipple sidha Rupali ke

honthon se aa laga.

"Munh kholiye" Kallo ne kaha toh Rupali ne jhijhakte hue apne honth khol diye. Munh khulte hi Kallo thoda sa aur aage ko jhuki aur uska ek nipple Rupali ke munh mein aa gaya.

"chooso" vo boli.

Rupali ne na chahte hue bhi apne honth band kiye aur dheere dheere us nipple ko choosne ki koshish karne lagi. Ek ajeeb sa taste uske munh mein bhar gaya. Usko samajh nahi aaya ke ye taste use pasand aa raha hai ya nahi par Kallo se kiye waade ke mutaabik vo chup chap nipple choosne lagi.

"AAAAAHHHH" Kallo ke munh se aah nikli "Zor se chooso na"

Usne ek haath se Rupali ke baal pakad liye the aur uska munh apni chhati ki taraf aur dabaye ja rahi. Nipple ke saath saath uski chhati ka thoda sa hissa bhi Rupali ke munh ke andar aa gaya tha jisko vo badi mushkil se choosne ki koshish kar rahi thi.

Kallo ne apne pehla nipple nikal kar doosra uske munh mein diya jisko Rupali ne phir vaise hi choosne ki koshish ki. Is khel mein ab thoda thoda maza usko bhi aane laga tha.

"Pehli baar hai isliye aapse theek se ho nahi rahai hai. Main sikhati hoon" Kehte hue Kallo ne uske munh se apni chhati bahar nikal li aur Rupali ke uper se hatkar bistar par beth gayi.

kramashah........................................


raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:28

खूनी हवेली की वासना पार्ट --42

गतान्क से आगे........................

"चलिए अब मैं अपनी गुड़िया रानी को सिखाती हूँ के बिस्तर पर खेल कैसे खेला जाता है"

कहते हुए वो नीचे को सरक कर रूपाली के पैरों के पास पहुँच गयी और उसके पैरों को चूम लिया.

"क्या कर रही है?" रूपाली ने पुछा तो कल्लो ने उसको चुप रहने का इशारा किया. रूपाली ने एक नाइटी पहेन रखी थी जिसके नीचे कुच्छ नही था क्यूंकी वो जानती थी के आज रात वो कल्लो के साथ क्या खेल खेलने वाली है.

कल्लो ने अपने दोनो हाथों से उसकी नाइटी को पकड़ा और उसकी टाँगो को चूमते हुए धीरे धीरे नाइटी उपेर सरकाने लगी.

रूपाली जानती थी के अब वो थोड़ी देर बाद ही पूरी तरह नंगी हो जाएगी. दिल दी धड़कन ना चाहते हुए भी तेज़ हो चली थी. एक नंगी औरत को यूँ अपने जिस्म से खेलते देख उसकी हालत खराब होती जा रही थी.

नाइटी धीरे धीरे उपेर को खिसकती हुई रूपाली की जांघों तक पहुँची, फिर थोड़ा और खिसकी और चूत से हट गयी, फिर थोडा और उपेर हुई और चूचियो के उपेर होती हुई रूपाली के गले तक आ गयी.

यहाँ आकर कल्लो को रुकना पड़ा क्यूंकी रूपाली के हाथ उपेर को बेड के साथ बँधे हुए थे. नाइटी उतारने के लिए हाथ खोलने ज़रूरी थे.

"हाथ खोलने पड़ेंगे" रूपाली ने कहा तो कल्लो ने मुस्कुराते हुए इनकार में सर हिलाया और नाइटी को वहीं गले के पास ही छ्चोड़ दिया.

एक तरह से रूपाली भी अब बिस्तर पर पूरी तरह नंगी थी. लाल रंग की रोशनी में दोनो के जिस्म चमक रहे थे. एक पूरी तरह से काला और दूसरी शरीर पूरी तरह से गोरा.

अब कल्लो फिर उसके उपेर सवार हो गयी और झुक कर रूपाली की चूचियाँ अपने हाथों में पकड़ ली.

"इनको ऐसे पकड़ा जाता है और जब तक इनको निचोड़ कर इनका रस ना निकाल दिया जाए, इनमें कोई मज़ा नही. मैं बताती हूँ कैसे"

कहते हुए कल्लो ने उसकी दोनो चूचियो को अपने हाथ में कस कर पकड़ा और धीरे धीरे दबाने लगी. रूपाली की चूचियाँ ज़्यादा बड़ी नही थी और कल्लो के हाथ में पूरी तरह समा रही थी.

रूपाली के दिमाग़ ने जैसे उसका साथ छ्चोड़ दिया था. उसके शरीर में एक अजीब सा एहसास घर कर रहा हा. जैसे जैसे कल्लो के हाथ उसकी चूचियाँ दबा रहे थे, एक अजीब सा करेंट उसके सीने से उतर सीधा दिमाग़ तक आ रहा था.

अब उसको समझ आ रहा था के क्यूँ कल्लो ने पहली बार उसको अपनी चूचियाँ दबाने को कहा था.

"दबाने के बाद इनको चूसा जाता है" कल्लो ने कहा और इससे पहले रूपाली कुच्छ समझती या कहती, उसने झुक कर उसका एक छ्होटा सा निपल अपने मुँह में ले लिया.

रूपाली के मज़े की जैसे कोई इंतेहाँ नही रही. कल्लो कभी उसके छ्होटे से निपल को ज़ोर ज़ोर से चूस्ति, तो कभी अपनी जीभ से उसकी पूरी छाती को चाटने लगती. जब वो एक चूची को चूस रही होती तो दूसरी चूची को हाथ से मसल्ने लगती. वो इतनी ज़ोर ज़ोर से दबा रही थी के रूपाली को कभी मज़ा आता तो कभी दर्द होता.

"जब तक इनको निचोड़ ना लिया जाए" उसके दबाने के अंदाज़ से रूपाली को पता चला के निचोड़ लेने से उसका क्या मतलब था. और अब ये भी समझ आ गया था के कल्लो क्यूँ अपनी चूची उससे चुसवाना चाहती थी. जितना मज़ा इस वक़्त रूपाली को आ रहा था इतना ज़िंदगी में कभी नही आया था.

"ऐसे चूसी जाती हैं चुचियाँ" कल्लो ने कहा

"चुचियाँ?" रूपाली के मुँह से अपने आप ही निकल पड़ा

"हां" कल्लो ने मुस्कुराते हुए फिर अपने हाथ रूपाली की छातियो पर कस दिए "ये आपकी चुचियाँ. मस्त हैं. जैसे कच्चे आम"

कल्लो एक बार फिर रूपाली की चूचियो पर टूट पड़ी और बारी बारी चूसने लगी पर अब उसका एक हाथ धीरे धीरे रूपाली के पेट पर से सरकता हुआ नीचे को जाने लगा. रूपाली को हल्का सा अंदेशा था के ये हाथ किस तरफ जा रहा है पर हाथ बँधे होने की वजह से वो कुच्छ कर नही सकती थी.

"कल्लूऊऊऊऊ" जैसे ही हाथ ने रूपाली की चूत को सहलाया, उसको लगा के वो फिर बेहोश हो जाएगी.

"ये दोनो कच्चे आम और ये संतरे की फाँक" कल्लो बोली और रूपाली की चूत को पूरी तरह अपने मुट्ठी में भर लिया.

"क्या कर रही है तू?" रूपाली की आँखें अब बंद हो चली थी

"एक जवान कच्ची कली को औरत बना रही हूँ" कहते हुए कल्लो रूपाली के उपेर ऐसे चढ़ गयी जैसे कोई मर्द औरत के उपेर वासना में चढ़ जाता है. अब तक जो काम धीरे धीरे आराम से हो रहा था उसमें अब तेज़ी आ गयी. दोनो के नंगे जिस्म एक दूसरे से लिपट गयी. रूपाली पूरी तरह कल्लो के नीचे थी और कल्लो कभी उसकी

चूचियाँ चूस्ति, तो कभी उसके चेहरे को पर जहाँ रूपाली का ध्यान अटका हुआ था वो उसकी चूत थी जिसको कल्लो का हाथ बुरी तरह रगड़ रहा था.

"हाए मैं मर गयी कल्लो" वो नशे की सी आवाज़ में बोली

"अभी कहाँ मर गयी तू" कल्लो ने जवाब दिया "अभी तो तेरी चूत को पता नही कितने लंड चखने हैं"

रूपाली के दिमाग़ ने फ़ौरन इस बात की तरफ इशारा किया के कल्लो आप से सीधा तू पर आ गयी थी पर इस वक़्त उसको कोई परवाह नही थी. इस वक्त तो ध्यान सारा अपनी चूत पर था.

"ज़ोर से रगड़" रूपाली खुद ही बोल पड़ी

"क्यूँ?" कल्लो के हाथ में तेज़ी आ गयी "मज़ा आ रहा है?"

"हां"

"इसको चूत कहते हैं. यहीं घुसता है मर्द का लंड"

"क्या?" रूपाली ने सवाल किया पर कल्लो ने जवाब नही दिया.

वो फिर झुक कर रूपाली के निपल्स पर टूट पड़ी. गोरी चूचियाँ इस तरह चूसे जाने से लाल पड़ गयी थी और रूपाली को हल्का हल्का दर्द भी होने लगा था.

"आराम से कर ना" रूपाली ने कहा "तकलीफ़ होती है"

"ये तकलीफ़ नही है" कल्लो उसके गले को चाटने लगी "तकलीफ़ क्या होती है ये तो तब पता चलेगा जब कोई लंड तेरी कोरी चूत का भोसड़ा बनाएगा"

कल्लो अब पूरी तरह से बदल चुकी थी. जी मालकिन, जी मालकिन करने वाली नौकरानी इस वक़्त रूपाली के जिस्म की मालकिन बन पूरी तरह तू तदाक पर आ गयी थी. पर रूपाली को उसकी ये बातें सुनकर गुस्सा आने के बजाय जैसे और मज़ा आ रहा था.

"क्या कर रही है" रूपाली को अचानक कल्लो की एक अंगुली अपनी चूत के अंदर घुसती हुई महसूस हुई

"तेरी चूत के फाटक खोल रही हूँ" कल्लो ने कहा

इससे पहले के रूपाली कुच्छ समझती, एक झटके में कल्लो की एक अंगुली उसकी कच्ची चूत के अंदर पूरी तरह घुस गयी.

"आआहह" दर्द के मारे रूपाली का शरीर काँप उठा और उसके मुँह से चीख निकल पड़ी. पर कल्लो ये बात जानती थी इसलिए फ़ौरन ही उसके होंठ रूपाली के होंठों पर आ गये और वो चीख घुटकर रह गयी.

रूपाली का पूरा शरीर काँपने लगा और दर्द की शिद्दत से उपेर नीचे होने लगा. कल्लो की एक अंगुली पूरी तरह उसकी चूत के अंदर थी और रूपाली को लग रहा था के वो मर जाएगी. कल्लो के नीचे दबी ना तो वो हिल पा रही थी और ना ही चूत से अंगुली बाहर निकाल पा रही थी.

"ऊऊम्म्म्मम ईओओओओण्ण्ण्ण" उसकी आवाज़ कल्लो के मुँह के अंदर घुट रही थी.

"बस बस" कल्लो ने अपने होंठ उसके होंठों पर रखे रखे कहा "हो गया काम"

और फिर जैसे एक दर्द की तेज़ लहर फिर रूपाली की जांघों की बीच उठी और कल्लो की दूसरी अंगुली उसकी चूत में घुसती चली गयी.

"हो गया भोसड़ा तैय्यार" कल्लो ने धीरे से कहा "अब तो बस इंतेज़ार एक लंड का है"

रूपाली को समझ नही आ रहा था के क्या हो रहा है. कल्लो की 2 अँगुलिया अब उसकी चूत में अंदर बाहर हो रही थी. कभी दर्द की एक तेज़ लहर उसकी जान निकाल देती तो कभी इतना मज़ा आता के उसका दिमाग़ सुन्न पड़ जाता. कल्लो अब भी उसके उपेर झुकी हुई उसके होंठ चूस रही थी. उपेर उसकी जीभ रूपाली के मुँह में अंदर बाहर हो रही थी, नीचे उसकी अँगुलिया चूत में.

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --42

gataank se aage........................

"Chaliye ab main apni gudiya rani ko sikhati hoon ke bistar par khel kaise khela jata hai"

Kehte hue vo neeche ko sarak kar Rupali ke pairon ke paas pahunch gayi aur uske pairon ko choom liya.

"Kya kar rahi hai?" Rupali ne puchha toh Kallo ne usko chup rehne ka ishara kiya. Rupali ne ek nighty pehen rakhi thi jiske neeche kuchh nahi tha kyunki vo jaanti thi ke aaj raat vo Kallo ke saath kya khel khelne wali hai.

Kallo ne apne dono haathon se uski nighty ko pakda aur uski taango ko choomte hue dheere dheere nighty uper sarkane lagi.

Rupali jaanti thi ke ab vo thodi der baad hi poori tarah nangi ho jaayegi. Dil di dhadkan na chahte hue bhi tez ho chali thi. Ek nangi aurat ko yun apne jism se khelte dekh uski halat kharab hoti ja rahi thi.

Nighty dheere dhere uper ko khisakti hui Rupali ki jaanghon tak pahunchi, phir thoda aur khiski aur choot se hat gayi, phir thoda aur uper hui aur chhatiyon ke uper hoti hui Rupali ke gale tak aa gayi.

Yahan aakar Kallo ko rukna pada kyunki Rupali ke haath uper ko bed ke saath bandhe hue the. Nighty utarne ke liye haath kholne zaroori the.

"Haath kholne padenge" Rupali ne kaha toh Kallo ne muskurate hue inkaar mein sar hilaya aur Nighty ko vahin gale ke paas hi chhod diya.

Ek tarah se Rupali bhi ab bistar par poori tarah nangi thi. Laal rang ki roshni mein dono ke jism chamak rahe the. Ek poori tarah se kala aur doosri shareer poori tarah se gora.

Ab kallo phir uske uper sawar ho gayi aur jhuk kar Rupali ki chhatiyan apne haathon mein pakad li.

"Inko aise pakda jata hai aur jab tak inko nichod kar inka ras na nikal diya jaaye, inmein koi maza nahi. Main batati hoon kaise"

Kehte hue Kallo ne uski dono chhatiyon ko apne haath mein kas kar pakda aur dheere dheere dabane lagi. Rupali ki chhatiyan zyada badi nahi thi aur Kallo ke haath mein poori tarah sama rahi thi.

Rupali ke dimag ne jaise uska saath chhod diya tha. Uske shareer mein ek ajeeb sa ehsaas ghar kar raha ha. Jaise jaise Kallo ke haath uski chhatiyan daba rahe the, ek ajeeb sa current uske seene se uthar sidha dimag tak aa raha tha.

Ab usko samajh aa raha tha ke kyun Kallo ne pehli baar usko apni chhatiyan dabane ko kaha tha.

"Dabane ke baad inko choosa jata hai" Kallo ne kaha aur isse pehle Ruapli kuchh samajhti ya kehti, usne jhuk kar uska ek chhota sa nipple apne munh mein le liya.

Rupali ke maze ki jaise koi intehaan nahi rahi. Kallo kabhi uske chhote se nipple ko zor zor se choosti, toh kabhi apni jeebh se uski poori chhati ko chaatne lagti. Jab vo ek chhati ko choos rahi hoti toh doosri chhati ko haath se masalne lagti. Vo itni zor zor se daba rahi thi ke Rupali ko kabhi maza aata toh kabhi dard hota.

"Jab tak inko nichod na liya jaaye" Uske dabane ke andaaz se Rupali ko pata chala ke nichod lene se uska kya matlab tha. Aur ab ye bhi samajh aa gaya tha ke Kallo kyun apni chhati usse chuswana chahti thi. Jitna maza is waqt Rupali ko aa raha tha itna zindagi mein kabhi nahi aaya tha.

"Aise choosi jaati hain chuchiyan" Kallo ne kaha

"Chuchiyan?" Rupali ke munh se apne aap hi nikal pada

"Haan" Kallo ne muskurate hue phir apne haath Rupali ki chhatiyon par kas diye "Ye aapki chuchiyan. Mast hain. Jaise kachche aam"

Kallo ek baar phir Rupali ki chhatiyon par toot padi aur baari baari choosne lagi par ab uska ek haath dheere dheere Rupali ke pet par se sarakta hua neeche ko jaane laga. Rupali ko halka sa andesha tha ke ye haath kis taraf ja raha hai par haath bandhe hone ki vajah se vo kuchh kar nahi sakti thi.

"Kalloooooooooo" Jaise hi haath ne Rupali ki choot ko sehlaya, usko laga ke vo phir behosh ho jaayegi.

"Ye dono kachche aam aur ye santre ki phaank" Kallo boli aur Rupali ki choot ko poori tarah apne mutthi mein bhar liya.

"Kya kar rahi hai tu?" Rupali ki aankhen ab band ho chali thi

"Ek jawan kachchi kali ko aurat bana rahi hoon" Kehte hue Kallo Rupali ke uper aise chadh gayi jaise koi mard aurat ke uper vaasna mein chadh jata hai. Ab tak jo kaam dheere dheere aaram se ho raha tha usmein ab tezi aa gayi. Dono ke nange jism ek doosre se lipat gayi. Rupali poori tarah Kallo ke neeche thi aur Kallo kabhi uski

chhatiyan choosti, toh kabhi uske chehre ko par jahan Rupali ka dhyaan atka hua tha vo uski choot thi jisko Kallo ka haath buri tarah ragad raha tha.

"Haaye main mar gayi Kallo" Vo nashe ki si aawaz mein boli

"Abhi kahan mar gayi tu" Kallo ne jawab diya "Abhi toh teri choot ko pata nahi kitne lund chakhne hain"

Rupali ke dimag ne fauran is baat ki taraf ishara kiya ke Kallo aap se sidha tu par aa gayi thi par is waqt usko koi parwah nahi thi. Is wat toh dhyaan sara apni choot par tha.

"Zor se ragad" Rupali khud hi bol padi

"Kyun?" Kallo ke haath mein tezi aa gayi "Maza aa raha hai?"

"Haan"

"Isko choot kehte hain. Yahin ghusta hai mard ka lund"

"Kya?" Rupali ne sawal kiya par Kallo ne jawab nahi diya.

Vo phir jhuk kar Rupali ke nipples par toot padi. Gori chhatiyan is tarah choose jaane se laal pad gayi thi aur Rupali ko halka halka dard bhi hone laga tha.

"Aaram se kar na" Rupali ne kaha "Takleef hoti hai"

"Ye takleef nahi hai" Kallo uske gale ko chaatne lagi "Takleef kya hoti hai ye toh tab pata chalega jab koi lund teri kori choot ka bhosda banayega"

Kallo ab poori tarah se badal chuki thi. Ji malkin, ji malkin karne wali naukrani is waqt Rupali ke jism ki malkin ban poori tarah tu tadak par aa gayi thi. Par Rupali ko uski ye baaten sunkar gussa aane ke bajay jaise aur maza aa raha tha.

"Kya kar rahi hai" Rupali ko achahan Kallo ki ek anguli apni choot ke andar ghusti hui mehsoos hui

"Teri choot ke phatak khol rahi hoon" Kallo ne kaha

Isse pehle ke Rupali kuchh samajhti, ek jhatke mein Kallo ki ek anguli uski kachchi choot ke andar poori tarah ghus gayi.

"Aaaahhhhhhhh" Dard ke maare Rupali ka shareer kaanp utha aur uske munh se cheekh nikal padi. Par Kallo ye baat jaanti thi isliye fauran hi uske honth Rupali ke honthon par aa gaye aur vo cheekh ghutkar reh gayi.

Rupali ka poora shareer kaanpne laga aur dard ki shiddat se uper niche hone laga. Kallo ki ek anguli poori tarah uski choot ke andar the aur Rupali ko lag raha tha ke vo mar jaayegi. Kallo ke niche dabi na toh vo hil pa rahi thi aur na hi choot se anguli bahar nikal pa rahi thi.

"OOOOMMMMM IOOOONNNN" Uski aawaz Kallo ke munh ke andar ghut rahi thi.

"Bas bas" Kallo ne apne honth uske honthon par rakhe rakhe kaha "Ho gaya kaam"

Aur phir jaise ek dard ki tez lehar phir Rupali ki jaanghon ki beech uthi aur Kallo ke doosri anguli uski choot mein ghusti chali gayi.

"Ho gaya bhosda taiyyar" Kallo ne dheere se kaha "Ab toh bas intezaar ek lund ka hai"

Rupali ko samajh nahi aa raha tha ke kya ho raha hai. Kallo ki 2 anguliyan ab uski choot mein andar bahar ho rahi thi. Kabhi dard ki ek tez lehar uski jaan nikal deti toh kabhi itna maza aata ke uska dimag sunn pad jata. Kallo ab bhi uske uper jhuki hui uske honth choos rahi thi. Uper uski jeebh Rupali ke munh mein andar bahar ho rahi thi, neeche uski anguliyan choot mein.

kramashah........................................