वर्ष २०१२ जिला धौलपुर की एक घटना - thriller adventure story

Horror stories collection. All kind of thriller stories in English and hindi.
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वर्ष २०१२ जिला धौलपुर की एक घटना - thriller adventure story

Unread post by novel » 30 Oct 2015 02:38

वर्ष २०१२ जिला धौलपुर की एक घटना


धौलपुर! राजस्थान! इतिहास थामे आज भी खड़ा है ये एक सुंदर सा शहर! पग पग में इतिहास समेटे ये शहर, कई किस्से, कथाओं की जननी रहा है! कुछ ऐसी, जो इतिहास के सफ़ों पर दर्ज़ हैं, और कुछ ऐसी, जो लोगों की जुबां पर दर्ज़ हैं! और कुछ ऐसी, जो अब भूली-बिसरी हैं! जो, भुला दी गयी हैं, अब कोई जानता भी नहीं उनके बारे में! जो कहानी मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ, वो भी एक ऐसी ही भूली बिसरी कहानी है, जिसका नाम इतिहास में कहीं नहीं! लोगों की ज़ुबाँ पर कहीं नहीं! जिसके बारे में आज चंद लोग ही जानते हैं! बस चंद लोग! उम्मीद है, इस कहानी को, अब कुछ और लोग भी जानेंगे! कहानी में कोई शक्ति नहीं, कोई चमत्कार नहीं! बस, एक कहानी, जो मुझे याद है आज भी! और उस कहानी के बस दो ही ततसमय-साक्षी शेष हैं, एक वो कुआँ, जिसे, अँधा हुआ कहा जाता है, और वो गाँव, जो अब आधुनिक हो चला है! पक्के मकान हैं अब वहां!
बात शुरू होती है, एक आयोजन से! धौलपुर में एक आयोजन था, कुछ लोग आये हुए थे, और मेरा भी निमंत्रण था वहाँ! अतः मैं भी शर्म अजी के साथ उस स्थान के लिए रवाना हुआ था! शहर से वो स्थान काफी दूर था, हमें एक जीप लेनी पड़ी थी, जीप ली, और पहुँच गए थे उस स्थान पर! मुझे बाबा कुंदन ने बुलाया था, उन्हें कुछ प्राप्त हुआ था, एक पौत्र! बस, यही आयोजन था! आयोजन बहुत बढ़िया रहा! वहां आये हुए कई लगों से मैं मिला, कई लोगों से, और उन्ही लोगों में, मुझे एक वृद्धा स्त्री भी मिली! कि सत्तर-अस्सी साल की रही होंगी वो अम्मा जी! अम्मा जी, वहीँ रहती हैं, बाबा कुंदन उनका ख़याल रखते हैं! अम्मा लगती नहीं हैं अस्सी बरस की! अभी भी दमखम है अम्मा में! सारा काम खुद ही कर लेती हैं! झाड़ू-बुहारी, बर्तन चौका सब! अब बुज़ुर्गों से आशीर्वाद मिलने के लिए मैं सदैव अग्रणी रहता हूँ! अम्मा के चरण छुए, तो उनका आशीर्वाद मिला! खुश हुईं अम्मा! खाने आदि के बारे में पूछी उन्होंने! खाना तो खा ही चुके थे हम! अम्मा से कह दिया कि खाना तो खा ही चुके हैं, वे खा लें अब! तो बोलीं, बाद में खा लेंगी वो!
उसी रात की बात होगी, हम खा-पी रहे थे, मेरी नज़र, खिड़की से बाहर गयी, बाहर, एक कक्ष में, शायद लालटेन जली थी, बत्ती नहीं थी उस समय, हमारे यहाँ भी हंडे ही जल रहे थे! तभी उस लालटेन वाले कक्ष से वो अम्मा बाहर आयीं, कुछ लेकर, फिर वो एक जगह रखा और चली गयीं, इस उम्र में भी उनको अच्छा-खास दीख पड़ता था! मुझे बहुत अच्छा लगा!! जब हम फारिग हुए, तो न जाने मेरा मन उनसे मिलने को हुआ! मैं शर्मा जी को संग ले, उनके कक्ष के सामने पहुंचा, दरवाज़ा खुला था, अम्मा कुछ कपड़े, उलट पुलट रही थीं! मैंने दरवाज़े को दस्तक दी! अम्मा ने देखा! खड़ी हुईं, आयीं बाहर! मुझे देखा!
"आओ बेटा!" बोली अम्मा!
"अभी तक सोयी नहीं अम्मा?" मैंने पूछा,
"नहीं बेटा" बोली वो!
"क्या बात है?" मैंने पूछा,
"कुछ नहीं, कुछ कपड़े सुंधा लूँ, सोचा" वो बोलीं,
हम चारपाई पर बैठ गए थे!
और अम्मा नीचे, अपने कपड़े सुंधा रही थीं!
"कौन से गाँव की हो अम्मा?" मैंने पूछा,
अम्मा ने गाँव का नाम बता दिया! मेरे लिए तो नया ही नाम था, सुना ही नहीं था मैंने!
"घर में कौन कौन हैं?" मैंने पूछा,
अम्मा चुप थी! चुप रहीं!
मैंने फिर से पूछा!!
"थे, सब थे, लेकिन अब कोई नहीं" बोलीं वो,
दुःख झलका था उनकी आवाज़ में, मुझे मेरा प्रश्न, अटपटा सा लगा था तब!
"ओह..." मैंने कहा,
"एक पुत्री थी, ब्याह दी, एक पुत्र था, ब्याह दिया था, मेरे पति तो मेरे पुत्र के पैदा होते ही, चल बसे थे, बीमार रहते थे बहुत" वो बोलीं,
ओह...संघर्षपूर्ण जीवन रहा अम्मा का, दुःख हुआ..
"और आपका पुत्र?" मैंने पूछा,
"नहीं रहा, कि संतान नहीं थी उसके, बीमार हुआ, और चल बसा" वो बोलीं,
मुझे दुःख हुआ ये सुनकर,
"पुत्री?" मैंने पूछा,
"सुना था पागल हो गयी थी, कभी नहीं ठीक हुई, कोई औलाद नहीं थी, वो भी पूरी हो गयी" वे बोलीं,
अब रह गयी थीं अम्मा अकेली.............
कैसा काटता है एक मनुष्य जीवन अपना, अकेला............
"कि भाई बहन?" मैंने पूछा,
अब कपड़े सुंधाना छोड़ दिया!
हमें देखा!
"थी एक बहन मेरी" वो बोलीं!
"अच्छा, कौन?" मैंने पूछा,
सोचा थोड़ा दुःख हल्का हो जाए उनका!
"गंगा" वो बोलीं!
गंगा! कितना पावन नाम है! मैंने तो हाथ भी जोड़े नाम लेते हुए! माँ हैं गंगा! गंगा माँ!
"अच्छा अम्मा!" मैंने कहा,
"कितना बजा?" पूछा उन्होंने,
"बारह" मैंने कहा,
"सो जाओ फिर बेटा" बोली वो!
"नहीं अम्मा! तेरे पास जी लग रहा है, मन नहीं सोने का!" मैंने कहा!
"अम्मा? गंगा कहाँ है?" मैंने पूछा,
"वो भी चली गयी मुझे छोड़ कर" वो बोलीं!
"ओह, छोटी थी या बड़ी?" मैंने पूछा,
"बड़ी" वो बोलीं,
"उनका कोई बाल-बच्चा?" मैंने पूछा,
अब बाहर झाँका उन्होंने! खड़ी हुईं,
और बाहर चली गयीं, कुछ देर बाद आयीं,
हाथ में कुछ लिए, एक झोला सा था, गुदड़ी सी लिए!
"ये, ये देखो" वो बोलीं,
ये एक तस्वीर थी! जिसमे दो लड़कियां थीं, नाव सहारे फोटो खींची गयी थी, श्याम-श्वेत तस्वीर थी! किसी मेले की सी लगती थी!
"ये, गंगा" वो बोलीं,
एक सुंदर सी अठारह उन्नीस बरस की लड़की! छरहरी सी! घाघरा पहने, श्रृंगार सा किये! अल्हड़ सी! तीखे नैन-नक्श थे उसके! हाथ में, कोई लकड़ी सी थी उसके!
"और ये?" मैंने पूछा,
"ये मैं" वो बोली,
पतली सी! सुंदर सी! तेज, नटखट सी एक लड़की!! नाक बहुत तीखी थी उसकी! नैन-नक्श भी तीखे ही थे उसके!
"अम्मा! तुम तो बहुत सुंदर थीं!" मैंने कहा,
मेरे शब्द, प्रभावित न कर सके उन्हें!
मैंने तस्वीर दे दी वापिस उनको!
उन्होंने में रख ली, लेकिन रखने से पहले, उसको देखा! साफ़ किया, अपने हाथ से!
और बैठ गयीं!
"आपके पिता जी?" मैंने पूछा,
"व्यापारी थे" वो बोलीं!
"अच्छा!" मैंने कहा,
व्यापारी! उस ज़माने में!
"और माता जी?" मैंने पूछा,
"मेरी माँ बहुत अच्छी थी, बहुत अच्छी, सभी मान करते थे उसका, सभी!" वो बोलीं!
"अच्छा अम्मा!" मैंने कहा,
अम्मा लेट गयी थीं, बुज़ुर्ग थीं, सोचा अब तंग न किया जाए उन्हें! मैं खड़ा हुआ,
"कल आना बेटा, अगर वक़्त हो तो" बोली अम्मा!
"हाँ अम्मा! हाँ!" बोला मैं!
और निकल आया बाहर! अम्मा से मिलकर, बहुत अच्छा लगा! बहुत अच्छा!

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Re: वर्ष २०१२ जिला धौलपुर की एक घटना - thriller adventure st

Unread post by novel » 30 Oct 2015 02:39

हम आये वहाँ से, सीधा अपने कमरे में, आज सुबह की वापसी भी थी हमारी, लेकिन अम्मा से तो ऐसे मन मिल गया था जैसे, अम्मा कोई नहीं, मेरी जानकार हैं, मेरी माता जैसी, मेरी अपनी ही माँ! ऐसा लगाव हो चला था अम्मा से! बुज़ुर्ग लोग, जब अपनी बातें बताते हैं तो एक इतिहास सामने होता है! एक जीवंत इतिहास! एक जीता हुआ इतिहास! वो, उस समय में जी रहे होते हैं, जिसमे हम कभी थे ही नहीं, तो वो खजाना हुए! खजाना सरल नहीं है प्राप्त करना! और इन बुज़ुर्गों के पास तो अनमोल खजाना है! कभी बैठिये इनके पास! इनका अनुभव, हमारे काम आता है! जीवन क्या है, कैसे आगे बढ़ता है, ये सब बता देते हैं! संघर्ष, क्या होता है, एक एक शब्द में झलक जाएगा! खैर, रात बहुत हो गयी थी, हम गए, और सो गए! सोये भी ऐसा कि सुबह दस बजे ही आँख खुली! दिन चढ़ गया था! नहाये धोये, और फिर चाय नाश्ता मंगवा लिया, किया और उसके बाद मैं, संग शर्मा जी के, अम्मा को देखने चला! अम्मा के कमरे में गए, तो अम्मा नहीं थी वहाँ! आसपास देखा, तो भी नहीं थी! हम वहीँ बैठ गए! और फॉर कोई दस मिनट के बाद अम्मा दिखाई दी, हाथों में गीले कपड़े थे, उनको सुखाने के लिये, एक टूटी सी साइकिल पड़ी थी वहाँ, उसके हैंडल पर डाल रही थीं, जब डाल लिए, तो आयीं हाथ पोंछते हुए वापिस कमरे की ओर! जब आयीं तो नमस्कार हुई उनसे, पाँव पड़े हम उनके! अम्मा बहुत खुश हुईं! हमें बिठाया, और चाय की पूछी, एक सहायक था वहाँ रामधनी, उसको बुलाया और चाय के लिए कह दिए! भोला सा रामधनी, चला गया अम्मा का आदेश लेकर! और फिर अम्मा आ बैठीं वहीँ!
"कहाँ थीं अम्मा?" मैंने पूछा,
"कपड़े थे कुछ, धो दिए" बोली अम्मा!
अपने झुर्री पड़े हाथों को पोंछते हुए कहा अम्मा ने!
"हाँ, मैंने देखा अम्मा" मैंने कहा,
"हाँ बेटा" बोली अम्मा,
और बैठ गयीं, नीचे एक कट्टा बिछा था, उसी पर बैठ गयीं थीं,
"और अम्मा कैसी हो?" मैंने पूछा,
"बस बेटा" बोलीं वो!
इतने में ही रामधनी आ गया, तीन कप और एक जग में चाय लिए! चाय डाली कपों में, और दे दी हमने! मैंने अपना कप, अम्मा को दे दिया था और फिर अपना कप लिया था!
"और अम्मा, कल आप गंगा के बारे में कुछ बता रही थीं?" मैंने कहा,
वो चाय पीते पीते रुकीं!
शून्य में ताका उन्होंने!
"हाँ, लेकिन उसकी कहानी छोटी नहीं बेटा! वो बोली, और आज तो तुम जा ही रहे हो" बोलीं अम्मा,
"कोई बात नहीं अम्मा, कहने बड़ी यही तो कोई बात नहीं, हमारे जाने की कोई बात नहीं, हम तो कल भी चले जाएंगे!" बोला मैं!
उसकी कहने छोटी नहीं! इस से तो मैं और जिज्ञासु हो चला था! न जाने कौन सी कहानी थी! उस गंगा की कहानी! जिसे न मैं जानता था, और न पहचानता था! लेकिन गंगा की बहन, हमारे सामने बैठी थीं! बस, लग गयी ललक!
अब अम्मा ने कहानी सुनानी शुरू की! कहानी ऐसी थी, कि एक बार शुरू हुई तो हम डूबते चले गए उसमे! एक कहानी, जो आज जीवंत हो उठी थी, उन अम्मा की ज़ुबानी! अब मैं आपको वही कहानी सुनाता हूँ! अपने शब्दों में! इसमें कल्पना नाम की कोई चीज़ नहीं है! जैसा सुना, लिख रहा हूँ!
राजस्थान! कई किस्से कहानियों का प्रदेश! वीर और वीरांगनाओं का प्रदेश! जौहर का प्रदेश! दुश्मनों के दांत खट्टे कर देने वाला प्रदेश! वचन के मान की आन रखने वाला प्रदेश! वचन! हाँ! सबसे हल्का शब्द लेकिन अर्थ में पर्वतों से भी भारी! ऐसा ही वचन किया था किसी ने!! और निभाया भी!! किसने, ये आपको बाद में पता चलेगा!!
धौलपुर! धौलपुर का एक छोटा सा गाँव! सूखा, बंजर नहीं था वो गाँव! हरा-भरा गाँव था वो! आबादी अधिक नहीं थी, लेकिन लोग सुखी और सम्पन्न थे! इसी गाँव में एक व्यापारी हुआ करते थे, राम किशोर! राम किशोर के दो ही पुत्रियां थीं, पुत्र नहीं था, लेकिन इस से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था उन्हें! उनकी पुत्रियां ही उनके पुत्र थे! आँखों का तारा थीं वो पुत्रियां उनकी! दोनों ही रूपवान और सुंदर थीं! सौंदर्य, खूब नवाजा था देने वाले ने उनको! घर में एक नौकरानी भी थी माला, उन पुत्रियों की हमउम्र! खूब पटती थीं उन तीनों की! किशोर साहब, जब भी कुछ लाते, तो माला का हिस्सा भी होता था उसमे! नहीं तो गुस्सा हो जाती थी और घंटों किशोर साहब और उनकी पत्नी, मनाया करते थे उसे!
हाँ, पानी गाँव के बाहर से लाया जाता था, गाँव के बाहर दो कुँए थे, एक नाल का कुआँ, जो अभी भी पानी देता था, और एक अँधा कुआँ, जो अब परित्यक्त था! बेटियों के जन्म से पहले ही उसमे पानी आना बंद हो गया था! पता नहीं कब से, अब तो बस, खाली ही पड़ा था, कभी राहगीर और मुसाफिर, पानी पिया करते हों तो हों, लेकिन अब ऐसा कुछ नहीं था! उसी नाल के कुँए से, पानी आया करता था गाँव का, वे दोनों कुँए आसपास तो नहीं थे, लेकिन दीखते थे आमने सामने!
एक रोज, माला पानी लेने आई थी कुँए से, संग उसके, वो गंगा भी थी! गंगा का रूप सच में सुहाना था, चटख गोरा रंग, इठालती सी काया, छरहरा बदन, और दमकता हुआ चेहरा, कोई देख लेता तो दुबारा ज़रूर देखता था उसे, पलट पलट कर! गंगा अक्सर, जब माला पानी भर रही होती, तो उस अंधे कुँए के पास जाकर बैठ जाया करती थी, वहां पेड़ लगे थे, बड़े बड़े पेड़! छाया होती थी तो अक्सर वहीँ आ बैठती थी गंगा! एक बार जब, माला के संग घर लौट रही थी गंगा, तो दो घुड़सवार आये पीछे से, आवाज़ दी उन्हें, वे रुकीं, एक घुड़सवार ने गंगा को देखा, तो लहरें उठ गयीं मन में!
"सेठ मंगू का घर कहाँ हैं?" पूछा उसने,
अब माला ने बता दिया!
वो माला को नही देख रहा था, बस एकटक, उस गंगा से नज़रें मिलाये हुए था!
"इसी गाँव की हो?" पूछा उसने,
"हाँ" बोली माला, और चल दीं आगे!
"सुनो?" बोला वो ही!
फिर रुकीं!
"क्या नाम है पिता जी का?" पूछा उसने!
"राम किशोर" गंगा ने बताया!
अब नाम दोहराया उसने, दो बार!
और नज़रें मिलाये हुए, दोनों आगे बढ़ लिए! पीछे पलट पलट के देखता रहा वो, बार बार!
"अब नहीं आउंगी तेरे साथ" बोली गंगा!
माला हंस पड़ी!
"क्यों?" पूछा माला ने,
"कैसे देख रहा था!" वो बोली,
"तो?" पूछा माला ने! हँसते हुए!
"तो??" बोली गंगा!
"अब इसमें तेरी क्या गलती?" बोली माला,
"तो किसकी गलती?" पूछा गंगा ने!
"तेरे रूप की गलती!" बोली मां!
लरज गयी गंगा!!
बातें करते करते, पहुँच गयी घर!
उस दिन, माला छेड़ती रही सारा दिन गंगा को! और गंगा, दो-मन की हुए बैठी रही! बोली कुछ नहीं!
अगले दिन,
फिर से पानी भरने गयी माला, गंगा के संग! और उसी समय वे दोनों घुड़सवार वापिस आ रहे थे गाँव से! माला ने देखा, तो कोहनी मारी गंगा को! गंगा ने देखा, तो सर फेर लिया, पीठ कर ली उनकी तरफ! और वे घुड़सवार, वहीँ रुके! वही उतरा! आया उनके पास!
"पानी पीना है" बोला वो!
"पियो" बोली माला!
पानी पिया उसने!
हाथ पोंछे!
"क्या नाम है इसका?" पूछा माला से उसने!
"उस से ही पूछ लो?" बोली माला!
अब तो सहमी गंगा!!! कभी ऐसे बात नहीं की थी उसने किसी से!
"क्या नाम है तुम्हारा?" पूछा उसने!
न बोली कुछ!
डरे! सहमे! घबराये!
"नाम ही तो पूछा है!" बोला वो!
"गंगा!" बोली वो! पीछा छुटे उस से!
"गंगा!! अच्छा!" बोला वो!
"मेरा नाम भूदेव है, मुलाज़िम हूँ सरकारी" बोला वो,
गंगा चुप!
कैसे पीछे पड़ गया!
होगा मुलाज़िम! उसे क्या!
"चल माला?" बोली गंगा!
और चली वहाँ से वे दोनों!
गंगा आगे आगे, और माला पीछे पीछे!!
माला ने पीछे देखा!
वहीँ खड़ा था वो भूदेव! उन्ही को देखता हुआ!
अब गंगा ऐसी चली कि घर जाकर ही रुकी!
आ गयी पीछे पीछे माला भी!

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वे घर चली आयीं थीं! गंगा तो बहुत डर गयी थी! और माला, माला उसे सारा दिन ऐसे ही चिढ़ाती रही थी! और जब बंगा की छोटी बहन जमना ने पूछा, तो माला ने उसे भी सब बता दिया! अब जमना भी पीछे पड़ गयी थी उसके! गंगा बेचारी क्या करती! झेंप ही जाती, बस! उधर, गंगा के माँ बाप, उस गंगा के विषय में चिंतित थे! गंगा तो अब रूप निकाले जा रही थी अपना! पिता जी, अपने जानकारों में कह ही चुके थे उसके रिश्ते के लिए, रिश्तेदारों में भी! कोई अच्छा सा लड़का मिलता तो हाथ पीले हो जाते गंगा के! लेकिन अभी तक कोई रिश्ता मिला नहीं था उन्हें! मिला भी था तो पसंद नहीं आया था!
करीब तीन दिन और बीते! फिर से कोई दोपहर बाद, माला पानी लेने गयी कुँए पर, संग गंगा भी चली! अब वो सरकारी मुलाज़िम तो जा ही चुके थे, इसीलिए, इत्मीनान से चली जाती थी! उस रोज भी, वो उसी अंधे कुँए के पास ही बैठी थी! कि कुँए पर कोई घुड़सवार रुका, उसने माला से बात की, माला से बात होती देख, गंगा घबराई, उस घुड़सवार ने उसको देखा, और मोड़ दिया अपना घोड़ा उसकी तरफ! गंगा के तो प्राण सूखें अब! खड़ी हो गयी वो! पीछे मुंह फेर कर! घुड़सवार उतरा घोड़े से, और आया गंगा के पास! गंगा के पास एक घड़ा था, पानी से भरा!
नीचे, घुटने पर बैठा वो,
"पानी" बोला वो!
क्या करती गंगा!
पिला दिया पानी! पानी पीते पीते, उस घुड़सवार की नज़रें, उस गंगा को ही घूरती रहीं! जब पानी पिया, तो अपने हाथ पोंछे उसने!
"कितना अच्छा हुआ जो तू मिल गयी! गंगा!" बोला वो!
अब गंगा सूखे खड़ी खड़ी!!
"उस से पानी नहीं पिया, तुझसे माँगा, यही न?" बोला वो!
गंगा चुप!! पानी पी लिया तो जाता क्यों नहीं!
"तुझ से ही पानी पीना था गंगा!" बोला वो!
अब गंगा क्या कहे!!
"तू बहुत अच्छी लगी मुझे, पहली नज़र से ही!" बोला वो!
गंगा को झुरझुरी चढ़े! ऐसे शब्द कभी न सुने थे उसने तो!
"तेरा कहीं ब्याह तय हुआ गंगा?" पूछा उसने!
गंगा चुप!!
"इतनी सुंदर है तू! आवाज़ कितनी सुंदर होगी! सुना दे आवाज़? वही आवाज़!" बोला वो!
ऐसी बातें क्या जाने गंगा!!
गंगा चलने लगी वहां से, घड़ा उठाये!
"सुन तो सही?" बोला वो! सामने आ खड़ा हुआ था उसके! दिल की धड़कन सभी सुन सकते थे उसकी, बस उस भूदेव के सिवा!!
"गंगा! तेरे से मन लग गया है मेरा तो, मैं इसीलिए आया गाँव आज, सच्ची!" बोला वो!
गंगा पीछे हटी!
और फिर आगे बढ़ी! इस बार, रास्ता छोड़ दिया उसने! और गंगा, दौड़ पड़ी! वो घुड़सवार, देखता रहा उसको! उसने तो कर दिया था इज़हार-ए-मुहब्बत! बस, गंगा का इंतज़ार था!!
सरपट भागी गंगा तो! माला से भी कुछ न कहा! माला पीछे पीछे उसको आवाज़ दे, और वो भागती जाए! पानी, बिखरे जाए, और बिखरते हुए, उसके तन से जा चिपके! यौवन, झाँकने लगे बाहर! और वो घुड़सवार, पीछे पीछे आता जाये! उस गंगा को देखे जाए! घोड़े को कभी एड़ लगाये, कभी लगाम कसे! नहीं रुकी गंगा! जा पहुंची घर! और सीधे अपने कमरे में! औंधे मुंह, धम्म से गिरी अपने बिस्तर पर! माला भी आ पहुंची! उसने उठाया उसे तो झिड़क दिया उसे! अब माला और छेड़े उसे!
"क्या हुआ गंगा?" पूछा माला ने!
गंगा चुप! मुंह छिपाए अपना!
"वैसे है तो अच्छा वो!" बोली माला!
अब फिर से झिड़का उसे गंगा ने! जमना भी आ गयी थी! वो भी, उसको छेड़े! जो माला कहे, वही दोहरा दे जमना!!
"सरकारी मुलाज़िम भी है, और क्या चाहिए!" बोली माला!
गंगा चुप रहे! कुछ बोले न बन पड़े!
"अगली बार घर का पता दे देना, बात चल जायेगी!" बोली माला! उसको छूते हुए!!
तो उस सारा दिन यही चलता रहा! गंगा के कोरे मन पर, किसी ने कलम चलाने की कोशिश की थी! लेकिन गंगा, दुविधा में भी नहीं थी! बस, उसको अजीब सा ही लग रहा था! सुंदर होने का, यही तो दुर्गुण हैं!
इसके बाद, हफ्ता गुजर गया! नहीं आया वो घुड़सवार! चलो, पीछा छूटा! अच्छा हुआ! यही सोचा उस गंगा ने! लेकिन माला, उस भूदेव की माला फेरती रहे! बार बार उसको झूठे से कहे, कि वो देख! वो आ रहा! तो बार बार चौंक जाए वो! कनखियों से देखे! और माला, उसका मज़ाक बनाये! कोई होता नहीं था वहाँ!!
कोई चार दिन बाद,
वो कुँए पर ही थीं, दोनों! दूसरी औरतें चली गयीं थीं पानी लेकर, अब वे भर रही थीं!
"अरे गंगा? वो देख!" बोली माला ज़ोर से!
कोई होता तो था नहीं!
तो, सर उठाकर देख लिया गंगा ने!
और सामने से! सामने से वही घुड़सवार आ रहा था!
अब तो सीने में क़ैद दिल, जगह छोड़े अपनी! साँसें, हो गयीं तेज! चेहरा लाल, शर्म से! और इतने में ही, वी घुड़सवार आ गया वहीँ!
गंगा के पास आया!
"पानी" बोला वो!
अब गंगा ने पानी पिलाया उसको! उस घुड़सवार का चाबुक, नीचे गिर पड़ा था उस समय! पानी पिया, और चाबुक उठाया अपना! गंगा को देखा, मुस्कुराया!
"मैं इतने दिन नहीं आया, तेरी बहुत याद आई गंगा!" बोला वो!
अब गंगा क्या करे! आये याद तो आये! वो क्या करे!
"कैसी है तू?" पूछा उसने!
कुछ न बोले!
नज़रें नीचे ही रखे!
"बता गंगा?" बोला वो!
क्या बताये!!
"तू बात नहीं करती मुझे!" बोला वो!
फिर भी न बोली कुछ!
"कुछ तो बोल गंगा?" बोला वो!
"सुबह, दोपहर, शाम रात, तेरी याद आती है गंगा!" बोला वो!
अब उसका एक एक शब्द, चाबुक बन, उसको उधेड़े!
"मैं दूर से आता हूँ गंगा! सिर्फ तेरे लिए, सिर्फ तेरे लिए!" बोला वो!
गंगा चुप रहे!!
"अब तुझे देख लिया, चैन पड़ा!! सच्ची!" बोला वो!
और तभी गंगा के कंधे पर, एक ततैय्या आ बैठा! गंगा ने तो देखा नहीं, उसकी तो गर्दन नीचे ही थी! और अगर न हटाये वो उसे, तो काट ले! सुजा दे फौरन! हाथ भी न उठे! तो उस भूदेव ने, अपना हाथ जैसे ही उस ततैय्ये को हटाने के लिए आगे बढ़ाया, गंगा ने फौरन झिड़का! ततैय्या तो उड़ा, लेकिन काट गया उस भूदेव के हाथ की एक ऊँगली को! ये गंगा ने भी देखा! गंगा उसकी ऊँगली देखे! और देखते ही देखते, वो ऊँगली सूजने से लगी! भूदेव ने, ऊँगली रगड़ी चाबुक से, लोहे वाले सिरे से, और पानी से हाथ धो लिया!!
"गलत नहीं समझना गंगा, वो ततैय्या तेरे कंधे पर बैठा था, न उड़ाता तो तुझे काट लेता, काट लेता तो हाथ सूज जाता, हाथ सूजता तो घड़ा कैसे उठाती, घड़ा नहीं उठता तो तू यहां तक कैसे आती, यहां तक नहीं आती, तो..मैं कैसे देखता तुझे!!" बोल गया वो भूदेव!
गंगा को हंसी आई! लेकिन हंसी, होंठों से बाहर नहीं आने दी उसने! हाँ, आवाज़ से भांप गया था भूदेव! मुस्कुरा गया था उसको देखकर!
और इसके बाद, गंगा और माला, चल पड़ीं घर की तरफ!! आज नहीं भाग रही थी गंगा उस माला से आगे आगे! आक संग चल रही थी! और वो घुड़सवार, वहीँ खड़ा खड़ा, उसको ही देख रहा था! अब गंगा ने पीछे मुड़कर देखा! वो हुड़सवार, आ रहा था, धीरे धीरे! उनके पीछे!
"हाथ काट लिया बेचारे का" बोली माला,
"तो क्या हुआ?" बोली गंगा!
"तुझे बचाया उसने, नहीं तो चिल्ला रही होती अभी तक!" बोली माला!
"धत्त!" बोली गंगा!
"सच में, प्रेम करता है तुझे वो!" बोली माला!
प्रेम!! गंगा के निर्मल जल में, लहर उठी थीं इस बार!!
"कल फिर आएगी न गंगा?" बोला वो घुड़सवार! संग आ मिला था अब वो!
गंगा चुप!! कुछ न बोले!
"कल आना गंगा! मैं सिर्फ तुझे देखने आऊंगा" वो बोला, रुका और गंगा को देखता रहा! और जब गंगा और माला, चली आयीं गाँव के अंदर, तो वो पीछे मुड़ा और दौड़ा दिया अपना घोड़ा!
आ गयीं घर अपने दोनों!
माला मुस्कुराये जाए! जमना को भी बताये! अब जमना भी छेड़े उसे!
लेकिन आज, ये छेड़, वो टीस नहीं दे रही थी! बल्कि, इसमें एक अलग सा ही आनंद था! एक अलग सा ही! आज से पहले, कभी महसूस नहीं किया था गंगा ने! उस दिन, गंगा के जल में, हिलोर उठती रहीं! रात में भी, जब भी नींद खुलती, तो यही हिलोरें, आ घेरतीं!!