संघर्ष

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rajaarkey
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Re: संघर्ष

Unread post by rajaarkey » 14 Dec 2014 10:31

संघर्ष --4

gtaank se aage.......... ऐसे माहौल में घरवाले चाहे जितनी जल्दी शादी करते पर तब तक उनके लडकियो की बुरो को आवारे चोद चोद कर एक नया आकार के डालते जिसे बुर या चूत नहीं बल्कि भोसड़ा ही कह सकते है. यानि शादी का बाद लड़की की विदाई होती तो अपने ससुराल कुवारी बुर के जगह खूब चुदी पिटी भोसड़ा ही ले जाती और सुहागरात में उसका मर्द अपने दुल्हन के बुर या चुदैल के भोसड़ा में भले ही अंतर समझे या न समझे लड़की या दुल्हन उसके लन्ड की ताकत की तुलना अपने गाँव के आवारो के दमदार लंडों से खूब भली भाती कर लेती. जो लड़की गाँव में घुमघुम कर कई लंडो का स्वाद ले चुकी रहती है उसे अपने ससुराल में एक मर्द से भूख मिटता नज़र नहीं आता. वैसे भी आवारे जितनी जोश और ताकत से चोदते उतनी चुदाई की उमंग शादी के बाद पति में न मिलता. नतीजा अपने गाँव के आवारो के लंडो की याद और प्यास बनी रहती और ससुराल से अपने मायका वापस आने का मन करनेलगता. ऐसे माहौल में सावित्री का बचे रहना केवल उसकी माँ के समझदारी और चौकन्ना रहने के कारण था . सावित्री के बगल में ही एक पुरानी चुड़ैल धन्नो चाची का घर था जिसके यहाँ कुछ चोदु लोग आते जाते रहते , सावित्री की माँ सीता इस बात से सजग रहती और सावित्री को धन्नो चाची के घर न जाने और उससे बात न करने के लिए बहुत पहले ही चेतावनी दे डाली थी. सीता कभी कभी यही सोचती की इस गाँव में इज्जत से रह पाना कितना मुश्किल हो गया है. उसकी चिंता काफी जायज थी. सावित्री के जवान होने से उसकी चिंता का गहराना स्वाभाविक ही था. आमदनी बदने के लिए सावित्री को दुकान पर काम करने के लिए भेजना और गाँव के आवारो से बचाना एक नयी परेशानी थी. वैसे सुरुआत में लक्ष्मी के साथ ही दुकान पर जाना और काम करना था तो कुछ मन को तसल्ली थी कि चलो कोई उतना डर नहीं है कोई ऐसी वैसी बात होने की. भोला पंडित जो ५० साल के करीब थे उनपर सीता को कुछ विश्वास था की वह अधेड़ लड़की सावित्री के साथ कुछ गड़बड़ नहीं करेगे. दुसरे दिन सावित्री लक्ष्मी के साथ दुकान पर चल दी . पहला दिन होने के कारण वह अपनी सबसे अच्छी कपडे पहनी और लक्ष्मी के साथ चल दी , रात में माँ ने खूब समझाया था की बाहर बहुत समझदारी सेरहना चाहिए. दुसरे लोगो और मर्दों से कोई बात बेवजह नहीं करनी चाहिए. दोनों पैदल ही चल पड़ी. रास्ते में लक्ष्मी ने सावित्री से कहा की "तुम्हारी माँ बहुत डरती है कि तुम्हारे साथ कोई गलत बात न हो जाए, खैर डरने कि वजह भी कुछ हद तक सही है पर कोई अपना काम कैसे छोड़ दे." इस पर सावित्री ने सहमती में सिर हिलाया. गाँव से कस्बे का रास्ता कोई दो किलोमीटर का था और ठीक बीच में एक खंडहर पड़ता जो अंग्रेजो के ज़माने का पुरानी हवेली की तरह थी जिसके छत तो कभी के गिर चुके थे पर जर्जर दीवाले सात आठ फुट तक की उचाई तक खड़ी थी. कई बीघे में फैले इस खंडहर आवारो को एक बहुत मजेदार जगह देता जहा वे नशा करते, जुआ खेलते, या लडकियो और औरतो की चुदाई भी करते. क्योंकि इस खंडहर में कोई ही शरीफ लोग नहीं जाते. हाँ ठीक रास्ते में पड़ने के वजह से इसकी दीवाल के आड़ में औरते पेशाब वगैरह कर लेती. फिर भी यह आवारो, नशेडियो, और ऐयाशो का मनपसंद अड्डा था. गाँव की शरीफ औरते इस खंडहर के पास से गुजरना अच्छा नहीं समझती लेकिन कोई दूसरा रास्ता भी नहीं था कस्बे में या कही जाने के लिए. दोनों चलते चलते खंडहर के पास पहुँचने वाले थे की लक्ष्मी ने सावित्री को आगाह करने के अंदाज में कहा " देखो आगे जो रास्ते से सटे खंडहर है इसमें कभी भूल कर मत जाना क्योंकि इसमें अक्सर गाँव के आवारे लोफ़र रहते हैं " इस पर सावित्री के मन में जिज्ञासा उठी और पुछ बैठी "वे यहाँ क्या करते?" "अरे नशा और जुआ खेलते और क्या करेंगे ये नालायक , क्या करने लायक भी हैं ये समाज के कीड़े " लक्ष्मी बोली. लक्ष्मी ने सावित्री को सचेत और समझदार बनाने के अंदाज में कहा" देखो ये गुंडे कभी कभी औरतो को अकेले देख कर गन्दी बाते भी बोलते हैं उनपर कभी ध्यान मत देना, और कुछ भी बोले तुम चुप चाप रास्ते पर चलना और उनके तरफ देखना भी मत, इसी में समझदारी है और इन के चक्कर में कैसे भी पड़ने लायक नहीं होते. " कुछ रुक कर लक्ष्मी फिर बोली "बहुत डरने की बात नहीं है ये मर्दों की आदत होती है औरतो लडकियो को बोलना और छेड़ना, " सावित्री इन बातो को सुनकर कुछ सहम सी गयी पर लक्ष्मी के साथ होने के वजह से डरने की कोई जरूरत नहीं समझी..आगे खंडहर आ गया और करीब सौ मीटर तक खंडहर की जर्जर दीवाले रास्ते से सटी थी. ऐसा लगता जैसे कोई जब चाहे रास्ते पर के आदमी को अंदर खंडहर में खींच ले तो बहर किसी को कुछ पता न चले , रास्ते पर से खंडहर के अंदर तक देख पाना मुस्किल था क्योंकि पुराने कमरों की दीवारे जगह जगह पर आड़ कर देती और खंडहर काफी अंदर तक था, दोनों जब खंडहर के पास से गुजर रहे थे तब एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था. खंडहर में कोई दिख नहीं रहा था वैसे सावित्री पहले भी कभी कभार बाज़ार जाती तो इसी रस्ते से लेकिन तब उसके साथ उसकी माँ और गाँव की कई औरते भी साथ होने से दर उतना नहीं लगता. इसबार वह केवल लक्ष्मी के साथ थी और कुछ समय बाद उसे अकेले भी आना जाना पड़ सकता था. जो सबसे अलग बात यह थी की वह अब भरपूर जवान हो चुकी थी और आवारो से उसके जवानी को खतरा भी था जो वह महसूस कर सकती थी. सावित्री अब यह अच्छी तरह जानती थी की यदि आवारे उसे या किसी औरत को इस सुनसान खंडहर में पा जाएँ तो क्या करेंगे. शायद यह बात मन में आते ही उसके बदन में अजीब सी सिहरन उठी जो वह कुछ महसूस तो कर सकती थी लेकिन समझ नहीं पा रही थी. शायद खंडहर की शांत और एकांत का सन्नाटा सावित्री के मन के भीतर कुछ अलग सी गुदगुदी कर रही थी जिसमे एक अजीब सा सनसनाहट और सिहरन थी और यह सब उसके जवान होने के वजह से ही थी. खंडहर के पास से गुजरते इन पलो में उसके मन में एक कल्पना उभरी की यदि कोई आवारा उसे इस खंडहर में अकेला पा जाये तो क्या होगा..इस कल्पना के दुसरे ही पल सावित्री के बदन में कुछ ऐसा झनझनाहट हुआ जो उसे लगा की पुरे बदन से उठ कर सनसनाता हुआ उसकी दोनों झांघो के बीच पहुँचगया हो खंडहर में से कुछ लोगो के बात करने की आवाज आ रही थी. सावित्री का ध्यान उन आवाजो के तरफ ही था. ऐसा लग रहा था कुछ लोग शराब पी रहे थे और बड़ी गन्दी बात कर रहे थे पार कोई कही दिख नहीं रहा था. अचानक उसमे से एक आदमी जो 3२ -3५ साल का था बाहर आया और दोनों को रास्ते पार जाते देखने लगा तभी अन्दर वाले ने उस आदमी से पुछा "कौन है" जबाब में आदमी ने तुरंत तो कुछ नहीं कहा पर कुछ पल बाद में धीरे से बोला " दो मॉल जा रही है कस्बे में चुदने के लिए" उसके बाद सब खंडहर में हसने लगे. सावित्री के कान में तो जाने बम फट गया उस आदमी की बात सुनकर. चलते हुए खंडहर पार हो गया लक्ष्मी भी चुपचाप थी फिर बोली "देखो जब औरत घर से बाहर निकलती हैं तो बहुत कुछ बर्दाश्त करना पड़ता है. यह मर्दों की दुनिया है वे जो चाहे बोलते हैं और जो चाहे करते हैं. हम औरतो को तो उनसे बहुत परेशानी होती है पर उन्हें किसी से कोई परेशानी नहीं होती." सावित्री कुछ न बोली पर खंडहर के पास उस आदमी की बात बार बार उसके दिमाग में गूंज रही थी "दो मॉल जा रही है कस्बे में चुदने के लिए" . तभी भोला पंडित की दुकान पर दोनों पहुँचीं . भोला पंडित पहली बार सावित्री को देखा तो उसकी चुचिया और चूतडो पर नज़र चिपक सी गई और सावित्री ने भोला पंडित का नमस्कार किया तो उन्होंने कुछ कहा नहीं बल्कि दोनों को दुकान के अंदर आने के लिए कहे. भोला पंडित ४४ साल के सामान्य कद के गोरे और कसरती शरीर के मालिक थे . उनके शरीर पर काफी बाल उगे थे . वे अक्सर धोती कुरता पहनते और अंदर एक निगोट पहनने की आदत थी. क्योंकि जवानी में वे पहलवानी भी करते थे. स्वाभाव से वे कुछ कड़े थे लेकिन औरतो को सामान बेचने के वजह से कुछ ऊपर से मीठापन दिखाते थे. दोनों दुकान में रखी बेंच पर बैठ गयीं. भोला पंडित ने एक सरसरी नजर से सावित्री को सर से पावं तक देखा और पुछा "क्या नाम है तेरा? " सावित्री ने जबाव दिया "जी सावित्री " लक्ष्मी सावित्री का मुह देख रही थी. उसके चेहरे पर मासूमियत और एक दबी हुई घबराहट साफ दिख रही थी. क्योंकि घर के बाहर पहली बार किसी मर्द से बात कर रही थी भोला पंडित ने दूसरा प्रश्न किया "kitne साल की हो गयी है" "जी अट्ठारह " सावित्री ने जबाव में कहा. आगे फिर पुछा "कितने दिनों में दुकान सम्हालना सीख लेगी" "जी " और इसके आगे सावित्री कुछ न बोली बल्कि बगल में बैठी लक्ष्मी का मुंह ताकने लगी तो लक्ष्मी ने सावित्री के घबराहट को समझते तपाक से बोली "पंडित जी अभी तो नयी है मई इसे बहुत जल्दी दुकान और सामानों के बारे में बता और सिखा दूंगी इसकी चिंता मेरे ऊपर छोड़ दीजिये " "ठीक है पर जल्दी करना , और कब तक तुम मेरे दुकान पर रहोगी " भोला पंडित ने लक्ष्मी से पुछा तो लक्ष्मी ने कुछ सोचने के बाद कहा "ज्यादे दिन तो नहीं पर जैसे ही सावित्री आपके दुकान की जिम्मेदारी सम्हालने लगेगी, क्योंकि मुझे कहीं और जाना है और फुर्सत एक दम नहीं है पंडित जी." आगे बोली "यही कोई दस दिन क्योंकि इससे ज्यादा मैं आपकी दुकान नहीं सम्हाल पाऊँगी , मुझे कुछ अपना भी कम करना है इसलिए" " ठीक है पर इसको दुकान के बारे में ठीक से बता देना" भोला पंडित सावित्री के तरफ देखते कहा.


rajaarkey
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Re: संघर्ष

Unread post by rajaarkey » 14 Dec 2014 10:32

संघर्ष --5

गतांक से आगे.......... सावित्री भोला पंडित के रूअब्दार कड़क मिज़ाज और तेवर को देखकेर कुछ डर सी जाती. क्योंकि वे कोई ज़्यादे बात चीत नही करते. और उनकी आवाज़ मोटी भी थी, बस दुकान पर आने वाली औरतो को समान बेचने के लालच से कुछ चेहरे पर मीठापन दीखाते. रोजाना दोपहेर को वे एक या दो घंटे के लिए दुकान बंद कर खाना खा कर दुकान के पिछले हिस्से मे बने कमरे मे आराम करते. यह दुकान को ही दो भागो मे बाँट कर बना था जिसके बीच मे केवल एक दीवार थी और दुकान से इस कमरे मे आने के लिए एक छोटा सा दरवाजा था जिस पर एक परदा लटका रहता. अंदर एक चौकी थी और पिछले कोने मे शौचालय और स्नानघर भी था . यह कमरा दुकान के तुलना मे काफ़ी बड़ा था. कमरे मे एक चौकी थी जिसपर पर भोला पंडित सांड की तरह लेट गये और नीचे एक चटाई पर लक्ष्मी लेट कर आराम करने लगी, सावित्री को भी लेटने के लिए कहा पर पंडितजी की चौकी के ठीक सामने ही बिछी चटाई पर लेटने मे काफ़ी शर्म महसूस कर रही थी लक्ष्मी यह भाँप गयी कि सावित्री भोला पंडित से शर्मा रही है इस वजह से चटाई पर लेट नही रही है. लक्ष्मी ने चटाई उठाया और दुकान वाले हिस्से मे जिसमे की बाहर का दरवाजा बंद था, चली गयी. पीछे पीछे सावित्री भी आई और फिर दोनो एक ही चटाई पर लेट गये, लक्ष्मी तो थोड़ी देर के लिए सो गयी पर सावित्री लेट लेट दुकान की छत को निहारती रही और करीब दो घंटे बाद फिर सभी उठे और दुकान फिर से खुल गई. करीब दस ही दीनो मे लक्ष्मी ने सावित्री को बहुत कुछ बता और समझा दिया था आगे उसके पास समय और नही था कि वह सावित्री की सहयता करे. फिर सावित्री को अकेले ही आना पड़ा. पहले दिन आते समय खंडहेर के पास काफ़ी डर लगता मानो जैसे प्राण ही निकल जाए. कब कोई गुंडा खंडहेर मे खेन्च ले जाए कुछ पता नही था. लेकिन मजबूरी थी दुकान पर जाना. जब पहली बार खंडहेर के पास से गुज़री तो सन्नाटा था लेकिन संयोग से कोई आवारा से कोई अश्लील बातें सुनने को नही मिला. किसी तरह दुकान पर पहुँची और भोला पंडित को नमस्कार किया और वो रोज़ की तरह कुछ भी ना बोले और दुकान के अंदर आने का इशारा बस किया. खंडहेर के पास से गुज़रते हुए लग रहा डर मानो अभी भी सावित्री के मन मे था. आज वह दुकान मे भोला पंडित के साथ अकेली थी क्योंकि लक्ष्मी अब नही आने वाली थी. दस दिन तो केवल मा के कहने पर आई थी. यही सोच रही थी और दुकान मे एक तरफ भोला पंडित और दूसरी तरफ एक स्टूल पे सावित्री सलवार समीज़ मे बैठी थी. दुकान एक पतली गली मे एकदम किनारे होने के वजह से भीड़ भाड़ बहुत कम होती और जो भी ग्राहक आते वो शाम के समय ही आते. दुकान के दूसरी तरफ एक उँची चहारदीवारी थी जिसके वजह से दुकान मे कही से कोई नही देख सकता था तबतक की वह दुकान के ठीक सामने ना हो. इस पतली गली मे यह अंतिम दुकान थी और इसके ठीक बगल वाली दुकान बहुत दीनो से बंद पड़ी थी. शायद यही बात स्टूल पर बैठी सावित्री के मन मे थी कि दुकान भी तो काफ़ी एकांत मे है, पंडित जी अपने कुर्सी पे बैठे बैठे अख़बार पढ़ रहे थे, करीब एक घंटा बीत गया लेकिन वो सावित्री से कुछ भी नही बोले. सावित्री को पता नही क्यो यह अक्चा नही लग रहा था. उनके कड़क और रोबीले मिज़ाज़ के वजह से उसके पास कहाँ इतनी हिम्मत थी कि भोला पंडित से कुछ बात की शुरुआत करे. दुकान मे एक अज़ीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था, तभी भोला पंडित ने स्टूल पर नज़रे झुकाए बैठी सावित्री के तरफ देखा और बोला " देखो एक कपड़ा स्नानघर मे है उसे धो कर अंदर ही फैला देना" मोटी आवाज़ मे आदेश सुनकर सावित्री लगभग हड़बड़ा सी गयी और उसके हलक के बस जी शब्द ही निकला और वह उठी और स्नानघर मे चल दी. स्नानघर मे पहुँच कर वह पीछे पलट कर देखी कि कहीं पंडित जी तो नही आ रहे क्योंकि सावित्री आज अकेले थी और दुकान भी सन्नाटे मे था और पंडित जी भी एक नये आदमी थे. फिर भी पंडित जी के उपर विश्वास था जैसा कि लक्ष्मी ने बताया था. सावित्री को लगा कि पंडित जी वहीं बैठे अख़बार पढ़ रहे हैं. फिर सावित्री ने स्नानघर मे कपड़े तलाशने लगी तो केवल फर्श पर एक सफेद रंग की लंगोट रखी थी जिसे पहलवान लोग पहनते हैं. यह भोला पंडित का ही था. सावित्री के मन मे अचानक एक घबराहट होने लगी क्योंकि वह किसी मर्द का लंगोट धोना ठीक नही लगता. स्नानघर के दरवाजे पर खड़ी हो कर यही सोच रही थी कि अचानक भोला पंडित की मोटी कड़क दार आवाज़ आई "कपड़ा मिला की नही" वे दुकान मे बैठे ही बोल रहे थे. सावित्री पूरी तरह से डर गयी और तुरंत बोली "जी मिला" सावित्री के पास इतनी हिम्मत नही थी कि भोला पंडित से यह कहे कि वह एक लड़की है और उनकी लंगोट को कैसे धो सकती है. आख़िर हाथ बढाई और लंगोट को ढोने के लिए जैसे ही पकड़ी उसे लगा जैसे ये लंगोट नही बल्कि कोई साँप है. फिर किसी तरह से लंगोट को धोने लगी. फिर जैसे ही लंगोट पर साबुन लगाने के लिए लंगोट को फैलाया उसे लगा कि उसमे कुछ काला काला लगा है फिर ध्यान से देख तो एकद्ूम सकपका कर रह गयी. यह काला कला कुछ और नही बल्कि झांट के बॉल थे जो भोला पंडित के ही थे. जो की काफ़ी मोटे मोटे थे. वह उन्हे छूना बिल्कुल ही नही चाहती थी लेकिन लंगोट साफ कैसे होगी बिना उसे साफ किए. फिर सावित्री ने पानी की धार गिराया कि झांट के बाल लंगोट से बह जाए लेकिन फिर भी कुछ बॉल नही बह सके क्योंकि वो लंगोट के धागो मे बुरी तरह से फँसे थे. यह सावित्री के लिए चुनौती ही थी क्योंकि वह भोला पंडित के झांट के बालो को छूना नही चाहती थी. अचानक बाहर से आवाज़ आई "सॉफ हुआ की नही" और इस मोटे आवाज़ ने मानो सावित्री की हड्डियाँ तक कपा दी और बोल पड़ी "जी कर रही हूँ" और घबराहट मे अपने उंगलिओ से जैसे ही लंगोट मे फँसे झांट के बालो को निकालने के लिए पकड़ी कि सिर से पाव तक गन्गना गयी , उसे ऐसे लगा जैसे ये झांट के बाल नही बल्कि बिजली का कुर्रेंट है, आख़िर किसी तरह एक एक बाल को लंगोट से निकाल कर फर्श पर फेंकी और पानी की धार फेंक कर उसे बहाया जो स्नानघर के नाली के तरफ तैरते हुए जा रहे थे और सावित्री की नज़रे उन्हे देख कर सनसना रही थी. किसी ढंग से लंगोट साफ कर के वह अंदर ही बँधे रस्सी पर फैला कर अपना हाथ धो ली और वापस दुकान मे आई तो चेहरे पर पसीना और लालपान छा गया था. उसने देखा कि भोला पंडित अभी भी बैठे अख़बार पढ़ रहे थे. सावित्री जा कर फिर से स्टूल पर बैठ गयी और नज़रे झुका ली. कुछ देर बाद दोपहर हो चली थी और भोला पंडित के खाना खाने और आराम करने का समय हो चला था. समय देख कर भोला पंडित ने दुकान का बाहरी दरवाजा बंद किया और खाना खाने के लिए अंदर वाले कमरे मे चले आए. दुकान का बाहरी दरवाजा बंद होने का सीधा मतलब था कि कोई भी अंदर नही आ सकता था. भोला पंडित खाना खाने लगे और सावित्री तो घर से ही खाना खा कर आती इस लिए उसे बस आराम ही करना होता. सावित्री ने चटाई लेकर दुकान वाले हिस्से मे आ गयी और चटाई बिछा कर लेटने के बजाय बैठ कर आज की घटना के बारे मे सोचने लगी. उसे लगता जैसे भोला पंडित की झांट को छू कर बहुत ग़लत किया, लेकिन डरी सहमी और क्या करती. बार बार उसके मन मे डर लगता. दुकान का बाहरी दरवाजा बंद होने के कारण वह अपने आप को सुरक्षित नही महसूस कर रही थी. यही सोचती रही कि अंदर के कमरे से खर्राटे की आवाज़ आने लगी. फिर यह जान कर की भोला पंडित सो गये है वह भी लेट गयी पर उनके लंगोट वाली झांतो की याद बार बार दिमाग़ मे घूमता रहता. यही सब सोचते सोचते करीब एक घंटा बीत गया. फिर भोला पंडित उठे तो उनके उठने के आहट सुन कर सावित्री भी चटाई पर उठ कर बैठ गयी. थोड़ी देर बाद शौचालय से पेशाब करने की आवाज़ आने लगी , वो भोला पंडित कर रहे थे.अभी दुकान खुलने मे लगभग एक घंटे का और समय था और भोला पंडित शायद एक घंटे और आराम करेंगे' यही बात सावित्री सोच रही थी की अंदर से पंडित जी ने सावित्री को पुकारा. "सुनो" सावित्री लगभग घबड़ाई हुई उठी और अपना समीज़ पर दुपट्टे को ठीक कर अंदर आए तो देखी की भोला पंडित चौकी पर बैठे हैं. सावित्री उनके चौकी से कुछ दूर पर खड़ी हो गयी और नज़रे झुका ली और पंडित जी क्या कहने वाले हैं इस बात का इंतज़ार करने लगी. तभी भोला पंडित ने पुचछा "महीना तुम्हारा कब आया था" अचानक ऐसे सवाल को सुन कर सावित्री की आँखे फटी की फटी रह गई वह मानो अगले पल गिरकर मर जाएगी उसे ऐसा लग रहा था. उसका गले मे मानो लकवा मार दिया हो, दिमाग़ की सारी नसे सूख गयी हो. सावित्री के रोवे रोवे को कंपा देने वाले इस सवाल ने सावित्री को इस कदर झकझोर दिया कि मानो उसके आँखो के सामने कुछ दीखाई ही नही दे रहा था. आख़िर वह कुछ बोल ना सकी और एक पत्थेर की तरह खड़ी रह गई. दुबारा भोला पंडित ने वही सवाल दुहरेया "महीना कब बैठी थी" सावित्री के सिर से पाँव तक पसीना छूट गया. उसे कुछ समझ नही आ रहा था कि ये क्या हो रहा है और वह क्या करे लेकिन दूसरी बार पूछने पर वह काफ़ी दबाव मे आ गयी और सूखे गले से काफ़ी धीमी आवाज़ ही निकल पाई "दस दिन प..." और आवाज़ दब्ति चली गयी कि बाद के शब्द सुनाई ही नही पड़े. फिर भोला पंडित ने कुछ और कड़े आवाज़ मे कुछ धमकी भरे लहजे मे आदेश दिया "जाओ पेशाब कर के आओ" इसे सुनते ही सावित्री कांप सी गयी और शौचालय के तरफ चल पड़ी. अंदर जा कर सीत्कनी बंद करने मे लगताथा जैसे उसके हाथ मे जान ही नही है. भोला पंडित का पेशाब कराने का मतलब सावित्री समझ रही थी लेकिन डर के मारे उसे कुछ समझ नही आ रहा था कि वो अब क्या करे . शौचालय के अंदर सावित्री के हाथ जरवंद खोलने मे कांप रहे थे और किसी तरह से जरवंद खोल कर सलवार को नीचे की और फिर चड्धि को सर्काई और पेशाब करने बैठी लेकिन काफ़ी मेहनत के बाद पेशाब की धार निकलना शुरू हुई. पेशाब करने के बाद सावित्री अपने कपड़ो को सही की दुपट्टा से चुचियो को ढाकी फिर उसकी हिम्मत शौचालय से बाहर आने की नही हो रही थी और वह उसी मे चुपचाप खड़ी थी. तभी फिर डरावनी आवाज़ कानो मे बम की तरह फट पड़ा "जल्दी आओ बाहर" बाहर आने के बाद वह नज़ारे झुकाए खड़ी थी और उसका सीना धक धक ऐसे कर रहा था मानो फट कर बाहर आ जाएगा . सावित्री ने देखा की भोला पंडित चौकी पर दोनो पैर नीचे लटका कर बैठे हैं. फिर पंडित जी चौकी पर बैठे ही सावित्री को नीचे से उपर तक घूरा और फिर चौकी पर लेट गये. चौकी पर एक बिस्तर बिछा था और भोला पंडित के सिर के नीचे एक तकिया लगा था. भोला पंडित लेते लेते छत की ओर देख रहे थे और चित लेट कर दोनो पैर सीधा फैला रखा था. वे धोती और बनियान पहने थे. धोती घुटने तक थी और घुटने के नीचे का पैर सॉफ दीख रहा था जो गोरे रंग का काफ़ी मजबूत था जिसपे काफ़ी घने बाल उगे थे. सावित्री चुपचाप अपने जगह पर ऐसे खड़ी थी मानो कोई मूर्ति हो. वह अपने शरीर मे डर के मारे धक धक की आवाज़ साफ महसूस कर रही थी. यह उसके जीवन का बहुत डरावना पल था. शायद अगले पल मे क्या होगा इस बात को सोच कर काँप सी जाती. इतने पॅलो मे उसे महसूस हुआ कि उसका पैर का तलवा जो बिना चप्पल के कमरे के फर्श पर थे, पसीने से भीग गये थे. उसकी साँसे तेज़ चल रही थी. उसे लग रहा था की सांस लेने के लिए उसे काफ़ी ताक़त लगानी पड़ रही थी. ऐसा जैसे उसके फेफड़ों मे हवा जा ही नही रही हो. उसके दिल और दिमाग़ दोनो मे लकवा सा मार दिया था. तभी पंडित जी कमरे के छत के तरफ देखते हुए बोले "पैर दबा" सावित्री जो की इस दयनीय हालत मे थी और शर्म से पानी पानी हो चुकी थी, ठीक अपने सामने नीचे फर्श पर देख रही थी, क्योंकि उसकी भोला पंडित की तरफ देखने की हिम्मत अब ख़त्म हो चुकी थी, आवाज़ सुनकर फिर से कांप सी गयी और अपने नज़रो को बड़ी ताक़त से उठा कर चौकी के तरफ की और भोला पंडित को जब कनखियों से देखी कि वे धोती और बनियान मे सिर के नीचे तकिया लगाए लेते थे और अब सावित्री के तरफ ही देख रहे थे. सावित्री फिर से नज़रे नीचे गढ़ा ली. वह चौकी से कुछ ही दूरी पर ही खड़ी थी उसे लग रहा था कि उसके पैर के दोनो तलवे फर्श से ऐसे चिपक गये हो की अब छूटेंगे ही नही. भोला पंडित को अपनी तरफ देखते हुए वह फिर से घबरा गयी और डर के मारे उनके पैर दबाने के लिए आगे बढ़ी ही थी कि ऐसा महसूस हुआ जैसे उसे चक्केर आ गया हो और अगले पल गिर ना जाए. शायद काफ़ी डर और घबराहट के वजह से ही ऐसा महसूस की. ज्यों ही सावित्री ने अपना पैर फर्श पर आगे बढ़ाई तो पैर के तलवे के पसीना का गीलापन फर्श पर सॉफ दीख रहा था. अब चौकी के ठीक करीब आ गयी और खड़ी खड़ी यही सोच रही थी कि अब उनके पैर को कैसे दबाए. भोला पंडित ने सावित्री से केवल पैर दबाने के लिए बोला था और ये कुछ नही कहा कि चौकी पर बैठ कर दबाए या केवल चौकी के किनारे खड़ी होकर की दबाए. क्योंकि सावित्री यह जानती थी कि पंडित जी को यह मालूम है कि सावित्री एक छ्होटी जात की है और लक्ष्मी ने सावित्री को पहले ही यह बताया था कि दुकान मे केवल अपने काम से काम रखना कभी भी पंडित जी का कोई समान या चौकी को मत छूना क्योंकि वो एक ब्राह्मण जाती के हैं और वो छ्होटी जाती के लोगो से अपने सामानो को छूना बर्दाश्त नही करते, और दुकान मे रखी स्टूल पर ही बैठना और आराम करने के लिए चटाई का इस्तेमाल करना. शायद इसी बात के मन मे आने से वह चौकी से ऐसे खड़ी थी कि कहीं चौकी से सॅट ना जाए. भोला पंडित ने यह देखते ही की वह चौकी से सटना नही चाहती है उन्हे याद आया कि सावित्री एक छोटे जाती की है और अगले ही पल उठकर बैठे और बोले "जा चटाई ला" सावित्री का डर बहुत सही निकला वह यह सोचते हुए कि भला चौकी को उसने छूआ नही. दुकान वाले हिस्से मे जहाँ वो आराम करने के लिए चटाई बिछाई थी, लेने चली गयी. इधेर भोला पंडित चौकी पर फिर से पैर लटका कर बैठ गये, सावित्री ज्यों ही चटाई ले कर आई उन्होने उसे चौकी के बगल मे नीचे बिछाने के लिए उंगली से इशारा किया. सावित्री की डरी हुई आँखे इशारा देखते ही समझ गयी कि कहाँ बिछाना है और बिछा कर एक तरफ खड़ी हो गयी और अपने दुपट्टे को ठीक करने लगी, उसका दुपट्टा पहले से ही काफ़ी ठीक था और उसके दोनो चूचियो को अच्छी तरह से ढके था फिर भी अपने संतुष्टि के लिए उसके हाथ दुपट्टे के किनारों पर चले ही जाते. भोला पंडित चौकी पर से उतर कर नीचे बिछी हुई चटाई पर लेट गये. लेकिन चौकी पर रखे तकिया को सिर के नीचे नही लगाया शायद चटाई का इस्तेमाल छ्होटी जाती के लिए ही था इस लिए ही चौकी के बिस्तर पर रखे तकिया को चटाई पर लाना मुनासिब नही समझे. भोला पंडित लेटने के बाद अपने पैरों को सीधा कर दिया जैसा की चौकी के उपर लेते थे. फिर से धोती उनके घुटनो तक के हिस्से को ढक रखा था. उनके पैर के तरफ सावित्री चुपचाप खड़ी अपने नज़रों को फर्श पर टिकाई थी. सीने का धड़कना अब और तेज हो गया था. तभी पंडित जी के आदेश की आवाज़ सावित्री के कानो मे पड़ी "अब दबा" . सावित्री को ऐसा लग रहा था कि घबराहट से उसे उल्टी हो जायगि. अब सावित्री के सामने यह चुनौती थी कि वह पंडित जी के सामने किस तरह से बैठे की पंडित जी को उसका शरीर कम से कम दीखे. जैसा की वह सलवार समीज़ पहनी और दुपट्टा से अपने उपरी हिस्से को काफ़ी ढंग से ढक रखा था. फिर उसने अपने पैर के घुटने को मोदकर बैठी और यही सोचने लगी कि अब पैर दबाना कहाँ से सुरू करे. उसके मन मे विरोध के भी भाव थे कि ऐसा करने से वो मना कर दे लेकिन गाओं की अट्ठारह साल की सीधी साधी ग़रीब लड़की जिसने अपना ज़्यादा समय घर मे ही बिताया था, और शर्मीली होने के साथ साथ वह एक डरपोक किस्म की भी हो गयी थी. और वह अपने घर से बाहर दूसरे जगह यानी भोला पंडित के दुकान मे थी जिसका दरवाजा बंद था और दोपहर के समय एकांत और शांत माहौल मे उसका मन और डर से भर गया था. उसके उपर से भोला पंडित जो उँची जाती के थे और उनका रोबीला कड़क आवाज़ और उससे बहुत कम बातें करने का स्वाभाव ने सावित्री के मन मे बचे खुचे आत्मविश्वास और मनोबल को तो लगभग ख़त्म ही कर दिया था. वैसे वह पहले से ही काफ़ी डरी हुई थी और आज उसका पहला दिन था जब वह दुकान मे भोला पंडित के साथ अकेली थी.

gtaank se aage.......... savitri bhola pandit ke rooabdar kadak mizaj aur tevar ko dekhker kuch dar si jati. kyonki ve koi jyade bat cheet nahi karte. aur unki awaj moti bhi thi, bas dukan par ane wali aurto ko saman bechne ke lalach se kuch chehre par meethapan deekhate. rojana dopaher ko ve ek ya do ghante ke liye dukan band kar khana kha kar dukan ke pichle hisse me bane kamre me aram karte. yah dukan ko hi do bhago me bant kar bana tha jiske beech me keval ek deevar thi aur dukan se is kamre me ane ke liye ek chota sa darvaja tha jis par ek parda latka rahta. under ek chaouki thi aur pichle kone me shoauchalay aur snanaghar bhi tha . yah kamra dukan ke tulna me kafi bada tha. kamre me ek chaouki thi jispar par bhola pandit sand ki tarah let gaye aur neeche ek chatai par laxmi let kar aram karne lagi, savitri ko bhi letne ke liye kaha par panditji chaouki ke theek samne hi bichi chatai par letne me kafi sharm mahsoos kar rahi thi laxmi yah bhamp gayi ki savitri bhola pandit se sharma rahi hai is vajah se chatai par let nahi rahi hai. laxmi ne chatai uthaya aur dukan wale hisse me jisme ki bahar ka darwaja band tha, chali gayi. peeche peeche savitri bhi aayi aur fir dono ek hi chatai par let gaye, laxmi to thodi der ke liye so gayi par savitri lete lete dukan ki chat ko niharti rahi aur kareeb do ghante baad fir sabhi uthe aur dukan fir se khul gai. kareeb das hi dino me laxmi ne savitri ko bahut kuch bata aur samjha diya tha aage uske pas samay aur nahi tha ki wah savitri ki sahayta kare. fir savitri ko akele hi ana pada. pahle din ate samay khandaher ke pas kafi dar lagta mano jaise pran hi nikal jaye. kab koi gunda khandaher me khench le jaye kuch pata nahi tha. lekin majboori thi ki dukaan par jana. jab pahli bar khandaher ke paas se gujri to sannata tha lekin sanyog se koi awara se koi ashleel baten sunane ko nahi mila. kisi tarah dukaan par pahunchi aur bhola pandit ko namaskar kiya aur we roz ki tarah kuch bhi na bole aur dukan ke ander ane ka ishara bas kiya. khandaher ke pas se gujarte huye lag raha dar mano abhi bhi savitri ke man me tha. aaj vah dukan me bhola pandit ke sath akele thi kyonki laxmi ab nahi aane wali thi. das din to keval maa ke kahne par aayi thi. yahi soch rahi thi aur dukan me ek taraf bhola pandit aur dusri taraf ek stul pe savitri salwar sameej me baithi thi. dukaan ek patle gali me ekdam kinare hone ke vajah se bhid bhad bahut kam hoti aur jo bhi grahak aati wo sham ke samay hi aati. dukaan ke dusri taraf ek unchi chahardiwari thi jiske vajah se dukan me kahi se koi nahi dekh sakta tha tabtak ki vah dukaan ke theek samne na ho. is patle gali me yah antim dukaan thi aur iske theek bagal wali dukaan bahut dino se band padi thi. shayad yahi bat stul par baithi savitri ke man me tha ki dukaan bhi to kafi ekant me hai, pandit ji apne kursi pe baithe baithe akhbar pad rahe the, kareeb ek ghanta beet gaye lekin we savitri se kuch bhi nahi bole. savitri ko pata nahi kyo yah accha nahi lag raha tha. unke kadak aur robeele mizaz ke vajah se uske paas kahan itni himmat thi ki bhola pandit se kuch baat ki shuruaat kare. dukaan me ek azeeb sa sannata pasra hua tha, tabhi bhola pandit ne stul par nazre jhukaye bathi savitri ke taraf dekha aur bola " dekho ek kapda snangher me hai use dho kar ander hi faila dena" moti awaz me adesh sunkar savitri lagbhag hadbada si gayi aur uske halak ke bas jee shabd hi nikla aur vah uthi aur snangher me chal di. snangher me pahunch kar vah peeche palat kar dekhi ki kahin pandit ji to nahi aa rahe kyonki savitri aaj akele thi aur dukaan bhi sannate me tha aur pandit ji bhi ek naye admi the. fir bhi pandit ji ke upar vishwas tha jaisa ki laxmi ne bataya tha. savitri ko laga ki pandit ji vahin baithe akhbar padh rahe hain. fir savitri ne snangher me kapade talashne lagi to keval farsh par ek safed rand ki langot rakhi thi jise pahalwan log pahante hain. yah bhola pandit ka hi tha. savitri ke man me achanak ek ghabrahat hone lagi kyonki wah kisi mard ka langot dhona theek nahi lagta. snanghar ke darwaje par khadi ho kar yahi soch rahi thi ki achanak bhola pandit ki moti kadak dar awaz aayi "kapda mila ki nahi" ve dukaan me baithe hi bol rahe the. savitri puri tarah se dar gayi aur turant boli "jee mila" savitri ke pas itni himmat nahi thi ki bhola pandit se yah kahe ki vah ek ladki hai aur unki langot ko kaise dho sakti hai. akhir hath badai aur langot ko done ke liye jaise hi pakdi use laga jaise ye langot nahi balki koi saanp hai. fir kisi tarah se langot ko dhone lagi. fir jaise hi langot par sabun lagane ke liye langot ko failaya use laga ki usme kuch kala kala laga hai fir dhyan se dekh to ekdum sakpaka kar rah gayi. yah kala kala kuch aur nahi balki jhant ke baal the jo bhola pandit ke hi the. jo ki kafi mote mote the. vah unhe chuna bilkul hi nahi chahti thi lekin langot saf kaise hogi bina use saf kiye. fir savitri ne pani ki dhar girya ki jhant ke bal langot se bah jaye lekin fir bhi kuch baal nahi bah sake kyonki we langot ke dhago me buri tarah se fanse the. yah savitri ke liye chunauti hi thi kyonki vah bhola pandit ke jhant ke baalo ko chuna nahi chahti thi. achanak bahar se awaz aayi "saaf hua ki nahi" aur is mote awaz ne maano savitri ki haddiyan tak kapa di aur bol padi "jee kar rahi hun" aur ghabrahat me apne unglion se jaise hi langot me fanse jhant ke baalo ko nikalne ke liye pakdi ki sir se pawn tak gangana gayi , use aise laga jaise ye jhant ke baal nahi balki bijli ka kurrent hai, akhir kisi tarah ek ek baal ko langot se nikal kar farsh par fenki aur pani ki dhar fenk kar use bahaya jo snangher ke naali ke taraf tairte huye ja rahe the aur savitri ki nazre unhe dekh kar sansana rahi thi. kisi dhang se langot saf kar ke vah ander hi bandhe rassi par faila kar apna hath tho lee aur vapas dukaan me aayi to chehre par paseena aur lalpan cha gaya tha. usne dekha ki bhola pandit abhi bhi baithe akhbaar badh rahe the. savitri ja kar fir se stul par baith gayi aur nazre jhuka lee. kuch der bad dopahar ho chali thi aur bhola pandit ke khana khane aur aram karne ka samay ho chala tha. samay dekh kar bhola pandit ne dukaan ka bahri darwaja band kiya aur khana khane ke liye ander wale kamre me chale aye. dukaan ka bahri darwaja band hone ka sidha matlab tha ki koi bhi ander nahi aa sakta tha. bhola pandit khana khane lage aur savitri to ghar se hi khana kha kar aati is liye use bas aram hi karna hota. savitri ne chatai lekar dukaan wale hisse me aa gayi aur chatai bicha kar letne ke bajay baith kar aaj ki ghatna ke baare me sochne lagi. use lagta jaise bhola pandit ki jhant ko chu kar bahut galat kiya, lekin dari sahmi aur kya karti. bar bar uske man me dar lagta. dukaan ka bahari darwaja band hone ke karan vah apne aap ko surakshit nahi mahsoos kar rahi thi. yahi sochti rahi ki ander ke kamre se kharrate ki awaz aane lagi. fir yah jan kar ki bhola pandit so gaye hai vah bhi let gayi par unke langot wali jhanto ki yad bar bar dimaag me ghumta rahta. yahi sab sochte sochte kareeb ek ghanta beet gaye. fir bhola pandit uthe to unke uthne ke ahat sun kar savitri bhi chatai par uth kar baith gayi. thodi der baad shauchalay se peshab karne ki awaz aane lagi , wo bhola pandit kar rahe the.abhi dukaan khulne me lagbhag ek ghante ka aur samay tha aur bhola pandit shayad ek ghante aur aram karnge' yahi bat savitri soch rahi thi ki ander se pandit ji ne savitri ko pukara. "suno" savitri lagbhag ghabdai hui uthi aur apna sameez par dupatte ko theek kar ander aae to dekhi ki bhola pandit chauki par baithe hain. savitri unke chauki se kuch dur par khadi ho gayi aur nazre jhuka li aur pandit ji kya kahne wale hain is baat ka intzar karne lagi. tabhi bhola pandit ne puchha "maheena tumhara kab aya tha" achanak aise sawal ko sun kar savitri ki aankhe fati ki fati rah gai vah mano agle pal girkar mar jayegi use aisa lag raha tha. uska gale me mano lakva mar diya ho, dimaag ki saari nase sukh gayi ho. savitri ke rowen rowen ko kampa dene wale is sawal ne savitri ko is kadar jhakjhor diya ki mano uske ankho ke samne kuch deekhayi hi nahi de raha tha. akhir vah kuch bol na saki aur ek patther ki tarah khadi rah gai. dubara bhola pandit ne vahi sawal duhraya "maheena kab baithi thi" savitri ke sir se panw tak paseena choot gaya. use kuch samajh nahi aa raha tha ki ye kya ho raha hai aur wah kya kare lekin dusri bar puchne par vah dafi dabav me aa gayi aur sukhe gale se kafi dhimi awaz hi nikal payi "das din p..." aur awaj dabti chali gayi ki baad ke shabd sunayi hi nahi pade. fir bhola pandit ne kuch aur kade awaz me kuch dhamki bhare lahaje me adesh diya "jao peshab kar ke aao" ise sunate hi savitri kamp si gayi aur shouchalay ke taraf chal padi. ander jaa kar sitkani band karne me lagta uske haath me jaan hi nahi hai. bhola pandit ka peshab karaane ka malab savitri samajh rahi thi lekin dar ke maare use kuch samajh nahi aa raha tha ki wo ab kya kare . shauchalaya ke ander savitri ke hath jarvan kholne me kamp rahe the aur kisi tarah se jarvan khol kar salwar ko keeche ki aur fir chaddhi ko sarkayi aur peshab karne baithi lekin kafi mehnat ke bad peshab ki dhar niklna shuru hui. peshab karne ke baad savitri apne kapado ko sahi ki dupatta se chuchion ko dhaki fir uski himmat shauchalaya se bahar aane ki nahi ho rahi thi aur vah usi me chupchap khadi thi. tabhi fir darawni awaz kaano me bam ki tarah fat pada "jaldi aao bahar" bahar aane ke bad vah nazare jhukaye khadi thi aur uska sina dhak dhak aise kar raha tha mano fat kar bahar aa jayega . savitri ne dekha ki bhola pandit chauki par dono pair neeche latka kar baithe hain. fir pandit jee chauki par baithe hi savitri ko neeche se upar tak ghura aur fir chauki par let gaye. chauki par ek bistar beechi thi aur bhola pandit ke sir ke neeche ek takiya laga tha. bhola pandit lete lete chat ki or dekh rahe the aur chit let tar dono pair sidha faila rakha tha. ve thoti aur baniyan pahne the. dhoti ghutne tak thi aur ghutne ke neeche ka pair saaf deekh raha tha jo gore rang ka kafi majboot tha jispe kafi ghane bal uge the. savitri chupchap apne jagah par aise khadi thi mano koi murti ho. vah apne shareer me dar ke maare dhak dhak ki awaj saf mahsoos kar rahi thi. yah uske jeevan ka bahut daravna pal tha. shayad agle pal me kya hoga is baat ko soch kar kaanp see jati. itne palo me use mahsoos hua ki uska pair ka talva jo bina chappal ke kamre ke farsh par the, paseene se bheeg gaye the. uski saanse tez chal rahi thi. use lag raha tha ki sans lene ke liye use kafi takat lagani pad rahi thi. aisa jaise uske fefadon me hava jaa hi nahi rahi ho. uske dil aur dimag dono me lakva sa mar diya tha. tabhi pandit jee kamre ke chat ke taraf dekhte huye bole "pair dabaa" savitri jo ki is dayniya haalat me thi aur sharm se paani paani ho chuki thi, theek apne samne neeche farsh par dekh rahi thi, kyonki use bhola pandit ke taraf dekhne ki himmat ab khatm ho chuki thi, awaz sunkar fir se kanp see gayi aur apne nazro ko badi takat se utha kar chauki ke taraf ki aur bhola pandit ko jab kankhiyon se dekhi ki ve dhoti aur baniyan me sir ke neeche takiya lagaye lete the aur ab savitri ke taraf hi dekh rahe the. savitri fir se nazre neeche gada lee. vah chauki se kuch hi duri par hi khadi thi use lag raha tha ki uske pair ke dono talve farsh se aise chipak gaye ho ki ab chutenge hi nahi. bhola pandit ko apni taraf dekhte huye vah fir se ghabra gayi aur dar ke maare unke pair dabaane ke liye aage badhi hi thi ki aisa mahsoos hua jaise use chakker aa gaya ho aur agle pal gir na jaye. shayad kafi dar aur ghabrahat ke vajah se hi aisa mahsoos ki. jyon hi savitri ne apna pair farsh par aage badhai to pair ke talve ke paseena ka geelapan farsh par saaf deekh raha tha. ab chaouki ke theek kareeb aa gayi aur khadi khadi yahi soch rahi thi ki ab unke pair ko kaise dabaye. bhola pandit ne savitri se keval pair dabane ke liye bola tha aur ye kuch nahi kaha ki chauki par baith kar dabaye ya keval chauki ke kinaare khadi hokar ki dabaye. kyonki savitri yah janti thee ki pandit jee ko yah maloom hai ki savitri ek chhoti jaat ki hai aur laxmi ne savitri ko pahle hi yah bataya tha ki dukaan me keval apne kaam se kaam rakhna kabhi bhi pandit jee ka koi saman ya chauki ko mat choona kyonki we ek brahman jaati ke hain aur wo chhoti jaati ke logo se apne samano ko choona bardasht nahi karte, aur dukaan me rakhi stul par hi baithna aur aram karne ke liye chatai ka istemaal karna. shayad isi bat ke man me aane se vah chauki se aise khadi thi ki kahin chauki se sat na jaaye. bhola pandit ne yah dekhte hi ki vah chauki se satna nahi chahti hai unhe yad aaya ki savitri ek chote jaati ki hai aur agle hi pal uthkar baithe aur bole "jaa chatai laa" savitri ka dar bahut sahi nikla vah yah sochte huye ki bhalaa chauki ko usne chooa nahi. dukaan wale hisse me jahan wo aram karne ke liye chatai bichai thi, lene chali gayi. idher bhola pandit chauki par fir se pair latka kar baith gaye, savitri jyoni chatai le kar aayi unhone use chauki ke bagal me neeche bichane ke liye ungli se ishara kiya. savitri ki dari huyi aankhe ishara dekhte hi samajh gayi ki kahan bichana hai aur bicha kar ek taraf khadi ho gayi aur apne dupatte ko theek karne lagi, uska dupatta pahle se hi kafi theek tha aur uske dono chation ko achhi tarah se dhaki thin fir bhi apne santushti ke liye uske hath dupatte ke kinaron par chale hi jaate. bhola pandit chauki par se utar kar neeche bichi huyi chatai par let gaye. lekin chauki par rakhe takiya ko sir ke neeche nahi lagaya shayad chatai ka istemaal chhoti jaati ke liye hi tha is liye hi chauki ke bistar par rakhe takia ko chatai par lana munasib nahi samjhe. bhola pandit letne ke baad apne pairon ko sidha kar diya jaisa ki chauki ke upar lete the. fir se dhoti unke ghutno tak ke hisse ko dhak rakha tha. unke pair ke taraf savitri chupchap khadi apne nazron ko farsh par tikayi thi. sine ka dhadakna ab aur tej ho gaya tha. tabhi pandit jee ke adesh ki awaz savitri ke kaano me padi "ab dabaa" . savitri ko aisa lag raha tha ki ghabrahat se use ulti ho jyegi. ab savitri ke saamne yah chunauti thi ki vah pandit ji ke samne kis tarah se baithe ki pandit ji ko uska shareer kam se kam deekhe. jaisa ki vah salwar sameez pahani aur dupatta se apne upri hisse ko kafi dhang se dhak rakha tha. fir usne apne pair ke ghutne ko modkar baithi aur yahi sochne lagi ki ab pair dabana kahan se suru kare. uske man me virodh ke bhi bhav the ki aisa karne se wo mana kar de lekin gaon ki attharah saal ki sidhi sadhi gareeb ladki jisne apna jyada samay ghar me hi bitaya tha, aur sharmilee hone ke saath saath vah ek darpod kism ki bhi ho gayi thi. aur vah apne ghar se bahar dusre jagah yani bhola pandit ke dukaan me thi jiska darwaja band tha aur dopahar ke samay ekant aur shant mahaul me uska man aur dar se bhar gaya tha. uske upar se bhola bandit jo unchee jaati ke the aur unka robeela kadak awaz aur usase bahut kam baaten karne ka swabhav ne savitri ke man me bache khuche atmvishwas aur manobal ko to lagbhag khatm hi kar diya tha. vaise vah pahle se hi kafi dari huyi thi aur aj uska pahla din tha jab vah dukaan me bhola pandit ke saath akelee thi


rajaarkey
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Re: संघर्ष

Unread post by rajaarkey » 14 Dec 2014 10:32

संघर्ष --6

गतांक से आगे..........

इन सब हालातों मे विरोध ना कर सकने वाली सावित्री को अब पंडित जी के पैर पर हाथ लगाना ही पड़ा. जैसे ही उसने उनके पैर पर हाथ रखा सारा बदन सनसनाहट से गन्गना गया क्योंकि यह एक मर्द का पैर था. जो कि काफ़ी ताकतवर और गाथा हुआ था और जिस पर घने बॉल उगे थे. वैसे सावित्री कभी कभी अपनी मा का पैर दबा देती थी जब वो काफ़ी थॅकी होती और उसे पैर दबाना मा ने ही सिखाया था. इसलिए मा के पैर की बनावट की तुलना मे भोला पंडित का पैर काफ़ी कड़ा और गाथा हुआ था. जहाँ मा के पैर पर बाल एकदम ना थे वहीं भोला पंडित के पैर पर काफ़ी घने बाल उगे थे. बालो को देखकर और छूकर उसे लंगोट मे लगे झांट के बालों की याद आ गयी और फिर से सनसना सी गयी. वह अपने हाथो से भोला पंडित के पैर को घुटने के नीचे तक ही दबाती थी. साथ साथ पंडित जी के बालिश्ट शरीर को भी महसूस करने लगी. जवान सावित्री के लिए किसी मर्द का पैर दबाना पहली बार पड़ा था और सावित्री को लगने लगा था कि किसी मर्द को छूने से उसके शरीर मैं कैसी सनसनाहट होती है. कुछ देर तक सावित्री वैसे ही पैर दबाती रही और पंडित जी के पैर के घने मोटे बालों को अपने हाथों मे गड़ता महसूस करती रही. तभी पंडित जी ने अपने पैर के घुटनो को मोदकर थोड़ा उपर कर दिया जिससे धोती घुटनो और झंघो से कुछ सरक गयी और उनकी पहलवान जैसी गठीली जांघे धोती से बाहर आ गयी. भोला पंडित के पैरों की नयी स्थिति के अनुसार सावित्री को भी थोड़ा पंडित जी की तरफ ऐसे खिसकना पड़ा ताकि उनके पैरो को अपने हाथों से दबा सके. फिर सावित्री पंडित जी के पैर को दबाने लगी लेकिन केवल घुटनो के नीचे वाले हिस्से को ही. कुछ देर तक केवल एक पैर को दबाने के बाद जब सावित्री दूसरे पैर को दबाने के लिए आगे बढ़ी तभी पंडित जी कड़ी आवाज़ मे बोल पड़े "उपर भी" सावित्री के उपर मानो पहाड़ ही गिर पड़ा. वह समझ गयी कि वो जाँघो को दबाने के लिए कह रहे हैं. पंडित जी की बालिश्ट जाँघो पर बाल कुछ और ही ज़्यादा थे. जाँघो पर हाथ लगाते हुए सावित्री अपनी इज़्ज़त को लगभग लूटते देख रही थी. कही पंडित जी क्रोधित ना हो जाए इस डर से जाँघो को दबाने मे ज़्यादा देर करना ठीक नही समझ रही थी. अब उसके हाथ मे कंपन लगभग साफ पता चल रहा था. क्योंकि सावित्री पंडित जी के जेंघो को छूने और दबाने के लिए मानसिक रूप से अपने को तैयार नही कर पा रही थी. जो कुछ भी कर रही थी बस डर और घबराहट मे काफ़ी बेबस होने के वजह से. उसे ऐसा महसूस होता था की अभी वह गिर कर तुरंत मर जाएगी. शायद इसी लिए उसे सांस लेने के लिए काफ़ी मेहनत करनी पड़ रही थी. उसके घबराए हुए मन मे यह भी विचार आता था कि उसकी मा ने उसके इज़्ज़त को गाओं के अवारों से बचाने के लिए उसे स्कूल की पड़ाई आठवीं क्लास के बाद बंद करवा दिया और केवल घर मे ही रखी. इसके लिए उसकी विधवा मा को काफ़ी संघर्ष भी करना पड़ा. अकेले घर को चलाने के लिए उसे काफ़ी मेहनत करनी पड़ती थी और इसी लिए कई लोगो के घर जा कर बर्तन झाड़ू पोच्छा के काम करती. आख़िर यह संघर्ष वह अब भी कर रही थी. इसीलिए वह सावित्री को गाओं मे कम करने के बजाय वह अधेड़ पंडित जी के दुकान पर काम करने के लिए भेजा था. यही सोचकर की बाप के उमर के अधेड़ भोला पंडित के दुकान पर उसकी लड़की पूरी सुरक्षित रहेगी जैसा की लक्ष्मी ने बताया था कि पंडित जी काफ़ी शरीफ आदमी हैं. लेकिन सीता की यह कदम की सावित्री भी काम कर के इस ग़रीबी मे इज़्ज़त के लिए इस संघर्ष मे उसका साथ दे जिससे कुछ आमदनी बढ़ जाए और सावित्री की जल्दी शादी के लिए पैसे का इंतेज़ाम हो जाए, सावित्री को अब ग़लत लगने लगा था. लेकिन सावित्री अपने मा को बहुत अच्छी तरीके से जानती थी. सीता को इज़्ज़त से बहुत प्यार था और वह कहती भी थी की मैं ग़रीब भले हूँ और मेरे पास पैसे भले ना हो पर मेरे पास इज़्ज़त तो है. यह बात सही भी थी क्योंकि सावित्री को याद था कि उसके बाप के मरने के बाद सीता ने इस ग़रीबी मे अपनी इज़्ज़त मर्यादा को कैसे बचा कर रखने के लिए कैसे कैसे संघर्ष की. जब वह सयानी हुई तब किस तरह से स्कूल की पड़ाई बंद कराके सावित्री को घर मे ही रहने देने की पूरी कोशिस की ताकि गाओं के गंदे माहौल के वजह से उसके इज़्ज़त पर कोई आँच ना आए. और इज़्ज़त के लिए ही गाओं के गंदे माहौल से डरी सीता यह चाहती थी कि सावित्री की बहुत जल्दी शादी कर के ससुराल भेज दिया जे और इसी लिए वह अपने इस संघर्ष मे सावित्री को भी हाथ बताने के लिए आगे आने के लिए कही.वो भी इस उम्मीद से की कुछ पैसे का इंतेज़ाम हो जाए, पंडित जी के दुकान पर काम के लिए मजबूरी मे भेजी थी इन्ही बातों को सोचते हुए सावित्री को लगा की उसके आँख से आँसू गिर जाएँगे और आँखे लगभग दबदबा गयी. और ज्यो ही सावित्री ने अपना काँपता हाथ पंडित जी के घने उगे बालो वाले बालिश्ट जाँघ पर रखी उसे लगा कि उसकी मा और वह दोनो ही इज़्ज़त के लिए कर रहे अंतिम शंघर्ष मे अब हार सी गयी हो. यही सोचते उसके दबदबाई आँखो से आँसू उसके गालों पर लकीर बनाते हुए टपक पड़े. अपने चेहरे पर आँसुओं के आते ही सावित्री ने अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया ताकि पंडित जी की नज़र आँसुओं पर ना पड़ जाए. तभी उसे लगा की पंडित जी उसके आँसुओं को देख लिया हो और दूसरे पल वह उठकर लगभग बैठ गये. सावित्री को लगा की शायद भगवान ने ग़रीब की सुन ली हो और अब इज़्ज़त बच जाय क्योंकि पंडित जी उसके रोने पर तरस खा कर उससे जाँघ ना दब्वाये. ऐसी सोच ने सावित्री के शरीर मे आशा की एक लहर दौड़ा दी. लेकिन अगले पलों मे ऐसा कुछ भी ना हुआ और पंडित जी बगल मे चौकी पर बिछे बिस्तेर के नीचे से एक किताब निकाली और फिर बिना कुछ कहे वैसे ही लेट गये और उस किताब को पढ़ने लगे. सावित्री को लगा कि वो आसमान से गिर गयी हो. नतीज़ा यह की सावित्री अपने आँखो मे आँसू लिए हुए उनके बालिश्ट झांग को दबाने लगी. जो कि बहुत कड़ा था और काफ़ी घने बाल होने के कारण सावित्री के हाथ मे लगभग चुभ से रहे थे. और ऐसा लगता मानो ये बाल सावित्री के हथेली मे गुदगुदी कर रहे हों क्योंकि काफ़ी मोटे और कड़े भी थे. जब भी सावित्री पंडित जी के जाँघ को दबाती उसे महसूस होता की उनके झांग और उसके हाथों के बीच मे उनके कड़े मोटे बाल एक परत सी बना ले रही हों. सावित्री के हथेलिओं को पंडित जी की जाँघ की मांसपेशियो के काफ़ी कड़े और गातीलेपन का आभास हर दबाव पर हो रहा था जैसे की कोई चट्टान के बने हों. पंडित जी किताब को दोनो हाथो मे लेकर लेटे लेटे पढ़ रहे थे और किताब उनके मुँह के ठीक सामने होने के कारण अब पंडित जी सावित्री को नही देख सकते थे. पंडित जी का मुँह अब किताब के आड़ मे पा कर सावित्री की हिम्मत हुई और वह पंडित जी के कमर वाले हिस्से के तरफ नज़र दौड़ाई तो देखा की धोती जो केवल जाँघो पर से हटी थी लेकिन कमर के हिस्से को अच्छी तरह से ढक रखा था और कहीं से भी लंगोट भी दिखाई नही दे रही थी.

धोती से उनके निचले हिस्से का ठीक से ढके होने से सावित्री को कुछ राहत सी महसूस हुई. और उसके आँखो के आँसू लगभग सूखने लगा ही था कि उसकी नज़र किताब के उपर पड़ी. आठवीं क्लास तक पड़ी होने के वजह से उसे पड़ना तो आता ही था. पंडित जी के हाथ मे जो किताब थी उसका नाम पढ़ कर सावित्री ऐसे सकपकाई जैसे अभी उसके बुर से मूत निकल जाएगी. ऐसी नाम की कोई किताब भी हो सकती है यही सोचकर सिहर ही गयी. ये नाम अक्सर वो गाओं मे झगड़े के समय औरतों को गाली देने के लिए प्रयोग होते हैं. उस किताब का नाम उसके उपर हिन्दी के बड़े अक्षरो मे "हरजाई" लिखा था. यह देखते ही सावित्री के अंदर फिर से घबराहट की लहरें उठने लगी. अब पंडित जी के चरित्र और नियत दोनो सॉफ होती नज़र आ रही थी. उसे अब लगने लगा था कि उसके शरीर मे जान है ही नही और किसी ढंग से वह पंडित जी के जाँघ को दबा पा रही थी. जब जब उस किताब पर नज़र पड़ती तो सावित्री ऐसे सनसना जाती मानो वह किताब नही बल्कि पंडित जी का मोटा खड़ा लंड हो. अब सावित्री के मन को यह यकीन हो गया कि आज उसकी इज़्ज़त को भगवान भी नही बचा पाएँगे. इसी के साथ उसे लगा की उसका मन हताशा की हालत मे डूबता जा रहा था. वह एकदम कमजोर महसूस कर रही थी मानो कई सालों से बीमार हो और मरने के कगार पर हा गयी हो. तभी पंडित जी को लगा की उनके कसरती जाँघ पर सावित्री के हाथों से उतना दबाव नही मिल पा रहा हो और यही सोच कर उन्होने सावित्री को जाँघो को हाथ के बजाय पैर से दबाने के लिए कहा. घबराई सावित्री के सामने एक बड़ी परेशानी थी की उनके पैर और जाँघो पर कैसे चढ़ कर दबाए. आख़िर मजबूर सावित्री उनके पैर और जांघों पर पैर रख कर खड़ी होने लगी तो ऐसा लगने लगा मानो संतुलन ना बनाने के वजह से गिर जाएगी. तभी पंडित जी ने उसे कहा "दुपट्टा हटा दे नही तो उसमे उलझ कर गिर जाएगी" सावित्री को भी कुछ यह बात सही लगी क्योंकि जब वह पंडित जी के पैर और जाँघो पर खड़ी होने की कोशिस करती तब उसका उपरी शरीर हवा मे इधेर उधेर लहराने लगता और दुपट्टा मे उसके हाथ फँसने से लगता. लेकिन दुपट्टा से उसकी दोनो बड़ी बड़ी गोल चुचियाँ धकि थी जो कि समीज़ मे काफ़ी तन कर खड़ी थी. हर हाल मे पैर तो दबाना ही था इसलिए सावित्री दुपट्टा को उतारने लगी और उसे लगा कि उसके उपर आकाश की बिजली गिर पड़ी हो. दुपट्टा उतार कर बगल मे फर्श पर रख दिया और जब सीधी खड़ी हुई तब उसे दुपट्टे की कीमत समझ मे आने लगी. दोनो चुचियाँ एक दम बाहर निकली दिख रही थी मानो समीज़ अभी फट जाएगा और दोनो बड़े बड़े गोल गोल चुचियाँ आज़ाद हो जाएँगी. अब फिर सावित्री पंडित जी के जाँघ पर अपने पैर रख कर चाड़ने की कोशिस करने लगी तो संतुलन बनाने लिए फिर उसका कमर के उपर का शरीर हवा मे लहराया और साथ मे दोनो चुचियाँ भी और उसके शरीर मे सनसनाहट भर सी गयी.लेकिन गनीमत यह थी की पंडित जी का ध्यान उस किताब मे ही था और वी सावित्री के चुचिओ को नही देख रहे थे. सावित्री जब किसी तरह से उनके जाँघ पर खड़ी हो कर उनके जाँघ को अपने पैरों से दबाव बना कर दबाती उनके जाँघ पर उगे घने काले मोटे बालों से उसके पैर के तलवे मे चुभन सी महसूस होती. सावित्री उनके जाँघ पर जब खड़ी हो कर दबा रही थी तभी उसे उनके कसरती शरीर के गातीलेपन का आभास भी होने लगा और जाँघ लग रहा था कि पत्थर का बना हों. थोड़ी देर तक दोनो जांघों को पैर से दबाने के बाद पंडित जी ने उस किताब को एक किनारे रख दिया और फिर अपने जाँघो पर चड़ी सावित्री को घूर्ने लगे मानो दोनो चुचिओ को ही देख रहे हो. अब यह सावित्री के उपर नया हमला था. कुछ पल तक वो चुचिओ को ही निहारने के बाद बोले "उतरो" और सावित्री उनके जाँघो पर से अपने पैर नीचे चटाई पर उतार ली और अपनी पीठ पंडित जी के तरफ कर ली ताकि अपनी दोनो चुचिओ को उनके नज़रों से बचा सके और अगले पल ज्यों ही अपना दुपट्टा लेने के लिए आगे बड़ी के कड़क आवाज़ उसके कानो मे गोली की तरह लगी "कमर भी अपने पैर से" और उसने पलट कर पंडित जी की ओर देखा तो वे पेट के बगल लेट गये थे और उनका पीठ अब उपर की ओर था. उनके शरीर पर बनियान और धोती थी और अब इस हालत मे जब पैर से कमर दबाने के लिए पैर को कमर पर रखने का मतलब उनका सफेद रंग की बनियान और धोती दोनो ही सावित्री के पैर से खराब होती. पंडित जी के कपड़े इतने सॉफ और सफेद थे कि ग़रीब सावित्री की हिम्मत ना होती उनके इन कपड़ो पर पैर रखे. कुछ पल हिचकिचाहट मे बीते ही थे की पंडित जी मे दिमाग़ मे फिर ये बात गूँजी की सावित्री एक छोटी जाती की है और उसके पैर से दबाने पर उनके कपड़े लगभग अशुद्ध हो जाएँगे. फिर अगले पल बोले "रूको कपड़े तो उतार लूँ" और बैठ कर बनियान को निकाल कर चौकी पर रख दिया और धोती को कमर से खोलकर ज्योन्हि अलग किया की उनके शरीर पर केवल एक लाल रंग की लंगोट ही रह गयी.

धोती को भी पंडित जे ने बनियान की तरह चौकी पर रख कर केवल लाल रंग के लंगोट मे फिर पेट के बगल लेट गये. सावित्री धोती हटने के बाद लाल लंगोट मे पंडित जी को देखकर अपनी आँखे दूसरी तरफ दीवार की ओर कर लिया. उसके पास अब इतनी हिम्मत नही थी की अधेड़ उम्र के पंडित जी को केवल लंगोट मे देखे. सावित्री जो की दीवार की तरफ नज़रें की थी, जब उसे लगा कि अब पंडित जे पेट के बगल लेट गये है तब वापस मूडी और उनके कमर पर पैर रख कर चढ़ गयी. अपना संतुलन बनाए रखने के लिए सावित्री को पंडित जी के कमर की तरफ देखना मजबूरी थी और ज्यों ही उसने पंडित जी की कमर की तरफ नज़रें किया वैसे ही पतले लंगोट मे उनका कसा हुआ गातीला चूतड़ दिखाई दिया. सावित्री फिर से सिहर गयी. आज जीवन मे पहली बार सावित्री किसी मर्द का चूतड़ इतने नज़दीक से देख रही थी. उनके चूतदों पर भी बॉल उगे थे. लंगोट दोनो चूतदों के बीच मे फँसा हुआ था. गनीमत यह थी की पंडित जे की नज़रें सावित्री के तरफ नहीं थी क्योंकि पेट के बगल लेटे होने के वजह से उनका मुँहे दूसरी तरफ था इसी कारण सावित्री की कुछ हिम्मत बढ़ी और वह पंडित जी के कमर और पीठ पर चढ़ कर अपने पैरों से दबाते हुए पंडित जे के पूरे शरीर को भी देख ले रही थी. उनका गाथा हुआ कसरती पहलवानो वाला शरीर देख कर सावित्री को लगता था कि वह किसी आदमी पर नही बल्कि किसी शैतान के उपर खड़ी हो जो पत्थर के चट्टान का बना हो. सावित्री अपने पूरे वजन से खड़ी थी लेकिन पंडित जी का शरीर टस से मास नही हो रहा था. जैसा की सावित्री उनके शरीर को देखते हुए उनके कमर को दबा ही रही थी की उसे ऐसा लगा मानो पंडित जी के दोनो जाँघो के बीच मे कुछ जगह बनती जा रही हो. पंडित जी पेट के बगल लेटे लेटे अपने दोनो पैरो के बीच मे कुछ जगह बनाते जा रहें थे. सावित्री की नज़रें पंडित जी के इस नये हरकत पर पड़ने लगी. तभी उसने कुछ ऐसा देखा की देखते ही उसे लगा की चक्कर आ जाएगा और पंडित जी के उपर ही गिर पड़ेगी. अट्ठारह साल की सावित्री उस ख़तरनाक चीज़ को देखते ही समझ गयी थी की इसी से पंडित जी उसके चरित्र का नाश कर हमेसा के लिए चरित्रहीं बना देंगे. यह वही चीज़ थी जिससे उसकी मा के सपनो को तार तार कर उसके संघर्ष को पंडित जी ख़त्म कर देंगे. और आगे उसकी मा अपनी इज़्ज़त पर नाज़ नही कर सकेगी. यह पंडित जी के ढीले लंगोट मे से धीरे धीरे बढ़ता हुआ लंड था जो अभी पूरी तरीके से खड़ा नही हुआ था और कुछ फुलाव लेने के वजह से ढीले हुए लंगोट के किनारे से बाहर आ कर चटाई पर साँप की तरह रेंगता हुआ अपनी लम्बाई बढ़ा रहा था. फिर भी हल्के फुलाव मे भी वह लंड ऐसा लग रहा था की कोई मोटा साँप हो. उसका रॅंड एकदम पंडित जी के रंग का यानी गोरा था. पेट के बगल लेटने के वजह से जो चूतड़ उपर था उसकी दरार मे लंगोट फाँसी हुई और ढीली हो गयी थी जिससे आलू के आकर के दोनो अनदुओं मे से एक ही दिखाई पड़ने लगा था. उसके अगाल बगल काफ़ी बॉल उगे थे. तभी सावित्री को याद आया की जब वह लंगोट साफ कर रही थी तभी यही झांट के बॉल लंगोट मे फँसे थे. अनदुओं के पास झांट के बॉल इतने घने और मोटे थे की सावित्री को विश्वास नही होता था की इतने भी घने और मोटे झांट के बाल हो सकते हैं. सावित्री अपने उपर होने वाले हमले मे प्रयोग होने वाले हथियार को देख कर सिहर सी जा रही थी. उसके पैर मे मानो कमज़ोरी होती जा रही थी और उसकी साँसे अब काफ़ी तेज होने लगी थी जिसे पंडित जी भी सुन और समझ रहे थे. कुछ पल बाद ज्योन्हि सावित्री का नज़र उस लंड पर पड़ी तो उसे लगा की मानो उसकी बुर से मूत छलक जाएगी और खड़ी खड़ी पंडित जी के पीठ पर ही मूत देगी, क्योंकि अब पहले से ज़्यादा खड़ा हो कर काफ़ी लंबा हो गया था. पंडित जी वैसे ही लेटे अपना कमर दबावा रहे थे और उनका खड़ा लंड दोनो जाँघो के बीच मे चटाई पर अपनी मोटाई बढ़ा रहा था और सावित्री को मानो देखकर बेहोशी छाने लगी थी. शायद यह सब उस लंड के तरफ देखने से हो रही थी. अब सावित्री की हिम्मत टूट गयी और उसने अपनी नज़र चटाई पर लेटे हुए पंडित जी के लंड से दूसरी ओर करने लगी तभी उसने देखा की पंडित जी लेटे हुए ही गर्दन घुमा कर उसे ही देख रहे थे. ऐसी हालत मे सावित्री की नज़र जैसे ही पंडित जी के नज़र से लड़ी की उसके मुँह से चीख ही निकल पड़ी और " अरी माई" चीखते हुए पंडित जी के कमर पर से चटाई पर लगभग कूद गयी और सामने फर्श पर पड़े दुपट्टे को ले कर अपने समीज़ को पूरी तरह से ढक ली. लाज़ से बहाल होने के कारण अब उसका दिमाग़ काम करना एकदम से बंद ही कर दिया था. नतीजा दो कदम आगे बढ़ी और चटाई से कुछ ही दूरी पर घुटनो को मोदते हुए और अपने शरीर दोनो बाहों से लपेट कर बैठ गई और अपने चेहरे को दोनो घुटनो के बीच ऐसे छुपा ली मानो वह किसी को अपना मुँह नही दिखाना चाहती हो. अब वह लगभग हाँफ रही थी. फर्श पर ऐसे बैठी थी की वह अब वान्हा से हिलना भी नही चाह रही हो. उसकी घुटना के बीच मे चेहरा छुपाते हुए सावित्री ने दोनो आँखे पूरी ताक़त से बंद कर ली थी. सावित्री का पीठ पंडित जी के तरफ था जो कुछ ही फुट की दूरी पर बिछे चटाई पर अब उठ कर बैठ गये थे. लेकिन उनकी लंगोट अब काफ़ी ढीली हो चली थी और लंगोट के बगल से पंडित जी का गोरा और तननाया हुया टमाटर जैसे लाल सूपड़ा चमकाता हुआ लंड लगभग फुंफ़कार रहा था मानो अब उसे अपना शिकार ऐसे दिखाई दे रहा हो जैसे जंगल मे शेर अपने सामने बैठे शिकार को देख रहा हो.

संघर्ष --6

गतांक से आगे..........

in sab halaton me virodh na kar sakne wali savitri ko ab pandit jee ke pair par hath lagana hi pada. jaise hi usne unke pair par hath rakhi sara badan sansanhat se ganganaa gayi kyonki yah ek mard ka pair tha. jo ki kafi takatwar aur gatha hua tha aur jisbar ghane baal uge the. vaise savitri kabhi kabhi apne maa ka pair daba deti thi jab wo kafi thaki hoti aur use pair dabana maa ne hi sikhaya tha. isliye maa ke pair ki banavat ke tulna me bhola pandit ka pair kafi kada aur gatha huaa tha. jahan maa ke pair par baal ekdam na the vahin bhola pandit ke pair par kafi ghane baal uge the. balo ko dekhkar aur chookar use langot me lage jhant ke balon ki yad aa gayi aur fir se sansana si gayi. vah apne hatho se bhola pandit ke pair ko ghutne ke neeche tak hi dabati thi. saath saath pandit ji ke balisht shareer ko bhi mahsoos karne lagi. jawaan savitri ke liye kisi mard ka pair dabana pahli bar pada tha aur savitri ko lagne laga tha ki kisi mard ko chune se uske shareer main kaisi sansanahat hoti hai. kuch der tak savitri vaise hi pair dabati rahi aur pandit jee ke pair ke ghane mote baalon ko apne hathon me gadta mahsoos karti rahi. tabhi pandit ji ne apne pair ke ghutno ko modkar thoda upar kar diye jisase dhoti ghutno aur jhangho se kuch sarak gayi aur unki pahalwan jaisi gathele jhanghe dhoti se bahar aa gayi. bhola pandit ke pairon ki nayi sthiti ke anusar savitri ko bhi dhoda pandit je ke taraf aise khiskna pada ki unke pairo ko apne hathon se daba sake. fir savitri pandit ji ke pair ko dabane lagi lekin keval ghutno ke neeche wale hisse ko hi. kuch der tak keval ek pair ko dabane ke bad jab savitri dusre pair ko dabane ke liye aage badhi tabhi pandit jee ne kade awaz me bol pade "upar bhee" savitri ke upar mano pahad hi gir pada. vah samajh gayi ki wo jhangho ko dabane ke liye kah rahe hain. pandit ji ki balisht jhanghon par baal kuch aur hi jyada the. jhangho par haath lagaate huye savitri apne ijjat ko lagbhag lootate dekh rahi thi. kahi pandit jee krodhit na ho jaaye is dar se jhangho ko dabaane me jyada der karna theek nahi samajh rahi thi. ab uske haath me kampan lagbhag saf pataa chal raha tha. kyonki savitri pandit jee ke jhangho ko choone aur dabaane ke liye mansik roop se apne ko taiyar nahi kar paa rahi thi. jo kuch bhi kar rahi thi bas dar aur ghabrahat me kafi bebas hone ke vajah se. use aisa mahsoos hota tha ki abhi vah gir kar turant mar jaayegi. shayad isi liye use sans lene ke liye kafi mehnat karni pad rahi thi. uske ghabraye huye man me yah bhi vichar aata tha ki uski maa ne uske ijjat ko gaon ke awaron se bachaane ke liye use school ki padai athvin class ke baad band karva diya aur keval ghar me hi rakhi. iske liye uski vidhva maa ko kafi sangharsh bhi karna pada. akele ghar ko chalane ke liye use kafi mehnat karni padti thi aur isi liye kai logo ke ghar jaa kar bartan jhadu pochha ke kaam karti. akhir yah sangharsh vah ab bhi kar rahi thi. isiliye vah savitri ko gaon me kam karne ke bajaay vah adhed pandit jee ke dukaan par kam karne ke liye bheja tha. yahi sochkar ki baap ke umar ke adhed bhola pandit ke dukaan par uski ladki puri surakshit rahegi jaisa ki laxmi ne bataya tha ki pandit jee kafi sharif admi hain. lekin sita ki yah kadam ki savitri bhi kaam kar ke is gareebi me izzat ke liye is sangharsh me uska sath de jisase kuch amdani badh jaye aur savitri ki jaldi shadi ke liye paise ka intezam ho jaye, savitri ko ab galat lagne laga tha. lekin savitri apne maa ko bahut acchi tareeke se jaanti thi. sita ko ijjat se bahut pyar tha aur vah kahti bhi thi ki main gareeb bhale hun aur mere paas paise bhale naa ho par mere pas ijjat to hai. yah bat sahi bhi thi kyonki savitri ko yad tha ki uske baap ke marne ke bad sita ne is gareebi me apni ijjat maryada ko kaise bacha kar rakhne ke liye kaise kaise sangharsh ki. jab vah sayaani huyi tab kis tarah se school ki padaai band karaake savitri ko ghar me hi rahne dene ki puri koshis ki taki gaon ke gande mahaul ke vajah se uske ijjat par koi aanch naa aye. aur ijjat ke liye hi gaon ke gande mahaul se dari sita yah chahti thi ki savitri ki bahut jaldi shadi kar ke sasural bhej diya jay aur isi liye vah apne is sangharsh me savitri ko bhi hath bataane ke liye aage aane ke liye kahi.wo bhi is ummeed se ki kuch paise ka intezam ho jaye, pandit je ke dukaan par kam ke liye majboori me bheji thi inhi baaton ko sochte huye savitri ko lagaa ki uske aankh se aansu gir jayenge aur ankhe lagbhag dabdabaa gayi. aur jyo hi savitri ne apna kanpata haath pandit jee ke ghane uge baalo wale balisht jhangh par rakhi use lagaa ki uski maa aur vah dono hi izzat ke liye kar rahe antim shangharsh me ab haar si gayi ho. yahi sochte uske dabdabai ankho se ansu uske gaalon par lakeer banaate huye tapak pade. apne chehre par ansuon ke aate hi savitri ne apna chehra dusri taraf kar li taaki pandit jee ki nazar ansuon par naa pad jaye. tabhi use laga ki pandit jee uske ansuon ko dekh liya ho aur dusre pal vah uthkar lagbhag baith gaye. savitri ko lagaa ki shayad bhagvan ne gareeb ki sun lee ho aur ab izzat bach jay kyonki pandit jee uske rone par taras kha kar usase jhangh na dabwayen. aisi soch ne savitri ke shareer me asha ki ek lahar dauda di. lekin agle palon me aisa kuch bhi na hua aur pandit jee bagal me chauki par biche bister ke neeche se ek kitaab nikaale aur fir bina kuch kahe vaise hi let gaye aur us kitab ko padhne lage. savitri ko laga ki wo asmaan se gir gayi ho. nateeza yah ki savitri apne ankho me ansu liye huye unke balisht jhangh ko dabane lagi. jo ki bahut kada tha aur kafi ghane baal hone ke karan savitri ke hath me lagbhag chubh se rahe the. aur aisa lagata maano ye baal savitri ke hatheli me gudgudi kar rahe hon kyonki kafi mote aur kade bhi the. jab bhi savitri pandit jee ke jhangh ko dabaati use mahsoos hota ki unke jhangh aur uske hathon ke beech me unke kade mote baal ek parat see bana le rahi hon. savitri ke hathelion ko pandit jee ki jhangh ki manspeshion ke kafi kade aur gatheelepan ka abhas har dabav par ho raha tha jaise ki koi chattaan ke bane hon. pandit jee kitaab ko dono hatho me lekar lete lete pad rahe the aur kitaab unke munh ke theek samne hone ke karan ab pandit jee savitri ko nahi dekh sakte the. pandit jee ka munh ab kitaab ke ad me paa kar savitri ki himmat huyi aur vah pandit jee ke kamar wale hisse ke taraf nazar daudai to dekha ki dhoti jo keval jhangho par se hati thi lekin kamar ke hisse ko acchi tarah se dhak rakha tha aur kahin se bhi langot bhi dikhayee nahi de rahi thi.

dhoti se unke nichle hisse ka theek se dhake hone se savitri ko kuch rahat si mahsoos hui. aur uske ankho ke ansu lagbhag sukhne laga hi tha ki uski nazar kitab ke upar padi. athvin class tak padi hone ke vajah se use padna to aata hi tha. pandit jee ke hath me jo kitaab thi uska naam padker savitri aise sakpakai jaise abhi uske bur se moot nikal jayegi. aisi naam ki koi kitaab bhi ho sakti hai yahi sochkar sihar hi gayi. ye naam aksar wo gaon me jhagade ke samay aurton ko gali dene ke liye prayog hote hain. us kitab ka naam uske upar hindi ke bade achhron me "harjaaee" likha tha. yah dekhte hi savitri ke andar fir se ghabrahat ki laharen uthne lagi. ab pandit jee ke charitra aur niyat dono saaf hoti nazar aa rahi thi. use ab lagne lagaa tha ki uske shareer me jaan hai hi nahi aur kisi dhang se vah pandit jee ke jangh ko daba pa rahi thi. jab jab us kitaab par nazar padti to savitri aise sansanaa jaati mano vah kitaab nahi balki pandit jee ka mota khada lund ho. ab savitri ke man ko yah yakin ho gayaa ki aaj uski izzat ko bhagvaan bhi nahi bachaa payenge. isi ke saath use laga ki uska man hatasha ki halat me doobta jaa rahaa tha. vah ekdam kamjoor mahsoos kar rahi thi mano kai saalon se bimaar ho aur marne ke kagaar par haa gayi ho. tabhi pandit ji ko laga ki unke kasarati jangh par savitri ke haathon se utna dabav nahi mil paa taha ho aur yahi soch kar unhone savitri ko jangho ko haath ke bajaay pair se dabaane ke liye kaha. ghabarai savitri ke saamne ek badi pareshani thi ki unke pair aur jangho par kaise chad kar dabaaye. aakhir majboor savitri unke pair aur janghon par pair rakh kar khadi hone lagi to aisa lagne laga mano santulan na banane ke vajah se gir jayegi. tabhi pandit ji ne use kaha "dupatta hataa de nahi to usme ulajh kar gir jayegi" savitri ko bhi kuch yah baat sahi lagi kyonki jab vah pandit ji ke pair aur jangho par khadi hone ki koshis karti tab uska upari shareer hava me idher udher lahrane lagta aur dupatta me uske haath fansane se lagta. lekin dupatta se uski dono badi badi gol chuchiyan dhaki thi jo ki sameez me kafi tan kar khadi thi. har haal me pair to dabana hi tha isliye savitri ne dupatta ko utarne lagi aur use lagaa ki uske upar akash ki bijli gir padi ho. dupatta utar kar bagal me farsh par rakh diya aur jab sidhi khadi huyi tab use dupatte ki kimat samajh me aane lagi. dono chuchian ek dam baahar nikali dikh rahi thi mano sameez abhi fat jayega aur dono bade bade gol gol chuchian azad ho jayengi. ab fir savitri pandit ji ke jangh par apne pair rakh kar chadne ki koshis karne lagi to santulan banane liye fir uska kamar ke upar ka shareer hawaa me lahraya aur sath me dono chuchian bhi aur uske shareer me sansanahat bhar see gayi.lekin ganeemat yah thi ki pandit ji ka dhyan us kitaab me hi tha aur we savitri ke chuchion ko nahi dekh rahe the. savitri jab kisi tarah se unke jangh par khadiho kar unke jangh ko apne pairon se dabav banaa kar dabaati unke jangh par uge ghane kale mote baalon se uske pair ke talve me chubhan see mahsoos hoti. savitri unke jangh par jab khadi ho kar dabaa rahi thi tabhi use unke kasarati shareer ke gatheelepan ka abhaas bhi hone lagaa aur jangh lag raha tha ki patthar ka bana hon. thodi der tak dono janghon ko pair se dabane ke baad pandit ji ne us kitaab ko ek kinaare rakh diya aur fir apne jangho par chadi savitri ko ghoorne lage maano dono chuchion ko hi dekh rahe ho. ab yah savitri ke upar naya hamala tha. kuch pal tak wo chuchion ko hi niharne ke baat bole "utaro" aur savitri unke jangho par se apne pair niche chatai par utar lee aur apni peeth pandit jee ke taraf kar lee taaki apni dono chuchion ko unke nazron se bacha sake aur agle pal jyon hi apna dupatta lene ke liye aage badi ke kadak awaz uske kaano me goli ki tarah lagi "kamar bhi apne pair se" aur usne palat kar pandit ji ki or dekha to ve pet ke bagal let gaye the aur unka peeth ab upar ki or tha. unke shareer par baniyaan aur dhoti thi aur ab is halat me jab pair se kamar dabaane ke liye pair ko kamar par rakhne ka matlab unka safed rang ki baniyaan aur dhoti dono hi savitri ke pair se kharaab hoti. pandit ji ke kapde itne saaf aur safed the ki garib savitri ki himmat na hoti unke in kapdo par pair rakhe. kuch pal hichkichahat me bite hi the ki pandit ji me dimaag me fir ye baat gunji ki savitri ek chote jati ki hai aur uske pair se dabane par unke kapde lagbhag ashuddh ho jayenge. fir agle pal bole "ruko kapde to utar lun" aur baith kar baniyaan ko nikaal kar chauki par rakh diya aur dhoti ko kamar se kholkar jyonhi alag kiya ki unke shareer par keval ek lal rang ki langot hi rah gayi.

dhoti ko bhi pandit je ne baniyan ki tarah chauki par rakh kar keval lal rang ke langot me fir pet ke bagal let gaye. savitri dhoti hatne ke bad lal langot me pandit je ko dekhkar apni ankhe dusri taraf dewal ki or kar liya. uske pas ab itni himmat nahi thi ki adhed umra ke pandit ji ko keval langot me dekhe. savitri jo ki dewal ke taraf nazren ki thi, jab use laga ki ab pandit je pet ke bagal let gayen hai tab vapas mudi aur unke kamar par pair rakh kar chad gayi. apna santulan banaye rakhne ke liye savitri ko pandit ji ke kamar ki taraf dekhna majboori thi aur jyon hi usne pandit je ke kamar ki taraf nazren kiya vaise hi patle langot me unka kasa hua gatheela chutad dikhai diya. savitri fir se sihar gayi. aaj jeevan me pahli baar savitri kisi mard ka chutad itne nazdeek se dekh rahi thi. unke chutadon par bhi baal uge the. langot dono chutadon ke beech me fansa huaa tha. ganeemat yah thi ki pandit je ki nazren savitri ke taraf nahin the kyonki pet ke bagal lete hone ke vajah se unka munhe dusari taraf tha isi karan savitri ki kuch himmat badhi aur vah pandit je ke kamar aur peeth par chad kar apne pairon se dabaate huye pandit je ke pure shareer ko bhi dekh le rahi thi. unka gatha hua kasarati pahalwano wala shareer dekh kar savitri ko lagta tha ki vah kisi admi par nahi balki kisi shaitaan ke upar khadi ho jo patthar ke chattan ka banaa ho. savitri apne pure vajan se khadi thi lekin pandit je ka shareer tas se mas nahi ho raha tha. jaisa ki savitri unke shareer ko dekhte huye unke kamar ko dabaa hi rahi thi ki use aisa laga mano pandit ji ke dono jangho ke beech me kuch jagah banati jaa rahi ho. pandit ji pet ke bagal lete lete apne dono pairo ke beech me kuch jagah banaate jaa rahen the. savitri ki nazaren pandit ji ke is naye harkat par padne lagi. tabhi usne kuch aisa dekha ki dekhte hi use laga ki chakkar aa jayega aur pandit ji ke upar hi gir padegi. attharah saal ki savitri us khatarnaak cheej ko dekhte hi samaj gayi thi ki isi se pandit ji uske charitra ko nash kar hamesa ke liye charitraheen banaa denge. yah vahi cheej thi jisase uski maa ke sapno ko taar taar kar uske sangharsh ko pandit ji khatm kar denge. aur aage uski maa apne izzat par naz nahi kar sakegi. yah pandit ji ke dheele langot me se dheere dheere badhta hua lund tha jo abhi puri tarike se khada nahi huaa tha aur kuch fulaav lene ke vajah se dheele huye langot ke kinaare se bahar aa kar chatai par saanp ki tarah rengta hua apni lmbaai badha raha tha. fir bhi halke fulav me bhi vah lund aisa lag raha tha ki koi mota saanp ho. uska rand ekdam pandit ji ke rang ka yani gora tha. pet ke bagal letne ke vajah se jo chutad upar tha uski daraar me langot fansi hui aur dheeli ho gayi thi jisase aloo ke akar ke dono anduon me se ek hi dikhayi padne laga tha. uske agal bagal kafi baal uge the. tabhi savitri ko yaad aya ki jab vah langot saf kar rahi thi tabh yahi jhant ke baal langot me fanse the. anduon ke paas jhant ke baal itne ghane aur mote the ki savitri ko vishvas nahi hota tha ki itne bhi ghane aur mote jhant ke baal ho sakte hain. savitri apne upar hone wale hamle me prayog hone wale hathiyar ko dekh kar sihar si jaa rahi thi. uske pair me maano kamjori hoti jaa rahi thi aur uski sanse ab kafi tej hone lagi thi jise pandit ji bhi sun aur samajh rahe the. kuch pal baad jyonhi savitri ka nazar us lund par padi to use laga ki maano uski bur se moot chalak jayegi aur khadi khadi pandit ji ke peeth par hi moot degi, kyonki ab pahle se jyada khada ho kar kafi lamba ho gaya tha. pandit ji vaise hi lete apna kamar dabavaa rahe the aur unka khada lund dono jangho ke beech me chatai par apni motai badha rahaa tha aur savitri ko mano dekhkar behoshi chaane lagi thi. shayad yah sab us lund ke taraf dekhne se ho rahi thi. ab savitri ki himmat toot gayi aur usne apni nazar chatai par lete huye pandit ji ke lund se dusri or karne lagi tabhi usne dekha ki pandit ji lete huye hi gardhan ghuma kar use hi dekh rahe the. aisi halat me savitri ki nazar jaise hi pandit ji ke najar se ladi ki uske munh se cheekh hi nikal padi aur " aree maaee" cheekhte hue pandit ji ke kamar par se chatai par lagbhag kud gayi aur samne farsh par pade dupatte ko le kar apne sameez ko puri tarah se dhak lee. laaz se behaal hone ke karan ab uska dimaag kaam karna ekdam se band hi kar diya tha. nateeja ki do kadam aage badhi aur chatai se kuch hi duri par ghutno ko modte huye aur apne shareer dono bahon se lapet kar baith gai aur apne chehre ko dono ghutno ke beech aise chupa lee maano vah kisi ko apna munh nahi dikhana chahti ho. ab vah lagbhag hanf rahi thi. farsh par aise baithi thi ki vah ab vanha se hilna bhi nahi chah rahi ho. uski ghutna ke beech me chehra chupaate huye savitri ne dono ankhe puri taakat se band kar lee thee. savitri ka peeth pandit ji ke taraf tha jo kuch hi fut ki duri par biche chatai par ab uth kar bath gaye the. lekin unki langot ab kafi dheeli ho chalee thi aur langot ke bagal se pandit ji ka gora aur tannaya huya tamatar jaise laal supada chamkaata hua lund lagbhag funfkaar rahaa tha mano ab use apna shikaar aise dikhai de raha ho jaise jangal me sher apne samne baithe shikaar ko dekh rahaa ho.