सीता --गाँव की लड़की शहर में compleet

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The Romantic
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Re: सीता --गाँव की लड़की शहर में

Unread post by The Romantic » 14 Dec 2014 12:27

सीता --एक गाँव की लड़की--4

शाम के 4 बजे चुके थे। श्याम आए तो उन्हें नाश्ता दी। वे रूम में बैठ कर नाश्ता कर रहे थे। मम्मी जी नाश्ता करके पड़ोस वाली आंटी के यहाँ बैठी गप्पे लड़ा रही थी।
तभी बाहर से किसी के बोलने की आवाज आई। वो श्याम को बुला रहा था।
श्याम उनकी आवाज पहचान गए थे।
"हाँ अंकल, अंदर आइए ना। पटना से कब आए?" श्याम मुँह का निवाला जल्दी से अंदर करते हुए बोले।
इतना सुनते ही मेरी तो रूह कांप उठी। मैं अनुमान लगा ली कि शायद नागेश्वर अंकल आए हैं। तब तक अंकल अंदर आ गए। चूँकि मैं रूम में ही थी तो देख नहीं पाई परंतु उनके पदचाप सुन के मालूम पड़ गई थी।
"क्या बेटा? हर वक्त घर में ही घुसे रहते हो। मैं तो तुम्हारी शादी कर के पछता रहा हूँ। मैं यहाँ आँगन तक आ गया हूँ और तुम हो कि अभी भी घर में ही हो।"
हम दोनों की हँसी निकल पड़ी। श्याम हँसते हुए बोले," नहीं अंकल, अभी अभी आया हूँ बाहर से। भूख लग गई थी तो नाश्ता कर रहा हूँ। आप बैठिए ना तुरंत आ रहा हूँ मैं।"
"हाँ हाँ बेटा, अब तो ऐसी ही 5 मिनट पर भूख लगेगी। चलो कोई बात नहीं मैं बैठता हूँ।" अंकल भी हँसते हुए बोले और वहीं पड़ी कुर्सी खींच कर बैठ गए।
मेरी तो हँसी के मारे बुरी हालत हो रही थी। किसी तरह अपनी हँसी रोक कर रखी थी।
"पूजा और मम्मी कहाँ गई है? दिखाई नहीं दे रही है।" अंकल कुछ देर बैठने के बाद पुनः पूछे।
"अंकल मम्मी अभी तुरंत ही आंटी के यहाँ गई है और पूजा अपने कमरे में होगी टीवी देख रही।" श्याम बोले
"क्या? जाएगी कम्पीटिशन की तैयारी करने और अभी से दिन भर टीवी से चिपकी रहती है।" अंकल आश्चर्य और नाराजगी से मिश्रित आवाज में बोले और पूजा को आवाज देकर बुलाने लगे। पर पूजा शायद सो रही थी जिस वजह से वो कोई जवाब नहीं दी।
तभी श्याम बोले," रूकिए अंकल, मैं बुलवा देता हूँ।" और श्याम हमें पूजा को बुलाने कह दिए। मैं तो डर और शर्म से पसीने पसीने होने लगी, पर क्या करती?
मैंने साड़ी से अच्छी तरह शरीर को ढँक ली और लम्बी साँस खींचते हुए जाने के आगे बढ़ी। क्योंकि पूजा के रूम तक जाने के लिए जिस तरफ से जाती उसी ओर अंकल बैठे थे।
मैं रूम से निकलते ही तेजी से जाने की सोच रही थी पर मेरे कदम बढ़ ही नहीं रही थी। ज्यों ज्यों अंकल निकट आ रहे थे त्यों त्यों मेरी जान लगभग जवाब दे रही थी।
अंकल के निकट पहुँचते ही मेरी नजर खुद-ब-खुद उनकी तरफ घूम गई। चूँकि मैं घूँघट कर रखी थी जिस से उनके चेहरे नहीं देख पाई और ना ही वे देख पाए। देखी तो सिर्फ उनके पेट तक के हिस्से।
क्षण भर में ही मेरी नजर उनके पेट से होते हुए नीचे बढ़ गई और उनके लण्ड के उभारोँ तक जा पहुँची। मैं तो देख कर सन्न रह गई।
अंकल एक सभ्य नेता की तरह कुरता-पाजामा पहने थे तो उनका लण्ड लगभग पूरी तरह तनी हुई ठुमके लगा रही थी, एकदम साफ साफ दिख रही थी।
मैंने तुरंत नजर सीधी की और तेजी से आगे बढ़ गई। लगभग दौड़ते हुए पूजा के कमरे तक जा पहुँची।
कुछ क्षण यूँ ही रुकी रही फिर गेट खटखटाई। एक दो बार खटखटाने के बाद अंदर से पूजा बोली," आ रही हूँ।"
मैं गेट खुलने का इंतजार कर रही थी कि फिर से मेरी नजर नीचे बैठे अंकल की तरफ घूम गई।
ओह गोड! ये क्या। अंकल अभी भी मेरी तरफ देख रहे थे और अब तो उनका एक हाथ लण्ड पर था। मैं जल्दी से नजर घुमा ली कि तभी गेट खुली। मैं सट से अंदर घुस गई और बेड पर धम्म से बैठ के हांफने लगी। पूजा मेरी तरफ आश्चर्य से देख रही थी। उसे कुछ समझ नहीं आ रही थी कि क्या हुआ।
"क्या हुआ भाभी?" पूजा जल्दी से मेरे पास आकर बैठ गई और आश्चर्य मुद्रा में पूछी।
मैंने अपनी साँसें को काबू में करते हुए सारी बातें एक ही सुर में कह डाली।
पूजा मेरी बातें सुनते ही जोर से हँस पड़ी।मेरी भी हल्की हँसी छूट पड़ी। तभी नीचे से एक बार फिर अंकल की आवाज आई।
"पूजा बेटा, जल्दी नीचे आओ मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ।"
"बस आ रही हूँ अंकल 1 मिनट में।" पूजा भी लगभग चिल्लाते हुए जवाब दी।
"चलो भाभी, अंकल से मिलते हैं।" पूजा मेरी तरफ देखते हुए बोली।
"नहीं.नहीं. मैं यहीं रुकती हूँ। तुम मिल कर आओ।"मैंने तपाक से जवाब दी।
"चलती हो या बुलाऊँ यहीं अंकल को।" धमकी देते हुए पूजा बोली।
मैं सकपका कर तुरंत ही चलने की हामी भर दी। मैं और पूजा नीचे उतरी। पूजा अंकल के पास बैठ गई पर मैं तो एक्सप्रेस गाड़ी की तरह रूम में घुस गई। पीछे से दोनों की हँसी आ रही थी, जिसे सुन मैं भी हँस पड़ी। श्याम अब तक नाश्ता कर बाहर जाने के लिए खड़े हाथ मुँह पोँछ रहे थे। फिर वे भी बातों को ताड़ते हुए हँस पड़े और निकल गए।
श्याम बाहर जाकर अंकल से दो टुक बात किए और जरूरी काम कह के निकल गए।
अब तो दोनों पूरी तरह फ्री थे। दोनों बात करने लगे, मैं सुनना चाहती थी मगर उनकी आवाज इतनी धीमी थी कि कुछ सुनाई नहीं दे रही थी।
मैं तो अब और व्याकुल हो रही थी सुनने के लिए। लेकिन क्या कर सकती थी।
कोई 10-15 मिनट बात करने के बाद पूजा मेरे कमरे में आई और बोली," भाभी, बाहर चलो। अंकल बुला रहे हैं।"
मेरी तो पूजा की बात सुनते ही दिमाग सुन्न हो गई।
"किस लिए?"फिर भी हकलाते हुए पूछी।
मेरी हालत देख पूजा हँस दी।
"चलो तो, मुझे थोड़े ही पता है किस लिए बुला रहे हैं। वे बोले बुलाने के लिए तो आई हूँ"
"नहीं पहले बताओ क्यों बुला रहे हैं तो जाऊंगी।"
"तुम तो बेकार की परेशान हो रही हो भाभी। कल वाली बात अंकल को नहीं पता है। कोई और काम है इसलिए बुला रहे हैं।" पूजा मुझे मनाते हुए बोली।
"फिर क्या बात है?तुम तो जानती होगी।" मैं अब थोड़ी नॉर्मल होते हुए पूछी।
पूजा दाँत पीसती हुई मेरी चुची पकड़ के मसलते हुए बोली,"तुम्हारी चूत फाड़ने के लिए बुला रहे हैं।"
मैं दर्द से कुलबुला गई। किसी तरह मेरी चीख निकलते निकलते बची।
मैं थोड़ी नाराज सी होते हुए बोली,"जाओ मैं नहीं जाती।"
पूजा को भी मेरी तकलीफ महसूस हुई तो मेरी गालोँ पर किस करते हुए बोली," भाभी प्लीज, कोई भी गलत बात नहीं होगी। वे आपसे मिलना चाहते हैं इसलिए बुला रहे हैं। चलो ना अब।"

कुछ देर तक मैं सोचती रही कि क्या करूँ? पता नहीं क्यों बुला रहे हैं? पूजा लगातार प्लीज प्लीज करती रही। अंतत: मैंने चलने की हामी भर दी।
मैंने अच्छी तरह से घूँघट की और पूजा के बाहर निकल गई।मैं तो अभी तक अंदर ही अंदर डर रही थी। कहीं कल वाली बात अगर जान गए होंगे तो पता नहीं क्या होगी! यही सब सोचते मैं पूजा के पीछे पीछे चल रही थी।
अंकल के पास पहुँचते ही उनके पैर छू कर प्रणाम की और पूजा के पीछे खड़ी हो गई।अंकल के दाएँ तरफ हम दोनों खड़ी थी। मेरी तो दिल अब काफी तेजी से चल रही थी कि पता नहीं अब अंकल क्या पूछेँगे?
तभी पूजा अंकल के सामने लगी कुर्सी पर जाकर बैठ गई। अंकल के बाएँ और पूजा के दाएँ तरफ एक और कुर्सी लगी थी। शायद अंकल पहले ही पूजा द्वारा मंगवा लिए थे।
पूजा और अंकल पहले से ही तय कर लिए थे शायद कि मुझे बीच में बैठाएंगेँ।
मैं अकेली खड़ी रही, अंदर से तो शर्म से पानी पानी हो रही थी।
"पूजा, मैं तो अपनी बेटी से मिलने आया था और तुम किसे ले आई हो।"तभी अंकल पूजा से हँसते हुए पूछे। पूजा अंकल की बातें सुन जोर से हँस पड़ी,पर बोली कुछ नहीं।
"सीता बेटा, बुरा मत मानना, मैं मजाक कर रहा था। आओ पहले बैठो फिर बात करते हैं।"
कहते हुए अंकल उठे और मेरी दोनों बाजू पकड़ के कुर्सी के पास ले जाकर बैठने के लिए हल्की दबाव दिए।
मैं तो हक्की-बक्की रह गई। शरीर से तो मानो जान निकल गई थी और अगले ही क्षण कुर्सी पर बैठी थी। अंकल के छूने से मेरी एक एक रूह कांप गई थी। तभी अंकल बोले,"देखो बेटा, हम लोग एक ही घर के हैं तो यहाँ पर्दा करने की कोई जरूरत नहीं है, करना होगा तो दुनिया वालों के लिए करना पर्दा।जैसे पूजा मेरी लाडली बेटी है वैसे ही तुम भी हो आज से। जब भी मेरी जरूरत पड़े तो बेहिचक कहना।" अंकल मेरी ओर थोड़े से झुक के बोले जा रहे थे।
मन ही मन सोच रही थी कि पूजा आपकी कितनी लाडली है ये तो मैं अच्छी तरह जान ही गई हूँ।
"अजीब बात है। मैं बोले जा रहा हूँ और तुम हो कि सारी बात सुनते हुए भी अभी तक घूँघट किए हो हमसे। औरों के लिए बहू होगी पर हम लोगो के लिए तो बेटी ही हो। सो प्लीज सीता...,"
तब तक पूजा उठ के मेरे पास आई और मेरी घूँघट उठाते हुए कंधे पर करते हुए बोली," क्या भाभी, अब तो शर्म छोड़ दो।"
फिर पूजा अपनी जगह पर जाकर बैठ गई।
पूरा चेहरा पसीने से भीग के लथपथ हो गई थी। ऊपर नजर करने की बात तो दूर, हिलने की भी हिम्मत नहीं हो रही थी मेरी।
तभी अंकल अपने जेब से रूमाल निकाल के देते हुए बोले," देखो तो, घूँघट रखने से कितना नुकसान होता है।इतनी खूबसूरत चेहरे पसीने से खराब हो रही थी सो अलग और तुम परेशान थी सो अलग। लो साफ कर लो पसीना।"
अंकल थे कि मुझे लगातार खुलने के लिए विवश कर रहे थे और एक मैं थी कि शर्म कम करना तो दूर और बढ़ा ही रही थी।
अब अगर अंकल की बात नहीं मानती तो वो मुझे यकीनन पुरानी ख्याल वाली लड़की समझ बैठते। सो थोड़ी हिम्मत कर के उनके हाथ से रूमाल ले ली और पसीने पोँछने लगी।चेहरा साफ करने के बाद अपना पल्लू माथे पर कर ली। अब घूँघट करने की बात तो सोच भी नहीं सकती थी।
"गुड बेटा, अब थोड़ी थोड़ी हमारी बेटी की तरह लग रही हो" कहते हुए अंकल हँस दिए। उधर पूजा सिर्फ हम दोनों की बातें सुन कर मुस्कुरा रही थी,बोल कुछ नहीं रही थी। पता नहीं पागल क्या सोच के चुप थी।कम से कम मेरे बदले तो कुछ बोलती।
मेरी भी डर अब भाग रही थी।
"क्या बातें हो रही देवर जी?"तभी पीछे से मम्मी जी आवाज सुनाई दी जो कि अंकल को देख कर पूछी थी।
मम्मी जी की तरफ सब घूम के देखने लगे।मैं उठ के खड़ी हो गई।
"अरे बेटी,तुम बैठो ना! पूजा कुर्सी ला दो। भाभी जी, बहू आ गई तो आप गायब ही रहती हैं। अब तो बच्चों के साथ ही गप्पे लड़ाना पड़ेगा।" अंकल मम्मी को ताना देते हुए बोले।
तब तक पूजा कुर्सी ला दी।मम्मी के बैठने के बाद मैं और पूजा भी बैठ गई।मम्मी जी के साथ साथ हम सब भी अंकल की बातें सुन हँस पड़ी।
"भाभी जी, मैं अपनी बेटी को फुर्सत के अभाव में मुँह देखाई नहीं दे पाया। बस इसी कारण आते ही यहाँ आया हूँ, वर्ना आप तो ताने देते देते मेरी जान ले लेते।"अंकल मुस्कुरा कर अपनी सफाई देते हुए बोले।
अब मेरी भी समझ में आ गई थी कि अंकल क्यों बुला रहे थे।
"ही ही ही. . आप अपनी बेटी को नहीं देते ऐसा कभी हो सकता है क्या? अगर ऐसा आप सोचते भी तो सच में आपकी जान ले लेती।" मम्मी जी भी हँसते हुए बोली।
सच कहूँ तो मैं सोची भी नहीं थी कि मेरे ससुराल में इतने अच्छे परिवार मिलेंगे। मेरे ससुर जी और अंकल दोनों भाई में अकेले ही थे, और चचेरे भाई में इतना लगाव आज पहली बार देखी।
तभी अंकल बाहर गए और कुछ ही देर में हाथ में एक बड़ा पैकेट लेते आए। वो शायद बाहर गेस्ट रूम में रखे थे। आते ही मेरी तरफ बढ़ाते हुए बोले," लो बेटा, मेरी तरफ से एक छोटी सी भेंट। पसंद ना आए तो बता देना क्योंकि मैं अपनी मर्जी से लिया हूँ।"
मैं हल्की सी शर्माती हुई पैकेट ले ली।
मैं पूजा की तरफ नजर दौड़ाई तो वो मेरी तरफ देख कर अभी भी मुस्कुरा रही थी। मैं नजरें चुरा कर उसे चलने को कहा। वो भी बात को तुरंत समझ गई और उठती हुई बोली,"अंकल, आप लोग बात कीजिए मैं चाय लाती हूँ। चलो भाभी।"
इतना सुनते ही मैं जल्दी से खड़ी हुई और सीधे रूम की तरफ बढ़ गई। पूजा भी पीछे से हंसती हुई आई।
रूम में आते ही पूजा पीछे से लिपटती हुई बोली," भाभी, अभी मत खोलना पैकेट। मैं आती हूँ तो मैं भी देखूंगी सो प्लीज।"
मेरी हँसी निकल गई। मैं हँसते हुए बोली,"अच्छा ठीक है।"
फिर मेरी गालोँ पर किस कर पूजा चली गई। मैं भी पैकेट रख पूजा के आने तक बैठ के इंतजार करने लगी।


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Re: सीता --गाँव की लड़की शहर में

Unread post by The Romantic » 14 Dec 2014 12:28

सीता --एक गाँव की लड़की--5

पैकेट में क्या हो सकती है, मैं खुद परेशान थी। पर मम्मी जी के सामने दिए थे तो कुछ राहत जरूर मिली कि कोई ऐसी-वैसी चीजें तो नहीं ही होगी। फिर भी मेरे अंदर एक अलग ही उत्सुकता थी जल्द से जल्द देखने की।
पर ये पूजा पता नहीं कहाँ मर गई थी। चाय बनाने गई या चूत मरवाने जो इतनी देर लगा रही है। किसी तरह अपने मन को शांत कर रही थी।
तभी पूजा धड़धड़ाती हुई अंदर आई और आते ही बोली," भाभी अब जल्दी से खोल के दिखाओ।"
उसकी बातों पर मुझे थोड़ी शरारत सूझी।
होंठों पर कुटील मुस्कान लाते हुई पूछी,"क्या खोल के दिखाऊँ?"
सुनते ही पूजा आँख दिखाते हुए बोली,"कमीनी, अभी तो पैकेट खोलो। और कुछ खोलने की इच्छा है तो अंकल को बुलाती हूँ, फिर खोलना।"कहते हुए पूजा जाने के लिए मुड़ी कि मैं जल्दी से उसे पकड़ी।
"पूजा की बच्ची,मार खाएगी अब तू। मैं तो यूँ ही मजाक कर रही थी और तुम तो सच मान गई। चल पैकेट खोलती हूँ।" अपनी बाँहों में कसते हुए बोली। पूजा मेरी बातें सुन मुस्कुरा दी और वापस आने के लिए मुड़ गई।
फिर हम दोनों बेड पर बैठ बीच में पैकेट रखी और उसकी सील हटाने लगी।
सील हटते ही पूजा उसमें रखी थैली उठा ली।
अंदर दो थैली थी,दूसरी थैली मैं उठा के खाली पैकेट को साइड में कर दी।
"भाभी, पहले ये वाली खोलो।"पूजा अपना पैकेट मुझे पकड़ाते हुए बोली।
मैं भी हंसती हुई पैकेट ले कर उसे खोलने लगी।
मैं जानती थी अगर पूजा को खोलने कहती तो वो कभी हाँ नहीं कहेगी। अब तक तो उसकी काफी चीज मैं जान गई थी। ऐसी लड़की कभी घमंडी या खुदगर्ज नहीं होती।
तभी तो मुझे पूजा इतनी अच्छी लगने लगी थी।
थैली खुलते ही लाल रंग के कपड़े नजर आई।
पूजा जल्दी से उठा के देखने के लिए बेड पर रख खोलने लगी।
पूरी तरह से खुलते ही हम दोनों की मुख से Wowwwww! निकल पड़ी।
बहुत ही खूबसूरत नेट वाली लहंगा साड़ी थी जो कि रेशम की थी।
Red और Maroon कलर की थी, जिस पर तिरछी डाली की तरह गोल्ड कलर की डिजाइन बनी हुई थी। जिसके ऊपर stones से काम की हुई थी, जो कि एक बिगुल की तरह लग रही थी। बॉर्डर पर काफी सुंदर Lace से काम किया हुआ था।
कढ़ाई भी बहुत अच्छी से की हुई थी। ठीक से देखने पर भी कोई त्रुटि नहीं मिलती।
मेरी हो आँखें फटी की फटी रह गई इतने महँगे साड़ी देख कर।
तभी पूजा के हाथों में ब्लॉउज देखी, जो कि देख के मंद मंद मुस्कान दे रही थी। मैं देखी तो एक बारगी शर्मा गई थी।
ब्लॉउज Off-Shoulder डिजाइन की थी, जिस पर नाम मात्र की हल्की Work की हुई थी। बहुत ही खूबसूरत लग रही थी।
मैं तो ये सोचने लगी कि ऐसी ब्लॉउज मैं गाँव में कैसे पहन सकती हूँ।
"भाभी, इस ड्रेस में पूरी कयामत लगेगी। जो भी देखेगा, देखता ही रह जाएगा।"पूजा हंसती हुई बोली।
मैं तो सोच के ही शर्मा गई।
"भाभी, जल्दी से एक बार पहन के दिखाओ ना। सच कहती हूँ काफी सुंदर लगोगी।"
"नहीं, मुझे नहीं पहननी।"
"प्लीज भाभी,सिर्फ एक बार।फिर जल्दी से खोल देना।"पूजा गिड़गिड़ाते हुए मनाने लगी।
मुझे तो काफी हँसी आ रही थी पूजा की इस प्यारी अदा को देख कर।
फिर मैं हामी भरते हुए बोली," अच्छा ठीक है, पर अभी दूसरी पैकेट बाकी है देखने की। उसे भी देख लेंगे फिर पहन के दिखा दूंगी।"
"Thanks भाभी।" पूजा कहते हुए जल्दी से साड़ी समेटने लगी। मैं भी साथ समेट कर उसी पैकेट में रख दी।
फिर दूसरी पैकेट खोलने के लिए बैठ गई।
पहली पैकेट में तो इतनी अच्छी साड़ी मिली जो कि Latest डिजाइन और बहुत ही खूबसूरत के साथ साथ काफी महँगी भी थी।
अब इस पैकेट में कितनी अच्छी और कितनी महँगी होगी।
मैं अगर कितनी भी अनुमान लगाती तो वो विफल ही होती। पूजा और मैं दोनों काफी उत्सुक थे देखने के लिए।
पैकेट खुलते ही मेरी तो आँखें चौँधिया गई।
पूजा भी Wowwww भाभी! कहती हुई एक टक देख रही थी।
गहने से भरी चमचमा रही थी।
पूजा एक एक कर निकालने लगी। मैं तो सिर्फ निहारे ही जा रही थी।
सारे गहने एक दम नई डिजाइन की थी।नेकलेस सेट तो देखने लायक थी। गोल्ड मीनाकारी कलर की बहुत ही खूबसूरत हार थी, जिस पर बहुत ही फैन्सी वर्क की हुई थी। साथ में लटकी हुई छोटी छोटी झुमकी और भी कयामत बना रही थी।
माँग टीका भी बहुत प्यारी थी जिस पर Stone और Diamond जड़ी हुई थी।
सोने की मध्यम सी मोटी मंगलसूत्र तो अद्भुत थी।
साथ ही कान के लिए 3 अलग अलग डिजाइन की रिंग और हुप्स थी। नाक की एक दम छोटी सी पिन, सभी उँगली के लिए अँगूठी, तारीफ के काबिल पायल।
मैं तो हर एक चीज देख हैरान थी। ऐसा नहीं था कि मेरे पास ये सब नहीं थी, थी मगर इतनी सुंदर और महँगी नहीं थी। मैं तो मंत्रमुग्ध हो एक टक देखी जा रही थी।
और ये सोने की घड़ी देख तो मैं मचल सी गई।
सच कहूँ तो मैं अब पूरी तरह से अंकल की दीवानी हो चुकी थी। कोई सगे भी इतनी महँगी गिफ्ट नहीं देता है।
मन तो कर रही थी कि अभी ये सारी गहने और कपड़े पहन के अंकल के बाँहों में जा गिरूँ।
मगर इतनी जल्दी अगर कहती भी तो पूजा जैसी लड़की कुछ और ही समझ लेती। भले ही अभी वो कुछ भी कह लेती मगर वो तो मुझे एक चालू लड़की की नाम जरूर दे देती जो सिर्फ दिखाने के लिए शरीफ बनती है। मन में ही अंकल के प्यार को कुछ दिनों के लिए दबा देने में ही भलाई थी।अंत में एक चीज देख तो हम दोनों एक साथ चौंक पड़ी।
फिर पूजा हंसती हुई हाथ में उठा ली।
एक दम नई मॉडल की मोबाइल फोन थी ये।पूजा जल्दी से ऑन की। ऑन होते ही उसके चेहरे पर एक नाराजगी सी आ गई। उसने फोन मेरे हाथ में पकड़ा के बाहर निकल गई।मैं भी मोबाइल में देखी कि आखिर क्या हुआ इसे।
ओह। इसमें Insert Sim लिखी थी। अब समझ में आ गई कि पूजा कहाँ गई है।मैं भी गेट के पास जा कर सुनने लगी कि क्या कहती है पूजा अंकल से।
"अंकल,फोन आप दिए तो उसमें Sim कौन डालेगा?" अंकल से गुस्से में बोली।
"ओह सॉरी पूजा, Sim मेरे जेब में ही रह गई।"
कहते हुए अंकल हँस दिए। साथ में मम्मी जी की भी हँसी सुनाई दी।
"पहले एक तंग करती थी और अब दो दो बेटी तंग करेगी। झेलते रहिएगा।"मम्मी बोली।

अंकल उठ के तेजी से बाहर की तरफ निकल गए। पूजा और मम्मी एक-दूसरे की तरफ देख हँस दिए। मैं भी अंदर में मुस्कुरा रही थी।
कुछ ही क्षण में बाहर से अंकल के आने की आहट हुई।
तब तक मम्मी जी उठ के बाथरूम की तरफ चली गई। अंकल आते ही मुझे आवाज देते हुए बोले...
"लो सीता बेटा, अपना Sim लो।"
मैं थोड़ी सी सकपका गई,पर तुरंत ही संभलते हुए बाहर की तरफ चल दी।
पूजा और अंकल दोनों कुछ ही फासले पर खड़े थे। मैं आहिस्ते से बढ़ते हुए अंकल के पहुँची और हाथ बढ़ा दी। अंकल हल्की मुस्कान देते हुए Sim दे दिए।
मैं बिना कुछ बोले वापस जाने के लिए आधी ही मुड़ी थी कि अंकल बोले।
"सीता, मेरा उपहार तो पसंद आया ना?"
मैं तो पसीने पसीने हो गई कि अब क्या जवाब दूँ! कुछ ना बोलती तो ये गलत होती।
मैं हिम्मत की और हाँ में अपना सिर हिला दी।
मेरी इस हरकत से अंकल कुछ अलग ही अंदाज में बोले,"पूजा, सीता गुटखा खाती है क्या जो कुछ बोलती नहीं है?"
इतना सुनते ही पूजा और अंकल दोनों जोर से हँस पड़े।
मैं भी अपने आप को नहीं रोक पाई और रोनी सी सूरत बनाते हुए सिर्फ इतना ही कह पाई,"अंकललललललल...."
अंकल अगले ही क्षण हँसते हुए मुझे अपने सीने से लगा लिए।
मैं भी बिना कोई मौका गँवाए अंकल के सीने से चिपक गई।
अंकल के सीने से लगते ही मैं एक रोमांच से भर गई थी।
तभी नीचे मेरे पेट कुछ चुभती हुई महसूस हुई।मैं समझते हुई देर नहीं कि क्या है? ये अंकल का तगड़ा लण्ड था जो कि पूरा तना हुआ था।मैं तो पानी पानी हो गई।
चूँकि अंकल काफी लम्बे थे तो मैं उनके कंधे तक ही आ पाती थी।वर्ना अंकल का विशाल लण्ड मेरी साड़ी फाड़ती हुई सीधी मेरी चूत में जा समाती।
मैं ठीक से संतुलन नहीं बना पा रही थी क्योंकि उनका लण्ड सीधा मेरे पेट को धक्का दे रहा था। मैं अपना सिर अंकल के सीने से चिपकाए थी पर मेरी पेट से नीचे करीब 8 इंच बाहर थी।
मैंने इसी अवस्था में थोड़ी सी ऊपर उठी और फिर नीचे हुई। जिससे अगले ही पल हल्की नीचे की तरफ हुई। मैंने और जोर लगाते हुए लण्ड को नीचे की दबाते हुए पूरी तरह चिपकने की कोशिश की।
किंतु उनका लण्ड अभी भी राजी नहीं थी बैठने के लिए। वो लगातार मुझे बाहर की धकेल रही थी।
अनायास ही मेरे मन में सवाल गूँज उठी कि चंद दिनों बाद जब ये लण्ड मेरी चूत को फाड़ेगा तो मेरी जान ही निकल जाएगी।
अंकल के हाथ मेरी पीठ पर थी और दूसरे हाथ से मेरी बाल को ऊपर से नीचे की तरफ लगातार सहला रहे थे।
अब तक तो अंकल भी समझ गए होंगे कि मैं भी उनके लंड से मजे ले रही हूँ। तभी बगल में खड़ी पूजा की आवाज आई,"अंकल, नई बहू के आते ही आप तो हमें भूल ही जाएँगे, ऐसा लग रहा है।"
अंकल हँसते हुए पूजा की बाँहेँ पकड़ अपनी तरफ खींचते हुए बोले,"अरे नहीं मेरी बच्ची, मैं किसी को नहीं भूल सकता। अब तो पहले से और ज्यादा समय देना होगा आप लोगों को।" और अगले ही पल पूजा भी मेरी बगल से अंकल के सीने में सटी हुई थी।
मैं भी पूजा को थोड़ी सी जगह देने की सोच एक तरफ खिसक गई।
मेरे हटते ही अंकल की भीमकाय लण्ड आजाद हो गया।
अब वो मेरी और पूजा के कमर के बीच दब रही थी। पूजा तुरंत ही इस स्थिति को भांप गई। वो मुस्काती हुई हमें हल्की सी धक्का दे दी। मैं उसकी तरफ देखी तो वो अपनी गोल आँखें नचाती हुई नीचे लण्ड की तरफ इशारा कर दी।
मैं तो डर और शर्म से भर गई और अपनी नजरें नीचे कर ली और अंकल से पुनः चिपक गई।
अंकल अपना चेहरा नीचे करते हुए मेरे गाल के काफी पास लाते हुए बोले,"सीता बेटा,मेरे मन में एक इच्छा जग गई है।अगर तुम हाँ करेगी तो मैं कहूंगा।"
मैं तो सोच में पड़ गई कि अंकल की क्या इच्छा है। सेक्स के लिए तो नहीं कहेंगे। ऐसी सोच दिमाग में आते ही मैं संकोच से भर गई।एक बारगी तो मैं अंकल की हर इच्छा पूरी करने की सोच रखी थी पर आज पहली मुलाकात में कुछ अटपटा लग रहा था।
फिर भी मैं सुनना चाहती थी कि आखिर अंकल क्या कहते हैं तो मैंने एक शब्द में "क्या....."कह अंकल के जवाब का इंतजार करने लगी।
कुछ क्षण पश्चात अंकल बोले,"बहू, मेरी इच्छा थी कि अगर आपको मेरा तोहफा पसंद आया है तो प्लीज एक बार मैं आपको उन कपड़े और जेवर में देखना चाहता हूँ।बस यही मेरी तमन्ना है। और हाँ...जरूरी नहीं कि आपको अभी ही पहननी है।जब भी आपको ठीक लगे तब आप दिखा देना।"
मैं अंकल की इच्छा सुन शर्म से पूजा की तरफ देख हल्की सी मुस्कान दी। पूजा भी हमें देख हँस रही थी।
अंकल को अब ना कहने की तो सोच भी नहीं सकती थी। मैं अंकल के कमीज के बटन पर उँगली फिराते हुए बोली,"ठीक है अंकल, मैं पहन के दिखा दूंगी"
अंकल हाँ सुनते ही हम दोनों को जोर से भीँचते हुए और अंदर चिपका लिए।
अब मेरी संकोच बहुत हद तक जा चुकी थी।
मेरी आँखे आनंद से बंद सी होने लगी थी अंकल की बाँहों में। पर किसी तरफ आँखें खोलते हुए पूजा की तरफ देखी तो वो नीचे इशारा करते हुए कुछ कहने की कोशिश कर रही थी। मैं भी ठीक से समझने की कोशिश की तो वो शायद अंकल के लण्ड की साइज के बारे में कह रही थी।
मैं शर्माते हुए पूजा की तरफ अपनी कमर से हल्की धक्का दे कर साइज मापने की कोशिश की।
हे भगवान! लण्ड तो हम दोनों की कमर से बाहर जा रही थी।
इतनी बड़ी देख मैं तो हैरान रह गई। पता नहीं पूजा कैसे झेलती होगी।
पूजा मेरी हालत देख मंद मंद मुस्कुरा रही थी।
मैं पुनः अपनी आँखें बंद कर अंकल के सीने से लग गई।
तभी अंकल की अगली हरकत देख मैं तो शर्म से मरी जा रही थी।


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Re: सीता --गाँव की लड़की शहर में

Unread post by The Romantic » 14 Dec 2014 12:28

सीता --एक गाँव की लड़की--6

अंकल पूजा की पीठ पर से हाथ हटाते हुए उसकी गाल पर ले गए और प्यार से उठाते हुए अपने चेहरे की तरफ कर लिए।
फिर अपने होंठ पूजा के होंठों के काफी निकट ले जाते हुए बोले,"मैं तो अपनी बेटी के प्यार से धन्य हो गया हूँ।मैं उनका सदा आभारी रहूँगा जिन्होंने मुझे इतनी प्यारी बेटियाँ दी है।" इतना कहने के साथ ही अंकल के होंठ पूजा की प्यारी होंठो से चिपक गए।
पूजा भी अपनी आँखें बंद कर अंकल को अपनी सहमति दे दी।
इधर मैं इन दोनों की स्थिति देख पसीने से भीँग सी गई थी। ना हटते बन रही थी और ना रहते। इतनी देर से लण्ड की ठोकरेँ खाते मैं वैसे ही पानी बहा रही थी। अब तो और भी बर्दाश्त से बाहर हो रही थी। अंकल एक तरफ से मुझे बाँहों में कसते हुए दूसरी कुंवारी कन्या की रस चुस रहे थे।
कुछ ही देर में दोनों के होंठ जुदा हो गए।
इतनी गहरी किस कर रहे थे कि अलग होना तो नामुमकिन थी पर मैं भी वहीं पर थी जिस वजह से छोड़नी पड़ी।
पूजा कुछ मायूस सी हो गई शायद वो अलग होना नहीं चाहती थी।
"अंकल आप अपना सारा प्यार मुझे ही देंगे क्या? ऐसे में तो भाभी कहीं नाराज हो गई तो...."तभी पूजा मेरी तरफ देख मुस्कुराती हुई अंकल से बोले। अपने बारे में सुन मेरे पसीने छूट पड़े।तभी अंकल मेरे गालोँ को सहलाते हुए चेहरे को ऊपर कर दिए। मेरी दिमाग सुन्न सी हो गई।मैं आँख खोलने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी।मेरे होंठ अपने आप कांपने लगी अंकल के अगले वार को सोच के।
"अरे नहीं पूजा,ऐसा करने की भला मेरी कहाँ हिम्मत है कि मैं अपनी सीता बेटी को भूल जाऊँ।" कहते हुए अंकल मेरी गर्म होंठ पर अपने होंठ रख दिए।
मैं तो एक बारगी बिल्कुल ही सिहर गई।
अंकल मेरी निचले होंठ के हिस्से को अपने होंठों से दबा के जीभ चलाने लगे।मैं तो इतनी सी ही में आनंद में खो गई।
अंकल अब पूरी होंठों को अपने कब्जे में लेते हुए जोर से किस करने लगे।मैं उनका साथ तो नहीं दे पा रही थी और ना ही विरोध कर रही थी।
अगले ही पल अंकल अपनी जीभ मेरी मुँह के अंदर डालने की कोशिश करने लगे।मैं ज्यादा रोकने की हिम्मत नहीं कर पाई और एक घायल हिरण की तरह खुद को सौंप दी।
अब उनकी जीभ मेरी जीभ से मिलाप कर रही थी।कुछ देर तक इसी तरह लगातार चुसते रहे।
तभी मेरी बगल से पूजा धीरे से अंकल की बाँहे से छूटते हुए बाहर हो गई। अब मैं अकेली अंकल की बाँहों में कैद मजे के सागर में गोते लगा रही थी। उनका एक हाथ मेरे सर पे और दूसरी हाथ मेरी कमर को सहला रही थी।
कोई 5 मिनट तक चुसने के बाद मेरी होंठ अंकल के होंठ से अलग हुई। मुझ में अब थोड़ी सी भी ताकत नहीं रह गई थी।मैं बेसुध सी अंकल के बाँहों में पड़ी लम्बी लम्बी साँसें ले रही थी।अंकल अब मेरी गालोँ को हौले से सहलाने लगे।
कुछ देर सहलाने के पश्चात।
"सीता बेटा,क्या हुआ?"अंकल धीरे से पूछे।
मैं यूँ ही आँखें बंद किए कुछ नहीं बोली।
तभी पीछे से पूजा सट गई और मेरे गालोँ को चूमते हुए बोली,"भाभी, अंकल के प्यार को आप बुरा मान गई क्या?"
पूजा की बातें सुनते ही मेरे अंदर गुस्से की आग भड़कने सी लग गई।इतना कुछ होने के बाद कमीनी पूछती है कि बुरा मान गई क्या?
अगर बुरा मानती तो मैं कब का यहाँ से चली गई होती।
फिर भी खुद पर नियंत्रण करते हुए ना में सिर हिला कर जवाब दे दी। जवाब पाते ही पूजा हँसती हुई मुझे थैंक्स भाभी बोली और लिपट सी गई।अंकल भी मुस्कुराते हुए एक बार फिर मेरी होंठ पर चुम्बन जड़ दिए।
"बेटा,अब मैं जा रहा हूँ।कुछ लोग मेरा इंतजार कर रहे हैं।मौका मिलते ही मैं आप लोगों से मिलने आ जाऊँगा। जाऊँ बेटा?"अंकल अपनी बाँहेँ हटाते हुए मेरी गालोँ को सहलाते हुए पूछे।
मैं भी अब थोड़ा फ्रेश होना चाहती थी। इतनी देर से मेरी चूत की पानी घुटने से नीचे आ गई थी बह के।मैं "हूँउँऊँऊँउँ" कह के अंकल के जाने की सहमति दे दी। अंकल थैंक्स कहते हुए मुझे अपने से अलग किए और बाहर निकल गए।
मेरी नजर पूजा पर पड़ते ही शर्म से अपने रूम की दौड़ गई। पूजा भी हँसती हुई पीछे से आई।
तब तक मैं बेड पर मुँह छिपा के लेट चुकी थी।पूजा आते ही मुझसे लिपट के चढ़ गई।
कुछ देर यूँ ही पड़ी रहने के बाद पूजा मुझे सीधी कर दी। मैं अभी भी अपने हाथ से आँखों को ढँक मंद मंद मुस्कुरा रही थी।
अगले ही क्षण पूजा मेरे सीने से साड़ी हटा दी। मेरी तनी हुई चुची पूजा के सामने थी। मेरी हर एक साँस के साथ मेरी चुची भी ऊपर नीचे कर रही थी। तभी पूजा मेरी कमर पर अपनी एक पैर चढ़ाती हुई मेरी एक चुची को दाँतो से पकड़ ली।मैं दर्द से उछल पड़ी।
पूजा हँसती हुई बोली," डॉर्लिँग, अंकल ऐसे ही और बेरहमी से तुझे मजा देंगे। थोड़ी सी बर्दाश्त करना सीख लो।"
"चुप कर बेशर्म। मैं नहीं करवाती।" मैंने पूजा के मुँह को ऊपर की तरफ धकेलते हुए बोली।
"हाँ वो तो मैं जानती ही हूँ कि आप करवाओगी या नहीं। मैं थी इसीलिए वर्ना अभी तक तो तुम अंकल से चुदी होती। कितनी मजे से अंकल का लण्ड अपनी चूत में सटा के खड़ी थी।"ताने देते हुए पूजा बोली।
"प्लीज पूजा,कुछ मत कहो।शर्म आती है।"
मेरी बात सुनते ही पूजा हँस पड़ी और बोली,"ओके भाभी, अब नहीं कहती।अच्छा ये तो बताओ अंकल का पसंद आया कि नहीं।"
मैं हँसती हुई हाँ में सिर हिला दी।पूजा भी मेरी जवाब से इतनी खुश हो गई कि एक बार फिर मेरी चुची पर अपने दाँत लगा दी। मैं उसकी बाल पकड़ जोर से चीख पड़ी।
शुक्र है कि घर में इस वक्त और कोई नहीं थी। पूजा हँसती हुई छोड़ दी।
फिर मेरी साड़ी के ऊपर से ही चूत पर हाथ रखती हुई बोली,"सीता मैडम! जरा इन्हें मजबूत कर के रखना। बहुत जल्द ही इसमें मुसल जाने वाली है।"
मैं चिहुँक के उठ बैठी और हाथ हटाते हुए हँसती हुई बोली," तुम किस दिन काम आएगी।"
पूजा कुछ बोलती, इससे पहले ही मम्मी जी की आवाज सुनाई दी।
"पूजा,किचन का काम नहीं होगा क्या? जल्दी आओ।"
मम्मी की आवाज सुनते ही हम दोनों जल्दी से अपने कपड़े ठीक किए और किचन की तरफ चल दी।

रात का खाना बन चुकी थी। करीब 9 बज रहे थे। चूँकि गाँव में सब ज्यादा देर तक नहीं जगे रहते। श्याम भी आ चुके थे।आते ही उन्होंने मेरी गालोँ को चूमते हुए खाना खाने की इच्छा व्यक्त की। मैं भी जल्दी से खाना लाई और श्याम खाना खाने बैठ गए।
मैं वहीं पास में बैठ मोबाइल निकाल छेड़छाड़ करने लगी। मोबाइल पर नजर पड़ते ही श्याम बोले,"अरे वाह नई फोन! और क्या सब दिए हैं अंकल मुँह दिखाई में। जरा हमें भी तो दिखाईए।"
मैं मुस्कुरा पड़ी। मेरी अंदर से तो जवाब आ रही थी कि ये सब मुँह दिखाई में नहीं बल्कि चूत चुदाई की अग्रिम रकम मिली है।फिर भी थोड़ी सी शर्माती हुई बोली,"आप पहले खाना खा लीजिए। फिर दिखा देती हूँ।"
"खाना के साथ ही दिखा दो वर्ना खाना पचेगी नहीं।बुरी आदत है मेरी। कुछ भी बर्दाश्त नहीं कर पाता हूँ। प्लीज..." श्याम अपनी अंदर की कमी बताते हुए दिखाने की आग्रह किए।
मैं भी हँसती हुई बोली,"अच्छा दिखाती हूँ ला कर। पूजा जी ले गए थे देखने के लिए"
"तो अब तक खड़ी क्यों हो? जल्दी जाओ ना।" श्याम जल्दी देखने की उत्सुकता में कहे।
मैं भी मुस्काती हुई पूजा के रूम की तरफ चल दी।मम्मी पापा दोनों खाना खा कर सोने चले गए थे। पूजा देर रात जगती है शायद पढ़ने या फिर फोन से बात करने।
मैं पूजा के गेट को नॉक की पर गेट खुली ही थी। नॉक करने के क्रम में ही खुल गई। मैं अंदर आते ही पूजा को श्याम द्वारा अंकल का उपहार देखने की बात बताई।
पूजा हँसती हुई दोनों पैकेट देने के लिए मेरी तरफ बढ़ी। अचानक अगले ही पल पूजा के कदम रुक गए और वो हँसते हुए बोली,"भाभी, ऐसे दिखाने से क्या फायदा? अगर इसे पहन के दिखाओगी तो और झक्कास लगोगी और भैया तो मर मिटेँगे आप पर"
मेरी भी हँसी निकल गई।
"चल रहने दे अभी। वो जल्दी देखने के लिए इंतजार कर रहे हैं।अगर नहीं गई जल्दी तो गुस्सा हो जाएँगे।"
"आप तो बेकार ही टेँशन लेती हो। वो कुछ नाराज नहीं होंगे अगर इसे पहन के जाओगी तो।देखते ही उनका सारा गुस्सा रफ्फू-चक्कर हो जाएगा।"
पूजा तो लगभग सही ही कह रही थी। ऐसे दिखाने और पहन के दिखाने में एक अलग ही रोमांच होगी।
कहावत है कि अगर जिंदगी को मजे से जीना है तो प्रत्येक दिन कुछ-ना-कुछ नया करना चाहिए। बस यही सोच मैं हामी भर दी।
मैं कपड़े चेँज करने बाथरुम की मुड़ी कि पूजा मेरी कलाई पकड़ ली।
"क्यों डॉर्लिँग, अब भी आप हमसे शर्मा रही हो कपड़े चेँज करने बाथरुम जा रही। चंद दिनों बाद तो मेरे सामने ही अपनी चूत उछल उछल के चुदवा रही होगी।"
मुझे भी कुछ शरारत सुझी।
"हाँ,अभी भी कुछ देर में उछल उछल के चुदवाने वाली हूँ। चलो तुम अभी ही देख लेना।"
मेरी बात सुनते ही पूजा तेजी से मेरी निप्पल पकड़ जोर से रगड़ दी। मैं दर्द से कराह उठी। पर पूजा मेरी निप्पल छोड़ी नहीं थी, ऐसे ही मेरे निकट आते हुए बोली,"कुतिया, अब और बोलेगी ऐसी बातें।"
मैं दर्द से तड़प रही थी तो जल्दी से ना कह दी।
मेरी निप्पल छोड़ते हुए पूजा मुस्कुराती हुई बोली," अब जल्दी जाओ वर्ना सच में भैया नाराज हो जाएँगे।"
"कमीनी कितना
दर्द हुआ, कुछ पता है।"
पूजा हँस दी और सॉरी कहते हुए बोली," भैया को बीच में क्यों लाई जो दर्द हुआ।अब जाओ भी बाद में बाद करेंगे।"
मैं भी अब ज्यादा देर नहीं करना चाहती थी। इसीलिए बिना कुछ कहे वहीं पर कपड़े चेँज करने लगी। पूजा ये देख हल्की सी मुस्कुरा दी।
कुछ ही क्षण में सारे कपड़े और गहने अलग पड़े थे। शरीर पर सिर्फ पेन्टी और ब्रॉ थी।मैंने पैकेट से साड़ी निकल कर पहनने लगी।पूजा भी मेरी सहायता कर रही थी।
फिर पूजा के कहने पर मैंने ब्रॉ निकाल दी और बिना ब्रॉ के ही Off-Shoulder वाली ब्लाउज पहनने लगी।
फिर एक एक कर सारे जेवर भी चढ़ा ली। कोई 20 मिनट लगे इन सब चीज करने में।
नीचे तो श्याम खाना खा कर पता नहीं कितने गुस्से में होंगे। जब मैं पूरी तरह तैयार हो गई तो पूजा पीछे से पकड़ बड़ी सी शीशे के सामने ले गई।
मैं तो खुद को देखते ही शर्मा गई।ब्लाउज से मेरी Cleavage काफी हद तक दिख रही थी।ठीक उसके ऊपर लटकी मंगल-सूत्र और नेकलेस काफी सेक्सी बना रही थी। पूजा तो देखते ही हाय कर बैठी।
होंठों पर हल्की गुलाबी रंग की लिपिस्टिक,आँखों में काजल और शरीर पर बेहद सेक्सी सुगंध वाली परफ्यूम पूरे माहौल को सेक्सी बना रही थी। पूजा अपने होंठ आगे कर मेरी उभारोँ पर किस करते हुए बोली,"भाभी,आप तो सेक्स की देवी लग रही हो। सच भैया तो पागल सा हो जाएँगे इस रूप में देख कर।"
मैं सिर्फ हँस कर रह गई।
"भाभी,अब प्लीज जाओ वर्ना अगर मैं नहीं जाने दी तो मनाते रहना भैया को फिर।"पूजा मुझे गेट तक लाते हुए बोली।
मैं भी अब और ज्यादा देर नहीं करना चाहती थी। पर जाते हुए सवाल कर गई।
"पूजा आज तो अंकल के पास जाने वाली थी ना फिर अभी तक यहीं हो?"
"बड़ी ख्याल करती है अंकल को।कहो तो अंकल को ही बुलवा दूँ।"
पूजा के शरारती जवाब सुन मैं मुस्कुरा कर रह गई।
फिर पूजा बोलती है," मैडम, आप चिंता ना करें।आप यहाँ रूम में लण्ड ले रही होगी ठीक उसी समय मैं भी अंकल के रूम में अपनी चूत में लण्ड लेती नजर आ जाऊंगी। अगर देखने की इच्छा हो तो ऊपर छत पर आ जाना, आज लाइट ऑन ही रखने अंकल को कहूंगी।"
मैं उसकी बात सुन हँसती हुई पागल कहती हुई नीचे उतर गई।
अंकल के घर ठीक बगल में ही थी। हमारे छत पर तो सिर्फ पूजा के लिए रूम बनी थी।बाकी छत तो खुली ही थी पर अंकल के छत पूरी तरह बनी हुई थी।दो मंजिला था अंकल का घर।चाहते ते और बना सकते थे पर कोई रहने वाला भी तो चाहिए। उनके बेटे-बेटियाँ सब बाहर रहती हैं। अंकल के घर के हर रूम में काँच की खिड़की लगी हुई थी जिससे अंधेरी रात में अगर लाइट जला कोई हरकत की जाए तो लगभग यह तो मालूम पड़ ही जाती है कि अंदर क्या चल रही है। भले ही कौन कर रहा है ये नहीं दिख पाती हो।
कुछ ही क्षण में मैं अपने रूम के पास पहुँच गई।

पायल की छन छन के साथ रूम में जैसे ही प्रवेश की, श्याम देखते ही रह गए। उनके नजरें ना तो हट रही थी और ना कुछ बोल ही रहे थे।बस लगातार वो कभी मेरी आँखों में देखते तो कभी मेरी होंठों को। कभी मेरी आधी नंगी पेट को देखते तो कभी मेरी उभारोँ को।
मैं तो खुद ही हैरान रह गई कि आखिर श्याम इतने हैरान क्यों हो रहे हैं मुझे ऐसी भेष में देख के।फिर कुछ देर यूँ ही गेट के पास खड़ी रहने के बाद धीरे से श्याम की तरफ बढ़ने लगी।
श्याम के निकट पहुँच कर जब प्यार से उनके गालोँ पर हाथ रखी तो वो ऐसे हड़बड़ा गए मानो नींद से जगे हो।
मेरी तो हँसी छूट पड़ी।फिर प्यार भरी लब्जोँ में पूछी,"ऐसे क्या देख रहे हैं?"
तभी वो मुझे अपनी बाँहों में कसते हुए बोले," मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा है कि मेरे सामने सीता खड़ी है। कसम से बिल्कुल अप्सरा जैसी दिख रही हो आज।"
मैं हँसते हुए बोली,"मुझे तो बस आपकी पत्नी ही रहने दीजिए। ज्यादा सर पर मत चढ़ाइए वर्ना कभी नहीं उतर पाऊंगी।"
"हा.हा.हा..आप जैसी बीबी अगर सर पर भी चढ़ जाए तो मस्ती ही मिलेगी।" मेरी गालोँ को चूमते हुए बोले।
मैं भी अगले ही पल मुस्काती हुई अपने उनके होंठों पर रखते हुए किस करने लगी।
श्याम भी इसी पल का इंतजार कर रहे थे। वे भी मुझे अपनी तरफ जोर से भीँचते हुए मेरी लब को पीने लगे।
मैं तो शाम से गर्म थी ही, जिससे तुरंत ही व्याकुल हो गई।मेरे मुँह से लगातार आहेँ निकल रही थी।मैं खुद ब खुद श्याम से जोर से लिपट गई।
वो अब मेरी होंठ के साथ साथ मेरी गाल,गर्दन,उभारोँ हर जगह चूमे जा रहे थे। मैं तीव्र गति से सेक्स की आग में जलने लगी।
अगले ही क्षण उन्होंने मेरी ब्लॉउज को नीचे सरका मेरी चुची को मुट्ठी में कैद कर लिए। अब वो लगातार मेरी चुची को मसलते हुए लगातार चूमे जा रहे थे। वे भी अब रुकने के ख्याल में नहीं थे। अब और बर्दाश्त कर पाना मेरे लिए असंभव थी।
अगले ही कुछ क्षण में मैं जोर से चिल्ला पड़ी।मेरे दाँत श्याम के कंधे में गड़ चुके थे और मेरे नाखून उनकी पीठ को खरोँच रही थी।
मेरी चूत लगातार मेरी पेन्टी को भीँगोँ रही थी।श्याम भी मेरी पीठ को धीमे धीमे सहला रहे थे।कुछ देर यूँ ही रहने के बाद जब थोड़ी होश में आई तो श्याम बोले,"आज तो मेरी रानी कुछ ज्यादा ही गर्म है। तबीयत से सेवा करनी पड़ेगी आज।"
मैं हल्की सी मुस्कुरा दी पर बोली कुछ नहीं।
"जान, आपके इस रूप को मैं कैद करना चाहता हूँ सो मेरी मदद करो।जब कभी भी काम के वक्त अकेला महसूस करूँगा तो आपकी ये तस्वीर देखते ही मैं अपना अकेलापन भूल जाऊँगा।"
मैं भला कभी मना करने की सोच भी सकती थी क्या?
अगले ही क्षण पूरा कमरा तेज रोशनी से नहा गई जो कि अब तक हल्की रोशनी में थी।
वे एक अच्छी गुणवत्ता वाले कैमरे से मेरी अलग अलग पर नॉर्मल फोटो लेने लगे। अचानक वे रुके और बोले,"डॉर्लिँग, अंकल से उपहार में ये फोन भी मिली है। इसे भी अपने हाथों में रख बात करती हुई पोजीशन बनाओ।"
मैं भी मुस्कुराती हुई फोन ले पोजीशन देने लगी।वे लगातार मेरी हर एक पल को कैमरे में कैद किए जा रहे थे।
"सीता,अब कुछ सेक्सी सी पोज दो।कुछ हॉट भी रहनी चाहिए।"
मैं तो एक बार चौंक के ना कह दी, पर वे जल्द ही हाँ करवा लिए। पर मैं तो ऐसी पोज से बिल्कुल अनजान थी।मेरी तरफ से कोई हरकत ना देख वो तुरंत ही समझ गए कि मुझे नहीं आती ऐसी पोज देने।
फिर वो एक एक कर बताने लगे।मुझे तो शर्म भी आ रही थी।
कभी अंगड़ाई लेने कहते,कभी Cleavage दिखाने कहते,कभी आगे झुकने कहते,कभी साड़ी का पल्लू ब्लॉउज से हटाने कहते,कभी होंठों को दबाते हुए चुची पर हाथ रखने कहते।
ऐसी ही ढेर सारी पोजीशन में फोटो लिए। मैं अब धीरे धीरे एक बार फिर गर्म होने लगी थी।कुछ ही देर में मैं आपा खो बैठी और दौड़ती हुई श्याम के गले लग गई।
"क्या हुआ सीता?"
मैंने अपने हाथ श्याम के लण्ड पर ले जाते हुए बोली,"पहले मुझे ये चाहिए फिर जितनी चाहे फोटो ले लेना।"
श्याम हँसते हुए कैमरे को एक ओर रखते हुए ओके कह दिए।लण्ड को पकड़ते ही मेरे मन में अंकल के लण्ड की लम्बाई घूमने लगी।मैंने उनसे लिपटे ही लण्ड को अपने कमर के तरफ मापने की कोशिश की।
जहाँ अंकल का लण्ड कमर से भी करीब 2 इंच बाहर जा रही थी, वहीं इनका लण्ड 1-1.5 इंच अंदर ही रह गई। मैं थोड़ी सी मायूस जरूर हुई पर अंकल का लण्ड भी अपना समझ हल्की सी मुस्कुरा दी।
श्याम मेरी ब्लॉउज खोलने की कोशिश करने लगे।अगले ही क्षण मेरी चुची खुली हवा खा रही थी और ब्लॉउज सोफे पर पड़ी थी।साड़ी भी चंद सेकंड में ही पूरी खुल गई थी। अब मैं सिर्फ पेन्टी में सारे गहनोँ में सजी थी। श्याम मुस्कुराते हुए एक बार बार मुझ पर टूट पड़े।ऊपर से चूमते हुए धीरे धीरे नीचे की तरफ बढ़ने लगे।मेरी चुची के पास आते ही उन्होंने निप्पल को अपने दाँतों से काटने लगे।मैं तड़प के उनके बाल नोँचने लगी पर वो रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।
तभी उनका एक हाथ नीचे बढ़ कर मेरी जांघोँ को सहलाने लगी। मैं तो रोमांच से सिहर सी गई और जोर जोर से आहेँ भरने लगी।मेरी आँखें अब बंद हो चली थी और पूरी शरीर कांप सी रही थी। अब वो मेरी दोनों चुची को बारी बारी से चूसे और काटे जा रहे थे।
तभी उनका हाथ जांघोँ से ऊपर सरक मेरी गीली पेन्टी पर चली गई।पेन्टी के ऊपर से ही वो मेरी चूत सहलाने लगे।मैं अब लगभग बेहोश सी होती हुई पूरी शरीर को उनके ऊपर छोड़ दी।
वे मेरी हालात समझ मुझे बेड के पास ले जाकर सुलाने की कोशिश किए।पर मैं तो उनको एक क्षण के लिए छोड़ने के मूड में नहीं थी।
तब मुझे बेड पर आधी ही सुला दिए।मेरी कमर से नीचे बेड से बाहर लटक रही थी और कमर से ऊपर बेड पर थी। ऐसी अवस्था में मेरी चूत ऊपर की तरफ निकल गई थी जिस पर श्याम अपना लण्ड चिपकाए मुझ पर लेटे थे।

कहानी जारी है...