सेक्सी हवेली का सच compleet

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raj..
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Re: सेक्सी हवेली का सच

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 12:20

सेक्सी हवेली का सच--09



"पर क्यूँ?"रूपाली के मुँह से अपने आप ही निकल गया

"जब आपकी पति छ्होटे ठाकुर की हत्या हुई तो उसके पिछे आस पास के इलाक़े में बहुत सारे लोग मौत की नींद सोए थे मालकिन. ठाकुर साहब और आपके देवर ठाकुर तेजवीर सिंग ने आपके पति की मौत का बदला लेने के लिए आस पास के इलाक़े में दहशत फेला दी थी."

"जानती हूँ" रूपाली ने ठंडी आवाज़ में कहा " आगे बोलो"

"गाओं में एक बनिया हुआ करता था. जाने क्यूँ ठाकुर साहब को लगा के उस बानिए का कुच्छ हाथ है आपके पति की हत्या में. बस एक रात ठाकुर साहब और उनकी आदमियों ने बानिए के घर पर हल्ला बोल दिया"

बिंदिया ने बात जारी रखते हुए कहा

"ह्म्‍म्म्मम फिर?" रूपाली गौर से उसकी बात सुन रही थी

"चंदर के माँ बाप उसी बानिए के घर पर काम करते थे. उनकी किस्मत खराब के उस रात बानिए के घर पर कोई पूजा चल रही थी जिसमें हाथ बटाने के लिए उसने चंदर के माँ बाप को रात भर के लिए रोक लिया था. आधी रात के करीब ठाकुर साहब अपने आदमियों के साथ बानिए के घर पहुँचे और घर में जो कोई भी था उसे मौत के घाट उतार दिया. उन लोगों में इस बेचारे चंदर के माँ बाप भी थे" बिंदिया ने साँस छ्चोड़ते हुए कहा और थोड़ी देर के लिए चुप हो गयी.

"ये आज से करीब 9 साल पहले की बात है. तब ये चंदर मुश्किल से 7-8 साल का था. गाओं में यूँ ही कुच्छ दिन अनाथ बेचारा यहाँ वहाँ घूमता रहा. एक दिन मेरे घर खाना माँगने आया तो मैने यहीं रख लिया" बिंदिया ने बात पूरी करते हुए कहा

रूपाली को समझ नही आया के क्या कहे. बिंदिया भी अपनी बात कहकर चुप हो गयी थी. दोनो औरतें खामोश बैठी यहाँ वहाँ देखती रही. रूपाली को ठाकुर के बारे में ये सुनना अच्छा नही लगा. पहले तो वो उसके ससुर थे और अब तो रिश्ता भी बदलकर मोहब्बत का हो गया था. उसका दिल ठाकुर को ग़लत मानने को तैय्यार नही था और ना ही उनके खिलाफ कुच्छ सुनने को तैय्यार था. उसके लिए ठाकुर वही आदमी था जिनकी बाहों में वो रात भर सोती थी और जो उसे इतना चाहते थे, वो आदमी नही जो किसी के घर में घुसकर लोगों को मारना शुरू कर दे. रूपाली ने बात बदलने की सोची

"एक बात कहूँ बिंदिया?" रूपाली ने कहा

"हां मालकिन" बिंदिया ने फ़ौरन उसकी तरफ देखा

"तुम्हारी उमर कितनी होगी?"

"सही तो नही पता पर 40 के आस पास तो होगी ही. क्यूँ?" बिंदिया ने सवालिया अंदाज़ में कहा

"क्यूंकी तुम्हारा नंगा जिस्म देखकर एक पल के लिए तो मुझे लगा के कोई 20 साल की लड़की है. लगा ही नही के तुम हो, एक 18 साल की लड़की की माँ" रूपाली ने मुस्कुराते हुए कहा

"मालकिन" बिंदिया शरम से पानी पानी हो गयी"आपने ..........?"

"हां सब देखा था मैने. जब मैं यहाँ आई तो तुम उस लकड़े के उपेर चढ़ि हुई थी इसलिए मैने पिछे से देखा. तुम्हारा जिस्म तो कमाल का है बिंदिया. मैं एक पल के लिए तो पिछे हटी पर फिर देखने लगी. खुद एक औरत होते हुए भी मैं तुम्हारे जिस्म को देखकर वहीं रुक ही गयी" पायल बोली

बिंदिया शरम से आँखें नीचे किए बैठी थी. उसपर तो लग रहा था जैसे किसी ने पानी फेंक दिया हो.

"मालकिन आपने सब ,,,,,,,,,,? मुझे तो लगा था के आपने इस बात से अंदाज़ा लगाया के मैं और चंदर एक साथ कपड़े ठीक करते हुए आए थे" बिंदिया अटकते हुए बोली

"नही तुम्हारा पूरा कार्यक्रम देखा था मैने. तुम लड़के के उपेर और फिर तुम झुकी हुई. अच्छा एक बात बताओ. तुम क्या आख़िर में हमेशा ऐसे ही शोर मचाती हो?" पायल ने अपनी बात जारी रखी. उसे बिंदिया का यूँ शरमाना अच्छा लग रहा था.

बिंदिया के मुँह से बोल नही फूट रहा था. वो नज़रें नीची किए ज़मीन की तरफ देख रही थी. रूपाली को ये मौका ठीक लगा. अगर उसे बिंदिया से और बातें पता करनी हैं तो उसके लिए ज़रूरी है के बिंदिया उसके साथ पूरी तरह खुल जाए और उस काम के लिए ये ठीक मौका था.

"अच्छा अब शरमाना छ्चोड़. मुझसे क्या शर्मा रही है?" रूपाली ने बिंदिया के सर पर हाथ मारते हुए कहा "मुझे अपनी दोस्त समझ, मालकिन नही."

बिंदिया ने रूपाली की तरफ देखा और मुस्कुराइ. रूपाली को अपना काम बनता लगा

"भूख लग रही है बहुत. कुच्छ खाने को है तेरे यहाँ?" उसने बिंदिया से पुचछा

बिंदिया घर में जो कुच्छ मिला खाने के लिए ले आई

"मालकिन ज़्यादा तो कुच्छ नही है मुझ ग़रीब के घर में. जो है बस यही है" उसने चारपाई पर खाना परोसते हुए रूपाली से कहा

"अरे पगली 2 वक़्त की रोटी मिल जाए, यही काफ़ी है इंसान के लिए" रूपाली ने हसते हुए जवाब दिए

रूपाली ने खामोशी से खाना खाया और बिंदिया वहीं नीचे बैठी उसे देखती रही. रूपाली ने उसे साथ खाने को कहा पर वो नही मानी. खाना ख़तम करके रूपाली ने हाथ धोए और घूमकर झोपड़ी के पिछे वहीं आ गयी जहाँ थोड़ी देर पहले बिंदिया चुड़वा रही थी. वो वही एक पेड़ की छाँव में आकर खड़ी हो गयी.

"क्या हुआ मालकिन" पीछे से आते हुए बिंदिया ने पुचछा

"कितनी शांति है यहाँ" रूपाली ने जवाब दिया"कितना सुकून"

"शांति नही मालकिन" बिंदिया ने कहा"सन्नाटा कहिए. एक बंजर पड़ी ज़मीन पे मौत का सा सन्नाटा"

"मौत का सन्नाटा?" रूपाली हस्ते हुए बोली "और इस मौत के सन्नाटे में तुम चंदर के साथ कबड्डी खेल रही थी?"

सुनते ही बिंदिया फिर से लाल हो गयी. वो दोनो चलते हुए फिर झोपड़ी के अंदर आ गयी.

"अच्छा ये सब शुरू कैसे हुआ ये तो बता?रूपाली फिर से बैठते हुए बोली

"क्या?"बिंदिया ने कहा

"यही. चंदर के साथ कबड्डी कबड्डी का खेल" रूपाली ने जवाब दिया

"क्या मालकिन आप भी. कोई और बात कीजिए ना" बिंदिया ने बात टालने की कोशिश की

"अरे बता ना. क्या बचपन से इसे लाते ही शुरू कर दिया था?" रूपाली बोली

"नही नही. ये तो अभी साल भर पहले ही शुरू हुआ था." बिंदिया बोली

"कैसे? बता ना" रूपाली ने ऐसे पुचछा जैसे कोई बहुत मज़े की बात सुनना शुरू कर रही हो

"छोड़िए ना मालकिन" बिंदिया ने एक और बार बात बदलने की कोशिश की

"बता ना" रूपाली ज़िद पर आदि रही

"ठीक है." बिंदिया ने हथ्यार डालते हुए कहा "जब चंदर को मैं यहाँ लाई थी तो ये मुश्किल से 7-8 साल का था. पाल पोस्के बड़ा किया. ये धीरे धीरे जवान होता चला गया पर शायद मैं इसे हमेशा एक बच्चे की तरह ही देखती रही. मेरे लिए तो ये वही बच्चा था जिसे अनाथ देखकर मैं अपने घर ले आई थी."

"ह्म्‍म्म्म" रूपाली ना हामी भारी

"मेरे इस कंधे में काफ़ी चोट लग गयी थी जिसकी वजह से ये हाथ ज़्यादा पिछे की तरफ मूड नही पाता" बिंदिया ने अपने लेफ्ट कंधे पर हाथ रखते हुए कहा. " इसी वजह से नहाते वक़्त मैं अपने हाथ से कमर पर साबुन नही लगा पाती. नहाते वक़्त या तो मैं अपने मर्द को बुला लेती थी या अपनी बेटी पायल को. जब मेरा मर्द मर गया तो ये काम पायल ही करती थी. एक दिन पायल घर पर नही तो तो मैने चंदर को कह दिया. तब वो बच्चा ही था. और फिर यह सिलसिला चल निकला. कभी पायल मेरी कमर पर साबुन लगा देती और जब वो ना होती तो मैं चंदर से लगवा लेती."

"तू नंगी हो जाती थी उसके सामने? बच्चा था तो क्या हुआ?" रूपाली ने हैरत से पुचछा

"अरे नही मालकिन. घाघरा उपेर खींच लेती थी सीने तक. बस कमर थोड़ा सा खोल देती थी ताकि वो साबुन आराम से लगा सके" बिंदिया बोली

"ह्म्‍म्म्म. फिर?" रूपाली ने आगे की बात बताने के लिए कहा

"फिर मेरा मर्द मर गया. कई साल तक मैं यूँ ही अकेले रही. एक बार जिस्म की आग इस कदर बढ़ गयी के अपने आप को रोक नही पाई और चंदर के साथ जिस्मानी रिश्ता बन गया. बस तबसे ऐसा ही चल रहा है" बिंदिया ने बात ख़तम करते बोला

"ये क्या बात हुई. अरे मैं वो किस्सा सुनना चाहती हूँ जब तुम दोनो ने पहली बार किया. वो कहानी बता. हर बात को बता के उसने क्या किया ओर तूने क्या किया" रूपाली जैसे हुकुम देते हुए बोली

"मालकिन" बिंदिया को जैसे यकीन नही हुआ

"क्या मालकिन?" रूपाली बनावटी गुस्सा दिखाते हुए बोली"जैसे तूने कभी किसी औरत के साथ ऐसी बात नही की. औरतें तो अक्सर ऐसी बातें करती हैं आपस में"

"वो तो ठीक है मालकिन पर फिर भी" बिंदिया अब भी हिचकिचा रही थी

"पर वार कुच्छ नही अब बता. मैने कहा ने मुझे अपनी दोस्त ही समझ. अब जल्दी से बता. बताआआआअ नाआआआअ" रूपाली किसी बच्चे की तरह ज़िद करते हुए बोली

ठीक है आप सुनना ही चाहती हैं तो सुनिए" बिंदिया ने आह भरते हुए कहा

"बात आज से कोई एक साल पहले की है. पायल घर पर नही थी. मैं यहीं झोपड़ी में नहाती थी. रोज़ की तरह नहाने लगी और चंदर को आवाज़ देकर अपनी कमर पर साबुन लगाने को कहा. सच कहिए तो उस दिन मुझे अंदाज़ा हुआ था के वो अब बच्चा नही रहा, एक मर्द बन चुका है"

"ह्म्‍म्म्म" रूपाली हामी भरते बोली

"रोज़ की तरह मैने अपना घाघरा उपेर खींच रखा था. मेरे सीने से मेरे घुटने तक. चंदर आया और मेरी कमर पर साबुन लगाने लगा. पर उस दिन जो ग़लती मुझसे हुई वो ये थी के मैने सफेद रंग का घाघरा पहेन रखा था और अंदर कुच्छ भी नही था" बिंदिया बोली

"मतलब पानी गिरते ही घाघरा बदन से चिपक गया और तेरा सारा समान चंदर के सामने?" रूपाली हस्ते हुए बोली

"हां" बिंदिया ने भी हसके ही जवाब दिया"मुझे इस बात का अंदाज़ा ही नही था के मैं एक तरह से उसके सामने नंगी ही हूँ. वो चुपचाप मेरे पिछे खड़ा साबुन लगा रखा था. कमर तो मैने खोल ही रखी थी पर सफेद घाघरा जिस्म से चिपक जाने के कारण मेरे पिच्छला नीचे का हिस्सा भी एक तरह से उसे नज़र ही आ रहा था."

"मतलब तेरा पिच्छवाड़ा?" रूपाली ने सीधी चोट की, हस्ते हुए"तेरी गान्ड?"

बिंदिया पर जैसे घड़ो पानी गिर गया. रूपाली उसके लिए उसकी मालकिन थी, एक अच्छे घर की सीधी शरीफ बहू. उससे इस तरह की भाषा की बिंदिया को बिल्कुल उम्मीद नही थी. वो रूपाली का मुँह देखने लगी.

"ऐसे क्या देख रही है. गान्ड को गान्ड नही तो क्या गोल गप्पा कहूँ? अगर तू ऐसे शरमाएगी मेरे सामने तो तेरी मेरी दोस्ती यहीं ख़तम. मैं जा रही हूँ और फिर कभी नही आने वाली"रूपाली चारपाई से उठने को हुई

"अरे नही मालकिन" बिंदिया ने फ़ौरन से रोका "आप ग़लत समझ रही हैं. गाओं की सब औरतें ऐसी ही ज़ुबान में बात करती हैं. मैं खुद भी करती हूँ ऐसे ही बातें जब सब औरतें आपस में बैठी होती हैं तो. बस आपके मुँह से सुनके थोडा अजीब सा लगा"

"अजीब छ्चोड़. मेरे से वैसे ही बात कर जैसे तू बाकी औरतों से करती है. मैं भी तो एक औरत ही हूँ. अब आगे बता" रूपाली ने वापिस आराम से बैठते हुए कहा

"थोड़ी देर यूँ ही गुज़र गयी. वो साबुन रगड़ रहा था. अचानक मेरी नज़र सामने मेरी च्चातियों पर पड़ी तो मैने फ़ौरन अपने हाथ आगे किए. मेरा घाघरा मेरे सीने से चिपक गया था और मेरी दोनो छातियाँ सॉफ दिखाई दे रही थी. मैने फ़ौरन अपने हाथों से अपने सीने को ढका और दिल ही दिल में सोचा के अच्छा हुआ चंदर आगे की तरफ नही खड़ा."

"ह्म्‍म्म्मम" रूपाली ने फिर हामी भारी. उसका प्लान कामयाब हो रहा था. बिंदिया उससे खुल रही थी. आराम से सब बातें कर रही थी. चुदाई के ये कहानी तो बस एक ज़रिया थी. असल बात जो रूपाली मालूम करना चाहती थी वो तो हवेली के बारे में थी. पर अब इस कहानी में उसे खुद भी थोड़ा मज़ा आने लगा था. वो कान लगाकर गौर से सुन रही थी.

"तभी मुझे ध्यान आया के जो हाल आगे हैं वो पिछे भी होगा" बिंदिया ने बात जारी रखी"मैं और चंदर दोनो ही खड़े हुए थे और मैं फ़ौरन समझ गयी के पिछे से मेरी गान्ड भी सॉफ दिखाई दे रही होगी कपड़े के उपेर से. मैने फ़ौरन अपने दोनो हाथो से अपने घाघरे को झटका ताकि वो मेरे जिस्म से अलग हो जाए, चिपका ना रहे और थोड़ा आगे को होकर चंदर की तरफ पलटी. वो अजीब सी नज़र से मुझे देख रहा था. तब मुझे एहसास हुआ के मैं एक बच्चे की नही, एक जवान लड़के की आँखों में देख रही हूँ जो थोड़ी देर पहली मेरी गान्ड का नज़ारा कर रहा था."

"फिर?" रूपाली थोड़ा आगे को होते हुए बोली

"कुच्छ पल के लिए ना चंदर कुच्छ बोला और ना मैं. दोनो एक दूसरे की आँखों में आँखें डाले देख रहे थे. मुझे समझ नही आ रहा था के क्या करूँ. फिर मुझे एहसास हुआ के चंदर की नज़र नीचे को झूल गयी है. मुझे लगा के वो शर्मा रहा है पर फिर एहसास हुआ के वो असल में मेरी टाँगो के बीच की जगह की तरफ देख रहा था. मैने अपने हाथ आगे को कर रखे थे इसलिए छातियाँ तो ढाकी हुई थी पर नीचे घाघरा फिर बदन से चिपक गया था. टाँगो के बीचे की जगह हल्की हल्की दिखाई दे रही थी"

"मतलब तेरी चूत?"रूपाली ने फिर सीधी चोट की

"नही चूत नही"बिंदिया फिर हस्ते हुए बोली"वो कैसे दिखेगी. मेरे पेट पे थोड़े ही लगी है मेरी चूत. वो तो टाँगो के बीचे में है, नीचे की तरफ."

"फिर?"रूपाली भी उसके साथ हस्ने लगी

"सामने से उसे मेरी चूत के उपेर के बॉल नज़र आने लगे थे. मेरे मर्द के मरने के बाद मैं बॉल सॉफ नही किए थे इसलिए काफ़ी ज़्यादा उग गये थे. चंदर की नज़र वहीं जमी हुई थी. मैं शरम से ज़मीन में गड़ गयी. उसे फ़ौरन बाहर जाने को कहा और उसकी तरफ फिर अपनी पीठ करके खड़ी हो गयी. घाघरे को मैने फिर झटका ताकि पिछे से वो फिर मेरी गान्ड से चिपक ना जाए"

"वो गया बाहर?"रूपाली ने पुचछा

"नही बल्कि वो मेरे और करीब आ गया. मेरे पिछे खड़ा होकर फिर मेरी कमर पर हाथ लगाया. मैं सिहर उठी और उसे फिर बाहर जाने को कहा पर वो नही गया. वो धीरे धीरे मेरी पीठ सहलाने लगा. मुझे समझ नही आए के क्या करूँ इसलिए दो कदम आगे को बढ़ गयी पर वो फिर भी नही माना. वो भी आगे को आ गया. ऐसा मैने एक दो बार किया तो बिल्कुल दीवार के पास आ गयी. अब मैं और आगे नही बढ़ सकती थी और चंदर मान नही रहा था. बार बार आगे आकर मेरी पीठ सहला रहा था. मुझे कुच्छ सूझ नही रहा था. मैं बस उसे बाहर जाने को कह रही थी और वो नही मान रहा था. तभी उसने धीरे से मेरी पीठ सहलाते सहलाते अपना हाथ आगे की और बढ़के मेरी एक छाति पकड़ने की कोशिश की और बस. मेरा गुस्सा सातवे आसमान पर पहुँच गया और मैने पलटके उसे एक थप्पड़ मार दिया पर उसपर तो जैसे असर ही नही पड़ा. जैसे ही मैं पलटी और थप्पड़ मारा उसने आगे बढ़कर अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिए"

"वा" रूपाली बोली " लड़का बड़ा तेज़ है. फिर?"

"मैने मुश्किल से अपने आपको उससे अलग किया और फिर उसके मुँह पर एक थप्पड़ जड़ दिया और फिर उसकी तरफ पीठ करके खड़ी हो गयी और रोते हुए उसे बाहर जाने को कहा" बिंदिया बोली

"तू रोने लगी?" रूपाली ने फिर हैरत से पुचछा

"हां ना जाने क्यूँ मेरा रोना छूट पड़ा पर उसे मेरे रोने से जैसे कुच्छ लेना देना ही नही था. इधर मैने रोना शुरू किया और उधर वो आगे बढ़कर पिछे से मेरे साथ सटकार खड़ा हो गया. उसका पूरा जिस्म मेरे जिस्म से लगा हुआ था और उसने मेरे गले को चूमना शुरू कर दिया. सच मानिए मालकिन, मुझे लग रहा था जैसे मेरा बलात्कार हो रहा हो. ज़रा भी मज़ा नही आ रहा था"

"ह्म. फिर?"रूपाली ने पुचछा

"फिर उसने अपना वो धीरे धीरे मेरे जिस्म से रगड़ना शुरू कर दिया" बिंदिया बोली

"वो?" रूपाली ने उसे देखते हुए कहा" तेरा मतलब उसका लंड?"

"हन मालकिन" बिंदिया फिर मुस्कुराइ"वो मेरे से लंबा है इसलिए उसका लंड मेरी कमर पर लग रहा था जिसे वो रग़ाद रहा था धीरे धीरे. मुझे कुच्छ समझ नही आ रहा था के क्या करूँ और ना ही मैं कुच्छ कर रही थी. बस दीवार की तरफ मुँह किए रो रही थी और वो पिच्छ से लगा हुआ था. थोड़ी देर बाद उसने धीरे से अपने घुटने मोड और अपना लंड कपड़ो के उपेर से ठीक मेरी गान्ड पे सटा दिया और वो पहला मौका था जब मेरे जिस्म में एक अजीब सी लहर उठी"

"तुझे मज़ा आया?" रूपाली ने पुचछा

"ऐसा ही समझ लो. मैं सालो बाद एक लंड को अपने जिस्म पर महसूस कर रही थी वो भी उसके लंड को जिसे मैने अपने बेटे की तरह पाला था" बिंदिया बोली "धीरे धीरे उसका रगड़ना और तेज़ हो गया और मेरा रोना भी बंद हो गया. मुझे अब भी कुच्छ समझ नही आ रहा था और मैं चुपचाप खड़ी अपने जिस्म में उठती हरारत को महसूस कर रही थी. तभी उसका लंड एक पल के लिए मेरी गान्ड से हटा और उसने अपने हाथ भी मेरी कमर से हटा लिए. पीछे कुच्छ हरकत हुई और इससे पहले के मैं कुच्छ समझ पाती वो फिर मेरे जिस्म से आ लगा. हाथ फिर कमर पर रख दिए और लंड फिर गान्ड से सटा दिया पर इस बार एक फरक था"

"क्या?"रूपाली ने पुचछा

"इस बार उसका पाजामा उसके लंड पर नही था" बिंदिया धीरे से मुस्कुराते बोली

"पाजामा उतार दिया उसने?" रूपाली ने पुचछा

"नही बस नीचे सरका दिया था" बिंदिया बोली

"हां एक ही बात है. लंड तो बाहर आ गया था ना. फिर?" रूपाली को अब सच में कहानी सुनने में मज़ा आने लगा था

"अब उसके लंड और मेरी गान्ड के बीचे सिर्फ़ मेरा घाघरा ही था. वो पूरे ज़ोर से अपना लंड मेरी गान्ड पर दबा रहा था और मेरे गले और कमर को चूम रहा था. मैं बस खड़ी ही थी. ना कुच्छ कर रही थी और जा उसे कुच्छ कह रही थी. जो मेरे साथ हो रहा था उसमें मज़ा भी आने लगा था और दुख भी हो रहा था के मेरे साथ ये क्या हो रहा है. मैं जैसे एक नींद सी में चली गयी थी. बस अपने जिस्म पे उसका जिस्म महसूस हो रहा था. ना वो कुच्छ कह रहा था और ना मैं. तभी मुझे अपना घाघरा उपेर को होता महसूस हुआ. वो मेरे घाघरे को पकड़के नीचे से उपेर को खींच रहा था ताकि मैं नीचे से नंगी हो जाऊ. मैं दीवार के साथ सटी खड़ी थी इसलिए उपेर से वो उसे उतार नही सकता था. कोशिश करता तो मैं रोक देती इसलिए उसने नीचे से उपेर को उठना शुरू कर दिया" बिंदिया कहती रही

"फिर? तूने रोका उसे?" रूपाली साँस रोके सुने जा रही थी

"चाहती तो बहुत थी पर ना जाने मुज़ेः क्या हो गया था. उसने मेरा घाघरा उपेर उठाकर मेरी कमर तक कर दिया और मैने कुच्छ ना कहा. मेरी चूत और गान्ड खुल गयी थी और मैं बस वैसे ही खड़ी थी. अब उसका लंड सीधा मेरी गान्ड को च्छू रहा था और उसने फिर वही रगड़ना शुरू कर दिया. दोस्तो ये कहानी राज शर्मा की है यानी मेरी है अगर कोई ओर अपने नाम से इसे पोस्ट कर रहा है तो समझ लो की वो कौन होगा मेरी गान्ड के बीचो बीच अपना लंड उपेर नीचे को कर रहा था और मेरी टाँगो पर हाथ फेर रहा था, उसकी साँस भारी हो चली थी और खुद मुझ पर भी एक नशा सा चढ़ गया था. शायद इतने दिन बाद एक मर्द के इतने करीब होने से."

"ह्म्‍म्म्म" रूपाली सुनती रही

"फिर उसने वो हरकत की जिसके लिए मैं शायद तैय्यार नही थी. उसने खड़े खड़े मेरी दोनो टांगे फेलाइ और थोडा नीचे को होके खड़े खड़े ही मेरी चूत में लंड डालने की कोशिश करने लगा. मैने फ़ौरन हटने की कोशिश की पर उसने मुझे मज़बूती से पकड़ रखा था इसलिए हिल भी नही पाई. पर इसका नतीजा ये हुआ के वो चूत लंड नही डाल पा रहा था क्यूंकी मैं बहुत हिल डुल रही थी. तभी उसने ज़ोर से मेरी कमर को पकड़ा और मुझे दीवार के साथ दबा दिया ताकि मैं एक इंच भी ना हिल सकूँ और फिर चूत में लंड डालने की कोशिश करने लगा," बिंदिया बोली

"अंदर डाला उसने?" रूपाली ने पुचछा

"इतनी आसानी से कहाँ मालकिन. नया लड़का था. पहली बार किसी औरत के इतना करीब था और उपेर से हम खड़े थे, बिस्तर पे लेते हुए नही थे और उसपे मैं उसका बिल्कुल साथ नही दे रही थी. काई बार कोशिश के बावजूद भी वो लंड छूट में नही घुसा पाया और शायद इसपर खुद भी झल्ला रहा था. उसने अभी थोड़ी देर पहले ही मेरी कमर पर साबुन लगाया था जो अब भी लगा हुआ था. जब उसका लंड मेरी कमर और गांद पर रगड़ा तो उसके लंड पर भी साबुन लग गया था. ऐसे ही कोशिश करते करते उसने झल्लाके एक बार ज़ोर से धक्का मारा और इस बार लंड को घुसने की जगह मिल गयी." बिंदिया मुस्कुराते हुए बोली

"तेरी चूत में डाल दिया?"रूपाली ने ऐसा पुचछा जैसे बहुत राज़ की बात कर रही हो

"नही मालकिन. लंड घुसा तो पर चूत में नही गान्ड में" बिंदिया बोली

"क्या?" रूपाली जैसे लगभज् चिल्ला उठी "लंड गान्ड में घुस भी गया?"

"अरे साबुन से पूरा लंड चिकना हो रखा था मालकिन. उसने एक ज़ोर का धक्का मारा तो पूरा लंड गान्ड में अंदर तक घुसता चला गया" बिंदिया बोली

"पूरा का पूरा? दर्द नही हुआ तुझे?" रूपाली ने पुचछा

"हुआ ना" बिंदिया हलकसे से हस्ते बोली "मेरी चीख निकल गयी. मेरी पूरी ज़िंदगी में मेरे मर्द ने भी कभी मेरी गान्ड नही मारी थी. ज़िंदगी में पहली बार लंड गान्ड में लिया तो जैसे मुझे चक्कर आने लगा. इतनी तकलीफ़ तो तब भी नही हुई थी जब पहली बार चुदी थी"

"फिर?"रूपाली अब भी हैरानी से सुन रही थी

"फिर क्या. उसने धक्के मारने शुरू कर दिए. उसे शायद पता भी नही था के उसने लंड कहाँ डाल रखा है. उसे तो बस इस बात से मतलब था के उसका लंड मेरे अंदर आ चुका है. नया लड़का था. पता हो भी नही सकता था. लंड अंदर जाते ही उसने जल्दी से मेरी गान्ड पे धक्के मारने शुरू कर दिए. लंड गान्ड में तेज़ी से अंदर बाहर होने लगा. मेरे घुटने कमज़ोर होने लगा था और मुझे लग रहा था के मैं चक्कर खाकर गिर जाऊंगी पर उसने मुझे ऐसे पकड़ रखा था के मैं हिल भी नही पा रही थी. दोनो छातियाँ दीवार के साथ दबी हुई थी और वो मेरी कमर पकड़े मेरी गान्ड मार रहा था" बिंदिया एक साँस में बोली

"तुझे मज़ा आया?" रूपाली बोली

"बिल्कुल भी नही. अभी तो दर्द का दौर भी ख़तम नही हुआ था के वो ख़तम होने लगा" बिंदिया ने जवाब दिया

"इतनी जल्दी? कितनी देर गान्ड मारी तेरी उसने?"रूपाली ने फिर सवाल किया

"मुश्किल से एक मिनट." बिंदिया ने कहा "वो ज़िंदगी में पहली बार किसी औरत को भोग रहा था. मुझे तो हैरत थी के लंड घुसते वक़्त उसका खड़ा था वरना पहली बार तो मर्द का जोश की वजह से ढंग से खड़ा भी नही होता और ज़्यादातर तो अंदर डालने से पहले ही झाड़ जाता है पर उसके साथ ऐसा नही हुआ. उसका लंड खड़ा भी हुआ और मेरी गांद में भी गया पर नया है इस बात का सबूत जल्दी ही मिल गया. उसने पागलों की तरह एक मिनट मेरी गान्ड मारी और थोड़ी देर बाद ही अपना पानी मेरी गान्ड में छ्चोड़ दिया"

"फिर" रूपाली को हैरानी हो रही थी के कोई औरत गान्ड भी मरा सकती है

"जब उसका निकल गया तो वो यूँ ही थोड़ी देर मेरे साथ लगा खड़ा रहा. उसका चेहरा मेरे गले पर था और वो दोनो हाथों से मेरी गान्ड सहला रहा था. लंड बैठने लगा तो गान्ड में से अपने आप बाहर निकल गया. लंड निकलते ही वो पलटा और मुझे यूँ ही नंगी खड़ी छ्चोड़कर कमरे से बाहर निकल गया"


raj..
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Re: सेक्सी हवेली का सच

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 12:21

सेक्सी हवेली का सच-10 and -11

हेलो दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा सेक्सी हवेली का सच -11 लेकर आपके सामने हाजिर हूँ अब आप कहानी का मज़ा लीजिए

"मैं कुच्छ ऐसे ही दीवार के साथ लगी नंगी ही खड़ी रही" बिंदिया ने अपनी बात जारी रखी " मुझे यकीन नही हो रहा था के जिसे मैं एक छ्होटा बच्चा समझती थी वो अभी अभी मेरी गान्ड मारके गया है. समझ नही आ रहा था के मेरा बलात्कार हुआ है या मैने अपनी मर्ज़ी से अपनी गान्ड मराई है. तभी मुझे पायल के आने की आवाज़ सुनाई दी तो मैने जल्दी से कपड़े पहने"

"चंदर ने इस बारे में क्या कहा?" रूपाली ने पुचछा

"वही तो बात है ना मालकिन. आज तक मेरी चंदर से उस दिन के बारे में कोई बात नही हुई है. बस जब उसका दिल करता है तो वो मेरे पास आके इशारे से समझा देता है और अगर मेरा दिल करता है तो मैं उसे इशारा कर देती हूँ. हम में से कोई भी इस बारे में चुदाई हो जाने के बाद बात नही करता. बाकी वक़्त हमारा रिश्ता वही रहता है जो हमेशा से था." बिंदिया ने जवाब दिया

"ह्म्‍म्म्मम" रूपाली ने हामी भारी

"उस दिन वो पूरा दिन गायब रहा और रात 9 बजे से पहले घर नही आया. जब वो आया तो पायल सो चुकी थी पर मैं जाग रही थी. वो अपनी चारपाई पर जाकर चुपचाप लेट गया. खाना भी नही माँगा और सो गया. पर मेरी आँखों से नींद गायब थी. दोपहर को मेरी गान्ड मारके उसने मेरे अंदर एक आग लगा दी थी. मैं कई साल से नही चुदी थी और उस दिन मेरा दिल बेकाबू हो रहा था. समझ नही आ रहा था के क्या करूँ पर सो ना सकी. आधी रात के करीब हुलचूल महसूस हुई तो मैने चादर हटाके देखा तो वो मेरे बिस्तर के पास खड़ा था. अंधेरे में हम एक दूसरे को देख नही सके पर समझ गया था के मैं जाग चुकी हूँ. मैं थोड़ी देर ऐसे ही लेटी रही और वो यूँ ही खड़ा हुआ मुझे देखता रहा. मुझे आज तक नही पता के मैने कैसे किया पर कुच्छ देर बाद मैं अपनी चारपाई पर एक तरफ को हो गयी. वो इशारा समझ गया के मैं उसे अपनी पास आके लेटने के लिए कह रही हूँ. वो फ़ौरन चारपाई पर चढ़ गया और मेरे पास आके लेट गया.

"मैं उसकी तरफ पीठ करके लेटी थी और वो मेरा चेहरा दूसरी तरफ था. वो सीधा लेटा हुआ था. कुच्छ पल यूँ ही गुज़र गये. जब उसने देखा के मैं बस चुपचाप लेती हूँ तो उसने मेरी तरफ करवट ली और मेरे कंधे पर हाथ रखा. मुझे लगा के वो मुझे अपनी तरफ घुमाएगा पर उसने धीरे धीरे मेरे कंधे को सहलाना शुरू कर दिया और उसका हाथ धीरे धीरे मेरी पीठ से होता हुआ फिर मेरी गान्ड तक आ पहुँचा. उसने थोड़ी देर पकड़कर मेरी गान्ड को दबाया और पिछे से ही हाथ मेरी टाँगो के बीच घुसकर मेरी चूत टटोलने लगा. इस वक़्त उसे मेरी तरफ से किसी इनकार का सामना करना नही पड़ रहा था. उसने मेरी टाँगो में हाथ घुसाया और मैने उसे रोका नही. उसने मेरी चूत पर हाथ फेरना शुरू किया और तब भी मैं कुच्छ नही बोली. पर हां उसकी इस हरकत ने मेरे जिस्म में जैसे आग लगा दी. मेरी साँस भारी हो गयी और मेरे मुँह से एक आह निकल गयी. वो समझ गया के मैं भी उसके साथ हूँ और मेरे साथ सॅट गया. उसका लंड फिर मेरी गान्ड पर आ लगा और तब मुझे महसूस हुआ के वो अपना पाजामा उतार चुका था. उसके लंड और मेरी गान्ड के बीच फिर से सिर्फ़ मेरा घाघरा ही था जिसे उसने फिर एक बार उपेर को खींचना शुरू कर दिया. मुझे उसकी इस हरकत से फ़ौरन दिन की कहानी याद आ गयी और मेरा दिल सहम गया के वो कहीं से फिर से लंड गान्ड में ना घुसा दे. ये ख्याल आते ही मैं फ़ौरन सीधी होकर लेट गयी जैसे अपनी गान्ड को अपने नीचे करके उसे बचा रही हूँ. मेरा घाघरा वो काफ़ी उपेर उठा चुका था और मेरे यूँ अचानक सीधा होने से और भी उपेर हो गया. मैं जाँघो तक नंगी हो चुकी थी. मेरी दोनो आँखें बंद थी और मैं खामोशी से उसकी अगली हरकत का इंतेज़ार कर रही थी. दिल ही दिल में मुझे अपने उपेर हैरानी हो रही थी के मैं उसे रोक क्यूँ नही रही. वो मेरे बेटे जैसा था और उसे अपनी चूत देना एक पाप था पर दूसरी तरफ दिल से ये आवाज़ आ रही थी के बेटे जैसा ही तो है. मेरा अपना बेटा तो नही तो पाप कैसा. मैं इसी सोच में थी के मुझे अपने उपेर वज़न महसूस हुआ. आँखें खोली तो देखा के वो मेरे उपेर आ चुका था. मेरा घाघरा उसने और उपेर खिच दिया था और मेरी चूत खुल चुकी थी. वो मेरे उपेर आया और हाथ में लंड पकड़कर चूत में डालने की कोशिश करने लगा" बिंदिया बोले जा रही थी. अब उसे भी अपनी चुदाई की दास्तान सुनने में मज़ा आ रहा था.

"सीधे चूत में लंड? उससे पहले कुच्छ नही?" रूपाली ने पुचछा

"पहली बार ज़िंदगी में किसी औरत के नज़दीक आया था मालकिन और वो भी सिर्फ़ 16-17 साल का लड़का. उसे तो बस चूत मारने की जल्दी थी. उसे क्या पता था के एक औरत को कैसे गरम तैय्यार करते हैं. उसे तो ये तक नही पता था के चूत में लंड कैसे डालते हैं. मेरी दोनो टांगे बंद थी और वो उपेर मेरे बालों पे लंड रगदकर घुसने की जगह ढूँढ रहा था. मेरी दोनो टाँगें उसकी इस हरकत से अपने आप खुल गयी और वो ठीक मेरी टाँगो के बीच आ गया. लंड को उसने फिर चूत पर रगड़ा तो मेरे मुँह से फिर आह निकल गयी. चूत पूरी तरह गीली हो चुकी थी पर वो अब भी लंड घुसाने में कामयाब नही हो पा रहा था. लंड को चूत पर रखकर धक्का मारता तो लंड फिसलकर इधर उधर हो जाता. जब खुद मुझसे भी बर्दाश्त नही हुए तो मैने अपने घुटने मॉड्कर टांगे उपेर हवा में कर ली. गान्ड मेरी उपेर उठ चुकी थी और चूत लंड के बिल्कुल सामने हो गयी. नतीजा ये हुआ के उसके अगले ही धक्के में लंड पूरा चूत में उतरता चला गया. बहुत दिन बार चुड रही थी इसलिए मेरे मुँह से आह निकल गयी और जैसी की मुझे उम्मीद थी, लंड चूत में घुसते ही उसके पागलों की तरह धक्के शुरू हो गये. उसने कुच्छ नही किया था. ना मुझे चूमा, ना मेरे जिस्म में कोई रूचि दिखाई. बस लंड चूत में डाला और धक्के मारने शुरू. 10-12 धक्को में ही उसके लंड ने पानी छ्चोड़ दिया और उसने मेरी चूत को भर दिया. मैं झल्ला उठी. मुझे अभी मज़ा आना शुरू ही हुआ था के वो ख़तम हो गया. मुझे लगा के शायद वो रुकेगा पर उसने लंड चूत में से निकाला, मेरे उपेर से उठा और पाजामा उठाकर अपने बिस्तर पर जाकर लेट गया"

"और तू अभी तक गरम थी?" रूपाली ने पुचछा

"हां और क्या. मेरे जिस्म से तो जैसे अँगारे उठ रहे थे. मैं यूँ ही पड़ी रही. घाघरा उपेर पेट तक चढ़ा हुआ और चूत खुली हुई. मुझे ये तक फिकर नही रही के अगले ही बिस्तर पर मेरी जवान बेटी सो रही है जो किसी भी पल जाग सकती थी.चंदर मुझे ऐसी हालत में छ्चोड़के गया था के मेरा दिल कर रहा था उसे एक थप्पड़ जड़ दूं. मेरे हाथ मेरी चूत तक पहुँच गये और मैं खुद ही अपनी चूत को टटोलने लगी. उसका पानी अब तक चूत में से बाहर बह रहा था. मैं अपनी चूत मसलनी शुरू की पर दी पर जो मज़ा लंड में था वो अपने हाथ में कहा. जब मुझसे बर्दाश्त ना हुआ तो मैं बिस्तर से उठी और खुद चंदर की चारपाई के पास जा पहुँची. वो सीधा लेटा हुआ था और उसने अब तक पाजामा नही पहना था. मुझे हैरत हुई के मेरी तरह उसे भी पायल के जाग जाने की कोई परवाह नही थी. उसने गर्दन घूमकर मुझे देखा और मैने उसकी तरफ. अंधेरा था इसलिए एक दूसरे के चेहरे को सॉफ देख नही सकी. मैने अपना घाघरा खोला और नीचे गिरा दिया. नीचे से पूरी तरह नंगी होकर मैं उसकी चारपाई पर चढ़ि. उसने हिलकर साइड होने की कोशिश की पर मैने उसका हाथ पकड़कर उसे वहीं लेट रहने का इशारा किया और अपनी टाँगें उसके दोनो तरफ रखकर उसके उपेर चढ़ गयी. उसका लंड अभी भी बैठा हुआ था. मैने उसे अपने हाथ से पकड़ा और गान्ड थोड़ी उपेर उठाकर नीचे से लंड चूत पर रगड़ने लगी. वो वैसे ही लेटा रहा और मैने लंड रगड़ना जारी रखा. मेरी चूत पूरी तरह गीली और गरम थी और लंड रगड़ने से और भी ज़्यादा शोले भड़क रहे थे. थोड़ी देर लंड यूँ ही रगड़ने का अंजाम सामने आया और उसका लंड फिर खड़ा हो गया. मैने अपनी गान्ड नीचे की और लंड पूरा चूत में ले लिया." बिंदिया ने जैसे बात ख़तम करते हुए कहा

"तो तूने भी उसे बता दिया के तू भी वही चाहती है?" रूपाली ने पुचछा

"और क्या करती मालकिन. जिस्म में मेरे भी आग लगी हुई थी. वो बच्चा था इसलिए बार बार जल्दी से झाड़ जाता. उस पूरी रात मैं उससे चुड़वति रही. तब तक जब तक की मेरी चूत की आग ठंडी नही हो गयी. उस रात हम दोनो का रिश्ता पूरा बदल गया पर हमने कभी इस बारे में बात नही की. तबसे अब तक वो हर रोज़ मुझे चोद्ता है. दिन में कम से कम 3 बार तो चोद ही लेता है और कम्बख़्त ने गान्ड भी नही बख़्शी. कभी चूत मारता है तो कभी गान्ड." बिंदिया हस्ते हुए बोली

"और तू मरवा लेती है? दर्द नही होता?" रूपाली ने फिर हैरत से पुचछा

"होता है पर जब लंड घुसता है तब. बाद में मज़ा आने लगता है. अरे मालकिन औरत को लंड घुसने से मज़ा ही आता है. अब वो लंड चाहे उसके मुँह में घुसे, या चूत में या गान्ड में" (दोस्तो यही बात तो आपका दोस्त राज शर्मा कहता है जिस औरत ने अपने तीनो छेदों का मज़ा नही लिया तो क्या खाक सेक्स किया )बिंदिया ऐसी बोली जैसे सेक्स पर कोई ग्यान दे रही ही रूपाली को

"पर उसके लंड से काम चल जाता है तेरा?" रूपाली ने पुचछा

"मतलब" बिंदिया आँखें सिकोडती बोली

"अरे देखा था आज मैने दिन में जब तू उसके लंड पर कूद रही थी. थोडा छ्होटा ही लगा मुझे तो" रूपाली ने जवाब दिया

"बच्चा है वो अभी मालकिन. इस उमर में एक आम आदमी का जितना होता है उतना ही है उसका भी. पर ये कमी वो दूसरी जगह पूरी कर देता है. शुरू शुरू में जल्दी झाड़ जाता था पर अब तो आधे घंटे से पहले पानी छ्चोड़ने का नाम नही लेता. और चूत मारे या गान्ड, धक्के ऐसे मारता है के मेरा पूरा जिस्म हिला देता है. दिन में 3-4 बार चोद्के भी दोबारा चोदने को तैय्यार रहता है" बिंदिया बोली

"कभी पायल को शक नही हुआ?" रूपाली ने फिर सवाल किया

"पता नही. शायद हुआ हो. हम अक्सर ऐसे वक़्त ही चोद्ते थे जब वो कहीं बाहर गयी होती थी पर कह नही सकती." बिंदिया ने जवाब दिया

रूपाली और बिंदिया अब ऐसे बात कर रहे थे जैसे बरसो की दोस्ती थी. रूपाली जानती थी के उसका तीर निशाने पर लगा है. बिंदिया बॉटल में उतार चुकी है. वो रूपाली को वो सब बता देगी जो वो मालूम करना चाहती है और इस बात का किसी से ज़िक्र भी नही करेगी. रूपाली अच्छी तरह जानती थी के अगर ठाकुर को ये पता चला के वो उनके खानदान के बारे में नौकरों से पुछ्ती फिर रही है तो ये रूपाली के लिए ठीक ना रहता. और उपेर से वो ठाकुर को दुख भी नही पहुँचना चाहती थी इसलिए इस बात को गुप्त रखना चाहती थी.

बातों बातों में दिल धंले को आ गया था इसलिए रूपाली जानती थी के अब उसे वापिस जाना पड़ेगा. उसने बिंदिया को अगले दिन पक्का हवेली आने को कहा और अपनी कार की तरफ बढ़ चली. वो चाहती थी के अगले दिन बिंदिया हवेली आए और वो उससे वो सब मालूम कर सके जो वो करना चाहती थी.

कार चलाती रूपाली हवेली पहुँची तो हैरान रह गयी. हवेली के कॉंपाउंड में पोलीस की जीप खड़ी थी और कुच्छ आदमी एक तरफ खड़े नीची आवाज़ में कुच्छ बात कर रहे थे. रूपाली कार से उतरी और आगे बढ़ी ही थी के एक तरफ से आवाज़ आई

"सलाम अर्ज़ करता हूँ मोहतार्मा"

वो पलटी तो देखा के इनस्पेक्टर मुनव्वर ख़ान खड़ा हुआ था

"क्या हो रहा है ये सब?" रूपाली ने पुचछा

"लाश मिली है एक." इनस्पेक्टर ने जवाब दिया "यहीं हवेली के कॉंपाउंड से"

"कैसी लाश?" रूपाली ने चौंकते हुए पुचछा

"ओजी लाश तो लाश होती है" ख़ान सिगेरेत्टे का काश लेता हुआ बोला "ऐसी लाश वैसी लाश मैं कैसे बताऊं. लाश तो सब एक जैसी ही होती हैं"

"पिताजी कहाँ है?" रूपाली ने ख़ान की बात सुनकर झुंझलाते हुए पुचछा

"रूपाली" ठाकुर की आवाज़ आई. रूपाली ने फ़ौरन अपने सर पर सारी का पल्लू डाल लिया. औरों के सामने तो उसे यही दिखना था के वो अब भी ठाकुर से परदा करती है. भले अकेले में शरम के सारे पर्दे उठा देती हो.

"आप अंदर जाइए. हम आपको बाद में बताते हैं" ठाकुर ने उससे कहा और खुद ख़ान से बात करने लगे

रूपाली धीमे कदमो से हवेली के अंदर आ गयी. उसने आते हुए चारों तरफ नज़र दौड़ाई पर लाश जैसा कुच्छ दिखाई नही दिया. हां बाहर खड़े आदमी उसे देखकर नीची आवाज़ में कुच्छ बात कर रहे थे. अपने कमरे में आकर रूपाली फ़ौरन खिड़की के पास आई पर जिस तरफ उसके कमरे की खिड़की खुलती थी वहाँ से कुच्छ नज़र नही आ रहा था. थोड़ी देर बाद पोलीस की जीप हवेली के दरवाज़े से बाहर निकल गयी. उसमें बेता ख़ान अब भी सिगेरेत्टे के कश लगा रहा था.

कपड़े बदलकर रूपाली नीचे आई.

"वो ख़ान क्या कह रहा था. लाश?" उसने बड़े कमरे में परेशान बैठे ठाकुर से पुचछा

"हां. हवेली के पिच्चे के दीवार के पास मिली है. लाश क्या अब तो सिर्फ़ हड्डियाँ बची थी. सिर्फ़ एक कंकाल" ठाकुर ने परेशान आवाज़ में कहा

"हवेली में लाश?" रूपाली को जैसे यकीन नही हो रहा था "किसकी थी?"

"क्या पता" ठाकुर ने उसी सोच भारी आवाज़ में कहा "अब तो सिर्फ़ हड्डियाँ ही बाकी थी."

"पर यहाँ तो कोई आता जाता भी नही. बरसो से हवेली में कोई आया गया नही" रूपाली परेशान सी बोली

"यही बात तो हमें परेशान कर रही है. हमारी ही हवेली में एक लाश गाड़ी हुई थी और हमें ही कोई अंदाज़ा नही? ऐसा कैसे हो सकता है?" ठाकुर की आवाज़ में गुस्से झलक रहा था

raj..
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Re: सेक्सी हवेली का सच

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 12:22

"ख़ान क्या कह रहा था? उसे किसने खबर की?" रूपाली सामने सोफे पर बैठते हुए बोली

"आपके कहने पर हमने कुच्छ आदमी सुबह बुलवाए थे. हवेली के कॉंपाउंड में सफाई करने के लिए. ये लोग पिछे उगी हुई झाड़ियाँ काट रहे थे तब इनको वो लाश दिखाई दी. इन्हें में से कोई एक पोलीस को खबर कर आया. और वो ख़ान क्या कहेगा? एक मामूली पोलीस वाला है." ठाकुर ने कहा

रूपाली दिल ही दिल में ठाकुर की इस बात से सहमत नही थी. रूपाली को ख़ान उन आदमियों में से लगता था जो बॉल की खाल निकालने में यकीन रखते थे. वो शकल से ही एक खड़ूस पोलीस वाला लगता था जो हर चीज़ को अपने बाप का माल समझके हड़पने की कोशिश करते हैं

"मालकिन आपकी चाय" सुनकर रूपाली पलटी तो पिछे पायल चाय की ट्रे लिए खड़ी थी. रूपाली भूल ही गयी थी के आते हुए उसने पायल को चाय के लिए बोला था. पायल ने उसे बताया था के वो खाना तो नही पर चाय वगेरह बना सकती थी.

रूपाली ने चाय लेकर पायल को जाने का इशारा किया और फिट बात करने के लिए ठाकुर की तरफ पलटी ही थी के हवेली के कॉंपाउंड से कार की आवाज़ आई. कॉंपाउंड बड़ा होने के कारण कार से भी हवेली के बाहर के दरवाज़े से हवेली तक आने में तकरीबन 3 मिनट लगते थे. ठाकुर और रूपाली खामोशी से धीरे धीरे पास आती कार की आवाज़ सुनते रहे. कार हवेली के बाहर आकर रुकी और ठाकुर का वकील देवधर एक बाग उठाए हवेली में दाखिल हुआ. ठाकुर के हाव भाव से रूपाली समझ गयी के उन्होने ही उसे फोन करके बुलाया था. देवधर के आते ही रूपाली उठी और अपने कमरे की तरफ बढ़ गयी. वो जानती थी के ठाकुर उसके सामने वकील से बात नही करना चाहेंगे इसलिए खुद ही उठ गयी.

देवधर के बारे में सोचती रूपाली अपने कमरे में पहुँची. देवधर को उसने अपनी शादी में पहली बार देखा था. वो उसके पति पुरुषोत्तम का बहुत करीबी दोस्त था. ठाकुर के सारे बिज़्नेस के क़ानूनी पहलू वो ही संभलता था. सब कहते थे के वो पुरुषोत्तम का दोस्त कम चमचा ज़्यादा था पर रूपाली को वो हमेशा आस्तीन का साँप लगा. ऐसे साँप जो आपके ही घर में पलता है और वक़्त आने पर आपको भी डॅस सकता है. इन 10 सालों में वही एक था जो अब भी ठाकुर से रिश्ता रखे हुए था. बाकी तो अपने भी रिश्ता छ्चोड़ गये थे. ठाकुर उसकी इस हरकत को उसकी हवेली के साथ वफ़ादारी समझते थे पर रूपाली जानती थी के देवधर सिर्फ़ इसलिए आता है क्यूंकी उसे भी ठाकुर से हर महीने के लगे बँधे पैसे मिलते थे. भले ही उसने सालों से ठाकुर के लिए क़ानूनी काम कोई ना किया हो. बल्कि उसके सामने ही ठाकुर का भतीजा ठाकुर की सारी जयदाद उनकी नाक के नीचे से ले गया था और देवधर ने कुच्छ ना किया था. जो बात रूपाली को खटक रही थी वो ये थी के मरने से कुच्छ दिन पहले पुरुषोत्तम ने उसे बताया था के देवधर ने उससे 25 लाख उधर माँगे थे. किसलये वो नही जानती थी. क्या उसके पति ने देवधर को वो पैसे दिए थे ये भी वो नही जानती थी. और अगर दिए थे तो क्या देवधर ने अब तक ठाकुर को वो पैसे वापिस किए? रूपाली ने दिल में सोच लिया के वो आज रात ठाकुर से ये बात पुछेगि.

रूपाली अपनी ही सोच में थी के उसे अचानक पायल का ध्यान आया. उस बेचारी का आज हवेली में दूसरा ही दिन था और आज ही उसने ये सब देख लिया. जाने उसपे क्या गुज़री होगी सोचते हुए रूपाली ने अपने कमरे के बीच का दरवाज़ा खोला और पायल के कमरे में दाखिल हुई. पायल वहाँ नही थी. रूपाली दरवाज़ा खोलकर उस कमरे में पहुँची जहाँ उसने पायल को बाथरूम इस्तेमाल करने के लिए कहा था. बाथरूम से शवर की आवाज़ आ रही थी मतलब के पायल यहीं है. रूपाली वहीं कोने में रखी एक कुर्सी पर बैठ गयी और पायल के बाहर निकलने का इंतेज़ार करने लगी.

थोड़ी देर बाद बाथरूम का दरवाज़ा खुला और उसके साथ ही रूपाली की आँखें भी खुली रह गयी. पायल नाहकार बाथरूम से बिल्कुल नंगी बाहर निकल आई थी. उसकी नज़र कमरे में बैठी पायल पर नही पड़ी और वो सीधी कमरे में शीशे के सामने जाकर खड़ी हो गयी. उसने सर पर तोलिया लपेटा हुआ था जिससे वो अपने बॉल सूखा रही थी. रूपाली पिछे से उसके नंगे जिस्म को देखने लगी. हल्का सावला रंग, पति कमर. पायल की उठी हुई गान्ड देखकर रूपाली को उसकी माँ बिंदिया की गान्ड ध्यान में आ गयी. पायल की गान्ड भी उसकी माँ की तरह बड़ी और भरी हुई थी. पायल अब भी उससे बेख़बर अपने सर पर तोलिया रगड़ रही थी.

"यूँ नंगी बाहर ना आया कर. कमरे में कोई भी हो सकता है" रूपाली ने कहा

उसकी आवाज़ सुनते ही पायल फ़ौरन पलटी और कमरे में उसे देखकर उसके मुँह से हल्की चीख निकल पड़ी. उसने फ़ौरन हाथ में पकड़ा हुआ तोलिया अपने आगे करके अपनी छातियाँ और चूत को धक लिया. पायल के मुँह से हल्की हसी छूट पड़ी

"अरे तेरा सब देख लिया मैने. अब क्या छुपा रही है" वो मुस्कुराते हुए बोली

"आप कब आई मालकिन?" पायल ने पुचछा

"अभी जब तू नहा रही थी. यूँ नंगी ना निकल आया कर कमरे से. समझी?" रूपाली ने उससे कहा. पायल ने रज़ामंदी में सर हिलाया. वो अभी भी शरम से सर झुकाए खड़ी थी.

"कपड़े पहेन कर नीचे आ जा. राते के खाने का वक़्त हो रहा है. खाना बनाना सीख ले जल्दी से तू" कहते हुए रूपाली कमरे से बाहर निकल गयी. उसने ये सोच कर राहत की साँस ली के हवेली में लाश मिलने की खबर से पायल परेशान नही दिख रही थी.

रूपाली नीचे आई तो ठाकुर और देवधर अब भी कुच्छ बात कर रहे थे. वो वहीं दीवार की ओट में खड़ी होकर सुनने लगी

"तो अब ख़ान का क्या करना है?" ठाकुर शौर्या सिंग कह रहे थे

"उसकी आप फिकर मत कीजिए. उसे मैं संभाल लूँगा. आपको फिकर करने की कोई ज़रूरत नही." देवधर ने जवाब दिया

"और उसे ये भी समझा देना के हमारे सामने दोबारा ऐसे बात की जैसे आज कर रहा था तो उसकी लाश भी कहीं ऐसे ही गढ़ी हुई मिलेगी" ठाकुर गुस्से में बोले

"आप चिंता ना कीजिए. मुझपे छ्चोड़ दीजिए. आप बस अगले हफ्ते केस के दिन टाइम पे कोर्ट पहुँच जाइएएगा." देवधर कह रहा था

देवधर और ठाकुर उठ कर खड़े हो चुके थे. देवधर अपने सारे काग़ज़ समेट कर अपने बॅग में रख रहा था. तभी रूपाली को उपेर से पायल के सीढ़ियाँ उतरने की आवाज़ आई. वो दीवार की ओट से निकली और सर पर घूँघट डालकर किचन की तरफ बढ़ चली. उसके बड़े कमरे में आते ही ठाकुर और देवधर दोनो चुप हो गये.

रात को पायल के सोने के बाद रूपाली फिर उठकर अपने ससुर के कमरे में पहुँची. ठाकुर अब भी बड़े कमरे में ही बैठे हुए थे, चेहरे पर परेशानी के भाव लिए.

"क्या हुआ पिताजी? अब तक सोए नही आप?" रूपाली ने पुचछा. उसने देख लिया था के भूषण भी अब तक हवेली में ही था.

"नही नींद नही आ रही" ठाकुर ने जवाब दिया

रूपाली ठाकुर को पिछे जा खड़ी हुई और उनके सर पर हाथ फेरने लगी

"चलिए आपको हम सुला देते हैं" उसने प्यार से कहा

ठाकुर ने उसका हाथ पकड़ा और प्यार से घूमाकर अपने सामने बैठाया

"आप जाकर सो जाइए. आज हवेली में जो कुच्छ हुआ उसे लेकर हम थोड़ा परेशन हैं"

रूपाली ठाकुर का इशारा समझ गयी. मतलब आज रात वो चुदाई के मूड में नही थे और उसे अपने कमरे में जाकर सोने के लिए कह रहे थे. उसने कुच्छ कहने के लिए मुँह खोला ही था के सामने से भूषण चाय की ट्रे लिए आता दिखाई दिया. रूपाली चुप हो गयी और उठकर खड़ी हो गयी.

"आपको किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो हमें आवाज़ दे दीजिएगा" उसने ठाकुर से कहा

"नही आप आराम कीजिए. आप इस हवेली की मालकिन हैं, नौकर नही जो आपको हम यूँ परेशान करें. आप जाकर सो जाइए" ठाकुर ने प्यार से कहा

रूपाली अपने कमरे की तरफ चल दी. भूषण की बगल से निकलते हुए दोनो की आँखें एक पल के लिए मिली और रूपाली सीढ़ियाँ चढ़कर अपने कमरे में पहुँच गयी.

बिस्तर पर रूपाली को जैसे अपने उपेर हैरत हो रही थी. हवेली में एक लाश मिली थी जिसकी परेशानी ठाकुर के चेहरे पर सॉफ दिखाई दे रही थी. भूषण भी बोखलाया हुआ था. ऐसे महॉल में खुद रूपाली को भी परेशान होना चाहिए था पर हो इसका बिल्कुल उल्टा रहा था. वो परेशान होने के बजाय जैसे अपने अंदर एक ताक़त सी महसूस कर रही थी. हवेली में लाश मिलने की बात ने इस बात को सॉफ कर दिया था के हवेली में बहुत कुच्छ ऐसा है जो वो नही जानती. जो उसे मालूम करना था. और सबसे ज़्यादा हैरानी उसे अपने जिस्म में उठ रही आग पे था. वो पिच्छले कुच्छ दीनो से हर रात चुद रही थी और आज रात भी उसका जिस्म फिर किसी मर्द के जिस्म की तलब कर रहा था. रूपाली ने अपने दिमाग़ से ये ख्याल झटकने की कोशिश की पर बार बार उसका ध्यान अपनी टाँगो के बीच उठ रही हलचल पर जा रहा था. दिन में बिंदिया के मुँह से चुदाई की दास्तान सुनकर दोपहर से ही उसके दिल में वासना पूरे ज़ोर पर थी.

वो अपने ही ख्यालों में खोई हुई थी के बीच के दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई. पायल अपने कमरे की तरफ से दरवाज़ा खटखटा रही थी. रूपाली ने उठकर दरवाज़ा खोला

"क्या हुआ?" उसने सामने खड़ी पायल से पुचछा. पायल अब भी आधी नींद में थी. बॉल बिखरे हुए.

"मालकिन मैं आपके कमरे में सो जाऊं? डर लग रहा है" पायल ने छ्होटी बच्ची की तरह पुचछा

"कैसा डर?" रूपाली ने पुचछा

" जी वो जो आज हवेली में लाश मिली थी. बुरे बुरे सपने आ रहे हैं. मैं यहीं नीचे सो जाऊंगी" पायल जैसे रोने को तैय्यार थी.

रूपाली को उसपर तरस आ गया. आख़िर अभी बच्ची ही तो थी. और हमेशा अपनी मा के साथ सोती थी.

"आजा सो जा" रूपाली ने इशारा किया. पायल कमरे में आई तो रूपाली ने दोबारा दरवाज़ा बंद कर दिया.

पायल वहीं रूपाली के बिस्तर के पास नीचे बिछि कालीन पर आकर सो गयी. रूपाली फिर अपने बिस्तर पर जा गिरी.

आधी रात गुज़र गयी पर रूपाली की आँखों में नींद का कोई निशान नही था. उसके जिस्म में लगी आग उसे अब भी पागल किए जा रही थी. नीचे पायल जैसे दुनिया से बेख़बर सोई पड़ी थी. रूपाली ने बिस्तर पर आगे को सरक कर पायल पर नज़र डाली तो देखती रह गयी.

पायल उल्टी सोई हुई थी. उसकी कमर साँस के साथ उपेर नीचे हो रही थी. घाघरा चढ़ कर जाँघो तक आ चुका था और उसकी आधी से ज़्यादा टांगे नंगी थी. रूपाली ने उसके जिस्म को देखा तो उसकी साँसें और तेज़ हो गयी. पायल ग़रीब सही पर उसका जिस्म भगवान ने बिल्कुल उसकी माँ जैसा बनाया था. एकदम गाथा हुआ. जिस्म का हर हिस्सा जैसे तराशा हुआ था. जहाँ जितना माँस होना चाहिए उतना ही. ना कम ना ज़्यादा. उसकी गान्ड देखकर रूपाली समझ गयी के पायल ने अंदर पॅंटी नही पहेन रखी थी. शायद ज़िंदगी में कभी नही पहनी इसलिए उतारकर सोती है. कमर पर भी चोली के नीचे ब्रा के स्ट्रॅप्स नही थे. शायद वो भी उतारकर आई थी. रूपाली को वो पल याद आया जब उसने पायल को नाहकार नंगी निकलते देखा था. उसका हाथ जैसे अपने आप आगे पड़ा और बिस्तर के साइड में लेटी पायल के घाघरे को पकड़कर उपेर सरकाने लगा. घाघरा पायल के नीचे दबा हुआ था इसलिए रूपाली को उसे थोड़ा खींचना पड़ा. उसके दिल में ज़रा भी ये डर नही था के पायल जाग गयी तो क्या सोचेगी. थोडा ज़ोर लगाकर खींचा तो घाघरा पायल की गान्ड से उठकर उसकी कमर तक आ गया. पायल नींद में थोड़ा हिली. शायद गान्ड पर एसी की ठंडी हवा महसूस होने से या फिर घाघरा उपेर सरकने की हुलचूल से पर फिर दोबारा नींद में चली गयी. रूपाली एकटक उसकी खुली हुई गान्ड को देखती रही. उसकी गान्ड की गोलाई जैसे कमाल थी. रूपाली ने अपना एक हाथ आगे बढ़ाया और धीरे से पायल की गान्ड पर फिराया. ऐसा करते ही उसके मुँह से आ निकल पड़ी. टाँगो के बीचे की आग और तेज़ हो गयी और फिर उसे बर्दाश्त ना हुआ. उसने जल्दी से अपनी नाइटी उपेर खींची और पॅंटी उतारकर एक तरफ फेंक दी. अपनी टांगे फेला दी और एक हाथ से अपनी चूत मसल्ने लगी. दूसरा हाथ उसने फिर पायल की गान्ड पर रखा धीरे धीरे सहलाने लगी. रूपाली को जैसे अपने उपेर यकीन नही हो रहा था. वो एक लड़की की गान्ड देखकर उसे सहलाते हुए गरम हो रही थी और अपनी चूत मसल रही थी. एक दूसरी औरत का जिस्म उसके जिस्म में आग लगा रहा था, उसे मज़ा दे रहा था. रूपाली के दिमाग़ में फिर ख्याल आया के क्या वो ठीक है जो औरत को देखकर भी गरम हो जाती है या ये बरसो से दभी हुई वासना है जो औरत और मर्द दोनो का स्पर्श पाकर बाहर आ जाती है. एक पल के लिए आए इस ख्याल को रूपाली ने अपने दिमाग़ से निकाला और पायल की गान्ड सहलाते हुए अपनी चूत में उंगली करने लगी.

अगले दिन सुबह रूपाली की आँख खुली तो पायल उठकर जा चुकी थी. वो अपने बिस्तर से उठी और नीचे आई तो ठाकुर कहीं बाहर जा रहे थे.

"हम दोपहर तक लौट आएँगे. देवधर का फोन आया था. कह रहा थे के इनस्पेक्टर ख़ान से हमें भी उसके साथ मिल लेना चाहिए" उन्होने रूपाली को देखते हुए कहा

"जी ठीक है." रूपाली ने जवाब दिया

"आपको कहीं जाना तो नही है आज?" ठाकुर ने पुचछा

"नही कहीं नही जाना" रूपाली ने जवाब दिया

"वैसे कल कहाँ थी आप सारा दिन?" ठाकुर कार की चाबियाँ उठाते हुए बोले

"जी ऐसे ही अपनी ज़मीन के चक्कर लगा रही थी. देख रही थी के कहाँ से दोबारा शुरुआत किया जाए." रूपाली बोली

"तो कुच्छ पता चला के कहाँ से दोबारा शुरू करने वाली हैं आप?" ठाकुर ने मुस्कुराते हुए सवाल किया

रूपाली ने हां में सर हिला दिया. ठाकुर उसकी और देखकर हसे और हवेली से बाहर निकल गये.

ठाकुर के जाने के बाद रूपाली वहीं बड़े कमरे में बैठ गयी. पूरी रात सोने के बावजूद उसका पूरा जिस्म जैसे टूट रहा था. उसे समझ नही आ रहा थे के ऐसा इसलिए है क्यूंकी कल रात वो हवेली में लाश मिलने की बात से परेशान थी या इसलिए के कल रात वो चूड़ी नही थी. जो भी था, रूपाली का दिल कर रहा था के वो फिर बिस्तर पर जा गिरे. उसने घूमकर पायल को आवाज़ दी. उसकी आवाज़ सुनकर पायल और भूषण दोनो किचन से बाहर आए

"एक कप चाय ले आ ज़रा" रूपाली ने कहा और भूषण की तरफ पलटी "इसे खाना बनाते वक़्त अपने साथ रखिए और खाना बनाना सीखा दीजिए ज़रा"

"जी वही कर रहा हूँ" भूषण ने जवाब दिया. वो दोनो पलटकर फिर किचन की तरफ बढ़ गये.

रूपाली का ध्यान फिर हवेली में मिली लाश की तरफ चला गया. किसकी हो सकती थी? कब से वहाँ थी? हवेली में कोई खून हुआ हो ऐसा उसने कही सुना तो नही था फिर अचानक? वो अपने ख्यालों में ही के के तभी फोन की घंटी बज उठी. रूपाली ने आगे बढ़कर फोन उठाया

"कैसी हैं दीदी?" दूसरी तरफ से एक जानी पहचानी आवाज़ आई. ये उसके छ्होटे भाई इंदर की आवाज़ थी.

इंदर रूपाली का लाड़ला छ्होटा भाई था. वो रूपाली से 5 साल छ्होटा था और रूपाले के बचपन का खिलोना था. वो उसे बड़े लाड से रखती थी, उसकी हर बात मानती और हमेशा उसे अपने माँ बाप की डाँट से बचाती. इंदर यूँ तो दिमाग़ से बड़ा तेज़ था पर किताबें शायद उसके लिए नही बनी थी. वो बहुत ही छ्होटी उमर में स्कूल से निकल गया था और अपने बाप का काम काज में हाथ बटाया करता था. रूपाली के पिता का कपड़ों का बहुत बड़ा कारोबार था अब इंदर ही उसकी देख रेख करता था.

"ठीक हूँ. तू कैसा है?" रूपाली ने पुचछा

"मैं भी ठीक हूँ. आप तो अब याद ही नही करती. मैने पहले भी 2-3 बार फोन किया था पर किसी ने उठाया ही नही. मम्मी पापा भी आपके लिए काफ़ी परेशान थे." इंदर बोला

"हां शायद मैं इधर उधर कहीं होगी इसलिए फोन नही उठाया" रूपाली बोली

"कभी खुद फोन कर लेती दीदी. आप तो हमें भूल ही गयी" इंदर शिकायत बोला तो रूपाली को ध्यान आया के उसने महीनो से अपने माँ बाप से बात नही की थी

"वो सब छ्चोड़" रूपाली ने बात टालते हुए कहा "काम कैसा चल रहा है?"

"सब ठीक है दीदी." इंदर ने जवाब दिया "आप कुच्छ दिन के लिए घर क्यूँ नही आ जाती. उस मनहूस हवेली में आख़िर तब तक अकेली रहेंगी आप?"

रूपाली बस हलकसे इतना ही निकाल पाई

"आऊँगी. ज़रूर आऊँगी."

"अच्छा एक काम कीजिए. मैं आपसे मिलने आ जाऊं?" इंदर बोला

"नही तू मत आ मैं ही घर आ जाऊंगी" रूपाली ने फ़ौरन मना किया. उसे डर था के अगर इंदर यहाँ आ गया तो शायद उसके रास्ते में रुकावट बन सकता है

"कब?" इंदर ने पुचछा

"जल्दी ही" रूपाली प्यार से बोली

"अच्छा एक काम कीजिए. घर फोन करके मम्मी से बात कर लीजिए. मैं अभी रखता हूँ. बाद में फोन करूँगा" इंदर ने कहा

"ठीक है" रूपाली ने अपनी भाई को प्यार से अपना ध्यान रखने के लिए कहा और फोन रख दिया. ज़िंदगी में अगर कोई एक इंसान जिसे रूपाली ने सबसे ज़्यादा चाहा था तो शायद वो उसका अपना भाई था. वो अपने भाई के लिए जान तक दे सकती थी, बिना सोचे. पर वक़्त ने कितना कुच्छ बदल दिया था उसके लिए. अब एक वक़्त ये भी आया था के उसी भाई से बात किए उसे महीनो गुज़र गये थे.