मजबूरी--हालत की मारी औरत की कहानीcompleet

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raj..
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मजबूरी--हालत की मारी औरत की कहानीcompleet

Unread post by raj.. » 06 Nov 2014 09:46

मजबूरी--हालत की मारी औरत की कहानी



मेरा नाम रचना है...मेरा जनम एक साधारण परिवार मे यूपी के एक छोटे से गाँव मे

हुआ … मेरे घर मुझे से बड़ी एक बहन और एक भाई है दोनो की शादी हो चुकी है … ये तब के बात है जब मेरी एज 18 साल थी.. अभी जवानी आनी शुरू ही हुई थी तब मेरी दीदी की शादी को 5 साल हो चुके थे और मे 12थ मे पढ़ रही थी…

एक दिन जब मे स्कूल से घर आई, तो घर मे मातम छाया हुआ था… मा नीचे ज़मीन पर बैठी रो रही थी जब मेने मा से पूछा तो मा ने कोई जवाब नही दिया.. और पापा जो एक कोने मे खड़े रो रहे थे .. उन्होने मुझे उठाया, और मेरी ओर देखते हुए बोले….. बेटा तुम्हारी दीदी हमे छोड़ कर इस दुनिया से चली गयी….

मेरे पैरो के तले से ज़मीन खिसक गयी, और मे फूट -2 कर रोने लगी…दीदी को एक बेटी थी जो शादी के एक साल बाद हुई थी मे अपने सारे परिवार के साथ जीजा जी के घर के लिए चली गयी दीदी की अंतिम क्रिया हुई

उसके बाद धीरे -2 सब नॉर्मल होने लगे… दीदी की मौत के दो महीने बाद जीजा जी अपनी बेटी को लेकर हमारे घर आए… तब मे स्कूल गयी हुई थी… जीजा जी के घर वालों से किया बात हुई, मुझे पता नही…. पर जब मे घर पहुचि तो, मा मुझे एक रूम मे ले गयी, और मुझे से बोली…..

मा: बेटा मेरी बात ध्यान से सुन…. तुझे तो पता है ना अब तेरी दीदी के गुजर जाने के बाद… तेरी दीदी की बेटी की देख भाल करने वाला कोई नही है, और तेरे जीजा जी दूसरी शादी करने जा रहे हैं… अब सिर्फ़ तुम ही अपनी दीदी की बेटी की जिंदगी खराब होने से बचा सकती हो….

मे: (हैरान होते हुए) मे पर कैसे मा…..

मा: बेटा तूँ अपने जीजा से शादी कर ले… यहीं आख़िरी रास्ता है…. देख बेटी मना मत करना… मे तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ…(और मा की आँखों मे आँसू आ गये)

मे: (मा के आँसू मुझेसे देखे ना गये) ठीक है मा , आप जो भी कहो जी…मे करने के लाए तैयार हूँ..

मा: बेटा तूने मेरी बात मान कर, मेरे दिल से बहुत बड़ा बोझ उतार दिया है…

और उसके बाद मा दूसरे रूम मे चली गयी…. दीदी की मौत के 6 महीने बाद, मेरी शादी मेरे जीजा जी से करवा दी गये…मेरे सारे अरमानो की बलि दे दी गयी…

जीजा जी अब मेरे पति बन चुके थे….उनका नाम गोपाल था… शादी के बाद मे जब अपने ससुराल पहुचि…रात को मेरी सास ने मुझे, घर के कमरे मे बैठा दिया…बिस्तर ज़मीन पर लगा हुआ था…घर कच्चा था…यहाँ तक के घर का फर्श भी कच्चा ही था….मे नीचे ज़मीन पर लगे हुए बिस्तर पर बैठी… अपनी आने वाली जिंदगी के बारे मे सोच रही थी….ऐसा नही था की मुझे सेक्स के बारे मे कुछ नही पता था…. पर बहुत ज़्यादा भी नही जानती थी…

अचानक रूम का डोर खुला, और गोपाल अंदर आ गये…अंदर आते ही उन्होने डोर को लॉक किया और मेरे पास आकर बैठ गये….मे एक दम से घबरा गयी… मेरे दिल की धड़कन एक दम तेज़ी से चल रही थी…..कुछ देर बैठने के बाद वो अचानक से बोले

गोपाल:अब बैठी ही रहोगी चल खड़ी हो कर अपनी सारी उतार

मे एक दम से घबरा गयी…मुझे ये उम्मीद बिकुल भी नही थी, की कोई आदमी अपनी सुहाग रात को ऐसे अपनी पत्नी से पेश आता होगा…

गोपाल: क्या हुआ सुनाई नही दिया …. चल जल्दी कर अपनी सारी उतार…

मेरे हाथ पैर काँपने लगे…माथे पर पसीना आने लगा…दिल के धड़कन तेज हो गयी….मे किसी तरहा खड़ी हुई, और अपनी सारी को उतारने लगी...जब मे सारी उतार रही थी..तो गोपाल एक दम से खड़े हो गये….और अपना पयज़ामा और कुर्ता उतार कर खुंते से टाँग दिया, और फिर से बिस्तर पर लेट गये…मे अपनी सारी उतार चुकी थी…अब मेरे बदन पर पेटिकॉट और ब्लाउस ही था….और उसके अंदर पॅंटी और ब्रा…गोपाल ने मुझे हाथ से पकड़ कर खींचा…मे बिस्तर पर गिर पड़ी…

गोपाल: क्यो इतना टाइम लगा रही हो… इतने टाइम मे तो मे तुम्हें दो बार चोद चुका होता…चल अब लेट जा…

गोपाल ने मुझे पीठ के बल लेता दिया….जैसे मेने अपनी सहेलियों से सुहागरात के बारे मे सुन रखा था…वैसा अब तक बिल्कुल कुछ भी नही हुआ था…उन्होने एक ही झटके मे मेरे पेटिकॉट को खींच कर मेरी कमर पर चढ़ा दिया,और मेरी जाँघो को फैला कर, मेरी जाँघो के बीच मे घुटनो के बल बैठ गये…मेने शरम के मारे आँखें बंद कर ली…आख़िर मे कर भी क्या सकती थी…और आने वालों पलों का धड़कते दिल के साथ इंतजार करने लगी…गोपाल के हाथ मेरी जाँघो को मसल रहे थे…मे अपनी मुलायम जाँघो पर गोपाल के खुरदारे और, सख़्त हाथों को महसूस करके, एक दम सिहर गयी…वो मेरी जाँघो को बुरी तराहा मसल रहा था…मेरी दर्द के मारे जान निकली जा रही थी…पर तब तक मे दर्द को बर्दास्त कर रही थी, और अपनी आवाज़ को दबाए हुए थी…

फिर एका एक उन्होने ने मेरी पॅंटी को दोनो तरफ से पकड़ कर, एक झटके मे खींच दिया… मेरे दिल की धड़कन आज से पहले इतनी तेज कभी नही चली थी…उसे बेरहम इंसान को अपने सामने पड़ी नाज़ुक सी लड़की को देख कर भी दया नही आ रही थी…फिर गोपाल एक दम से खड़ा हुआ और, अपना अंडरवेर उतार दिया…कमरे मे लालटेन जल रही थी…लालटेन की रोशनी मे उसका काला लंड, जो कि 5 इंच से ज़यादा लंबा नही था, मेरी आँखों के सामने हवा मे झटके खा रहा था…गोपाल फिर से मेरी जाँघो के बीच मे बैठ गया, और मेरी जाँघो को फैला कर, अपने लंड के सुपाडे को मेरी चूत के छेद पर टिका दिया…मेरे जिस्म मे एक पल के लिए मस्ती की लहर दौड़ गयी…चूत के छेद और दीवारों पर सरसराहट होने लगी…पर अगले ही पल मेरी सारी मस्ती ख़तम हो गयी…उस जालिम ने बिना कोई देर किए, अपनी पूरी ताक़त के साथ अपना लंड मेरी चूत मे पेल दिया… मेरी आँखें दर्द के मारे फॅट गयी,और दर्द के मारे चिल्ला पड़ी…मेरी आँखों से आँसू बहने लगे…पर उस हवसि दरिंदे ने मेरी चीखों की परवाह किए बगैर एक और धक्का मारा, मेरा पूरा बदन दर्द के मारे एन्थ गया…मेरे मुँह से चीख निकलने ही वाली थी की, उसने अपना हाथ मेरे मुँह पर रख दिया… और मेरी चीख मेरे मुँह के अंदर ही घुट कर रह गये…मे रोने लगी

मे: (रोते हुए) बहुत दर्द हो रहा है इसे निकल लो जी आह

गोपाल: चुप कर साली, क्यों नखरे कर रही है पहली बार दर्द होता है…अभी थोड़ी देर मे ठीक हो जाएगा…


raj..
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Re: मजबूरी--हालत की मारी औरत की कहानी

Unread post by raj.. » 06 Nov 2014 09:49

मे रोती रही, गिड्गिडाति रही, पर उसने मेरे एक ना सुनी,और अपना लंड मेरी चूत के अंदर बाहर करने लगा… मेरी चूत से खून निकल कर मेरी जाँघो तक फेल चुका था..खून निकलने का पता मुझे सुबह चला, जब मे सुबह कपड़े पहनने के लिए उठी थी..दर्द के मारे मेरी जान निकली जा रही थी…पर दरिंदे ने मुझ पर कोई तरस नही खाया…ना ही उसने मुझे प्यार किया, ना ही मेरी चुचियो को मसला, ना ही चूसा बस अपना लंड डाल कर, वो मुझे पेले जा रहा था…मे उसके भारी बदन के नीचे पड़ी दर्द को सहन कर रही थी…5 मिनट लगातार चोदने के बाद,उसका बदन अकडने लगा, और उसके लंड से पानी निकल गया…और मेरे ऊपेर निढाल होकर गिर गये…उसका सारा वजन मेरे ऊपेर था..मेने गोपाल को कंधों से पकड़ कर साइड करने के कॉसिश की….पर उसका वेट मुझसे कहीं ज़्यादा था..आख़िर कार वो खुद ही उठ कर बगल मे निढाल होकर गिर गया…

मेने राहत की साँस ली… मे अभी भी रो रही थी…मेने अपने पेटिकॉट को नीचे किया और, गोपाल की तरफ पीठ करके लेट गयी…वो तो 5 मिनट मे ही झाड़ कर सो गया था…उसके ख़र्राटों की आवाज़ से मुझे पता चला… मे बाथरूम जाना चाहती थी… पर मेरा पूरा बदन दुख रहा था… मेरे चूत सूज चुकी थी…इसलिए मे उठ भी ना

पे…और वहीं लेटे -2 मुझे कब नींद आ गये…मुझे नही पता…उसके बाद मुझे तब होश आया, जब मेरी सास ने मुझे सुबह उठाया…

मेरे सारे अरमान एक ही पल मे टूट गये थे… मे सोचने लगी काश के मेने मा को मना कर दिया होता…पर होनी को कोन टाल सकता है…अब यही मेरा जीवन है…मेने अपने आप से समझोता कर लिया…मेरी जिंदगी किसी मशीन की तरह हो गयी…दिन भर घर का काम करना, और रात को गोपाल से चुदाना यही मेरी नियती बन गयी थी…कुछ दिनो के बाद मेरी चूत थोड़ी सी खुल गयी…इस लिए अब मुझे दर्द नही होता था…पर गोपाल अपनी आदात के अनुसार, रोज रात को मेरे पेटिकॉट को ऊपेर उठा कर मुझे चोद देते… आज तक उन्होने मुझे कभी पूरा नंगा भी नही किया…

गोपाल जिस गाँव मे रहते थे…उस गाँव की औरतो से भी धीरे -2 मेरी पहचान होने लगी…उनकी चुदाई की बातों को सुन मे एक दम से मायूस हो जाती…पर मेने कभी अपने दिल की बात किसी से नही कही…बस चुप-चाप घुट-2 कर जीती रही…गोपाल मुझे ना तो शरीरक रूप से सन्तुस्त कर पाया, और ना ही उसे मेरे भावनाओ की कोई परवाह थी….दिन यूँ ही गुज़रते गये…मेरा ससुराल एक साधारण सा परिवार था…मेरे पति गोपाल ना ही बहुत ज़्यादा पढ़े लिखे थे, और ना ही कोई नौकरी करते थे…मेरे जेठ जी बहुत पढ़े लिखे आदमी थे…घर की ज़मीन जायदाद ज़्यादा नही थे… इसलिए घर को चलाना भी मुस्किल हो रहा था…जेठ जी सरकारी टीचर थे…पर वो अलग हो चुके थे…. ज़मीन को जो हिस्सा मेरे पति के हिस्से आया तो उसके भरोसे जीवन को चलना ना मुनकीन के बराबर था…

टाइम गुज़रता गया… पर टाइम के गुजरने के साथ घर के खर्चे भी बढ़ते गयी…मेरे शादी को 10 साल हो चुके थी…मे 28 साल की हो चुकी थी…पर मेरे कोई बच्चा नही हुआ था…और मे बच्चा चाहती भी नही थी…क्योंकि दीदी की बेटी को जो अब 14 साल की हो चुकी थी उसके खर्चे ही नही संभाल रहे थे…लड़की का नाम नेहा है… वो मुझे मा कह कर ही पुकारती थी…नेहा पर जवानी आ चुकी थी… उसकी चुचियो मे भी भराव आने लगा था…वो जानती थी कि मे उसकी असली मा नही हूँ, पर अब मुझमे वो अपनी मा को ही देखती थी…अब घर के हालत बहुत खराब हो चुके थे…घर का खरच भी सही ढंग से नही चल पा रहा था…

एक दिन सुबह मैं जल्दी उठ कर घेर मे गाय को चारा डालने गई तो मैने देखा की मेरा जेठ विजय मेरी जेठानी शांति से चिपका हुआ है और उसकी चुचियो को मसल रहा है मेरा हाथ इतना सेक्सी सीन देख कर खुद ही मेरी चूत पर चला गया मैं अपनी चूत मसल्ने लगी फिर मुझे होश आया कि कहीं वो दोनो मुझे देख ना ले इसलिए मैं वापस आने लगी लेकिन शायद उन्होने मुझे देख लिया था

शांति कपड़े ठीक करके दूध धोने बैठ गयी…और विजय बाहर आने लगा…मे एक दम से डर गयी…और वापिस मूड कर आने लगी…बाहर अभी भी अंधेरा था…मे अपने घर मे आ गयी..पर जैसे ही मे डोर बंद करने लगी…विजय आ गया, और डोर को धकेल कर अंदर आ गया…

मे: (हड़बड़ाते हुए) भाई साहब आप, कोई काम था….(मेरे हाथ पैर डर के मारे काँप रहे थे…)

विजय: क्यों क्या हुआ… भाग क्यों आई वहाँ से… अच्छा नही लगा क्या?

मे: (अंजान बनाने का नाटक करते हुए) कहाँ से भाई साहब मे समझी नही…

वो एक पल के लिए चुप हो गया….और मेरी तरफ देखते हुए उसने अपना लंड लूँगी से निकाल लिया…और एक ही झटके मे मेरा हाथ पकड़ कर अपने लंड पर रख लिया….

मे: ये क्या कर रहे हैं भाई साहब? छोड़ो मुझे (गुस्से से बोली)

विजय: अब मुझसे क्या शरमाना मेरी जान….वहाँ तो देख देख कर अपनी चूत को मसल रही थी…अब क्या हुआ…

मे: (अपने हाथ को छुड़ाने के कॉसिश करते हुए गुस्से से बोली) देखिए भाई साहब आप जो कर रहे है, ठीक नही कर रहे है…मेरा हाथ छोड़ दो…

विजय ने अपने होंटो पर बेहूदा सी मुस्कान लाते हुए मुझे धक्का दे कर दीवार से सटा दिया…और मेरे दोनो हाथों को पकड़ कर मेरी कमर को पीछे दीवार से सटा दिया…..मेरी सारी का पल्लू नीचे गिर गया…और मेरे ब्लाउस मे तनी हुई चुचिया मेरे जेठ जी के सामने आ गयी…उन्होने एक हाथ से मेरे दोनो हाथों को पकड़ कर दीवार से सताए रखा…फिर वो पैरो के बल नीचे बैठ गये…और मेरी सारी और पेटिकॉट को ऊपेर करने लगे…मेरी तो डर के मारे जान निकली जा रही थी…कि कहीं कोई उठ ना जाए…घर पर बच्चे और सास ससुर थे….अगर वो मुझे इस हालत मे देख लेते तो मे कहीं की ना रहती…..मे अपनी तरफ से छूटने का पूरी कोशिश कर रही थी…पर उसकी पकड़ बहुत मजबूत थी….उसने तब तक मेरे सारी और पेटिकॉट को मेरी जाँघो तक उठा दिया था….और अपनी कमीनी नज़रों से मेरी दूध जैसी गोरी और मुलायम जाँघो को देख रहा था….अचानक उन्होने ने मेरी सारी और पेटिकॉट को एक झटके मे मेरे चुतडो तक ऊपेर उठा दिया…मेरी ब्लॅक कलर की पॅंटी अब उनकी आँखों के सामने थी…इससे पहले कि मे और कुछ कर पाती या बोलती, उसने अपने होंटो को मेरी जाँघो पर रख दिया…मेरे जिस्म मे करेंट सा दौड़ गया…बदन मे मस्ती और उतेजना की लहर दौड़ गयी…और ना चाहते हुए भी मुँह से एक कामुक और अश्लील सिसकारी निकल गयी…जो उसने सुन ली वो तेज़ी से अपने होटो को मेरी जाँघो पर रगड़ने लगा…मेरे हाथ पैर मेरा साथ छोड़ रहे थे…उन्होने ने मेरे दोनो हाथों को छोड़ दिया…और अपने दोनो हाथों को मेरी सारी और पेटिकॉट के नीचे से लेजा कर मेरे चुतडो को मेरी पनटी के ऊपेर से पकड़ लिया….मेरा जिस्म काँप उठा…आज कई महीनो बाद किसी ने मुझे मेरे चुतडो पर छुआ था…वो मेरी जाँघो को चूमता हुआ ऊपेर आने लगा…और मेरी पॅंटी के ऊपेर से मेरी चूत की फांकों पर अपने होंटो को रख दिया ….मे अपने हाथों से अपने जेठ के कंधों को पकड़ कर पीछे धकेल रही थी…पॅंटी के ऊपेर से ही चूत पर उनके होंटो को महसूस करके मे एक दम कमजोर पड़ गयी…

मे: (अब मेने विरोध करना छोड़ दिया था बस अपने मर्यादा का ख़याल रखते हुए मना कर रही थी) नही भाई साहब छोड़ दो जी…कोई आ जाएगा…. अहह नही ओह्ह्ह्ह बस बच्चे उठ जाएँगे ओह्ह्ह ओह्ह्ह्ह

क्रमशः.................


raj..
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Re: मजबूरी--हालत की मारी औरत की कहानी

Unread post by raj.. » 06 Nov 2014 09:49

Mera naam Rachna hai...mera janam ek sadharan pariwar me UP ke ek chote se gaanv me

hua … mere ghar mujhe se badi ek bahan aur ek bhai hai dono kee shadi ho chuki hai … ye tab ke baat hai jab meree age 18 saal thee.. abhi jawani aani shuru hee hui thee tab meree didi kee shadi ko 5 saal ho chuke the aur me 12th me padh rahi thee…

ek din jab me school se ghar ayee, to ghar me matam chaya hua tha… maa neeche jameen par baithi ro rahi thee jab mene maa se poocha to maa ne koi jawab nahi diya.. aur papa jo ek kone me khade ro rahe the .. unhone mujhe uthaya, aur meree aur dekhate hue bole….. beta tumhari didi hame chod kar isdunaya se chali gaye….

Mere pairo ke tale se jameen khisak gayee, aur me foot -2 kar rone lagi…didi ko ek beti thee jo shadi ke ek saal baad huee thee me apne sare pariwar ke sath jija jee ke ghar ke liye chali gayee didi kee antim kriya hui

Uske baad dheere -2 sab normal hone lagee… didi kee mout ke do mahine baad jija jee apnee beti ko lekar hamare ghar aaye… tab me school gayee hui thee… jija jee ke ghar walon se kiya baat hui, mujhe pata nahi…. par jab me ghar phunchi to, maa mujhe ek room me le gayee, aur mujhe se boli…..

Maa: beta meri baat dhyaan se sun…. tujhe to pata hai na ab teri didi ke gujar jane ke baad… teree didi kee beti kee dekh bhaal karne wala koi nahi hai, aur tere jija jee doosri shadi karne ja rahe hain… ab sirf tum hee apnee didi kee beti kee jindgi kharab hone se bacha sakti ho….

Me: (harain hote hue) me par kaise maa…..

Maa: beta tun apne jija se shadi kar le… yahin akhiri rasta hai…. Dekh beti mana mat karna… me tumhare hath jodati hun…(aur maa kee ankhon me ansoon aa gaye)

Me: (maa ke ansoon mujhese dekhe na gaye) theek hai maa , aap jo bhee kaho gee…me karne ke laye taiyaar hoon..

Maa: beta tune meree baat maan kar, mere dil se bahut bada bojh utaar diya hai…

Aur uske baad maa doosre room me chali gayee…. Didi kee mout ke 6 mahine baad, meree shadi mere jija jee se karwa dee gaye…mere sare armano kee bali de dee gayee…

Jija jee ab mere pati ban chuke the….unka naam gopal tha… shadi ke baad me jab apne sasural phunchi…raat ko meree saas ne mujhe, ghar ke kamre me baitha diya…bistar jameen par laga hua tha…ghar kachcha tha…yahan tak ke ghar ka farsh bhee kacha hee tha….me neeche jameen par lage hue bistar par baithi… apni aane walee jindgi ke baare me soch rahi thee….aisa nahi tha ki mujhe sex ke baare me kuch nahi pata tha…. Par bahut jyaada bhee nahi janti thee…

Achank room ka door khula, aur gopal andar aa gaye…andar aate hee unhone door ko lock kiya aur mere pass aakar baith gaye….me ek dum se ghabra gayee… mere dil kee dhadkan ek dum teji se chal rahi thee…..kuch der baithane ke baad wo achank se bole

Gopal:ab baithi hee rahogee chal khadi ho kar apni saree utar

Me ek dum se ghabra gayee…mujhe ye umeed bikul bhee nahi thee, ki koi adami apni suhag raat ko aise apni patni se pesh aata hoga…

Gopal: kya hua sunaai nahi diya …. Chal jaldi kar apni saree utar…

Mere hath pair kanmapne lage…mathe par paseena aane laga…dil ke dhadkan tej ho gaye….me kisi tarhan khadi hui, aur apni saree ko utaren lagi...jab me saree utar rahi thee..to gopal ek dum se khade ho gaye….aur apna payjaama aur kurta utar kar khunte se taang diya, aur phir se bistar par lete gaye…me apni saree utar chuki thee…ab mere badan par peticote aur blouse hee tha….aur uske andar panty aur bra…gopal ne mujhe hath se pakad kar kheencha…me bistar par gir padi…

Gopal: kyo itna time laga rahi ho… itne time me to me tumhen do baar chod chuka hota…chal ab let ja…

Gopal ne mujhe peeth ke bal leta diya….jaise mene apni saheliyon se suhagaraat ke baare me sun rakha thaa…waisa ab tak bilkul kuch bhee nahi hua thaa…unhone ek hee jhatke me mere peticote ko kheench kar meree kamar par chadha diya,aur meree jaangho ko faila kar, meree jaangho ke beech me ghuntno ke bal baith gaye…mene sharam ke maare ankhen band kar lee…akhir me kar bhee kya sakti thee…aur aane walon palon ka dhadkate dil ke sath intjaar karne lagi…gopal ke hath meree jaangho ko masal rahe the…me apni mulaayam jaangho par gopal ke khurdare aur, sakht hathon ko mahsoos karke, ek dum sihar gaye…wo meree jaangho ko buri tarahan masal raha tha…meree dard ke maare jaan nikli ja rahi thee…par tab tak me dard ko bardast kar rahi thee, aur apni awaz ko dabaaye hue thee…

Phir eka ek unhone ne meree panty ko dono taraf se pakad kar, ek jhatke me kheench diya… mere dil kee dhadkan aaj se pehale itni tej kabhi nahi chali thee…use beraham insaan ko apne samne padi najuk see ladki ko dekh kar bhee daya nahi aa rahi thee…phir gopal ek dum se khada hua aur, apna underwear utar diya…kamre me lalten jal rahi thee…lalten kee roshani me uska kala lund, jo ki 5 inch se jayada lamaba lahi thaa, meree ankhon ke samne hawa me jhatke kha raha tha…gopal phir se meree jaangho ke beech me baith gaya, aur meree jaangho ko faila kar, apne lund ke supaaDe ko meree choot ke ched par tika diya…mere jism me ek pal ke liye masti kee lehar doud gaye…choot ke ched aur diwaron par sarsaraahat hone lagi…par agle hee pal meree sari masti khatam ho gayee…us jalim ne bina koi der kiye, apni poori taakat ke sath apna lund meree choot me pel diya… meree ankhen dard ke maare phat gayee,aur dard ke mare chilla padi…meree ankhon se ansoo bahane lage…par us hawasi darinde ne meree chikhon kee parwah kiye bagair ek aur dhakka mara, mera poora badan dard ke mare enth gaya…mere munh se cheekh nikalne hee wali thee ki, usne apna hath mere munh par rakh diya… aur meree cheekh mere munh ke andar hee ghut kar reh gaye…me rone lagi

Me: (rote hue) bahut dard ho raha hai ise nikal lo jee ahhh

Gopal: chup kar Sali, kyon nakhare kar rahi hai pehali baar dard hota hai…abhi thodi der me theek ho jayega…

Me roti rahi, giDgiDaati rahi, par usne mere ek na suni,aur apna lund merEe choot ke andar bahar karne laga… meree choot se khoon nikal kar meree jaangho tak phel chuka tha..khoon nikalne ka pata mujhe subah chala, jab me subah kapde pehane ke liye uthi thee..dard ke maare meree jaan nikli jaa rahi thee…par darinde ne mujh par koi taras nahi khaya…na hee usne mujhe payar kiya, na hee meree chuchiyo ko masla, na hee chusa bus apna lund daal kar, wo mujhe pele ja raha tha…me uske bhari badan ke neeche padi dard ko sahan kar rahi thee…5 min lagataar choden ke baad,uska badan akden laga, aur uske lund se pani nikal gaya…aur mere ooper nidhal hokar gir gaye…uska sara wajan mere ooper tha..mene gopal ko kandhon se pakad kar side karne ke kosih kee….par uska wight mujhse kahin jyaada tha..akhir kaar wo khud hee uth kar bagal me nidhal hokar gir gaya…

Mene rahat kee saans lee… me abhee bhee ro rahi thee…mene apne peticote ko neeche kiya aur, gopal kee taraf peeth karke late gayee…wo to 5 minat me hee jhad kar so gaya tha…uske kharraton kee awaz se mujhe pata chala… me bathroom jana chathi thee… par mera poora badan dukh raha tha… mere choot suj chuki thee…islaye me uth bhee na

Paye…aur wahin lete -2 mujhe kab neend aa gaye…mujhe nahi pata…uske baad mujhe tab hosh aaya, jab meree saas ne mujhe subah uthaaya…

mujhe kab neend aa gayee…mujhe nahi pata…uske baad mujhe tab hosh aaya, jab meree saas ne mujhe subah uthaya… mere sare armaan ek hee pal me toot gaye the… me sochane lagi kash ke mene maa ko mana kar diya hota…par honi ko kon taal sakta hai…ab yahi mera jeevan hai…mene apne aap se samjhota kar liya…meree jindgi kisi machine kee tarah ho gayee…din bhar ghar ka kaam karna, aur raat ko gopal se chudaanaa yehi meree niyatee ban gayee thee…kuch dino ke baad meree choot thodi see khul gayee…is liye ab mujhe dard nahi hota thaa…par gopal apni adaat ke ansuar, roj raat ko mere peticote ko ooper utha kar mujhe chod dete… aj tak unhone mujhe kabhi poora nanga bhee nahi kiya…

Gopal jis gaanv me rahte the…us gaanv kee ourato se bhee dheere -2 meree pehchan hone lagi…unki chudai kee baton ko sun me ek dum se mayoos ho jati…par mene kabhi apne dil kee baat kisi se nahi kahi…bus chup-chap ghut-2 kar jeeti rahi…gopal mujhe na to sharirk roop se santust kar paya, aur na hee use mere bhavnaao kee koi parwaah thee….din yun hee gujarte gaye…mera sasural ek sadharan sa pariwar tha…mere pati gopal naa hee bahut jyaada padhe likhe the, aur naa hee koi naukari karte the…mere jeth jee bahut padhe likhe adami the…ghar kee jameen jaayadaad jyaada nahi the… isliye ghar ko chalana bhee muskil ho raha thaa…jeth jee sarkari teacher the…par wo alag ho chuke the…. Jameen ko jo hissaa mere pati ke hisse aaya to uske bharose jeevan ko chalana na munkin ke barbar tha…

Time gujarta gaya… par time ke gujarane ke sath ghar ke kharche bhee badhate gayee…mere shadi ko 10 saal ho chuke thee…me 28 saal ke ho chuki thee…par mere koi bacha nahi hua thaa…aur me bacha chathi bhee nahi thee…kyonki didi kee beti ko jo ab 13 saal kee ho chuki thee uske kharche hee nahi sambhal rahe the…ladki ka naam neha hai… wo mujhe maa kah kar hee pukartee thee…neha par jawani aa chuki thee… uski chuchiyo me bhee bharav aane laga tha…wo janti thee ki me uski asli maa nahi hun, par ab mujhme wo apni maa ko hee dekhti thee…ab ghar ke halat bahut kharab ho chuke the…ghar ka kharach bhee sahi dhang se nahi chal paa raha tha…

shanti kapde theek karke doodh dhone baith gayee…aur vijay bahar aane laga…me ek dum se dar gayee…aur wapis mud kar aane lagi…bahar abhi bhee andhera tha…me apne ghar me aa gayee..par jaise hee me door band karne lagi…vijay aa gaya, aur door ko dhakel kar andar aa gaya…

Me: (hadbadaate hue) bhai sahab aap, koi kaam tha….(mere hath pair dar ke maare kaanp rahe the…)

Vijay: kyon kya hua… bhag kyon aayi wahan se… achcha nahi laga kya?

Me: (anjaan banane ka natak karte hue) kahan se bhai sahab me samjhi nahi…

Wo ek pal ke liye chup ho gaya….aur meree taraf dekhate hue usne apna lund lungi se nikal liya…aur ek hee jhatke me mera hath pakad kar apne lund par rakh liya….

Me: ye kya kar rahe hain bhai sahab? Chodo mujhe (gusse se boli)

Vijay: ab mujhse kya sharmana meree jaan….wahan to dekh dekh kar apni choot ko masal rahi thee…ab kya hua…

Me: (apne hath ko chudane ke kosish karte hue gusse se boli) dekhiye bhai sahab aap jo kar rahe hai, theek nahi kar rahe hai…mera hath chod do…

Vijay apne honto par behuda see muskan late hue mujhe dhakka de kar diwar se sata diya…aur mere dono hathon ko pakad kar meree kamar ke peeche diwar se sata diya…..meree saree ka pallu neeche gir gaya…aur mere blouse me tani hui chuchiya mere jeth jee ke samne aa gayee…unhone ek hath se mere dono hathon ko pakad kar diwar se sataye rakha…phir wo pairo ke bal neeche baith gaye…aur meree saree aur peticote ko ooper karne lage…meree to dar ke maare jaan nikli jaa rahi thee…ki kahin koi uth na jaye…ghar par bachche aur saas sasur the….agar wo mujhe is halat me dekh lete to me kahin ke naa rahti…..me apni taraf se chutne ka pooree koshish kar rahi thee…par uski pakad bahut majboot thee….usne tab tak mere saree aur peticote ko mere jaangho tak utha diya thaa….aur apni kameeni nazron se meree doodh jaisee gori aur mulaayam jaangho ko dekh raha thaa….achanak unhone ne meree saree aur peticote ko ek jhatke me mere chutaDO tak ooper utha diya…meree black colour kee panty ab unki ankhon ke saamane thee…isse pehale ki me aur kuch kar pati ya bolti, usne apne honto ko meree jaangho par rakh diya…mere jism me current sa doud gaya…badan me masti aur utejana kee lehar doud gayee…aur na chathe hue bhee munh se ek kamuk aur ashleel siskaari nikal gayee…jo usne sun lee wo teji se apne hotno ko meree jaangho par ragadne laga…mere hath pair mera sath chod rahe the…unhone ne mere dono hathon ko chod diya…aur apne dono hathon ko meree saree aur peticote ke neeche se lejakar mere chutaDO ko meree panty ke ooper se pakad liya….mera jism kaanp utha…aaj kai mahino baad kisi ne mujhe mere chutaDO par chua tha…wo meree jaangho ko choomata hua ooper aane laga…aur meree panty ke ooper se meree choot kee phankon par apne honto ko rakh diya ….me apne hathon se apne jeth ke kandhon ko pakad kar peeche dhakel rahi thee…panty ke ooper se hee choot par unke honto ko mahsoos karke me ek dum kamjor padh gayee…

Me: (ab mene virodh karna chod diya tha bus apne maryada ka khayal rakhe hue mana kar rahi thee) nahi bhai sahab chod dye jee…koi aa jayegaa…. Ahhhhhhhh nahi ohhhh buss bachee uth jayngee ohhh ohhhh

kramashah.................