लेखक-प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ

Discover endless Hindi sex story and novels. Browse hindi sex stories, adult stories ,erotic stories. Visit webvitaminufa.ru
The Romantic
Platinum Member
Posts: 1803
Joined: 15 Oct 2014 17:19

Re: लेखक-प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ

Unread post by The Romantic » 17 Dec 2014 03:48

मोऽ से छल किये जा … सैंयां बे-ईमान-5

“हाँ एक अनोखा आनंद जो शायद तुमने आज से पहले ना तो कभी सुना होगा और ना ही कभी लिया होगा ?”

“क … क्या … मतलब ?”

“अगर मुझ पर विश्वास करती हो और थोड़ी सी अपनी शर्म को छोड़ दो तो मैं तुम्हें सम्भोग के अलावा एक और आनंद से परिचित करवा सकता हूँ ?”

अब तुम मेरी उत्सुकता को समझ सकती हो। मैंने अपनी मुंडी हिला कर हामी भर दी तो श्याम ने कहा।

“तुम अभी सु सु को थोड़ा सा रोक लो और पहले अपनी मुनिया को ठीक से साफ़ करके धो लो”

“क्या मतलब ?”

ओह … मैं जैसा कहूं प्लीज करती जाओ और फिर तुम मेरा कमाल देखना ?”

अब हम दोनों शावर के नीचे आ गए। मुझे संकोच भी हो रहा था और लाज भी आ रही थी पर मैंने अपनी मुनिया और जाँघों को पहले पानी से धोया और फिर साबुन लगा कर साफ़ किया। श्याम ने भी अपना “वो” साबुन और पानी से धो लिया।

अब मैंने उसकी ओर प्रश्नवाचक निगाहों से ताका। वो मेरे पास आकर पंजों के बल उकडू होकर बैठ गया। अब उसका मुँह ठीक मेरी मुनिया के होंठों के सामने था। उसकी गर्म साँसें मैं अपनी मुनिया पर महसूस कर रही थी। मुझे जोर से सु सु आ रहा था पर मैं किसी तरह उसे रोके हुए थी।

उसने मेरी जाँघों के बीच अपने दोनों हाथ डाल कर उन्हें चौड़ा करने का प्रयत्न किया। मुझे शर्म भी आ रही थी पर मैंने अपनी जांघें थोड़ी सी चौड़ी कर दी। अब उसने दोनों हाथों से मेरी कमर पकड़ कर अपनी और अपने होंठ मेरी मुनिया पर रख दिए। इस से पहले कि मैं कुछ समझूं उसने गप से मुनिया का ऊपर भाग अपने मुँह में लेकर चूसना शुरू कर दिया। मेरे लिए तो यह अप्रत्याशित सा था। फिर उसने अपनी जीभ से ही मुनिया की दोनों फांकों को चौड़ा किया और जीभ की नोक से मदनमणि को टटोला। मेरी तो जैसे किलकारी ही निकल गई। मेरे हाथ अपने आप उसके सिर पर चले गए और अनजाने जादू में बंधी मैंने उसके सिर को अपनी मुनिया की ओर दबा दिया। उसने मेरी मदनमणि को दांतों से होले से दबा दिया तो मेरी रोमांच से भरी चींख निकलते निकलते बची। अब मेरे लिए अपने आप को रोक पाना कहाँ संभव था। मेरी सु सु की पतली धार निकल पड़ी। उसने मदनमणि के दाने को नहीं छोड़ा। मुझे तो एक नए रोमांच और आनंद में डुबो गया उसका यह चूसना और सु सु का निकलना।

मेरा सु सु उसके मुँह से होता गले सीने और नीचे तक बहने लगा। कोई आधे मिनट तक मैं इसी प्रकार सु सु करती रही। तब उसके मुँह से गूऊउ … उन्न्न्नन्न ….. की आवाज ने मेरा ध्यान खींचा। वो मुझे रुकने को कह रहा था। इस स्थिति में सु सु को रोकना बड़ा कठिन था पर मैंने उसे रोक लिया।

श्याम ने अपना मुँह हटा लिया और अपने होंठों पर अपनी जीभ फेरता हुआ बोला,”मीनू अब तुम फर्श पर उकडू होकर बैठ जाओ और अपनी जांघें जोर से भींच लो।”

मैंने वैसा ही किया। मैंने अपनी जांघें भींच लीं और अपनी रानी (गुदा) और मुनिया का एक बार संकोचन किया। आह … एक मीठी सिहरन से मेरे सारे रोम ही जैसे खड़े हो गए। उसने आगे कहा “अब तुम अपनी जांघें धीरे धीरे खोलो और अपने दोनों हाथों की अँगुलियों से अपनी मुनिया की पंखुड़ियों को खोलो और फिर तेजी से सु सु की धार छोड़ो”

मुझे कुछ अटपटा सा भी लग रहा था और शर्म भी आ रही थी पर मैंने उसके कहे अनुसार किया। मेरी मुनिया से एक ऊंची और पतली सी सु सु की धार निकली जो कम से कम 3 फूट दूर तो अवश्य गई होगी। कल कल करती सु सु की धार चुकंदर सी रक्तिम रोम विहीन मुनिया के मुँह से फ़िश्श …. सीईईइ … का सिसकारा तो बाथरूम के बाहर भी आसानी से सुना जा सकता था। श्याम की आँखें तो इस दृश्य को देख कर फटी की फटी ही रह गई। एक मिनट तक तो वो मुँह बाए इस मनमोहक दृश्य को देखता ही रहा। फिर उसे जैसे कुछ ध्यान आया,”ओह … मीनू रुको प्लीज !”

मुझे सु सु करने में आज से पहले कभी इतना आनंद नहीं आया था। मैंने अपना सु सु रोक लिया और उसकी ओर देखा तो वो फिर बोला “अरे यार बीच बीच में रोक कर इसकी धार छोड़ो ना ?”

ओह … ये श्याम तो आज मुझे लज्जाहीन (बेशर्म) करके ही सांस लेगा। मैंने 4-5 बार अपने सु सु को रोका और फिर छोड़ा। आह।। यह तो बड़ा ही आनंददायक खेल था। बचपन में मैंने कई बार अकेले में या अपनी सहेलियों के साथ यह खेल खेला था पर उस समय इन सब बातों का अर्थ और आनंद कौन जानता था। सच है खुजली को खुजलाने और सु सु को रोक रोक कर करने में अपना ही आनंद है।

फिर सु सु की धार और उसका सिसकारा मंद पड़ता गया और अंत में मैंने अपना पूरा जोर लगा कर अंतिम धार को छोड़ा तो वो कम से कम कम 2 फ़ुट तो अवश्य ऊपर उठी होगी। यह तो उसके लिए सलामी ही थी ना ?

मैं अब उठ खड़ी हुई। जैसे ही मैं खड़ी हुई उसने नीचे झुक कर एक बार मेरी मुनिया को चूम लिया।

“ओह परे हटो ! गंदे कहीं के ?”

“अरे मेरी मैना रानी प्रेम में कुछ भी गन्दा नहीं होता।” और उसने मुझे अपनी बाहों में भर लिया।

अब हम आपस में गुंथे हुए शावर के नीचे आ गए। मेरा तो तन, मन और आत्मा सब आज जैसे शीतल ही हो गया था। मैं झूम झूम कर पहले तो बारिश में नहाई थी अब शावर के नीचे गुनगुने पानी से नहा रही थी।

जैसे ही मैं घूमी तो उसने मुझे पीठ के पीछे से अपनी बाहों में भर लिया। हे … भगवान् मेरा तो ध्यान इस ओर गया ही नहीं था। उसका “वो” तो फिर से फनफनाने लगा था। मैं उसे अपने नितम्बों की खाई में स्पष्ट अनुभव कर रही थी। एक नए रोमाच से मैं भर उठी। उसने मेरे दोनों उरोजों को पकड़ लिया। उनके चूचक तो इस समय इतने कड़े हो गए थे जैसे कि वो कोई मटर के दाने हों। अपनी चिमटी में लेकर वो उन्हें मसलने लगा। मैं अपने पंजों के बल थोड़ी सी ऊपर हो गई तो उसका “वो” फिसल कर मेरी जाँघों के बीच से होता मुनिया का मुँह चूमने लगा। उसका सुपारा मेरी मुनिया और जाँघों के बीच नज़र आ रहा था। मैंने झट से अपनी जांघें कस लीं। अब तो वो चाह कर भी अपने इस डंडे को नहीं हिला सकता था। मैंने अपने हाथ ऊपर उठा दिए और उसका सिर पकड़ने का प्रयास करने लगी। उसने अपनी मुंडी नीचे की तो उसकी गर्म साँसें मेरे चहरे और कानों पर पड़ी। मेरा तो रोम रोम ही पुलकित हो रहा था जैसे। काश समय रुक जाए और हम अपना शेष जीवन इसी तरह एक दूजे की बाहों में समाये बिता दें।

“मीनू कुछ बोलोगी नहीं ?”

“ओह … श्याम मेरे साजन अब मैं क्या बोलूँ ? तुमने मुझे आज तृप्त कर दिया है। मेरा तन मन और प्रेम की प्यासी यह आत्मा तो धन्य हो गई है आज। बस मुझे इसी प्रकार अपनी बाहों में लिए प्रेम किये जाओ मेरे प्रियतम ”

“मीनू एक और आनंद लोगी ?”

“क … क्या ? कैसा आनंद ?” मैं विस्मित थी अब कौन सा आनंद बाकी रह गया है ?

“तुम अब थोड़ा सा आगे झुक कर वाश बेसिन को पकड़ लो ?”

मैं डर रही थी कहीं वो कुछ उल्टा सीधा करने के चक्कर में तो नहीं है ? मैंने कहा “क… क्या मतलब ?”

“ओह … मैनाजी एक बार मैं तुम्हें नए आसन में उस आनंद की अनुभूति करवाना चाहता हूँ ?”

मैंने शावर को बंद कर दिया और वाशबेसिन के ऊपर हाथ जमा कर थोड़ी सी झुक गई जिससे मेरे नितम्ब थोड़े ऊपर हो गए। मेरे नितम्बों की खाई तो जैसे चौड़ी होकर अपना खजाना ही खोल बैठी थी। मेरे उरोज तो सिन्दूरी आमों की तरह नीचे झूल से गए। उनके बीच पड़ा मंगलसूत्र किसी घड़ी के पैंडुलम की तरह हिलाता मेरा मुँह चिढ़ा रहा था जैसे। श्याम मेरे पीछे आ गया और उसने मेरे गीले नितम्बों पर अपने हाथ फिराए। आह … मेरी मुनिया तो एक बार फिर पनिया गई। मैं जानती थी उसका “वो” भी तो अब फिर से लोहे की छड़ बन गया होगा।

उसने अपना मुँह मेरे नितम्बों की खाई में लगा दिया। उन पर रेंगती गर्म साँसे अनुभव कर के मेरी तो सीत्कार ही निकल गई। उसने दोनों हाथों से मेरे नितम्बों को चौड़ा किया और फिर अपने होंठों को मेरी मुनिया की फांकों से लगा दिया। फिर जीभ से उसे चाटने लगा। ऐसा नहीं था की वो बस मुनिया को ही चाट या चूम रहा था वो तो अपनी जीभ से मेरी मुनिया के आस पास का कोई भी स्थान या अंग नहीं छोड़ रहा था। जैसे ही उसकी जीभ ने मेरी रानी (गुदाद्वार) के सुनहरे छिद्र पर स्पर्श किया मेरी ना चाहते हुए भी एक किलकारी निकल गई और मेरी मुनिया और रानी ने एक साथ संकोचन किया और मेरी मुनिया ने अपना काम रज छोड़ दिया। मुनिया बुरी तरह पनिया गई थी। उसने बारी बारी मेरी दोनों जाँघों को भी चूमा और चूसा।

अब श्याम की बंसी भी बजने को तैयार ही तो थी। उसने उसपर थूक लगाया और मेरी मुनिया की फांकों को एक हाथ से चौड़ा कर के अपना कामदंड मेरी मुनिया के छेद पर टिका दिया और मेरी कमर पकड़ ली। आह … इतने रोमांच के क्षणों में मैं भला अपने आप को कैसे रोक पाती मैंने पीछे की ओर एक हल्का सा धक्का लगा दिया। उसका पूरा का पूरा कामदंड मेरी मुनिया में समां गया। आह … इस लज्जत और आनन्द को शब्दों में तो वर्णन किया ही नहीं जा सकता।

उसके धक्के चालू हो गए। मेरी मुनिया से फच्च …फच्च … का मधुर संगीत बजने लगा। मैंने एक हाथ से अपनी मदनमणि को रगड़ना चालू कर दिया। रोमांच की पराकाष्ठा थी यह तो। उसने एक हाथ से मेरी कमर पकड़े रखी और दूसरे हाथ से मेरा एक उरोज अपने हाथ से मसलना चालू कर दिया। मुझे तो आज पहली बार तिहरा आनंद मिल रहा था। मैं चाहती थी कि वो जोर जोर से धक्के लगाता ही जाए भले ही मेरी मुनिया का सूज सूज कर और दर्द के मारे बुरा हाल हो जाए। आह … इस मीठी सी जलन और पीड़ा में भी कितना आनंद है मैं कैसे बताऊँ।

“ऊईई … मा…आ….. ….. ओह … मेरे श्याम … मेरे साजन …. इस्स्स्सस ……”

“मेरी मैना, मैंने कहा था ना मेरे मेरे कि मैं तुम्हें प्रेम की उन ऊँचाइयों (बुलंदियों) पर ले जाऊँगा जिसे ब्रह्मानंद कहा जाता है !”

“ओह … श्याम ऐसे ही करते रहो ….आह्ह … थोड़ा जोर से … आह्ह … ऊईई … मा… आ … आ … “

उसके धक्के तेज होने लगे। मेरी मुनिया तो काम रस बहा बहा कर वैसे ही बावली हुए जा रही थी। मेरे मस्तिष्क में जैसे कोई सतरंगी तारे से जगमगाने लगे और शरीर अकड़ने सा लगा और उसके साथ ही मेरा स्खलन हो गया। श्याम के धक्के अब भी चालू थे। उसने एक हाथ से मेरे नितम्बों पर थपकी लगानी शुरू कर दी। मैं जानती थी कि इन थप्पड़ों से मेरे नितम्ब लाल हो गए होंगे पर इस चुनमुनाती पीड़ा की मिठास और कसक भला मेरे अलावा कोई कैसे जान सकता है। हमें कोई 20-25 मिनट तो अवश्य हो गए होंगे। जब उसका “वो” अन्दर जाता तो मैं अपनी मुनिया और रानी (योनि और गुदा) का संकोचन करती और पीछे की और हल्का सा धक्का लगा देती। इससे उसका उत्साह बढ़ जाता और वो फिर दुगने उत्साह और वेग से धक्के लगाने लगता। हम दोनों ही लयबद्ध ढंग से आपस में ताल मिला रहे थे जैसे।

मेरे पैर और कमर अब दुखने लगे थे। उसकी साँसें भी उखड़ने सी लगी थी। मुझे लगा कि अब वो अधिक देर नहीं रुक पायेगा। मैंने अपनी मुनिया का संकोचन बंद कर उसे ढीला छोड़ दिया। मैंने अपने पैर ठीक से जमा लिए और अपनी जांघें चौड़ी कर दी। चरमोत्कर्ष के इन अनमोल क्षणों में मैं उसे पूर्ण सहयोग देना चाहती थी। मैं भला अपने और उसके आनंद में कोई रुकावट क्यों डालती। अब तो वो बड़ी आसानी से अन्दर बाहर हो रहा था। अचानक उसके मुँह से गुरर्र … गूं… की आवाजें आने लगी। मैं समझ गई उसका सीताराम बोलने का समय आ गया है।

उसने मेरी कमर जोर से पकड़ ली और जोर जोर से धक्के लगाने लगा। मैं आँखें बंद किये उस चरमोत्कर्ष को महसूस करती रही। आह … स्वर्गीय आनंद अपने चरम बिन्दु पर था। हम दोनों की मीठी सिसकारियां पूरे बाथरूम में गूँज रही थी। मैंने अपने गुदाज नितम्बों को उसके पेडू और जाँघों से रगड़ना चालू कर दिया और उसके तीव्र होते प्रहारों के साथ ताल मिलाने लगी। उसने मेरी सुराहीदार गरदन पर एक चुम्बन लिया और फिर एक हाथ नीचे ले जाकर मेरी मुनिया के दाने को अपनी चिमटी से पकड़ लिया। मेरी तो सिसकारियां ही निकालने लगी। उसका कामदंड मेरी योनि में फूलने और सिकुड़ने लगा। मेरी मुनिया ने एक बार फिर संकोचन किया जैसे कि वो उसे पूरा ही निचोड़ लेना चाहती थी।

मुनिया ने एक बार फिर पानी छोड़ दिया और उसके साथ ही पिछले आधे घंटे से कुलबुलाता मोम पिंघल गया। उसके गर्म और गाढे वीर्य की पिचकारियाँ अन्दर निकलती चली गई और हम दोनों ही उस परम आनंद को महसूस करते तरंगित होते रहे। उसने झड़ते समय मीठी मीठी सिसकारियों के साथ मेरी गरदन और पीठ पर चुम्बनों की झड़ी सी लगा दी थी। मैं तो बस आँखें बंद किये उस प्रेम आनंद में डूबी ही रह गई।

2-3 मिनट ऐसे ही एक दूसरे से चिपके रहने के बाद उसका कामदंड फिसल कर बाहर आ गया और उसके साथ ही मेरी मुनिया से भी उसके वीर्य और मेरे कामरज का मिश्रण बाहर निकालने लगा। मैं नीचे बैठ गई और नल खोल कर अपनी मुनिया को साफ़ करने लगी। उसने भी अपने “उसको” धो लिया। आह … सिकुड़ने के बाद भी वो कम से कम 4-5 इंच का तो अवश्य होगा। उसका सुपारा तो अभी भी लाल टमाटर की तरह फूला सा ही लग रहा था। मेरा मन उसे चूम लेने को करने लगा पर स्त्री सुलभ लज्जा के कारण मैं तो बस ललचाई आँखों से उसे देखती ही रह गई। काश श्याम एक बार मेरे मन की बात समझ लेता और मुझे इसे अपने मुँह में लेकर चूसने या प्यार करने को कह देता तो तो अपनी सारी लाज शर्म त्याग कर उसे पूरा का पूरा अपने मुँह में भर लेती। पता नहीं इस श्याम ने मुझ पर क्या जादू या टोना कर दिया है।

सूखे तौलिये से हमने अपने शरीर पोंछे और उसने मुझे फिर अपनी बाहों में भर कर गोद में उठा लिया और हम फिर से कमरे के अन्दर आ गए।

The Romantic
Platinum Member
Posts: 1803
Joined: 15 Oct 2014 17:19

Re: लेखक-प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ

Unread post by The Romantic » 17 Dec 2014 03:49

मोऽ से छल किये जा … सैंयां बे-ईमान-6

मैं अब अपने कपड़े पहन लेना चाहती थी। जैसे ही मैंने अपनी लुंगी और शर्ट उठाने का उपक्रम किया श्याम मेरे हाथों से वो वस्त्र छीन कर परे फेंकते हुए बोला “अभी नहीं मेरी मैना रानी अभी तो बहुत काम बाकी है ?”

“ओह … श्याम तुम 2 बार तो कर चुके हो अब और क्या काम शेष रह गया है ?”

“अरे मेरी भोली मैना तुम बस देखती जाओ आज की रात तुम्हारे जीवन की ऐसी कल्पनातीत रात होगी जो तुम अपने शेष जीवन में कभी नहीं भूलोगी।”

पता नहीं अब श्याम क्या करने वाला है। मैं पलंग पर करवट लेकर लेट सी गई। श्याम मेरे बगल में लेट गया और मेरे कन्धों को पकड़ कर मुझे अपने सीने से लगा लिया। मैं तो उसके सीने से लग कर आत्मविभोर ही हो गई। उसके सीने पर उगे हलके हलके बालों में अंगुलियाँ फिराती रही और वो कभी मेरे सिर के बालों पर हाथ फिराता और कभी कमर पर कभी मेरी पीठ और कभी नितम्बों पर। मेरे गोल गोल नितम्ब तो अब इतने कस गए थे जैसे कोई कोल्हापुर के छोटे छोटे तरबूज ही हों। और उनकी सुरमय घाटी तो जैसे श्याम पर बिजलियाँ ही गिरा रही थी।

उसके दिल की धड़कनों से इसका साफ़ पता चल रहा था। उसने अपना हाथ मेरे दोनों नितम्बों की घाटी (दरार) में फिराना चालू कर दिया। ओह … रोमांच की ये नई परिभाषा थी। आह … जैसे ही उसकी अंगुली मेरी रानी के छिद्र से छूती मेरी रानी और मुनिया दोनों अपना संकोचन कर बैठती और उसकी अंगुली उस छेद पर रुक सी जाती। अनोखे आनंद से मैं तो सराबोर ही हो रही थी। मैं सोच रही थी कि वो अपनी एक अंगुली मेरे उस दूसरे छिद्र में क्यों नहीं डाल रहा है। मैं अपने आप को नहीं रोक पाई और अपने दोनों पैरों को उसकी कमर के दोनों और करके उसके ऊपर आ गई और एक चुम्बन उसके होंठों पर ले लिया। उसने मेरी कमर पकड़ ली और मेरे होंठ चूसने लगा।

पर इस से पहले कि मैं कुछ करती श्याम मुझे अपने ऊपर से हटाते हुए उठा खड़ा हुआ । मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मैं भी उठ बैठी थी ।

हाय… राम उसका “वो” तो ठीक मेरे होंठों के सामने था। मैंने अपनी सारी शर्म आज छोड़ कर उसे अपने हाथ में पकड़ लिया। कितना प्यारा लग रहा था। थोड़ा सा अलसाया सा कोई 4 इंच लम्बा और 1 इंच मोटा मेरे हाथों में ऐसे लग रहा था जैसे कोई नटखट बच्चा शरारत करने के बाद अपनी निर्दोश और मासूम हंसी लिए गहरी नींद में सोया पड़ा हो। ऐसे में कौन उसे प्यार ना करना चाहेगा । मैंने उसके सुपारे पर एक चुम्बन ले लिया। उसने एक हलकी सी अंगडाई ली। मैं अब अपने आप को नहीं रोक पाई और उसके सुपारे पर अपनी जीभ टिका दी। आह… एक गुनगुना सा अहसास तो मुझे पुलकित ही कर गया। मैंने उसका पूरा सुपारा मुँह में भर लिया और चूसने लगी। अभी मैंने 2-3 चुस्की ही लगाई थी कि वो तो फूलने लगा था। श्याम ने मेरा सिर अपने हाथों में पकड़ लिया और आह… उन्नन … की आवाजें निकालने लगा। अब धीरे धीरे उसका आकार बढ़ने लगा था। मैंने एक हाथ से उसका “वो” पकड़ रखा था और दूसरे हाथ से उसकी एक जांघ पकड़ रखी थी। मैं घुटनों के बल हो गई थी। उसने अपनी कमर आगे पीछे करनी चालू कर दी। आह… अब तो आराम से वो अन्दर बाहर होने लगा था। उसके मुँह से सीत्कार निकलने लगी थी।

मेरे लिए जीवन में यह पहला और निराला अनुभव था। श्याम कभी मेरे होंठों को सहलाता कभी अपने “उसको” छू कर देखता कि कितना अन्दर जा रहा है। उसका सारा शरीर रोमांच से जैसे कांप सा रहा था। मेरे लिए तो यह नितांत नया अनुभव ही था। मेरे मन में इसके बारे में भी कई भ्रांतियां थी लेकिन आज इसे मुँह में लेकर चूस लेने के पश्चात ही मुझे पता चला है कि मैं अब तक इस अनोखे आनंद से वंचित क्यों रही। मैंने अपना पूरा मुँह खोल दिया ताकि उसका वो अधिक से अधिक अन्दर चला जाए । मैं आँखें बंद किये उसे चूसती रही । वो कमर हिला हिला कर उसे अन्दर बाहर करता रहा। उसके लटकते अंडकोष मेरी ठोडी से लगते तो मैं रोमांचित ही हो जाती, एक हाथ से पकड़ कर मैंने उन्हें मसलना शुरू कर दिया। मेरे मुँह से अब फच्च फच्च की आवाजें आनी चालू हो गई थी और बीच बीच में गूं… गूं… की आवाजें भी निकल रही थी। श्याम के लिए तो जैसे यह किसी स्वर्ग के आनंद से कम नहीं था। वो भी अपनी आँखें बंद किये आह… ओह … उन्न्नन्न … ईस्स्स्स… किये जा रहा था।

मैंने कोई 8-10 मिनट तो अवश्य उसे चूसा होगा। अब तो वो खूंटे की तरह हो गया था। मेरे मुँह से निकली लार से तर होकर किसी पिस्टन की तरह मेरे मुँह में ऐसे आ जा रहा था जैसे यह मुँह ना होकर कोई रतिद्वार ही हो। चूसते चूसते मेरा मुँह दुखने सा लगा था। मैंने उसे अपने मुँह से बाहर निकाल दिया। मुझे तो बड़ा आश्चर्य हो रहा था कि मेरे छोटे से मुँह में इतना बड़ा और मोटा कैसे अन्दर तक चला गया। इससे पहले कि मैं अपने होंठ पोंछती उसने झट से नीचे बैठते हुए मेरे होंठ अपने मुँह में भर लिए। शायद वो भी उस मिठास को थोड़ा सा चख लेना चाहता था।

“ओह… धन्यवाद मेरी मीनू !” कहते हुए उसने मुझे अपनी बाहों में भर लिया।

अब वो पलंग पर टेक लगाकर बैठ गया और अपनी एक जांघ मोड़ ली और दूसरा पैर लम्बा कर दिया। मैं उसकी जांघ पर सिर रख कर लेट गई। वो नीचे झुका और मेरे माथे और गालों को चूमने लगा। वह एक हाथ से मेरे सर के बालों और कपोलों को सहला रहा था और दूसरे हाथ से मेरे उरोजों को दबाने और मसलने लगा।

मेरी आँखें बंद थी और मैं तो जैसे सपनों के उस रहस्यमयी संसार में गोते ही लगा रही थी। मेरे लिए तो यह रोमांच कल्पनातीत ही था। उसका कामदण्ड तो मेरे कंधे के नीचे दबा फिर उछलकूद मचाने लगा था। उसने मेरी मुनिया पर हाथ लगाया और एक अंगुली से उसकी कलिकाओं को चौड़ा करके अपनी अंगुली को ऊपर नीचे करने लगा। वो तो फिर पानी छोड़ने लगी थी। उसने अपनी अंगुली को मुँह में ले लिया और एक चटखारा लगाया !

मैंने मारे शर्म के अपनी आँखों पर हाथ रख लिए और उसकी गोद से लुढ़क कर नीचे हो गई और दूसरी ओर करवट लेकर लेट गई। अब वो मेरे नितम्बों के ठीक पीछे आ कर चिपक सा गया। उफ्फ्फ… उसका कामदण्ड तो मेरे नितम्बों की खाई में टकरा रहा था। उसने कस कर मुझे अपने से चिपका लिया। मैंने भी अपने घुटने थोड़े से मोड़ कर नितम्ब जितने पीछे हो सकते थे कर दिए। उसने एक हाथ से मेरा पेट पकड़ कर मुझे अपनी ओर खींच लिया। मेरी मीठी सीत्कार फिर निकलने लगी। अब उसने अपने हाथ मेरे पेट से हटा कर अपने कामदण्ड को पकड़ कर मेरे नितम्बों की खाई में रगड़ना चालू कर दिया। आह… उसका चिकना सा अहसास तो रोमांच से भरा था मैंने अपनी एक जांघ थोड़ी सी ऊपर उठा दी। अब तो उसका सुपारा ठीक मेरी गुदा द्वार के ऊपर ही तो लगा था। कुछ गीला गीला और चिकना सा मुझे अनुभव हुआ । मुझे तो बाद में पता चला कि उसने अपने सुपाड़े पर अपना थूक लगा लिया था।

श्याम कभी अपने कामदण्ड को मेरी मुनिया की कलिकाओं (पंखुड़ियों) पर रगड़ता कभी रानी के छिद्र पर। मुझे तो लगा कि अगर 2-4 बार उसने ऐसे ही किया तो मैं कुछ किये बिना ही एक बार फिर झड़ जाउंगी । शमा बताती है कि गुल तो ऐसे अवस्था में एक ही खटके में अपना पूरा का पूरा “वो” उसके पिछले छेद में ठोक देता है। ऐसा सोचते ही मेरे दिल कि धड़कन तेज हो गई कहीं श्याम भी मेरी ?? ओह … अरे नहीं… ?

मैं एक झटके से उठ बैठी श्याम ने मेरी ओर आश्चर्य से देखा जैसे कह रहा हो,”क्या हुआ ?”

“तुम कहीं … ?… वो… ओह … ?” मेरे मुँह से तो जैसे कुछ निकल ही नहीं रहा था। मैंने अपनी मुंडी नीचे कर ली।

“नहीं मेरी मीनू मैं तुम्हारी इच्छा के विपरीत ऐसा कुछ नहीं करूंगा जो तुम्हें पसंद ना हो और जिससे तुम्हें जरा भी कष्ट पहुंचे ।”

“पर वो… वो तुम ?”

“अरे नहीं मैं तो बस तुम्हारी उस सहेली को प्रेम कर रहा था बस ?” उसने हंसते हुए कहा।

“छी … छी … वह कोई प्रेम करने की जगह है भला ?”

“अपनी प्रियतमा का कोई भी अंग भला गन्दा कैसे हो सकता है ?”

“नहीं…नहीं… मुझे लाज आती है…” मैंने अपने हाथों को अपनी आँखों पर रख लिया।

“अच्छा चलो प्रेम ना सही उसे छू तो सकता हूँ ?” उसने मेरे चहरे से मेरे हाथ हटाने का प्रयत्न किया तो मैं अपने हाथ छुड़ाने चक्कर में नीचे गिर पड़ी । वो मेरे दोनों हाथ पकड़ कर मेरे ऊपर आ गया और फिर उसने मुझे अपनी बाहों में जकड़ लिया। मैंने अपनी शर्म छुपाने के लिए अपनी आँखें बंद कर के अपनी बाहें उसके गले में डाल दी। धीरे धीरे उसने अपने हाथ मेरी कमर और कूल्हों पर पुनः फिराने शुरू कर दिए। मैंने अपने पैर ऊपर उठा कर उसकी कमर से लपेट लिए। उसकी अंगुलियाँ मेरे नितम्बों की खाई में फिर से फिरनी चालू हो गई। पता नहीं उसने कब पलंग की दराज़ में पड़ी वैसलीन की डिब्बी निकाल ली थी और उसकी क्रीम अपनी अंगुली पर लगा ली थी। अब तो उसकी अंगुलियाँ ऐसे फिर रही थी जैसे किसी चिकने घड़े पर पानी की बूँदें फिसलती हैं। उसने मेरी रानी के मुँह पर भी अंगुली फिरानी चालू कर दी। आह … उसका चिकना अहसास तो मुझे इस आनंद को भी भोग लेने को ललचाने लगा था।

“मीनू सच बताना क्या सच में तुम इसे गन्दा समझती हो ?”

“किसे ?” मैं उसका संकेत समझती थी पर फिर भी मैंने अनजान बनते हुए पूछा ।

“मैं स्वर्ग के इस दूसरे द्वार की बात कर रहा हूँ।” उसने अपनी अंगुली को मेरे रानी के छेद पर दबाया।

“छी … छी … !”

“देखो मीनू इस प्रकृति ने जो कुछ भी सृजन किया है वह भला गन्दा कैसे हो सकता है ? सम्भोग और प्रेम में कुछ भी गन्दा, बुरा या अपवित्र नहीं होता। इस में जो आनंद कूट कूट कर भरा है वो कोई विरले ही जान और समझ पाते हैं !”

“नहीं मुझे डर लगता है !”

“अरे इसमें डरने वाली क्या बात है ?”

“नहीं तुम्हारा ये देखो कितना मोटा है और अब तो कितना खूंखार लग रहा है… ना बाबा … ना… मैं तो मर ही जाउंगी ?”

“अच्छा चलो तुम अगर नहीं चाहती तो ना सही पर क्या तुम एक बार बस इतना अनुभव भी नहीं करना चाहती कि जब ये कामदण्ड तुम्हारे उस छेद पर जरा सा रगड़ खायेगा या दबाव बनाएगा तो कैसा रोमांच, गुदगुदी और अनूठा अहसास होगा ?”

सच कहूं तो अब मुझे भी उसका “वो” मेरे पिछले छेद में लेने की तीव्र इच्छा होने लगी थी पर मैं अपने मुँह से कुछ बोल नहीं पा रही थी। इस लज्जत और आनंद के बारे में मैंने शमा से बहुत सुना था। मैंने निर्णय नहीं कर पा रही थी। एक ओर मन की सोच थी तो दूसरी ओर तन की प्यास !

मैंने एक सांस छोड़ते हुए श्याम से कहा,”ज्यादा दर्द तो नहीं होगा ना ?”

“देखो मीनू मैंने अभी तक कुछ भी ऐसा किया है जिससे तुम्हें जरा भी कष्ट हुआ हो ?”

“हूँ … !”

“तुम बस मेरे कहे अनुसार करती जाओ फिर देखो इस जन्नत के दूसरे दरवाजे का आनंद तो उस पहले वाले से भी सौ गुना ज्यादा होगा।”

अब उसने मुझे पेट के बल लिटा दिया और घुटनों के बल मेरी जाँघों के बीच बैठ गया। उसने मेरे पेट के नीचे एक तकिया लगा दिया और मेरी कमर पकड़ कर मेरे नितम्बों को थोड़ा सा ऊपर उठा दिया। ओह अब तो मेरा सारा खज़ाना ही उसके सामने जैसे खुल सा गया था। दो गुदाज और मांसल नितम्ब, गहरी खाई और उनके बीच खुलता और सिकुड़ता स्वर्ग का दूसरा द्वार। उसके 1 इंच नीचे स्वर्ग गुफा का पहला द्वार जिसके लिए आदमी तो क्या देवता भी अपना संयम खो दें । रोम विहीन मोटी मोटी सूजी हुई सी गुलाबी फांके और रक्तिम चीरे के बीच सुर्ख लाल रंग की कलिकाएँ किसी का भी मन डोल जाए । उसने अपने जलते और कांपते होंठ उन पर लगा दिए। मेरी तो किलकारी ही निकल गई। उसने अपनी जीभ से उसे चाटा और फिर अपनी जीभ उस पर फिराने लगा। कभी फांकों पर, कभी दरार पर और कभी उस छिद्र पर जिसे अब तक मैं केवल गन्दा ही समझ रही थी। अब तो यह छेद भी एक नए अनुभव के लिए आतुर सा हो चला था। कभी खुलता कभी बंद होता। मैंने भी अपनी मुनिया और रानी का संकोचन करना शुरू कर दिया। उसकी आँखें तो बस उस छिद्र पर टिकी ही रह गई होंगी।

आमतौर पर पर यह छिद्र काला पड़ जाता है पर मेरा तो अभी भी सुनहरे रंग का ही था और उसकी दरदरी सिलवटें तो ऐसी थी कि किसी के भी प्राण हर लें।

रोमांच की अधिकता के कारण मैंने अपनी कमर और नितम्ब ऊपर नीचे करने चालू कर दिए। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि वह इतनी देर क्यों कर रहा है। उसका “वो” तो अब काम के वशीभूत होकर उपद्रव करने को मचल रहा होगा। ऐसा कसा हुआ और कुंवारा छिद्र भला उसे पहले कहाँ नसीब हुआ होगा। उसने वैसलीन की डिब्बी खोली और ढेर सारी क्रीम निकाल कर मेरी रानी के छिद्र पर लगा दी। [मुझे क्षमा कर देना मैं इन अंगों का गन्दा नाम (लंड, चूत, गांड) नहीं ले पा रही हूँ] और फिर धीरे धीरे अपनी अंगुली उस पर मसलने लगा। मेरी तो सीत्कार ही निक़ल गई। जब उसने धीरे से एक पोर अन्दर किया। मैं तो रोमांचित और तरंगित ही हो उठी।

मैंने अपनी रानी का संकोचन किया तो श्याम बोला “नहीं मीनू इसे बिलकुल ढीला छोड़ दो और आराम से रहो तुम्हें कोई कष्ट नहीं होने दूंगा। अगर तुम्हें जरा भी कष्ट हो या अच्छा ना लगे तो उसी समय बता देना मैं आगे कुछ नहीं करूंगा।”

मेरी ऐसी मनसा कत्तई नहीं थी। मैंने अपनी रानी का मुँह ढीला छोड़ दिया। उसने फिर क्रीम अपनी अंगुली पर लगाई और इस बार आधी अंगुली बिना किसी रोकटोक के अन्दर प्रविष्ट कर गई। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि इतनी सरलता से यह सब कैसे हो रहा है। श्याम अवश्य कोई जादू जानता है। 4-5 बार उसने क्रीम अन्दर लगाई और अपनी अंगुली को मेरी रानी में अन्दर बाहर करता रहा। मेरा अनुमान था कि आधी डिब्बी क्रीम तो अवश्य अन्दर चली ही गई होगी। अब तो रानी बिलकुल रंवा हो चली थी। आह… उस का चिकना सा अहसास तो अति रोमांचित कर देने वाला था। जैसे ही उसकी अंगुली अन्दर जाती मेरी रानी का छल्ला भी साथ अन्दर चला जाता और जब अंगुली बाहर आती तो बादामी रंग का छल्ला भी बाहर आ जाता। अब उसने डिब्बी में बाकि की क्रीम को अपने कामदंड पर लगा लिया। मैंने अपनी मुंडी जरा सी मोड़ कर देखा था ट्यूब लाइट के दुधिया प्रकाश में उसका “वो” ऐसे चमकने लगा था जैसे कि कोई पहलवान अपने शरीर पर खूब तेल की मालिश कर अखाड़े में कुश्ती लड़ने को खड़ा हो।

उसने मेरे नितम्बों पर 3-4 चपत लगाए। आह… चुनमुना सा अहसास मुझे पीड़ा के स्थान पर तरंगित कर रहा था। जिसे ही उसका हल्का सा थप्पड़ मेरे नितम्ब पर पड़ता तो वो हिलने लगता और मैं अपनी रानी का संकोचन कर बैठती और फिर मेरे मुँह से अनायास एक काम भरी सीत्कार निकल जाती। अब उसने मेरे पेट के नीचे से तकिया निकाल कर बगल में रख दिया और मेरी दाईं जांघ को घुटने से थोड़ा सा मोड़ कर मुझे करवट के बल लेटा दिया। मेरा बायाँ पैर सीधा था और दायाँ पैर मुड़ा हुआ था जिसके घुटने और जांघ के नीचे तकिया लगा था। मैंने तकिये को थोड़ा सा अपनी छाती से चिपका लिया।

श्याम उठकर अपने पैर उलटे करके मेरी बाईं जांघ पर बैठ गया और मेरे दायें नितम्ब को अपने हाथ से थोड़ा सा ऊपर की ओर कर दिया। अब तो रानी का छिद्र बिलकुल उसकी आँखों के सामने था। उसने कोई हड़बड़ी या जल्दी नहीं की । धीरे से उसने अपनी अंगुलियाँ मेरी मुनिया की फांकों पर रगड़नी चालू कर दी। कभी वो दाने को मसलता और कभी उसकी कलिकाओं को। आह… मुझे तो लगा मैं झड़ गई हूँ। श्याम कुछ कर क्यों नहीं रहा है। अब उसने अपनी एक अंगुली मेरी रानी के छेद पर लगा कर उसे घुमाना चालू कर दिया। मेरे ना चाहते हुए भी रानी ने फिर संकोचन करना चालू कर दिया तो श्याम बोला,”मीनू अपने आप को बिलकुल ढीला छोड़ दो। अब तुम उस परम आनंद को अनुभव करने वाली हो जिस से तुम आज तक वंचित थी। मेरा विश्वास करो इस अनुभव को प्राप्त कर तुम प्रेम के उस उच्चतम शिखर पर पहुँच जाओगी जिसकी कल्पना तुमने कभी स्वप्न में भी नहीं की होगी !”

“उन्ह्ह …” मैं क्या बोलती । मैंने अपना एक अंगूठा अपने मुँह में ले लिया और चूसने लगी। मेरा एक हाथ मेरी छाती से लगे ताकिये को कसा था। मेरे दिल की धड़कनें तेज होती जा रही थी। श्याम ने अपने कामदण्ड को अपने बाएं हाथ में पकड़ कर रानी के छिद्र पर लगा ही दिया और दूसरे हाथ से मेरी मदनमणि को अपनी चिमटी में पकड़ लिया। उसने मदनमणि को इतनी जोर से भींचा कि मेरी तो चींख ही निकल गई। दूसरी ओर उसके कामदण्ड का दबाव और चिकना अहसास में अपनी रानी के छल्ले पर अनुभव कर रही थी। मेरी बंद आँखों में सतरंगे तारे से जगमगाने चालू हो गए। आँखें तो पहले से ही बंद थी। धीरे धीरे दबाव बढ़ता गया और मुझे लगा जैसे किसी ने मेरी रानी के छेद को चौड़ा सा कर दिया है और उसके साथ ही मुझे लगा जैसे मेरी रानी के छल्ले के चारों ओर सैंकड़ों चींटियों ने एक साथ काट खाया है। मेरे मुँह से सहसा निकल पड़ा “ऊईई… मा ……”

और फिर गच्च की एक हल्की सी आवाज हुई और उसका सुपारा अन्दर घुस गया। मेरी तो जैसे साँसें ही अटक गई थी। श्याम कुछ देर चुप सा रहा। ना तो हिला ना ही उसने धक्का लागाया मुझे तो लगा जैसे किसी ने लोहे की मोटी सी गर्म सलाख मेरी रानी के अन्दर ठूंस दी है। मेरी आँखों से आंसू से निकल पड़े। मैं जोर से चींखना चाहती थी पर मैंने अपने दांत कस पर दबा लिए और अपने हाथों से उस तकिये को जोर से अपनी छाती से भींच लिया।

कोई 2-3 मिनट हम दोनों इसी अवस्था में रहे। मुझे थोड़ा दर्द भी हो रहा था पर इतना नहीं कि मैं चीखूँ या चिलाऊँ। श्याम ने मेरे नितम्बों को सहलाना शुरू कर दिया। मेरा शरीर अनोखे भय और रोमांच से कांपने लगा था। उसके दिल की धड़कने भी बढ़ गई थी।

थोड़ी देर बाद वो बोला,”धन्यवाद मेरी मीनू … बस … अब कोई दर्द या कष्ट नहीं होगा … अब तो बस आनंद ही आनंद है आगे !”

सच कहूं तो मुझे तो कोई आनंद नहीं अनुभव हो रहा था। हाँ थोड़ा सा दर्द और चुनमुना सा अहसास अवश्य हो रहा था। मुझे तो लग रहा था कि मेरी रानी का छिद्र और छल्ला सुन्न से पड़ गए हैं। मैंने अपना एक हाथ पीछे ले जाकर अपनी रानी के छेद पर लगाने कोशिश की । ओह जैसे कोई मोटा सा मूसल किसी ने मेरी रानी में ठोक रखा था। अभी भी 4-5 इंच तो बाहर ही होगा। मैंने अपना हाथ हटा लिया। श्याम ने अपने हाथ मेरे नितम्बों, जांघ और कमर पर फिराने चालू रखे। अब तो मुझे भी लग रहा था कि वह अन्दर समायोजित हो चुका है। उसने एक ठुमका सा लगाया और मेरी रानी ने संकोचन करके जैसे उसे अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी। मुझे अन्दर तो कुछ अनुभव ही नहीं हो रहा था बस उस छल्ले पर जरूर कसाव और चुनमुनापन सा अनुभव हो रहा था।

अब श्याम ने अपने कामदण्ड को थोड़ा सा बाहर निकाला और फिर धीरे से अन्दर दबाव बनाया । इस बार 5 इंच तक अन्दर चला गया। मुझे तो बस छल्ले का अन्दर बाहर होना ही अनुभव होता रहा। उसने अभी पूरा अन्दर नहीं डाला बस 4-5 इंच अन्दर डाल कर कभी बाहर करता कभी अन्दर सरका देता । कुछ देर बाद तो मैं भी जैसे अभ्यस्त सी हो गई थी। अन्दर क्रीम पिंघलने से छेद रंवा सा हो गया था और अब तो बड़ी आसानी से अन्दर बाहर होने लगा था। उस के मुँह से भी आह… ईईइ … गुर्रर्र की आवाजे आने लगी थी। मेरी भी अब सीत्कार निकलने लगी थी। अचानक उसके अंडकोष मेरी मुनिया से टकराये तब मुझे ध्यान आया कि अब तो उसका पूरा का पूरा 7″ मेरे अन्दर प्रविष्ठ कर ही गया है। आह… उसने मुझे पूर्ण रूप से आज पा ही लिया है। अब तो मेरा छल्ला जैसे ही अन्दर या बाहर होता मेरा तो रोम रोम ही पुलकित होने लगा था। रोमांच की यह नई परिभाषा और पराकाष्ठा थी। आज से पहले मैंने कभी इतना आनंद नहीं अनुभव किया था।

“मीनू एक काम करोगी ?” अचानक श्याम की आवाज मेरे कानों में पड़ी।

“क … क्या ?”

“तुम तकिया अपने पेट के नीचे कर के उस पर लेट जाओ प्लीज !”

मैंने अपने दाईं टांग को सीधा किया और पेट के नीचे तकिया लगा कर थोड़ा सा दाईं ओर झुक गई। श्याम अब ठीक मेरे ऊपर आ गया। मैंने अपने नितम्ब ऊपर उठा दिए। यद्यपि वो मेरे ऊपर आ गया था पर उसने अभी अपना पूरा भार मेरे ऊपर नहीं डाला था। उसने अपने घुटने मोड़ रखे थे। उसके मुड़े हुए दोनों पैर मेरी कमर और नितम्बों के दोनों ओर थे। वह थोड़ा सा झुका और अपने हाथ नीचे ले जा कर मेरे उरोजों को पकड़ लिया और उन्हें दबाने लगा। मैं भी या ही चाह रही थी कि वो आज इन्हें भी मसल ही डाले। जब सब कुछ समायोजित हो गया तब उसने धीरे धीरे अपने कामदण्ड को अन्दर बाहर करना फिर से चालू कर दिया। अब तो ना कोई कष्ट था ना कोई रूकावट। अब तो बस किसी पिस्टन की तरह वो अन्दर बाहर होने लगा था। जब वो अपना कामदण्ड थोड़ा सा बाहर निकाल ता तो मैं भी अपने नितम्ब थोड़े ऊपर कर देती और जब वो हल्का सा धक्का लगता तो वो अपने आप नीचे हो जाते। उसके अंडकोष मेरी मुनिया की फांकों से टकराते तो रोमांच के मारे मेरी मीठी सीत्कार निकल जाती।

हमें कोई दस मिनट तो अवश्य हो गए होंगे। पर समय का किसे भान और चिंता थी। ओह … मुझे तो असली काम रहस्य का आज ही अनुभव हुआ था। मैं तो इसे निरा गन्दा और अप्राकृतिक ही समझती रही थी आज तक। शमा सच कहती थी कि अपने प्रेमी या पति को पूर्ण रूप से समर्पित तभी माना जाता है जब वो इस आनंद को भी प्राप्त कर ले। आज मैं भी पूर्ण समर्पिता हो गई हूँ।

श्याम ने अब जोर जोर से धक्के लगाने चालू कर दिए थे मुझे तो पता ही नहीं चला। मेरी सीत्कार गूँज रही थी और उसकी भी मीठी स्वर लहरी हवा में गूँज रही थी। एक अनोखे आनंद से हम दोनों ही लबालब भरे एक दूजे में समाये थे।

मैं थोड़ी थक सी गई थी। मैंने अपने नितम्ब ऊपर नीचे करने बंद कर दिए तो श्याम ने मेरे कंधे को पकड़ कर मुझे करवट के बल हो जाने का इशारा किया। मैंने अपने नितम्बों को थोड़ा सा ऊपर करके तकिया निकाल दिया और करवट लेकर लेट गई। श्याम मेरे पीछे था। हमने यह ध्यान अवश्य रखा था कि वो फिसल कर बाहर ना आ जाए । अब मैंने अपनी दाईं जांघ अपने बांह में भर कर ऊपर कर ली। श्याम मेरी कमर पकड़ कर धक्के लगाने लगा। बड़ी आसानी से वो अन्दर बाहर होने लगा था। मुझे तो आश्चर्य हो रहा था कि इतना मोटा और लम्बा कैसे मेरे इस छोटे से छिद्र में समाया अन्दर बाहर हो रहा है।

अब तक 20-25 मिनट हो चले थे। मैं थक गई थी पर मेरा मन अभी नहीं भरा था। मैं आज इस आनंद को जी भर कर उठा लेना चाहती थी। काश समय रुक जाए और हम एक दूजे में समाये इसे तरह लिपटे सारी रात पड़े रहें।

अब श्याम के मुँह से गुरर्र … गुन्न्न्न … आह… की आवाजें आनी शुरू हो गई थी। मुझे लगा कि अब वो किसी भी समय पिचकारी छोड़ सकता है। मैंने अपने नितम्ब जोर से उसकी जांघों से सटा दिए। उसका एक हाथ मेरी कमर के नीचे से होता मेरे उरोज को पकड़े था और दूसरे हाथ से मेरी मुनिया को सहला रहा था। अचानक उसने मेरी कमर पकड़ ली और एक जोर से धक्का लगा दिया। आह… वो तो जड़ तक अन्दर चला गया था। मेरी हलकि सी किलकारी निकल गई और मेरी मुनिया ने पानी छोड़ दिया। अब उसका कामदण्ड फूलने और पिचकने लगा था। उसने एक ठुमका लगाया और उसी के साथ मेरी रानी ने भी संकोचन कर उसका अभिवादन किया। उसका शरीर अकड़ने सा लगा और झटके से खाने लगा। मैंने अपना दायाँ पैर नीचे कर लिया और वो फिर मेरे ऊपर आ गया। मैंने अपने नितम्ब ऊपर किये तो उसने अंतिम धक्का लगा दिया और इसके साथ ही उसके वीर्य की पिचकारियाँ छूटनी चालू हो गई। आह… गर्म गाढ़े वीर्य से मेरी रानी लबालब भर गई। उसका कामदण्ड भी वीर्य से लिपड़ गया। उसके धक्के धीमे पड़ने लगे और उसने मुझे जोर से अपनी बाहों में कस लिया और ऊपर ही लेट गया।

कुछ देर हम दोनों बिना कुछ बोले ऐसे ही पड़े रहे। अब तो उसका वो सिकुड़ने लगा था। एक पुच की आवाज के साथ वो फिसल कर बाहर आ गया। और उसका गर्म वीर्य मेरी रानी के छिद्र से बाहर आना चालू हो गया जो मेरी जाँघों पर भी फ़ैलने लगा। मुझे गुदगुदी सी होने लगी । और अपनी रानी के अन्दर खालीपन सा अनुभव होने लगा। उसने मुझे अपनी बाहों में उठा लिया और बाथरूम में जाते हुए मेरी बंद आँखों की पलकों को चूम लिया।

हम सफाई करके वापस पलंग पर आ गए। वो चित लेट गया और मैं उसके सीने पर अपना सिर रख दिया। मेरे सर के बालों से उसका मुँह ढक सा गया था। उसने मेरे सिर, कपोलों और पीठ पर हाथ फिराने चालू रखे। पता नहीं कब इसी तरह आपस में लिपटे हमें नींद ने अपने बाहुपाश में ले लिया।

सुबह जब मेरी आँख खुली तो मैंने घड़ी देखी। ओह… सुबह के 10:00 बज रहे थे। श्याम दिखाई नहीं दे रहा था। हो सकता है वो ड्राइंग रूम में हो या फिर बाथरूम में। मैंने अपने निर्वस्त्र शरीर को देखा जो बस उसी लुंगी से ढका था। मैंने बैठे बैठे ही एक अंगडाई लेने की कोशिश की तो मुझे लगा कि मेरा तो अंग अंग ही किसी मीठी कसक और पीड़ा से भरा है। मैंने अपने अधरों को छू कर देखा वो तो सूजे हुए लग रहे थे। मेरे उरोजों पर, उनकी घाटियों पर, पेट पर, पेडू पर, जाँघों पर, नितम्बों पर लाल और नीले से निशान बने थे। ओह … ये तो श्याम के प्रेम की निशानी थे। मैं तो ऐसा सोच कर ही लजा गई। मैंने लुंगी और शर्ट उठाई और बाथरूम की ओर भागी। ओह… मेरी दोनों जाँघों और नितम्बों के बीच तो ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने चाकू से चीर ही दिया हो। मैंने बाथरूम में जाकर शीशे में अपना चेहरा देखा। हाय … राम मेरे होंठ सूजे हुए थे। कपोलों, गले, माथे, स्तनों पर हर जगह लाल और नीले निशान पड़ गए थे। मेरी मुनिया तो सूज कर पाव रोटी की तरह हो गई थी। आँखों में लाल डोरे से तैर रहे थे। शायद रात की खुमारी अभी भी बाकी थी।

मैंने शीशे में एक बार अपने आप को फिर से निहारा। ओह … यह तो वही चार साल पहले वाली निर्दोष, निष्पाप, निष्कपट, निश्छल, मासूम और अपराधबोध रहित मीनल खड़ी थी।

मैं मुँह हाथ धोये और वही लुंगी और शर्ट पहन कर ड्राइंग रूम में आ गई। मैं चाहती थी तो कि श्याम मुझे देखते ही दौड़ कर मेरी ओर आये और मुझे अपनी बाहों में भर कर इतनी जोर से भींचे कि मेरा सारा दर्द उसी पल दूर हो जाए। पर श्याम तो कब का जा चुका था। हाँ सोफे के बीच रखी मेज पर कागज़ का एक पुर्जा सा पड़ा अवश्य दिखाई दिया।

मैंने झट से उसे उठा लिया और उसे पढ़ने लगी :

“मेरी मीनल

आज मैंने तुम्हें पूर्ण रूप से पा लिया है मेरी प्रियतमा। मेरे पास तुम्हारे इस समर्पण के लिए धन्यवाद करने को शब्द ही नहीं हैं। आज मेरा तन मन और बरसों की प्यासी यह आत्मा सब तृप्त हो गए हैं। तुमने मुझसे वचन लिया था कि यह सब केवल आज रात के लिए ही होगा। मैं जा रहा हूँ मेरी प्रियतमा। मैं नहीं चाहता कि तुम मेरे ऊपर अपना वचन भंग करने का आरोप लगाओ। मैं भला अपने ऊपर अपनी प्रियतमा के वचन भंग (वादा खिलाफी) का आरोप कैसे लगने दे सकता हूँ ? मैं जा रहा हूँ, मेरी प्रियतमा अपना ख़याल रखना।

–तुम्हारा श्याम”

“ओह … मेरे श्याम…” मैं स्तंभित खड़ी उस कागज़ के पुर्जे को देखती ही रह गई।

“नहीं श्याम तुम ऐसा कैसे कर सकते हो …. मेरे साजन ……. मैं अब तुम्हारे बिना जी नहीं पाउंगी …….. मुझे छोड़ कर यूं मत जाओ … मैं तुम्हें वचन मुक्त करती हूँ !” मुझे तो ऐसा लग रहा था किसी ने मेरी छाती में खंजर भोंक दिया है और मेरा सारा रक्त ही निचोड़ लिया है। मैं अपना सर पकड़ कर वहीं सोफे पर गिर पड़ी। अब मेरे अन्दर इतनी शक्ति कहाँ बची थी कि मैं शयन कक्ष में वापस जा पाऊँ।

मेरी आँखें छलछला उठी। मैं अपने जीवन में घुट घुट कर बहुत रोई हूँ पर आज तो मैं फूट फूट कर रो रही थी। मुझे लगा जैसे मैं एक बार फिर से छली गई हूँ।

यह थी मेरी आपबीती। अब तुम सोच रही होगी कि अब समस्या क्या है वो तो बताई ही नहीं ? ओह… तुम भी निरी बहनजी ही हो ? श्याम तो बस एक रात के मुसाफिर की तरह मेरे सूने जीवन में आया और मुझे सतरंगी दुनिया की एक झलक दिखा कर चला गया। मैं भी कितनी पागल थी कि उसे अपने वचन में बाँध बैठी। मनीष 3-4 दिनों के बाद आ जाएगा और उसकी पदोन्नत्ति निश्चित है। अब फिर उजड़ कर दूसरे शहर जाना होगा। अब तुम बताओ कल रात जो सुनहरे और सतरंगी सपने मैंने देखे थे और उस परम आनंद की अनुभूति की थी मैं उसे कैसे अपने तन और मन से अलग कर पाउंगी। मेरे लिए अब क्या रास्ता बचा है? बताओ मैं क्या करूँ ?

तुम्हारी – मीनल

The Romantic
Platinum Member
Posts: 1803
Joined: 15 Oct 2014 17:19

Re: लेखक-प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ

Unread post by The Romantic » 17 Dec 2014 03:54

जब वी मेट-1

यह साला शाहिद कपूर दिखने में तो निरा पप्पू ही लगता है पर जिस तरीके से इसने फिल्म जब वी मेट में करीना कपूर का चुम्बन लिया है लगता है इसने जरुर इमरान हाशमी की शागिर्दी की होगी। और ये छमक छल्लो करीना कपूर भी कम नहीं है इसने भी जिस अंदाज़ में जी खोल कर अपने हुस्न के जलवे दिखाए हैं सब के लंड उसे सलाम-ए-इश्क करने लगे हैं। क्या मस्त चूतड़ हैं साली के ! एकदम पटाका लगती है। सैफ अली खान की तो बुढ़ापे में लाटरी ही लग गई है। वो तो इसकी मटकती गांड मार कर जन्नत का नज़ारा ही लूट लेगा। क्या किस्मत पाई है इस पटौदी के पप्पू ने भी।

एक बात तो साफ़ है करीना में भी पठानी खून है और सैफ अली में भी थोड़ा बहुत तो नबाबी शौक तो जरुर होगा। करीना की मटकती गांड का मज़ा तो वो जरुर लूटेगा। आप सभी तो बहुत गुणी हैं और अच्छी तरह जानते हैं कि पठान और नवाब दोनों ही गांडबाजी के बड़े शौक़ीन होते हैं।

सच कहूं तो एक बात की तो तसल्ली है कि अब हम जैसे शादीशुदा लोगों के लिए किसी जवान लौंडिया पर लाइन मारते समय इन दोनों का (सैफ और करीना का) उदहारण देना कितना आसान हो जाएगा। बस हम तो यही कहेंगे- लगे रहो सैफ भाई।

टीवी पर जब वी मेट फिल्म चल रही थी और मैं सोफे पर बैठा अपने लंड को हाथ में थामे बेबो करीना के नाम की माला जप रहा था। मधु आजकल जयपुर गई हुई है। सच कहूं तो आज करीना के मोटे मोटे गुदाज़ नितम्ब देख कर तो बस जी चाह रहा था है कि सोफे पर बैठे बैठे ही किसी मोटे चूतड़ वाली लौंडिया को अपनी गोद में ही बैठा लूं और अपना लंड उसकी फूल कुमारी (गांड) में डाल दूं या फिर उसे बेड पर उलटा लेटा कर उसके नितम्बों की खाई में अपना लंड डाल कर बस ऊपर पसर ही जाऊं।

मधु एक दो दिन में आने वाली है। ओह… इन दो दिनों से तो उसका कोई फ़ोन भी नहीं आया। कितनी लापरवाह हो गई है यह मधु भी। मैं अभी सोच ही रहा था कि मधुर के आते ही सबसे पहले मैं सारे काम छोड़ कर एक बार उसकी गांड जरुर मारूंगा कि मोबाइल की घंटी बजी …………

कोई अनजाना सा नंबर था। मधुर का तो यह नंबर नहीं हो सकता। पता नहीं इस समय कौन है।

मैंने फ़ोन ऑन करके जब हेलो बोला तो उधर से किसी महिला की आवाज आई “मिट्ठूजी कैसे हो ?”

“हेल्लो ! आप किस से बात करना चाहती हैं ?”

“मैना की याद आ रही है क्या ?”

“सॉरी मैंने आपको नहीं पहचाना ?”

“हाय मैं मर जावां ! वाहे गुरु दी सोंह ! मेरे मिट्ठू जी तुहाडी एहो गल्लां ते मन्नू मार छडदी ने !”

“पर आप हैं कौन और किस से बात करना चाहती हैं ?”

“आय हाय… मैं दूजी वारि मर जावां… तुहाडी एहो गल्लां ते मैंनू बेचैन कर देंदियाँ ने ? पर तूं ते हरजाई ए !” (ओये होए … मैं दुबारा कुर्बान जाऊं ? तुम्हारी यही बातें तो मुझे बेचैन कर देती हैं ? पर तुम तो हो ही छलिया !)

“स.. सॉरी आप हैं कौन ?”

“हाय ! क्या अदा है ? तुम क्यों पहचानोगे तुम्हें तो उस मैना के सिवा कुछ दिखाई ही नहीं देता। पता नहीं ऐसा क्या है उसमें जो उसके मिट्ठू ही बने रहते हो !”

“ओह… न … नीरू ? … ओह… सॉरी मैंने पहचाना नहीं था… कैसी हो ?”

ओह… यह तो नीरू थी। आपको ‘अभी ना जाओ छोड़ कर….’ वाली निर्मला बेन पटेल तो जरुर याद आ गई होगी। कोई तीन साल पहले की बात है हमने गर्मियों की छुट्टियों में खूब मस्ती की थी।

“मैं ठीक हूँ तुम सुनाओ अभी भी मैना के साथ सोये हो या उसकी याद में मुट्ठ मार रहे हो ?”

“ओह… नीरू तुम बिल्कुल नहीं बदली ?”

“तुम तो इस मैना को भूल ही गए हो ?”

“अरे नहीं मैं भूला नहीं था बस थोड़ा व्यस्त रहा और तुम भी तो यहाँ से चली गई थी।”

“हाँ यार वो गणेश का काम यहाँ ठीक नहीं चल रहा था और फिर किट्टी के दादाजी का भी स्वर्गवास हो गया तो हमें सूरत शिफ्ट होना पड़ा।”

“ओह ! आई ऍम सॉरी”

“कोई बात नहीं और सुनाओ कैसा चल रहा है ? कोई नई मैना मिली या नहीं ?”

“नीरू सच में तुम्हारे साथ जो पल बिताये हैं वो तो मैं जीवन भर नहीं भूल सकता। मैं बहुत याद करता हूँ तुम्हें।”

“झूठे कहीं के ?”

“नहीं मैं सच कह रहा हूँ !”

“तो फिर मेरे पास आये क्यों नहीं ?”

“तुम बुलाओगी तो जरुर आऊंगा !”

“तुम तो छलिया हो, पूरे हरजाई हो ! तुम्हें भला मेरी क्या जरुरत और परवाह होगी?”

“नहीं ऐसी बात नहीं है, दरअसल…”

“ओह ! छोड़ो इन बातों को ! मेरा एक काम करोगे ?”

“हाँ… हाँ बोलो क्या काम है मैं जरुर करूँगा ?”

“किसी चिकने लौंडे या पप्पू का फ़ोन नंबर या मेल आई डी दो ना !”

“ऐसी क्या जरुरत पड़ गई?”

“आज सेक्सी बातें करने का बहुत मूड हो रहा है। सच में गणेश तो किसी काम का ही नहीं रहा आजकल। मैं बहुत तड़फती हूँ। कोई ऐसा बताओ जो सारी रात मेरे साथ चुदाई की बातें करता रहे और मौका मिलने पर सारी रात मुझे आगे और पीछे दोनों तरफ से खूब रगड़े।”

“पर इन चिकने और अनुभवहीन लौंडों में तुम्हें क्या मजा आएगा ?”

“अरे तुम नहीं जानते, ये अनुभवहीन चिकने लौंडे झड़ते जल्दी हैं पर दुबारा तैयार भी फटाफट हो जाते हैं। मुझे ये छत्तिसिये और चालिसिये तो बिल्कुल नहीं जमते। एक तो इन लोगों की दिक्कत यह होती है कि अपनी बीवी से डरते रहते हैं कि उसे पता ना चल जाए और दूसरे इन्हें दुनिया जहान की समस्याएं चिपकी रहती है। और ये पप्पू तो बस बिना किसी परवाह और लाग-लपट के सारे दिन और रात चूत और गांड के पीछे मिट्ठू बने रहते हैं। एक और बात है इनकी मलाई बड़ी मस्त होती है, इसे पीकर तो औरत जवान ही बनी रहती है।”

“ओहो ?”

“तुमने फिल्म अभिनेत्री रेखा को नहीं देखा? साली 55 के पार हो गई है पर आज भी चिर यौवना बनी हुई है। साली आज भी चिकने लौंडों के साथ चिपकी ही रहती है इसीलिए तो इतनी खूबसूरत लगती है इस उम्र में भी… ”

“चलो नीरू … फिर तुम एक काम करो ….?”

“क्या ?”

“तुम कोई कहानी लिख कर किसी सेक्सी साईट पर क्यों नहीं भेज देती। उसमें अपना आई डी दे दो फिर देखो तुम्हारे पास तो ऐसे प्रस्तावों की लाइन लग जायेगी। कुंवारे तो छोड़ो, शादीशुदा लोग भी तुम्हारे सामने गिड़गिड़ायेंगे !”

“पर मुझे कहानी लिखना कहाँ आता है ?”

“चलो तुम मुझे अपनी पहली चुदाई का किस्सा बताओ मैं उसे कहानी का रूप देकर भेज दूंगा।”

“चलो ठीक है मैं अपनी पहली चुदाई का किस्सा सुनाती हूँ, तुम उसे कहानी का रूप देकर प्रकाशित करवा देना।”

और फिर नीरू ने बताना शुरू किया :

मैं निर्मला बेन पटेल तो शादी के बाद बनी हूँ पर उस समय तो मैं नीरू अरोड़ा ही थी। मैं पंजाबी परिवार से हूँ पर शादी गुजराती परिवार में हुई है। मेरी शादी से पहले हमारे परिवार में मेरे मम्मी-पापा और सिर्फ मैं ही थी। पापा का सूरत, बड़ोदा और वलसाड में ट्रांसपोर्ट का काम है। मम्मी कुशल गृहणी हैं और चुदाई की बड़ी शौक़ीन हैं। आप तो जानते हैं पंजाबी लड़कियां और औरतें चुदाई की बड़ी शौक़ीन होती हैं। पापा अक्सर ट्यूर पर रहते थे और जिस दिन वो आते थे रात को मम्मी और पापा देर रात गए तक चुदाई में लगे रहते थे। मैं छुप छुप कर मम्मी पापा की यह रास-लीला खूब मज़े लेकर देखा करती थी। इकलौती संतान होने के कारण मेरी परवरिश अच्छी तरह से हुई थी इसलिए मैं समय से पहले ही जवान हो गई थी।

भगवान् ने जैसे मुझे अपने हाथों से खुद फुर्सत में तराशा था और गूंथ-गूंथ कर मेरे अन्दर जवानी भर दी थी। मेरे कजरारे नैनों और घनी पलकों की छाँव में बैठ कर तो कोई मुसाफिर अपनी मंजिल ही भूल जाए। मेरे उरोज तो जैसे चोली में समाना ही नहीं चाहते थे। यौवन भरे, मांसल, छरहरे और गदराये हुए मादक स्तन और उनके अहंकारी चुचूक तो हर किसी को चूस लेने को आमंत्रित ही करते रहते थे जैसे !

जब भी मैं अपने उभरते यौवन को आईने में देखती तो खुद ही शरमा जाती थी। मुझे पता ही नहीं चला कि कब मेरी जांघें इनी चिकनी और मोटी हो गई थी और मेरे कूल्हों और छातियों पर चर्बी चढ़ गई थी। मैं कई बार बात कमरे में कपड़े उतार कर अपने नितम्बों को और छाती पर उगे उन दो अनमोल फलों को अचरज से देखा करती थी। कभी उन्हें दबा कर और कभी कभी मसलकर ! ऐसा करने से मुझे अज़ीब और असीमित आनंद की अनुभूति होती थी। मोहल्ले और कोलेज के लड़के तो मेरी छाती पर झूलते दो अनारों को देख कर आहें भरने पर मजबूर हो जाते थे। मेरे भारी भारी स्तन शमीज में से चमकते हुये सभी का मन को मोह लेते थे।

मेरे होंठों में जैसे शहद, आँखों में शराब और सारे जिस्म में खून की जगह फूलों का रस भरा था। अगर किसी की राहों में आ जाऊं तो इंसान क्या फरिश्तों का ईमान एक बार डगमगा जाए।

मैं जानती थी यह गदराया जिस्म, यह जवानी और यह नाज़ुक अंग सदा ऐसे नहीं रहेंगे। आपको बता दूं मैंने कम उम्र से ही हस्तमैथुन करना शुरू कर दिया था। कभी कभी तो मैं अपनी कच्छी उतार कर पहले तो अपनी छमक छल्लो पर हाथ फिराती और कभी उसकी छोटी छोटी गुलाबी कलिकाओं को होले से चौड़ा कर के अन्दर देखती थी। काम रस में भीगी गुलाबी रंगत लिए मेरी छोटी सी छमक छल्लो कितनी प्यारी लगती थी उस समय। मेरा जी चाहता था कोई इसे मुँह में भर कर चूम ले और फिर जोर जोर से चूसता ही चला जाए।

मेरे गोरे चिट्टे बदन पर बालों का तो नाम-ओ-निशान ही नहीं था। बस उस अनमोल खजाने पर छोटे छोटे घुंघराले से रेशमी बाल थे। जाँघों के बीच छिपे उस खजाने के अन्दर की तितली के दो छोटे छोटे पंखों की तरह फड़फड़ाती दो गुलाबी पट्टियां हमेशा काम रस से सराबोर रहने लगी थी। और वो किशमिश का दाना तो कभी कभी सूज कर अकड़ सा जाया करता था।

मैं थोड़ी शर्मीली जरुर थी, पर मैं चाहती थी कोई मुझे बाहों में भर कर भींच दे और मेरे होंठों का चुम्बन ले ले। हर लड़की और औरत को मोटे और लम्बे लंड से चुदाई की चाहत होती है।

एक बात बताऊँ ? मैं दस-एक साल की थी तब क्लास की बाकी लड़कियाँ तो सूखी सी ही थी पर मेरे नीबू निकल आये थे और नितम्ब भरे भरे से हो गए थे। और वो हरामी मास्टर मणि भाई देसाई तो बस मेरी कोई गलती ढूंढता ही रहता था और फिर मेरे नितम्बों पर इतनी जोर से चिकोटी काटा करता था कि मैं शर्म के मारे वाटर वाटर ही हो जाया करती थी।

मैंने जवानी में नया-नया पैर रखा था, मेरा दाना कूदने लगा था। अपने से बड़ी लड़कियों से मेरी दोस्ती थी। मैंने उनके साथ मिलकर कई बार कामुक फ़िल्में भी देखी थी। लगभग सभी लड़कियों का किसी न किसी लड़के के साथ चक्कर जरूर था। कईयों ने तो दो दो तीन तीन आशिक बना रखे थे। कुछ ने तो अपने चहेरे फुफेरे ममेरे भाइयों के साथ ही सम्बन्ध बना लिए थे। बस मैं ही मन मसोस कर रह जाती थी। मैं भी सेक्स करना चाहती थी पर ना तो कोई उपयुक्त साथी मिला और ना ही अवसर। दरअसल इसका एक कारण था। मेरे पापा बड़े दबंग किस्म के आदमी थे और मोहल्ले वाले सभी उनसे डरते थे। किसी की क्या मजाल कि मुझे आँख उठा कर देखे या हाथ लगाए। एक बार जब मैं तेरह साल की थी तो एक लड़के ने मेरे चीकुओं को भींच दिया था तो पापा ने उस लड़के की इतनी धुनाई की थी कि उन्हें हमारा मोहल्ला ही छोड़ कर जाना पड़ा था।

चूत में अंगुली करते करते और मोटे लंड की कामना में मैं कब 18 की हो गई पता ही नहीं चला। कहते हैं पहला प्यार और पहली चुदाई इंसान कभी नहीं भूलता। मैं भला उस चुदाई को कैसे भूल सकती हूँ जिसके बाद मेरी कमसिन छमक छल्लो पूरी तरह खिल कर जैसे कमल का फूल ही बन गई थी।

मैंने पहली बार लंड का स्वाद 19 वें साल में चखा था। आप सभी अपने हथियार पकड़ कर रखना क्यूंकि यह कथा पढ़कर आप सब लोगों के खड़े लंड से पानी जरुर निकल जाएगा। और हाँ मेरी सहेलियों आप अपनी कच्छी नीचे करके अपनी छमक छल्लो में अंगुली या बैंगन जरूर करती रहना इससे कहानी पढ़ने का मज़ा दुगना हो जाएगा।

बात इस तरह हुई कि मैं फ़िरोज़पुर अपने मामा के घर गई थी। मामा रेलवे में अधिकारी हैं सो अकसर बाहर रहते हैं। मामा के परिवार में मामा मामी के अलावा सिर्फ उनका एक बेटा निखिल ही था। निखिल की उम्र उस समय 20 के आस पास रही होगी। मैंने बहुत दिनों के बाद उसे देखा था। मैं तो उसे देखती ही रह गई। वो तो पूरा सजीला जवान बन गया था। उसका बदन बहुत गठीला हो गया था और इतना खूबसूरत लग रहा था कि कोई भी लड़की उस कामदेव पर मर ही मिटे। हालांकि वो मेरा ममेरा भाई था पर भाई बहन का रिश्ता अपनी जगह है और जवानी का रिश्ता अपनी जगह है … जब लण्ड और चूत एक ही कमरे में मौजूद हैं तो संगम होगा कि नहीं ? तुम्हीं सोचो ? मेरा मन उस से चुदवा लेने को करने लगा।

वह भी मेरी फिगर और कमर की लचक के साथ नितम्बों की थिरकन पर मर ही मिटा था। कहते हैं यौनाकर्षण दुनिया की सबसे ताक़तवर शक्ति होती है। इसे हराना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होता है। तन के मिलन की चाह बडी नैसर्गिक है। सुन्दर स्त्री की देह से बढ़कर भ्रमित करने वाला कोई और पदार्थ इस संसार में नहीं है।

और वो भी तो बस मेरे पास बने रहने का कोई ना कोई बहाना ही ढूंढता रहता था। जिस अंदाज़ में वो मेरे वक्ष और नितम्बों को घूरता था, मुझे पक्का यकीन हो गया था कि उसके मन भी वही सब चल रहा है जो मेरे मन में है। जब हम अकेले होते तो मैं कई बार उसके सामने थोड़ा झुक जाया करती थी और फिर उसकी आँखें तो मेरे गोल गोल नागपुरी संतरों जैसे उरोजों और उनकी गहरी घाटी पर से हटने का नाम ही नहीं लेती थी। (मैंने उन दिनों जान बूझकर ब्रा और पेंटी पहनना छोड़ दिया था बस कुरते के नीचे समीज पहना करती थी ) कभी कभी मैं टॉप और कैप्री पहन लेती थी तो उसमें से झांकती मेरी पुष्ट जांघें और उस अनमोल खजाने को देखकर तो वो बावला ही हो जाया करता था। मेरी कामुक कमर की लचक और मेरा पिछवाड़ा देखकर तो उसके सीने में हाहाकार ही मच जाती होगी।

वैसे तो उनका घर ज्यादा बड़ा नहीं था, दो कमरे और हाल था। मामा मामी एक कमरे में सोते थे और मैं निखिल वाले कमरे में। निखिल हाल में पड़े दीवान पर सो जाया करता था। उस रात मामा चार-पांच दिन बाद आये थे और वो दोनों जल्दी ही अपने कमरे में सोने चले गए। अब आपको यह बताने की जरुरत नहीं है कि वो कमरे में क्या कर रहे होंगे।

मैं और निखिल दोनों टीवी देख रहे थे। रात के लगभग 11.30 बज गए थे। निखिल ने चाय पीने का पूछा तो मैंने कह दिया मुझे कोई चाय साय नहीं पीनी !

ओह … यह निखिल भी एक नंबर का लोल ही है …. सामने पूरी दूध की डेयरी है और यह चाय के चक्कर में पड़ा है?

मेरे मन में तो आया कह दूं- छोड़ो चाय-साय ! कभी दूध-सूध भी पी लिया करो।

टीवी पर कोई सेक्सी फिल्म चल रही थी। मेरी छमक छल्लो चुलबुलाने लगी थी और मैं उसे ऊपर से ही सहला और दबा रही थी। यही हाल निखिल का था। उसका पजामा तो टेंट ही बना था। वो भी अपने पप्पू को दबा और मसल रहा था। मेरा अनुमान था कि उसका मस्त कलंदर कम से कम 7-8 इंच का तो जरूर होगा।

थोड़ी देर बाद मैंने उठते हुए एक मादक सी अंगडाई ली और निखिल से कहा- मैं सोने जा रही हूँ !

तो वो बोला,”प्लीज, थोड़ी देर रुको ना कितनी मस्त फिल्म चल रही है !”

“अरे क्या खाख मस्त है ? देखो ना पिछले आधे घंटे में बस दो बार किस किया है… हुंह… बकवास फिल्म है.. मुझे नहीं देखनी मैं सोने जा रही हूँ !” मैंने बुरा सा मुँह बनाया और कमर पर हाथ रख कर वहीं खड़ी रही, गई नहीं।

“ओह.. तो क्या तुम्हें किस पसंद नहीं है ?”

“नहीं… ऐसी बात नहीं है पर … पर…”

“पर क्या ?”

“ओह.. छोड़ो ..!”

“नीरू … प्लीज बताओ ना ?”

निखिल ने मेरा हाथ पकड़ लिया और मुझे नीचे बैठाने लगा। मैं तो कब की ऐसे अवसर की तलाश में थी। मैंने इस तरह अपना हाथ छुडाने की कोशिश की कि मैं उसकी गोद में गिर पड़ी। उसका मस्त कलंदर तो मेरे मोटे मोटे नितम्बों के बीच ठीक फूल कुमारी के छेद से लग गया। मेरी छमक छल्लो के अन्दर सरसराहट सी होने लगी। मेरा सारा शरीर झनझना उठा, पहली बार दिल में एक इच्छा जागी कि उसके लंड के ऊपर ही सारी उम्र बैठी रहूँ कभी ना उठूँ। मेरा दिल तो जैसे गार्डन-गार्डन ही हो गया था।

मैं भोली बनती हुई जोर से चिल्लाई “ऊईइ… मम्मी…”

“क्या हुआ ?”

“ओह ! कुछ चुभ रहा है !”

“कहाँ ?”

“ओह्ह… नीचे ! पता नहीं इतना नुकीला और मोटा सा क्या है ?”

“अरे.. वो… ओह… कुछ नहीं…है… प्लीज बैठो ना थोड़ी देर !”

उसकी आँखों में लाल डोरे तैरने लगे थे। उसकी साँसें तेज हो रही थी और नीचे उसका 7 इंच का लंड उछल कूद मचा रहा था।

मैं सब जानती थी पर भोली बनते हुए मैंने कहा,”निखिल अगर मुझे गोद में बैठाना है तो पहले इस चुभती हुई चीज को हटा दो प्लीज !”

“ओह… नीरू … प्लीज तुम खुद ही हटा दो ना !”

मैं झट से खड़ी हो गई और उसके इलास्टिक वाले पजामा खींच कर नीचे कर दिया। उसने चड्डी तो पहनी ही नहीं थी। मेरी आँखों के सामने 7 इंच का काला लंड फुंक्कारें मार रहा था।

“हाई राम… इतना बड़ा…..?” सहसा मेरे मुँह से निकल गया।

उसका 7 इंच का लंड किसी मस्त सांड की तरह झूम रहा था मेरी तो आँखें ही फटी रह गई। वो तो ऐसे झटके मार रहा था जैसे ऊपर छत को फाड़ कर निकल जाएगा। मैंने सकुचाते हुए उसे अपने हाथ में पकड़ लिया। मैं तो उसे छू कर जैसे मदहोश ही हो गई थी। निखिल के मुँह से एक मीठी सीत्कार निकल गई और उसके लंड ने जोर से एक ठुमका लगाया। उसके टोपे पर प्रीकम की बूँदें ऐसे चमक रही थी जैसे कोई छोटा सा सफ़ेद मोती हो। वो तो इतना प्यारा लग रहा था कि मेरा मन उसे मुँह में लेने को करने लगा।

“ओह… नीरू कमरे में चलें क्या ?”

“ओह.. हाँ” मैं अपने ख्यालों से जागी।

निखिल ने टीवी और लाईट बंद कर दी और अपनी बाहें मेरी और फैला दी। मैं दौड़ कर उसके गले से लिपट गई और उछल कर उसकी गोद में चढ़ गई। मैंने अपनी दोनों टांगें उसकी कमर के चारों और लपेट ली। उसका तना हुआ लंड मेरी नितम्बों के बीच की दरार में लगा था। इस ख्याल से ही मेरी छमक छल्लो ने पानी छोड़ दिया। निखिल ने अपनी मुंडी थोड़ी सी नीचे झुका दी तो मैंने अपने होंठ उसके होंठों से लगा दिए।

आह… जैसे ही उसने मेरे गुलाबी होंठों को चूसना चालू किया। उसके लंड ने नीचे घमासान ही मचा दिया और मेरी छमक छल्लो ने भी दनादन आंसू बहाने चालू कर दिए।

वो मुझे गोद में उठाये ही कमरे में आ गया।

अन्दर जीरो वाट का बल्ब जल रहा था।