बदनाम रिश्ते

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rajaarkey
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बदनाम रिश्ते

Unread post by rajaarkey » 02 Nov 2014 09:42


चेतावनी ........... ये कहानी समाज के नियमो के खिलाफ है क्योंकि हमारा समाज मा बेटे और भाई बहन और बाप बेटी के रिश्ते को सबसे पवित्र रिश्ता मानता है अतः जिन भाइयो को इन रिश्तो की कहानियाँ पढ़ने से अरुचि होती हो वह ये कहानी ना पढ़े क्योंकि ये कहानी एक पारवारिक सेक्स की कहानी है





बदनाम रिश्ते




दोस्तों मैं यानि आपका दोस्त राज शर्मा बदनाम रिश्ते में एक और नई कहानी लेकर हाजिर हूँ
मैं उत्तर भारत में एक जमींदार परिवार का हूं. हमारी बहुत बड़ी खेती है. हमारे परिवार में सभी मर्द और औरतें अच्छे ऊंचे पूरे हैं. हमारे परिवार में मेरी मां, मामाजी, मैं और मेरी छोटी बहन प्रीति है. पिताजी बचपन में ही गुजर गये थे, तब से हम लोग मामाजी के साथ रहते हैं. मामाजी भी अकेले हैं, शादी नहीं की.

घर के काम के अलावा मेरी मां खेतों में भी काम करती है इसलिये उसका शरीर बड़ा तंदुरुस्त और गठा हुआ है. उसका अच्छा कसा हुआ पेट है, लंबी लंबी मजबूत टांगें हैं और बड़े बड़े चौड़े कूल्हे हैं. मम्मे तो अच्छे भरावदार और मोटे हैं.

जब मैंने अम्मा के सजीले बदन को एक मर्द की निगाह से देखना शुरू किया तब मैं उन्नीस बरस का था. अपनी मां को मैं बहुत प्यार करता था और उसके रूप को अपनी जांघों और बांहों में भर लेना चाहता था. हमारा घर खेतों के बीच था और चारों ओर ऊंची दीवालें थीं जिससे कोई अंदर ना देख सके. इसलिये मां और प्रीति गरमी के मौसम में ज्यादा कपड़े पहने बिना ही घूमतीं थीं. बारीक कपड़े पहनकर दोनों बिना ब्रेसियर या जांघिये के ही रहती थीं.

मेरी अम्मा का शरीर काफ़ी मांसल और भरा पूरा है और वह बड़ी टाइट और बारीक कपड़े की सलवार कमीज़ पहनती है. जब मां गरमी में रसोई में बैठ कर खाना बनाती थी, तब मुझे मां के सामने बैठ कर उसकी ओर देखना बहुत अच्छा लगता था. अम्मा बिलकुल पतले टाइट पारदर्शक कपड़ों में चूल्हे के सामने बैठ जाती थी. गरमी से उसे जल्द ही खूब पसीना छूटने लगता था. मां की बड़ी बड़ी चूंचियां उसकी लो कट की कमीज के ऊपर उभर आतीं थीं. पसीने से भीगी कमीज में से उसके मांसल स्तन साफ़ दिखने लगते थे.

मैं नजर गड़ा कर पसीने की बहती धारों को देखता था जो उसके गले से चूंचियों के बीच की गहरी खाई में बहने लगती थीं. अब तक पसीने से गीले बारीक कपड़े में से उसके उभरे हुए निपल भी दिखने लगते थे और मां के मतवाले उरोजों का पूरा दर्शन मुझे होने लगता था. पहले अम्मा मुझे इस गरमी में बैठने के लिये डांटती थी पर मैं उसे प्यार से कहता. "मम्मी जब आप इतनी गर्मी में बैठ सकती हैं हमारे लिये, तो मैं भी आपकी गर्मी में पूरा साथ दूंगा".

मां इस बात पर मुस्कराकर बोलती "बेटा मैं तो गरम हो ही गई हूं, मेरे साथ तू भी गरम हो जायेगा". अब असली नाटक शुरू होता था. मां मेरी ओर बड़े प्यार से देखते हुए कहती "देख कितना पसीना आ गया है" और अपनी कमीज का किनारा उठाकर मुझे वह अपना पसीने से तरबतर थोड़ा फ़ूला हुआ नरम नरम पेट दिखाती.

वह एक पटे पर पिशाब करने के अंदाज़ में अपनी जांघें खोल कर बैठती और फ़टाफ़ट चपाती बनाती जाती. मैं सीधा उसके सामने बैठ कर उसकी जांघों के बाच टक लगा कर देखता था. मेरी नजर खुद पर देख कर अम्मा अपना हाथ पीछे चूतड़ पर रखकर अपनी सलवार खींचती जिससे टाइट होकर वह सलवार उसकी मस्त फ़ूली फ़ुद्दी पर सट कर चिपक जाती.

अम्मा की फ़ुद्दी कमेशा साफ़ रहती थी और झांटें न होने से सलवार उस चिकनी बुर पर ऐसी चिपकती थी कि फ़ुद्दी के बीच की गहरी लकीर साफ़ दिखती थी. उसके पेट से बह के पसीना जब फ़ुद्दी पर का कपड़ा गीला करता तो उस पारदर्शक कपड़े में से मुझे मां की बुर साफ़ दिखती. उसका खड़ा बाहर निकला क्लिटोरिस भी मुझे साफ़ दिखता और मैं नजर जमा कर सिर्फ़ वहीं देखता रहता.

अब तक मां की चूत में से चिपचिपा पानी निकलने लगता था और वह उत्तेजित हो जाती थी. बुर की महक से मेरा सिर घूमने लगता. हम दुहरे अर्थ की बातें करने लगते थे. मम्मी मेरी प्लेट पर एक चपाती रख कर पूछतीं "बेटा तेल लगा के दूं?". मैं कहता "मम्मी बिना तेल की ही ले लूंगा, तू दे तो". रात को यह बातें याद करके मैं बिस्तर में बैठ कर अपना लंड हाथ में लेकर मां के बारे में सोचता और उसकी चूत चोदने की कल्पना करते हुए मुठ्ठ मारता.

अब मैं असली बात बताता हूं कि हमारा आपस का कामकर्म कैसे शुरू हुआ. मामाजी बीज खरीदने को बाहर गये थे, करीब एक हफ़्ते के लिये. वैसे पहले भी मामाजी ऐसे जाते थे पर इस बार पहली बार मैंने गौर किया कि एक दो दिन में ही मां छटपटाने सी लगी. गायें जैसी गरम हो कर करती हैं बस वैसा ही बर्ताव मां का हो गया. एक छोटे खेत की जुताई बची थी. सुबह मैंने मां से कहा "मम्मी मैं वह छोटा खेत जोत के आता हूं". मां बोली "बेटा, अभी तो बहुत गर्मी होती है, वहां कोई भी तो नहीं आता है, आज कल तो कोई भी खेतों में नहीं जाता है, पूरा वीराना होगा."

मैंने उसके बोलने की तरफ़ ध्यान नहीं दिया और ट्रैक्टर तैयार करने लगा. जब मैं निकलने ही वाला था तो अम्मा ने पीछे से कहा "बेटा मैं दोपहर का खाना ले के आऊंगी". मैं बोला "ठीक है मम्मी पर देर मत करना". मैं फ़िर खेतों पर निकल गया.

rajaarkey
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Re: बदनाम रिश्ते

Unread post by rajaarkey » 02 Nov 2014 09:42


हमारे खेत बहुत बड़े हैं और उस दिन काफ़ी गर्मी थी. कोई भी वहां नहीं था. मैं जहां काम कर रहा था वहां चारों बाजू बाजरे की ऊंची फ़सल थी. मैंने काफ़ी देर काम किया और फ़िर बैठ कर सुस्ताने लगा. घड़ी में देखा तो दोपहर हो गयी थी. मुझे सहसा याद आया कि मां दोपहर का खाना लेकर आ रही होगी. मां का खयाल आते ही मेरा लंड खड़ा होने लगा और रोंगटे खड़े हो गये. मैंने मस्ती से मचल कर धीरे से कहा "मां तेरी चूत."

अपने मुंह से यह शब्द सुन कर मुझे इतना रोमांच हुआ कि मैंने अपना हाथ पैंट के ऊपर से ही अपने लंड पर रखा और जोर से बोला " मम्मी आज खेत में चुदवा ले अपने बेटे से." अब मैं और उत्तेजित हो उठा था और चिल्लाया "मां आज चूत ले के आ मेरे पास देख मम्मी आज तेरा बेटा हाथ में लंड ले के बैठा है". अब मैं पूरी तरह से उत्तेजित हो चुका था और ऐसे गंदे शब्द अपनी मां के लिये बोल कर अपने आप को और जम के गरम कर रहा था.

अपनी मां की चूत की कल्पना कर कर के मैं पागल हुआ जा रहा था. मेरा लंड तन्नाकर पूरी तरह से खड़ा हो गया था. सुनसान जगह का फ़ायदा लेकर मैं जोर जोर से खुद से बातें करता हुआ अपनी मां की चूत की सुंदरता का बखान करने लगा. पांच दस मिनट ही गुजरे होंगे कि मुझे दूर से अपनी मां आती दिखायी दी. उसके हाथ में खाने का डिब्बा था. मैंने ट्रैक्टर चालू किया और फ़िर काम करने लगा.

कुछ देर बाद मां मेरे पास पहुंची और ट्रैक्टर की आवाज के ऊपर चिल्लाकर मुझे उतरने को कहा. मैंने ट्रैक्टर बंद किया और उसकी ओर बढ़ा. मन में मां के प्रति उठ रहे गंदे विचारों के कारण मुझे उससे आंखें मिलाने की हिम्मत नहीं हो रही थी. मां ने खेत के बीच के पेड़ की ओर इशारा किया और हम चल कर वहां पहुंचे. वहां पहुंच कर मां बोली "बेटा तू कितना गरम हो गया है. देख कैसा पसीना आ गया है. ला मैं तेरा पसीना पोंछ दूं."

मेरे पास आ कर उसने प्यार से मेरा पसीना पोंछा. फ़िर हम खाने बैठे. मैं तो मां की तरफ़ ज्यादा नहीं देख पा रहा था पर वह नजर जमा कर मेरी ओर देख रही थी. खाने के बाद मैंने हाथ धोए और फ़िर ट्रैक्टर की ओर चला, इतने में मां पीछे से बोली. "बेटा एक ज़रूरी बात करनी है " मैं वापस आ कर उसके पास बैठ गया. मां काफ़ी परेशान दिख रही थी.

सहसा वह बोली "बेटा बाजरा बड़ा हो गया है कोई चोरी तो नहीं करता." मैं बोला "नहीं मम्मी अब कौन लेगा इसे." मम्मी बोली "नहीं कोई भी चोरी कर सकता है तू देख आस पास कोई है तो नहीं. ऐसा कर तू पेड़ पे चढ़ जा और सब तरफ़ देख़ " मैंने पेड़ पर चढ़ कर सब तरफ़ देखा और उतर के बोला "मम्मी आस पास तो कोई भी नहीं है, हम दोनों बिल्कुल अकेले हैं. दूर तक कोई नहीं दिखता"

मां ने मेरी आंखों से नजर भिड़ा कर पूछा " हम दोनों अकेले हैं क्या?" मैंने सिर हिलाकर हामी भरी तो वह बोली "तू मुझे बाजरे के खेत में ले चल" मैं खेत की सबसे घनी और ऊंची जगह की ओर चल दिया, अम्मा मेरे पीछे पीछे आ रही थी. जैसे ही हम खेत में घुसे, हम पूरी तरह से बाहर वालों की नजरों से छिप गये, अगर कोई देख भी रहा होता तो कुछ न देख पाता.

मैंने मां का हाथ पकड़ा और उसे खींच कर और गहरे ले जाने लगा. अम्मा धीरे से मेरे कान में बोली "बेटा कोई देखेगा तो नहीं हमें यहां." मैं एक जगह रुक गया और उसकी ओर मुड़ कर बोली "यहां कौन देखेगा हमें, देखना तो दूर कोई हमारी आवाज़ भी नहीं सुन सकेगा".

मैं मां की ओर देखकर बोला "मम्मी मेरे साथ गंदा काम करेगी?" फ़िर और पास जा कर बोला "मा चल गंदी गंदी बात कर ना?" मां मेरी ओर देख कर बोली "अच्छा, तू अब मुझे गन्दी औरत बनने को बोल" मैं अब उत्तेजित हो रहा था और मेरा लंड फ़िर खड़ा होने लगा था. मैंने इधर उधर देखा, हम लोग बिलकुल अकेले थे.


मैं फ़िर बोला. "मम्मी मैं आदमी वाला काम करूंगा तेरे साथ." मां मेरी ओर देख कर बोली. "हाय मेरे साथ गंदी बात कर रहा है तू." मैंने उसकी ओर देख कर कहा "चल अब अपने कपड़े उतार के नंगी हो जा." मां का चेहरा इस पर लज्जा से लाल हो गया और वह शर्माकर बोली "नहीं पहले तू अपना लंड दिखा".

मैंने अपनी ज़िप खोली और फ़िर अपनी अंडरवियर निकाली. अंदर हाथ डाल कर मैंने अपना लंबा तगड़ा लंड बाहर निकाला और अम्मा के हाथ पकड़कर उंगलियां खोल कर उनमें थमा दिया "ले मेरा लंड पकड़" मेरे ही लंड पर मेरी खुद की मां के नरम हाथों का स्पर्श मुझे पागल बना रहा था. मैंने अब धीरे धीरे अम्मा के कपड़े उतारना शुरू कर दिये. उसकी कमीज़ के दोनों छोर पकड़ कर मैंने ऊपर खींचे और उसने भी दोनों हाथों को उठाकर मुझे कमीज़ निकाल लेने दी.

अब वह मेरे सामने सिर्फ़ ब्रेसियर और सलवार में खड़ी थी. मैंने उसकी सलवार की नाड़ी खींच दी और सलवार को खींच कर उसके पैरों में नीचे उतार दिया. मां ने पैर उठा कर सलवार पूरी तरह से निकाल दी. अब मेरी मां सिर्फ़ ब्रा और पैंटी में मेरा लंड पकड़ कर मेरे सामने खड़ी थी. मैंने उसका चुंबन लेते हुए अपने हाथ उसके नंगे कंधों पर रख कर कहा "अम्मा, तुझे नंगी कर दूं? " मां कुछ न बोली पर मेरे लंड को प्यार से दबाती और सहलाती रही जो अब खड़ा होकर खूब बड़ा और मोटा हो गया था.

मैने मां को बांहों में लिया और उसकी ब्रा के हुक खोल दिये. ब्रा नीचे गिर पड़ी और मां के खूबसूरत मोटे स्तन मेरे सामने नंगे हो गये. मां ने तुरंत शरमा कर मुझे पास खींच लिया जिससे उसकी चूंचियां न दिखें. यह देखकर मैंने उसके कान में शरारत से कहा " मां, अपने बेटे को चूंची दिखाने में इतना शरमा रही है तो तू अपनी चूत कैसे खोलेगी मेरे सामने?" मम्मी अब बोली " चल अब ज्यादा बातें मत कर, मेरे साथ काम कर"

मुझे अब बड़ा मजा आ रहा था और मां की शरम कम करने को मैं उससे और गंदी गंदी बातें करने लगा. मैंने दबी आवाज में पूछा "मरवाएगी?" मां बोली "इतनी दूर से मरवाने के लिये ही तो आई हूं, बाजरे के खेत में नंगी खड़ी हूं तेरे सामने और तू पूछ रहा है कि मरवाएगी?" मैंने उसे और चिढ़ाते हुए पूछा "कच्छी उतार दूं क्या"

rajaarkey
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Re: बदनाम रिश्ते

Unread post by rajaarkey » 02 Nov 2014 09:43



मां अब तक मेरे धीरे धीरे सताने वाले बर्ताव से चिढ़ गयी थी. वह मुझे अलग कर के पीछे सरकी, एक झटके में अपनी पैंटी उतार के फ़ेक दी, अपने कपड़ों को नीचे बिछाया और उन पर लेट गयी. अपने घुटने मोड़ कर अपनी जांघें उसने फ़ैलायीं और अपनी चूत को मेरे सामने खोल कर बोली "और कुछ खोलूं क्या? अब जल्दी से अपना लंड डाल!"

मैंने अपने कपड़े उतारे और मां की टांगों के बीच घुटने टेक कर बैठ गया. मेरी मां अपनी नजरें गड़ा कर मेरे मस्त तन्नाये हुए लंड को देख रही थी. मैंने हाथ में लौड़ा लिया और धीरे से चमड़ी पीछे खींची. लाल लाल सूजे हुए सुपाड़े को देख कर मां की जांघें अपने आप और फ़ैल गयीं. हम दोनों अब असहनीय वासना के शिकार हो चुके थे.

मम्मी भर्रायी आवाज में बोली "अब देर मत कर बेटे, अपना लंड मेरे अन्दर कर दे जल्दी से". मैंने लंड पकड़ कर सुपाड़ा मां की चूत के द्वार पर रखा. फ़िर उसके घुटने पकड़ कर उसकी जांघें और फ़ैलाते हुए आंखों में आंखें डाल कर पूछा "चोद दूं तुझे?"

मां का पूरा शरीर मस्ती से कांप रहा था. उसने अपना सिर हिला कर मूक जवाब दिया ’हां’, मैंने घुटनों पर बैठे बैठे झुक कर एक धक्का दिया और लंड को उसकी बुर में घुसेड़ दिया. जैसे ही मोटा ताजा सुपाड़ा उसकी गीली बुर में घुसा, मम्मी की चूत के पपोटे पूरे तन कर चौड़े हो गये. मां सिसक कर बोली "आ बेटे मेरे ऊपर चढ़ जा." यह सुनकर लंड को वैसा ही घुसाये हुए मैं आगे झुका और अपनी कोहनियां उसकी छाती के दोनों ओर टेक दीं. फ़िर अपने दोनों हाथों में मैंने अम्मा की चूंचियां पकड़ लीं.

हम दोनों अब एक दूसरे की आंखों में आंखें डाल कर देख रहे थे. मैंने अब एक कस कर धक्का दिया और मेरा पूरा लंड मां की चूत की गहराई में समा गया. लंबी प्रतीक्षा और चाहत के बाद लंड घुसेड़ने का काम आखिर खत्म हुआ और हमारा ध्यान अब चुदाई के असली काम पर गया. मैं मां को चोदने लगा. हम दोनों वासना में डूबे हुए थे और एक दूसरे की कामपीड़ा को समझते हुए पूरे जोर से एक दूसरे को भोगने में लग गये.

मां की मतवाली चूत बुरी तरह से चू रही थी और मेरा लंड उसकी बुर के रस से पूरी तरह चिकना और चिपचिपा हो गया था. मैं पूरे जोर से धक्के मार मार कर मम्मी को चोद रहा था. अपनी मां को चोदते हुए मुझे जो सुख मिल रहा था वह अवर्णनीय है. मैंने उसके गुदाज बड़े बड़े स्तन अपने पंजों में जकड़ रखे थे और उसकी आंखों में देखते हुए लंबे लंबे झटकों के साथ उसकी चूत में अपना लंड अंदर बाहर कर रहा था.

अम्मा का चेहरा अब कामवासना से तमतमा कर लाल हो गया था और गर्मी से पसीने की बूंदें उसके होंठों पर चमकने लगी थीं. अब जैसे मैं लंड उसकी चूत में जड़ तक अंदर घुसेड़ता, वह जवाब में अपने चूतड़ उचका कर उल्टा धक्का मारती और अपनी चूत को मेरी झांटों पर दबा देती. मैंने उसकी आंखों में झांका तो उसने नजर फ़ेर ली और बुदबुदायी, "अब तू बच्चा नहीं रहा, तू तो पूरा आदमी हो गया है." मैंने पूछा "मां, तू चुद तो रही है ना अच्छी तरह?" मां कुछ न बोली, बस चूतड़ उचका उचका कर चुदाती रही.

उस दोपहर मैंने अपनी मां को अच्छा घंटे भर चोदा और चोद चोद कर उसकी चूत को ढीला कर दिया. आखिर पूरी तरह तृप्त होकर और झड़ कर जब मैं उसके बदन पर से उतरा तो मेरा झड़ा लंड पुच्च से उसकी गीली चिपचिपी बुर से निकल आया. अम्मा चुद कर जांघें फ़ैला कर अपनी अपनी चुदी बुर दिखाते हुए हांफ़ते हुए पड़ी थी.


वह धीरे से उठी और कपड़े पहनने लगी. मैंने भी उठ कर अपने कपड़े पहन लिये. हम खेतों के बाहर आ कर ट्रैक्टर तक आये और अम्मा बर्तन उठाने में लग गयी. बरतन जमाते जमाते बोली "रात को मेरे कमरे में एक बार आ जाना." मैंने पूछा "मां रात को फिर चूत मरवाएगी?" मां ने जवाब नहीं दिया, बोली "प्रीति को तो तू चोदता होगा?"

प्रीति मेरी छोटी बहन है, मुझसे एक साल छोटी है. मैंने आंखें नीची कर लीं. मम्मी बोली "ठीक से बता ना. बहन को तो बहुत लोग चोदते हैं."

मैं धीमी आवाज में बोला " नहीं मम्मी अभी तक तो नहीं"

मां मेरे पास आकर बोली "बेटे, अपनी बहन को नहीं चोदा तूने आज तक? बहन को तो सबसे पहले चोदना चाहिये, बेटे, भाई का लंड सबसे पहले बहन की चूत खोलता है. बेटे पता है? गांव में जितने भी घर हैं, सब घरों में भाई बहनों की चूत नंगी कर के उनमें लंड देते हैं." मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि मेरी मां खुद मुझे अपनी बहन को चोदने को कह रही थी.

"मुझे ही देख, तेरे मामाजी रोज चोदते हैं मुझे, दो दिन नहीं चुदी तो क्या हालत हो गयी मेरी. प्रीति को मत सता, चोद डाल एक बार" मां ने फ़िर कहा.