रद्दी वाला (रचयिता: काजल गुप्ता)

Discover endless Hindi sex story and novels. Browse hindi sex stories, adult stories ,erotic stories. Visit webvitaminufa.ru
RohitKapoor
Rookie
Posts: 39
Joined: 22 Oct 2014 17:03

रद्दी वाला (रचयिता: काजल गुप्ता)

Unread post by RohitKapoor » 29 Oct 2014 00:46

ज्वाला देवी के प्रति रंजना के मन में बड़ा अजीब सा भाव उत्पन्न हो गया था। उसकी नज़र में वो इतनी गिर गयी थी कि उसके सारे आदर्शो, पतिव्रता के ढोंग को देख देख कर उसका मन गुस्से के मारे भर उठा था। उसके सारे कार्यों में रंजना को अब वासना और बदचलनी के अलावा कुछ भी दिखायी नहीं दे रहा था। मगर अपनी मम्मी के बारे में इस तरह के विचार आते आते कभी वो सोचने लगती थी कि जिस काम की वजह से मम्मी बुरी है वही काम करवाने के लिये तो वो खुद भी अधीर है।

वास्तविकता तो ये थी कि आजकल रंजना अपने अंदर जिस आग में जल रही थी, उसकी झुलस की वो उपेक्षा कर ही नहीं सकती थी। जितना बुरा गलत काम करने वाला होता है उतना ही बुरा गलत काम करने के लिये सोचने वाला भी होता है। बस! अगर ज्वाला देवी की गलती थी तो सिर्फ़ इतनी कि असमय ही चुदाई की आग रंजना के अंदर उसने जलायी थी। अभी उस बेचारी की उम्र ऐसी कहाँ थी कि वो चुदाई करवाने के लिये प्रेरित हो अपनी चूत कच्ची ही फ़ुड़वाले। बिरजु और ज्वाला देवी की चुदाई का जो प्रभाव रंजना पर पड़ा, उसने उसके रास्ते ही मोड़ कर रख दिये थे। उस रोज़ से ही किसी मर्द से चुदने के लिये उसकी चूत फ़ड़क उठी थी। कईं बार तो चूत की सील तूड़वाने के लिये वो ऐसी ऐसी कल्पनायें करती कि उसका रोम-रोम सिहर उठता था। अब पढ़ायी लिखायी में तो उसका मन कम था और एकान्त कमरे में रह कर सिर्फ़ चुदाई के खायाल ही उसे आने लगे थे। कईं बार तो वो गरम हो कर रात में ही अपने कमरे का दरवाजा ठीक तरह बंद करके एकदम नंगी हो जाया करती और घन्टो अपने ही हाथों से अपनी चूचियों को दबाने और चूत को खुजाने से जब वो और भी गर्माँ जाती थी तो नंगी ही बिस्तर पर गिर कर तड़प उठती थी, कितनी ही देर तक अपनी हर्कतो से तंग आ कर वो बुरी तरह छटपटाती रहती और अन्त में इसी बेचैनी और दर्द को मन में लिये सो जाती थी।

*************

उन्ही दिनों रंजना की नज़र में एक लड़का कुछ ज्यादा ही चढ़ गया था। नाम था उसका मृदुल। उसी की क्लास में पढ़ता था। मृदुल देखने में बेहद सुन्दर-स्वस्थ और आकर्षक था, मुश्किल से दो वर्ष बड़ा होगा वो रंजना से, मगर देखने में दोनों हम उम्र ही लगते थे। मृदुल का व्यव्हार मन को ज्यादा ही लुभाने वाला था। न जाने क्या खासियत ले कर वो पैदा हुआ होगा कि लड़कियाँ बड़ी आसानी से उसकी ओर खींची चली आती थीं। रंजना भी मृदुल की ओर आकर्षित हुए बिना न रह सकी। मौके बेमौके उससे बात करने में वो दिलचस्पी लेने लगी। खूबसुरती और आकर्षण में यूँ तो रंजना भी किसी तरह कम न थी, इसलिये मृदुल दिलोजान से उस पर मर मिटा था। वैसे लड़कियों पर मर मिटना उसकी आदत में शामिल हो चुका था, इसी कारण रंजना से दो वर्ष बड़ा होते हुए भी वो अब तक उसी के साथ पढ़ रहा था। फेल होने को वो बच्चों का खेल मानता था।

बहुत ही जल्द रंजना और मृदुल में अच्छी दोस्ती हो गयी। अब तो कॉलेज में और कॉलेज के बाहर भी दोनों मिलने लगे। इसी क्रम के साथ दोनों की दोस्ती रंग लाती जा रही थी। उस दिन रंजना का जन्म दिन था, घर पर एक पार्टी का आयोजन किया गया, जिसमें परिचित व रिश्तेदारों के अलावा ज्यादातर संख्या ज्वाला देवी के चूत के दिवानों की थी। आज बिरजु भी बड़ा सज धज के आया था, उसे देख कर कोई नहीं कह सकता था कि वो एक रद्दी वाला है।

रंजना ने भी मृदुल को इस दावत के लिये इनविटेशन कार्ड भेजा था, इसलिये वो भी पार्टी में शामिल हुआ था। जिस तरह ज्वाला देवी अपने चूत के दिवानों को देख-देख कर खुश हो रही थी उसी तरह मृदुल को देख कर रंजना के मन में भी फ़ुलझड़ियाँ सी फूट रहीं थीं। वो आज बे-इन्तहा प्रसन्न दिखायी पड़ रही थी। पार्टी में रंजना ज्यादातर मृदुल के साथ ही रही। ज्वाला देवी अपने यारों के साथ इतनी व्यस्त थी कि रंजना चाहते हुए भी मृदुल का परिचय उससे न करा सकी। मगर पार्टी के समाप्त हो जाने पर जब सब मेहमान विदा हो गये तो रंजना ने जानबूझ कर मृदुल को रोके रखा। बाद में ज्वाला देवी से उसका परिचय कराती हुई बोली, “मम्मी ! ये मेरे खास दोस्त मृदुल हैं।”

“ओहह ! हेंडसम बॉय।” ज्वाला देवी ने साँस सी छोड़ी और मृदुल से मिल कर वो जरूरत से ज्यादा ही प्रसन्नता ज़ाहिर करने लगी। उसकी निगाहें बारबार मृदुल की चौड़ी छाती, मजबूत कन्धों, बलशाली बाँहों और मर्दाने सुर्ख चेहरे पर ही टिकी रही। रंजना को अपनी मम्मी का यह व्यव्हार और उसके हाव-भाव बड़े ही नागवार गुज़र रहे थे। मगर वो बड़े धैर्य से अपने मन को काबू में किये सब सहे जा रही थी। जबकि ज्वाला देवी पर उसे बेहद गुस्सा आ रहा था। उसे यूँ लग रहा था जैसे वो मृदुल को उससे छीनने की कोशिश कर रही है। मृदुल से बातें करने के बीच ज्वाला देवी ने रंजना की तरफ़ देख कर बदमाश औरत की तरह नैन चलाते हुए कहा, “वाह रंजना ! कुछ भी हो, मृदुल... अच्छी चीज़ ढूँढी है तुमने, दोस्त हो तो मृदुल जैसा।” अपनी बात कह कर कुछ ऐसी बेशर्मी से मुस्कराते हुए वो रंजना की तरफ़ देखने लगी कि बेचारी रंजना उसकी निगाहों का सामना न कर सकी और शर्मा कर उसने अपनी गर्दन झुका ली। ज्वाला देवी ने मृदुल को छाती से लगा कर प्यार किया और बोली, “बेटा ! इसे अपना ही घर समझ कर आते रहा करो, तुम्हारे बहाने रंजना का दिल भी बहल जाया करेगा, ये बेचारी बड़ी अकेली सी रहती है।”

“यस आन्टी ! मैं फिर आऊँगा।” मृदुल ने मुसकुरा कर उसकी बात का जवाब दिया और उसने जाने की इजाज़त माँगी, रंजना एक पल भी उसे अपने से अलग होने देना नहीं चाहती थी, मगर मजबूर थी। मृदुल को छोड़ने के लिये वो बाहर में गेट तक आयी। विदा होने से पहले दोनों ने हाथ मिलाया तो रंजना ने मृदुल का हाथ ज़ोर से दबा दिया, इस पर मृदुल रहस्य से उसकी तरफ़ मुसकुराता हुआ वहाँ से चला गया।

अब आलम ये था कि दोनों ही अक्सर कभी रेस्तोराँ में तो कभी पार्क में या सिनेमा हाल में एक साथ होते थे। पापा सुदर्शन की गैरमौजूदगी का रंजना पूरा-पूरा लाभ उठा रही थी। इतना सब कुछ होते हुए भी मृदुल का लंड चूत में घुसवाने का सौभाग्य उसे अभी तक प्राप्त न हो पाया था। हाँ, चूमा चाटी तक नौबत अवश्य जा पहुंची थी। रोज़ाना ही एक चक्कर रंजना के घर का लगाना मृदुल का परम कर्तव्य बन चुका था। सुदर्शन जी की खबर आयी कि वे अभी कुछ दिन और मेरठ में रहेंगे। इस खबर को सुन कर माँ बेटी दोनों का मानो खून बढ़ गया हो।

रंजना रोजाना कॉलेज में मृदुल से घर आने का आग्रह बार-बार करती थी। जाने क्या सोच कर ज्वाला देवी के सामने आने से मृदुल कतराया करता था। वैसे रंजना भी नहीं चाहती थी कि मम्मी के सामने वो मृदुल को बुलाये। इसलिये अब ज्यादातर चोरी-चोरी ही मृदुल ने उसके घर जाना शुरु कर दिया था। वो घन्टों रंजना के कमरे में बैठा रहता और ज्वाला देवी को ज़रा भी मालूम नहीं होने पाता था। फिर वो उसी तरह से चोरी-चोरी वापस भी लौट जाया करता था। इस प्रकार रंजना उसे बुला कर मन ही मन बहुत खुश होती थी। उसे लगता मानो कोई बहुत बड़ी सफ़लता उसने प्राप्त कर ली हो।

चुदाई संबंधों के प्रति तरह-तरह की बातें जानने की इच्छा रंजना के मन में जन्म ले चुकी थी, इसलिये उन्ही दिनों में कितनी चोदन विषय पर आधारित पुस्तकें ज्वाला देवी के कमरे से चोरी-चोरी निकाल कर वो काफ़ी अध्य्यन कर रही थी। इस तरह जो कुछ उस रोज़ ज्वाला देवी व बिरजु के बीच उसने देखा था इन चोदन समबन्धी पुस्तकों को पढ़ने के बाद सारी बातों का अर्थ एक-एक करके उसकी समझ में आ गया था। और इसी के साथ साथ चुदाई की ज्वाला भी प्रचण्ड रूप से उसके अंदर बढ़ उठी थी।

फिर सुदर्शनजी मेरठ से वापिस आ गये और माँ का बिरजु से मिलना और बेटी का मृदुल से मिलना कम हो गया। फिर दो महीने बाद रंजना के छोटे मामा की शादी आ गयी और उसी समय रंजना के फायनल एग्जाम भी आ गये। ज्वाला देवी शादी पर अपने मायके चली गयी और रंजना पढ़ाई में लग गई। उधर शादी सम्पन्न हो गई और इधर रंजना की परीक्षा भी समाप्त हो गई, पर ज्वाला देवी ने खबर भेज दी कि वह १५ दिन बाद आयेगी। सुदर्शनजी ऑफिस से शाम को कुछ जल्द आ जाते। ज्वाला के नहीं होने से वे प्रायः रोज ही शाज़िया की मारके आते इसलिये थके हारे होते और प्रायः जल्द ही अपने कमरे में चले जाते। रंजना और बेचैन रहने लगी और एक दिन जब पापा अपने कमरे में चले गये तो रंजना के वहशीपन और चुदाई नशे की हद हो गयी। हुआ यूँ कि उस रोज़ दिल के बहकावे में आ कर उसने चुरा कर थोड़ी सी शराब भी पी ली थी। शराब का पीना था कि चुदाई की इच्छा का कुछ ऐसा रंग उसके सिर पर चढ़ा कि वो बेहाल हो उठी। दिल की बेचैनी और चूत की खाज से घबड़ा कर वो अपने बिस्तर पर जा गिरी और बर्दाश्त से बाहर चुदाई की इच्छा और नशे की अधिकता के कारण वो बेचैनी से बिस्तर पर अपने हाथ पैर फेंकने लगी और अपने सिर को ज़ोर-ज़ोर से इधर उधर झटकने लगी। कमरे का दरवाजा खुला हुआ था, दरवाजे पर एकमात्र परदा टंगा हुआ था। रंजना को ज़रा भी पता न चला कि कब उसके पापा उसके कमरे में आ गये।

वे चुपचाप उसके बिस्तर तक आये और रंजना को पता चलने से पहले ही वे झुके और रंजना के चेहरे पर हाथ फेरने लगे फिर एकदम से उसे उठा कर अपनी बाँहों में भींच लिया। इस भयानक हमले से रंजना बुरी तरह से चौंक उठी, मगर अभी हाथ हिलाने ही वाली थी कि सुदर्शन ने उसे और ज्यादा ताकत लगा कर जकड़ लिया। अपने पापा की बाँहों में कसी होने का आभास होते ही रंजना एकदम घबड़ा उठी, पर नशे की अधिकता के कारण पापा का यह स्पर्श उसे सुहाना लगा। तभी सुदर्शनजी ने उससे प्यार से पुछा, “क्यों रंजना बेटा तबियत तो ठीक है न। मैं ऐसे ही इधर आया तो तुम्हें बिस्तर पर छटपटाते हुए देखा… और यह क्या तुम्हारे मुँह से कैसी गन्ध आ रही है।” रंजना कुछ नहीं बोल सकी और उसने गर्दन नीचे कर ली। सुदर्शनजी कई देर बेटी के सर पर प्यार से हाथ फेरते रहे और फिर बोले, “मैं समझता हूँ कि तुम्हें मम्मी की याद आ रही है। अब तो हमारी बेटी पूरी जवान हो गई है। तुम अकेली बोर हो रही हो। चलो मेरे कमरे में।” रंजना मन्त्र मुग्ध सी पापा के साथ पापा के कमरे में चल पड़ी। कमरे में टेबल पर शराब की बोतलें पड़ी थीं, आईस बॉक्स था और एक तश्तरी में कुछ काजू पड़े थे। पापा सोफ़े पर बैठे और रंजना भी पापा के साथ सोफ़े पर बैठ गई। सुदर्शनजी ने एक पेग बनाया और शराब की चुसकियाँ लेने लगे। इस दौरान दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई। तभी सुदर्शन ने मौन भंग किया।

“लो रंजना थोड़ी पी लो तो तुम्हें ठीक लगेगा तुम तो लेती ही हो।” अब धीरे धीरे रंजना को स्थिती का आभास हुआ तो वह बोली, “पापा आप यह क्या कह रहे हैं?” तभी सुदर्शन ने रंजना के भरे सुर्ख कपोलों (गालों) पर हाथ फेरना शुरु किया और बोले, “लो बेटी थोड़ी लो शर्माओ मत। मुझे तो पता ही नहीं चला कि हमारी बेटी इतनी जवान हो गई है। अब तो तुम्हारी परीक्षा भी खतम हो गई है और मम्मी भी १५ दिन बाद आयेगी। अब जब तक मैं घर में रहूँगा तुम्हें अकेले बोर होने नहीं दूँगा।” यह कहते हुए सुदर्शन ने अपना गिलास रंजना के होंठों के पास किया। रंजना नशे में थी और उसी हालत में उसने एक घूँट शराब का भर लिया। सुदर्शन ने एक के बाद एक तीन पेग बनाये और रंजना ने भी २-३ घूँट लिये।

रंजना एक तो पहले ही नशे में थी और शराब की इन २-३ और घूँटों की वजह से वह कल्पना के आकाश में उड़ने लगी। अब सुदर्शनजी उसे बाँहों में ले हल्के-हल्के भींच रहे थे। सुदर्शन को शाज़िया जैसी जवान चूत का चस्का तो पहले ही लगा हुआ था, पर १९ साल की इस मस्त अनछुई कली के सामने शाज़िया भी कुछ नहीं थी। इन दिनों रंजना के बारे में उनके मन में बूरे ख्याल पनपने लगे थे पर इसे कोरी काम कल्पना समझ वे मन से झटक देते थे। पर आज उन्हें अपनी यह कल्पना साकार होती लगी और इस अनायास मिले अवसर को वे हाथ से गँवाना नहीं चाहते थे। रंजना शराब के नशे में और पिछ्ले दिनों मृदुल के साथ चुदाई की कल्पनाओं से पूरी मस्त हो उठी और उसने भी अपनी बाँहें उठा कर पापा की गर्दन में डाल दी और पापा के आगोश में समा अपनी कुँवारी चूचियाँ उनकी चौड़ी छाती पर रगड़नी शुरु कर दीं। रंजना का इतना करना था कि सुदर्शन खुल कर उसके शरीर का जायका लूटने पर उतर आया। अब दोनों ही काम की ज्वाला में फुँके हुए जोश में भर कर अपनी पूरी ताकत से एक दूसरे को दबाने और भींचने लगे।

तभी सुदर्शन ने सहारा देकर रंजना को अपनी गोद में बिठा लिया। रंजना एक बार तो कसमसाई और पापा की आँखों की तरफ़ देखी। तब सुदर्शन ने कहा। “आह! इस प्यारी बेटी को बचपन में इतना गोद में खिलाया है। पर इन दिनों में मैने तुम्हारी ओर ध्यान ही नहीं दिया। सॉरी, और तुम देखते-देखते इतनी जवान हो गई हो। आज प्यारी बेटी को गोद में बिठा खूब प्यार करेंगे और सारी कसर निकाल देंगे।”

सुदर्शन ने बहुत ही काम लोलुप नज़रों से रंजना की छातियों की तरफ़ देखाते हुए कहा। परन्तु मस्ती और नशे में होते हुए भी रंजना इस ओर से लापरवाह नहीं रह सकी कि कमरे का दरवाजा खुला था। वह एकाएक पापा की गोद से उठी और फ़टाफ़ट उसने कमरे का दरवाजा बंद किया। दरवाजा बंद करके जैसे ही लौटी तो सुदर्शन सम्भल कर खड़ा हो चुका था और वासना की भूख उसकी आँखों में झलकने लगी। वो समझ गया कि बेटी चुदने के लिये खुब ब खुद तैयार है तो अब देर किस बात की।

पापा ने खड़े-खड़े ही रंजना को पकड़ लिया और बुरी तरह बाँहों में भींच कर वे पागलो की तरह ज़ोर- ज़ोर से उसके गालों पर कस कर चुम्मी काटने लगे। गालों को उन्होने चूस-चूस कर एक मिनट में ही कशमीरी सेब की तरह सुरंग बना कर रख दिया। मस्ती से रंजना की भी यही हालत थी, मगर फिर भी उसने गाल चुसवात- चुसवाते सिसक कर कहा, “हाय छोड़ो न पापा आप यह कैसा प्यार कर रहे हैं। अब मैं जाती हूँ अपने कमरे में सोने के लिये।” पर काम लोलुप सुदर्शन ने उसकी एक न सुनी और पहले से भी ज्यादा जोश में आ कर उसने गाल मुँह में भर कर उन्हे पीना शुरु कर दिया। “ऊँऊँऊँऊँ हूँ… अब नहीं जाने दूँगा। मेरे से मेरी जवान बेटी की तड़प और नहीं देखी जाती। मैने तुम्हें अपने कमरे में तड़पते मचलते देखा। जानती हो यह तुम्हारी जवानी की तड़प है। तुम्हें प्यार चाहिये और वह प्यार अब मैं तुझे दूँगा।” मजबूरन वो ढीली पड़ गयी। बस उसका ढीला पड़ना था कि हद ही कर दी सुदर्शन ने।

वहीं ज़मीन पर उसने रंजना को गिरा कर चित्त लिटा लिया और झपट कर उसके उपर चढ़ बैठा। इसी खीँचातानी में रंजना का स्कर्ट जाँघों तक खिसक गया और उसकी गोरी-गोरी तन्दुरुस्त जाँघें साफ़ दिखायी देने लगी। बेटी की इतनी लंड मार आकर्शक जाँघों को देखते ही सुदर्शन बदवास और खुँख्वार पागल हो उठा। सारे धैर्य की माँ चोद कर उसने रख दी, एक मिनट भी चूत के दर्शन किये बगैर रहना उसे मुश्किल हो गया था। अगले पल ही झटके से उसने रंजना का स्कर्ट खींच कर फ़ौरन ही उपर सरका दिया। उसका विचार था कि स्कर्ट के उपर खींचे जाते ही रंजना की कुँवारी चूत के दर्शन उसे हो जायेंगे और वो जल्दी ही उसमें डुबकी लगा कर जीभर कर उसमें स्नान करने का आनंद लूट सकेगा, मगर उसकी ये मनोकामना पूरी न हो सकी, क्योंकि रंजना स्कर्ट के नीचे कतई नंगी नहीं थी बल्कि उसके नीचे पैन्टी पहने हुये थी। चूत को पैन्टी से ढके देख कर पापा को बड़ी निराशा हुई। रंजना को भी यदि यह पता होता कि पापा उसके साथ आज ऐसा करेंगे तो शायद वह पैन्टी ही नहीं पहनती। रंजना सकपकाती हुई पापा की तरफ़ देख रही थी कि सुदर्शन शीघ्रता से एकदम उसे छोड़ कर सीधा बैठ गया। एक निगाह रंजना की जाँघों पर डाल कर वो खड़ा हो गया और रंजना के देखते देखते उसने जल्दी से अपनी पैन्ट और कमीज़ उतार दी। इसके बाद उसने बनियान और अन्डरवेयर भी उतार डाला और एकदम मादरजात नंगा हो कर खड़ा लंड रंजना को दिखाने लगा। अनुभवी सुदर्शन को इस बात का अच्छी तरह से पता था कि चुदने के लिये तैयार लड़की मस्त खड़े लंड को अपनी नज़रों के सामने देख सारे हथियार डाल देगी।

इस हालत में पापा को देख कर बेचारी रंजना उनसे निगाहे मिलाने और सीधी निगाहों से लंड के दर्शन करने का साहस तक न कर पा रही थी बल्कि शर्म के मारे उसकी हालत अजीब किस्म की हो चली थी। मगर न जाने नग्न लंड में कशिश ही ऐसी थी कि अधमुँदी पलकों से वो बारबार लंड की ही ओर देखती जा रही थी। उसके सगे बाप का लंड एक दम सीधा तना हुआ बड़ा ही सख्त होता जा रहा था। रंजना ने वैसे तो बिरजु के लंड से इस लंड को न तो लंबा ही अनुभव किया और न मोटा ही मगर अपनी चूत के छेद की चौड़ाई को देखते हुए उसे लगा कि पापा का लंड भी कुछ कम नहीं है और उसकी चूत को फाड़ के रख देगा। नंगे बदन और जाँघों के बीच तनतनाते सुर्ख लंड को देख कर रंजना की चुदाई की इच्छा और भी भयंकर रूप धारण करती जा रही थी। जिस लंड की कल्पना में उसने पिछले कई महीने गुजारे थे वह साक्षात उसकी आँखों के सामने था चाहे अपने पापा का ही क्यों न हो।

तभी सुदर्शन जमीन पर चित लेटी बेटी के बगल में बैठ गया। वह बेटी की चिकनी जाँघों पर हाथ फेरने लगा। उसने बेटी को खड़ा लंड तो नंगा होके दिखा ही दिया अब वह उससे कामुक बातें यह सोच कर करने लगा कि इससे छोकरी की झिझक दूर होगी। फिर एक शर्माती नई कली से इस तरह के वासना भरे खेल खेलने का वह पूरा मजा लेना चाहता था। “वाह रंजना! इन वर्षों में क्या मस्त माल हो गई हो। रोज मेरी नज़रों के सामने रहती थी पर देखो इस ओर मेरा ध्यान ही नहीं गया। वाह क्या मस्त चिकनी चिकनी जाँघें हैं। हाय इन पर हाथ फेरने में क्या मजा है। भई तुम तो पूरी जवान हो गई हो और तुम्हें प्यार करके तो बड़ा मजा आयेगा। हम तो आज तुम्हें जी भर के प्यार करेंगें और पूरा देखेंगें कि बेटी कितनी जवान हो गई है!” फिर सुदर्शन ने रंजना को बैठा दिया और शर्ट खोल दिया। शर्ट के खुलते ही रंजना की ब्रा में कैद सख्त चूचियाँ सिर उठाये वासना में भरे पापा को निमंत्रण देने लगीं। सुदर्शन ने फौरन उन पर हाथ रख दिया और उन्हें ब्रा पर से ही दबाने लगा। “वाह रंजना तुमने तो इतनी बड़ी -बड़ी कर लीं। तुम्हारी चिकनी जाँघों की ही तरह तुम्हारी चूचियाँ भी पूरी मस्त हैं। भई हम तो आज इनसे जी भर के खेलेंगे, इन्हें चूसेंगे!” यह कह कर सुदर्शन ने रंजना की ब्रा उतार दी। ब्रा के उतरते ही रंजना की चूचियाँ फुदक पड़ी। रंजना की चूचियाँ अभी कच्चे अमरूदों जैसी थीं। अनछुयी होने की वजह से चूचियाँ बेहद सख्त और अंगूर के दाने की तरह नुकीली थीं। सुदर्शन उनसे खेलने लगा और उन्हें मुँह में लेकर चूसने लगा। रंजना मस्ती में भरी जा रही थी और न तो पापा को मना ही कर रही थी और न ही कुछ बोल रही थी। इससे सुदर्शन की हिम्मत और बढ़ी और बोला, “अब हम प्यारी बेटी की जवानी देखेंगे जो उसने जाँघों के बीच छुपा रखी है। जरा लेटो तो।” रंजना ने आँखें बंद कर ली और चित लेट गई। सुदर्शन ने फिर एक बार चिकनी जाँघों पर हाथ फेरा और ठीक चूत के छेद पर अंगुल से दबाया भी जहाँ पैन्टी गिली हो चुकी थी।

“हाय रन्जू! तेरी चूत तो पानी छोड़ रही है।” यह कहके सुदर्शन ने रंजना की पैन्टी जाँघों से अलग कर दी। फिर वो उसकी जाँघों, चूत, गाँड़ और कुंवारे मम्मों को सहलाते हुए आहें भरने लगा। चूत बेहद गोरी थी तथा वहाँ पर रेशमी झाँटों के हल्के हल्के रोये उग रहे थे। इसलिये बेटी की इस अनछुई चूत पर हाथ सहलाने से सुदर्शन को बेहद मज़ा आ रहा था। सख्त मम्मों को भी दबाना वो नहीं भूला था। इसी दौरान रंजना का एक हाथ पकड़ कर उसने अपने खड़े लंड पर रख कर दबा दिया और बड़े ही नशीले स्वर में बोला, “रंजना! मेरी प्यारी बेटी! लो अपने पापा के इस खिलौने से खेलो। ये तुम्हारे हाथ में आने को छटपटा रहा है मेरी प्यारी प्यारी जान.. इसे दबाओ आह!” लंड सहलाने की हिम्मत तो रंजना नहीं कर सकी, क्योंकि उसे शर्म और झिझक लग रही थी।

मगर जब पापा ने दुबारा कहा तो हलके से उसने उसे मुट्ठी में पकड़ कर भींच लिया। लंड के चारों तरफ़ के भाग में जो बाल उगे हुए थे, वो काले और बहुत सख्त थे। ऐसा लगता था, जैसे पापा शेव के साथ साथ झाँटें भी बनाते हैं। लंड के पास की झाँटे रंजना को हाथ में चुभती हुई लग रही थी, इसलिये उसे लंड पकड़ना कुछ ज्यादा अच्छा नहीं लग रहा था। अगर लंड झाँट रहित होता तो शायद रंजना को बहुत ही अच्छा लगता क्योंकि वो बोझिल पलकों से लंड पकड़े पकड़े बोली, “ओहह पापा आपके यहाँ के बाल भी दाढ़ी की तरह चुभ रहे हैं.. इन्हे साफ़ करके क्यों नहीं रखते।” बालों की चुभन सिर्फ़ इसलिये रंजना को बर्दाश्त करनी पड़ रही थी क्योंकि लंड का स्पर्श उसे बड़ा ही मनभावन लग रहा था। एकाएक सुदर्शन ने लंड उसके हाथ से छुड़ा लिया और उसकी जाँघों को खींच कर चौड़ा किया और फिर उसके पैरों की तरफ़ उकड़ू बैठा। उसने अपना फ़नफ़नाता हुआ लंड कुदरती गिली चूत के अनछुए द्वार पर रखा। वो चूत को चौड़ाते हुए दूसरे हाथ से लंड को पकड़ कर काफ़ी देर तक उसे वहीं पर रगड़ता हुआ मज़ा लेता रहा। मारे मस्ती के बावली हो कर रंजना उठ-उठ कर सिसक रही थी, “उई पापा आपके बाल .. मेरी चूत पर चुभ रहे हैं.. उन्हे हटाओ.. बहुत गड़ रहे हैं। पापा अंदर मत करना मेरी बहुत छोटी है और आपका बहुत बड़ा।” वास्तव में अपनी चूत पर झाँट के बालों की चुभन रंजना को सहन नहीं हो रही थी, मगर इस तरह से चूत पर सुपाड़े के घस्सों से एक जबर्दस्त सुख और आनंद भी उसे प्राप्त हो रहा था। घस्सों के मज़े के आगे चुभन को वो भूलती जा रही थी।

रंजना ने सोचा कि जिस प्रकार बिरजु ने मम्मी की चूत पर लंड रख कर लंड अंदर घुसेड़ा था उसी प्रकार अब पापा भी ज़ोर से धक्का मार कर अपने लंड को उसकी चूत में उतार देंगे, मगर उसका ऐसा सोचना गलत साबित हुआ। क्योंकि कुछ देर लंड को चूत के मुँह पर ही रगड़ने के बाद सुदर्शन सहसा उठ खड़ा हुआ और उसकी कमर पकड़ कर खींचते हुए उसने उसे उपर अपनी गोद में उठा लिया। गोद में उठाये ही सुदर्शन ने उसे पलंग पर ला पटका। अपने प्यारे पापा की गोद में भरी हुई जब रंजना पलंग तक आयी तो उसे स्वर्गीय आनंद की प्राप्ति हो रही थी। पापा की गरम साँसों का स्पर्श उसे अपने मुँह पर पड़ता हुआ महसूस हो रहा था, उसकी साँसों को वो अपने नाक के नथुनो में घुसती हुई और गालों पर लहराती हुई अनुभव कर रही थी।

इस समय रंजना की चूत में लंड खाने की इच्छा अत्यन्त बलवती हो उठी थी। पलंग के उपर उसे पटक सुदर्शन भी अपनी बेटी के उपर आ गया था। जोश और उफ़ान से वो भरा हुआ तो था ही साथ ही साथ वो काबू से बाहर भी हो चुका था, इसलिये वो चूत की तरफ़ पैरों के पास बैठते हुए टाँगों को चौड़ा करने में लग गया। टाँगों को खूब चौड़ा कर उसने अपना लंड उपर को उठ चूत के फ़ड़फ़ड़ाते सुराख पर लगा दिया। रंजना की चूत से पानी जैसा रिस रहा था शायद इसीलिये सुदर्शन ने चूत पर चिकनायी लगाने की जरूरत नहीं समझी। उसने अच्छी तरह लंड को चूत पर दबा कर ज्यों ही उसे अंदर घुसेड़ने की कोशिश में और दबाव डाला कि रंजना को बड़े ज़ोरों से दर्द होने लगा और असहनीय कष्ट से मरने को हो गयी। दबाव पल प्रति पल बढ़ता जा रहा था और वो बेचारी बुरी तरह तड़फ़ड़ाने लगी। लंड का चूत में घुसना बर्दाश्त न कर पाने के कारण वो बहुत जोरों से कराह उठी और अपने हाथ पांव फ़ेंकती हुई दर्द से बिलबिलाती हुई वो तड़पी, “हाय! पापा अंदर मत डालना। उफ़ मैं मरी जा रही हूँ। हाय पापा मुझे नहीं चाहिये आपका ऐसा प्यार!” रंजना के यूँ चीखने चिल्लाने और दर्द से कराहने से तंग आ कर सुदर्शन ने लंड का सुपाड़ा जो चूत में घुस चुका था उसे फ़ौरन ही बाहर खींच लिया।

फिर उसने अंगुलियों पर थूक ले कर अपने लंड के सुपाड़े पर और चूत के बाहर व अंदर अंगुली डाल कर अच्छी तरह से लगाया। पुनः चोदने की तैयारी करते हुए उसने फिर अपना दहकता सुपाड़ा चूत पर टिका दिया और उसे अंदर घुसेड़ने की कोशिश करने लगा। हालाँकि इस समय चूत एकदम पनियायी हुई थी, लंड के छेद से भी चिपचिपी बून्दे चू रहीं थीं और उसके बावजूद थूक भी काफ़ी लगा दिया था मगर फिर भी लंड था कि चूत में घुसाना मुश्किल हो रहा था। कारण था चूत का अत्यन्त टाईट छेद। जैसे ही हल्के धक्के में चूत ने सुपाड़ा निगला कि रंजना को जोरों से कष्ट होने लगा, वो बुरी तरह कराहने लगी, “धीरे धीरे पापा, बहुत दर्द हो रहा है। सोच समझ कर घुसाना.. कहीं फ़ट .. गयी.. तो.. उफ़्फ़.. मर.. गयी। हाय बड़ा दर्द हो रहा है.. टेस मार रही है। हाय क्या करूँ।”

चूँकि इस समय रंजना भी लंड को पूरा सटकने की इच्छा में अंदर ही अंदर मचली जा रही थी। इसलिये ऐसा तो वो सोच भी नहीं सकती थी कि वो चुदाई को एकदम बंद कर दे। वो अपनी आँखों से देख चुकी थी कि बिरजु का खूँटे जैसा लंड चूत में घुस जाने के बाद ज्वाला देवी को जबर्दस्त मज़ा प्राप्त हुआ था और वो उठ-उठ कर चुदी थी। इसलिये रंजना स्वयं भी चाहने लगी कि जल्दी से जल्दी पापा का लंड उसकी चूत में घुस जाये और फिर वो भी अपने पापा के साथ चुदाई सुख लूट सके, ठीक बिरजु और ज्वाला देवी की तरह। उसे इस बात से और हिम्मत मिल रही थी कि जैसे उसकी माँ ने उसके पापा के साथ बेवफ़ाई की और एक रद्दी वाले से चुदवाई अब वो भी माँ की अमानत पर हाथ साफ़ करके बदला ले के रहेगी।

रंजना यह सोच-सोच कर कि वह अपने बाप से चुदवा रही है जिससे चुदवाने का हक केवल उसकी माँ को है, और मस्त हो गई। क्योंकि जबसे उसने अपनी माँ को बिरजु से चुदवाते देखा तबसे वह माँ से नफ़रत करने लगी थी। इसलिये अपनी गाँड़ को उचका उचका कर वो लंड को चूत में सटकने की कोशिश करने लगी, मगर दोनों में से किसी को भी कामयाबी हासिल नहीं हो पा रही थी। घुसने के नाम पर तो अभी लंड का सुपाड़ा ही चूत में मुश्किल से घुस पाया था और इस एक इंच ही घुसे सुपाड़े ने ही चूत में दर्द की लहर दौड़ा कर रख दी थी।

रंजना जरूरत से ज्यादा ही परेशान दिखायी दे रही थी। वो सोच रही थी कि आखिर क्या तरकीब लड़ाई जाये जिससे लंड उसकी चूत में घुस सके। बड़ा ही आश्चर्य उसे हो रहा था। उसने अनुमान लगाया था कि बिरजु का लंड तो पापा के लंड से ज्यादा लंबा और मोटा था फिर भी मम्मी उसे बिना किसी कष्ट और असुविधा के पूरा अपनी चूत के अंदर ले ली थी और यहाँ उसे एक इंच घुसने में ही प्राण गले में फ़ंसे महसूस हो रहे थे। फिर अपनी सामान्य बुद्धि से सोच कर वो अपने को राहत देने लगी, उसने सोचा कि ये छेद अभी नया-नया है और मम्मी इस मामले में बहुत पुरानी पड़ चुकी है।

चोदू सुदर्शन भी इतना टाईट व कुँवारा छेद पा कर परेशान हो उठा था मगर फिर भी इस रुकावट से उसने हिम्मत नहीं हारी थी। बस घबड़ाहट के कारण उसकी बुद्धि काम नहीं कर रही थी इसलिये वो भी उलझन में पड़ गया था और कुछ देर तक तो वो चिकनी जाँघों को पकड़े पकड़े न जाने क्या सोचता रहा। रंजना भी साँस रोके गर्मायी हुई उसे देखे जा रही थी। एकाएक मानो सुदर्शन को कुछ याद सा आ गया हो वो एलर्ट सा हो उठा, उसने रंजना के दोनों हाथ कस कर पकड़ अपनी कमर पर रख कर कहा, “बेटे ! मेरी कमर ज़रा मजबूती से पकड़े रहना, मैं एक तरकीब लड़ाता हूँ, घबड़ाना मत।” रंजना ने उसकी आज्ञा का पालन फ़ौरन ही किया और उसने कमर के इर्द गिर्द अपनी बाँहें डाल कर पापा को जकड़ लिया। वो फिर बोला, “रंजना ! चाहे तुम्हे कितना ही दर्द क्यों न हो, मेरी कमर न छोड़ना, आज तुम्हारा इम्तिहान है। देखो एक बार फाटक खुल गया तो समझना हमेशा के लिये खुल गया।”

इस बात पर रंजना ने अपना सिर हिला कर पापा को तसल्ली सी दी। फिर सुदर्शन ने भी उसकी पतली नाज़ुक कमर को दोनों हाथों से कस कर पकड़ा और थोड़ा सा बेटी की फूलती गाँड़ को उपर उठा कर उसने लंड को चूत पर दबाया तो, “ओह! पापा रोक लो। उफ़ मरी..” रंजना फिर तड़पाई मगर सुदर्शन ने सुपाड़ा चूत में अंदर घुसाये हुए अपने लंड की हरकत रोक कर कहा, “हो गया बस, मेरी इतनी प्यारी बेटी। वैसे तो हर बात में अपनी माँ से प्रतियोगिता करती हो और अभी हार मान रही हो। जानती हो तुम्हारी माँ बोल-बोल के इसे अपनी वाली में पिलवाती है और जब तक उसके भीतर इसे पेलता नहीं सोने नहीं देती। बस। अब इसे रास्ता मिलता जा रहा है। लो थोड़ा और लो..” यह कह सुदर्शन ने उपर को उठ कर मोर्चा संभाला और फिर एकाएक उछल कर उसने जोरों से धक्के लगाना चालू कर दिया। इस तरह से एक ही झटके में पूरा लंड सटकने को रंजना हर्गिज़ तैयार न थी इसलिये मारे दर्द के वो बुरी तरह चीख पड़ी। कमर छोड़ कर तड़पने और छटपटाने के अलावा उसे कुछ सुझ नहीं रहा था, “मरी... आ। नहीं.. मरी। छोड़ दो मुझे नहीं घुसवाना... उउफ़ मार दिया। नहीं करना मुझे मम्मी से कॉंपीटिशन। जब मम्मी आये तब उसी की में घुसाना। मुझे छोड़ो। छोड़ो निकालो इसे .. आइइई हटो न उउफ़ फ़ट रही है.. मेरी आइई मत मारो।” पर पापा ने जरा भी परवाह न की। दर्द जरूरत से ज्यादा लंड के यूँ चूत में अंदर बाहर होने से रंजना को हो रहा था। बेचारी ने तड़प कर अपने होंठ अपने ही दांतों से चबा लिये थे, आँखे फ़ट कर बाहर निकलने को हुई जा रही थीं। जब लंड से बचाव का कोई रास्ता बेचारी रंजना को दिखायी न दिया तो वो सुबक उठी, “पापा ऐसा प्यार मत करो। हाय मेरे पापा छोड़ दो मुझे.. ये क्या आफ़त है.. उफ़्फ़ नहीं इसे फ़ौरन निकाल लो.. फ़ाड़ डाली मेरी । हाय फ़ट गयी मैं तो मरी जा रही हूँ। बड़ा दुख रहा है । तरस खाओ आहह मैं तो फँस गयी..” इस पर भी सुदर्शन धक्के मारने से बाज़ नहीं आया और उसी रफ़्तार से जोर जोर से धक्के वो लगाता रहा। टाईट व मक्खन की तरह मुलायम चूत चोदने के मज़े में वो बहरा बन गया था।

पापा के यूँ जानवरों की तरह पेश आने से रंजना की दर्द से जान तो निकलने को हो ही रही थी मगर एक लाभ उसे जरूर दिखायी दिया, यानि लंड अंदर तक उसकी चूत में घुस गया था। वो तो चुदवाने से पहले यही चाहती थी कि कब लंड पूरा घुसे और वो मम्मी की तरह मज़ा लूटे। मगर मज़ा अभी उसे नाम मात्र भी महसूस नहीं हो रहा था।

सहसा ही सुदर्शन कुछ देर के लिये शांत हो कर धक्के मारना रोक उसके उपर लेट गया और उसे जोरों से अपनी बाँहों में भींच कर और तड़ातड़ उसके मुँह पर चुम्मी काट काट कर मुँह से भाप सी छोड़ता हुआ बोला, “आह मज़ा आ गया आज, एक दम कुँवारी चूत है तुम्हारी। अपने पापा को तुमने इतना अच्छा तोहफ़ा दिया है। रंजना मैं आज से तुम्हारा हो गया।” तने हुए मम्मों को भी बड़े प्यार से वो सहलाता जा रहा था। वैसे अभी भी रंजना को चूत में बहुत दर्द होता हुआ जान पड़ रहा था मगर पापा के यूँ हल्के पड़ने से दर्द की मात्रा में कुछ मामूली सा फ़र्क तो पड़ ही रहा था और जैसे ही पापा की चुम्मी काटने, चूचियाँ मसलने और उन्हे सहलाने की क्रिया तेज़ होती गयी वैसे ही रंजना आनंद के सागर में उतरती हुई महसूस करने लगी। अब आहिस्ता आहिस्ता वो दर्द को भूल कर चुम्मी और चूची मसलायी की क्रियाओं में जबर्दस्त आनंद लूटना प्रारम्भ कर चुकी थी। सारा दर्द उसे उड़न छू होता हुआ लगने लगा था। सुदर्शन ने जब उसके चेहरे पर मस्ती के चिन्ह देखे तो वो फिर धीरे-धीरे चूत में लंड घुसेड़ता हुआ हल्के-हल्के घस्से मारने पर उतर आया। अब वो रंजना के दर्द पर ध्यान रखते हुए बड़े ही आराम से उसे चोदने में लग गया। उसके कुँवारे मम्मो के तो जैसे वो पीछे ही पड़ गया था। बड़ी बेदर्दी से उन्हे चाट-चाट कर कभी वो उन पर चुम्मी काटता तो कभी चूची का अंगूर जैसा निपल वो होंठों में ले कर चूसने लगता। चूची चूसते-चूसते जब वो हाँफ़ने लगता तो उन्हे दोनों हाथों में भर कर बड़ी बेदर्दी से मसलने लगता था। निश्चय ही चूचियों के चूसने मसलने की हरकतों से रंजना को ज्यादा ही आनंद प्राप्त हो रहा था। उस बेचारी ने तो कभी सोचा भी न था कि इन दो मम्मों में आनंद का इतना बड़ा सागर छिपा होगा। इस प्रथम चुदाई में जबकि उसे ज्यादा ही कष्ट हो रहा था और वो बड़ी मुश्किल से अपने दर्द को झेल रही थी मगर फिर भी इस कष्ट के बावजूद एक ऐसा आनंद और मस्ती उसके अंदर फ़ूट रही थी कि वो अपने प्यारे पापा को पूरा का पूरा अपने अंदर समेट लेने की कोशिश करने लगी।

क्योंकि पहली चुदाई में कष्ट होता ही है इसलिये इतनी मस्त हो कर भी रंजना अपनी गाँड़ और कमर को तो चलाने में अस्मर्थ थी मगर फिर भी इस चुदाई को ज्यादा से ज्यादा सुखदायक और आनन्ददायक बनाने के लिये अपनी ओर से वो पूरी तरह प्रयत्नशील थी। रंजना ने पापा की कमर को ठीक इस तरह कस कर पकड़ा हुआ था जैसे उस दिन ज्वाला देवी ने चुदते समय बिरजु की कमर को पकड़ रखा था। अपनी तरफ़ से चूत पर कड़े धक्के मरवाने में भी वो पापा को पूरी सहायता किये जा रही थी। इसी कारण पल प्रतिपल धक्के और ज्यादा शक्तिशाली हो उठे थे और सुदर्शन जोर जोर से हाँफ़ते हुए पतली कमर को पकड़ कर जानलेवा धक्के मारता हुआ चूत की दुर्गति करने पर तुल उठा था।

उसके हर धक्के पर रंजना कराह कर ज़ोर से सिसक पड़ती थी और दर्द से बचने के लिये वो अपनी गाँड़ को कुछ उपर खिसकाये जा रही थी। यहाँ तक कि उसका सिर पलंग के सिरहाने से टकराने लगा, मगर इस पर भी वो दर्द से अपना बचाव न कर सकी और अपनी चूत में धक्कों का धमाका गूँजता हुआ महसूस करती रही। हर धक्के के साथ एक नयी मस्ती में रंजना बेहाल हो जाती थी। कुछ समय बाद ही उसकी हालत ऐसी हो गयी कि अपने दर्द को भुला डाला और प्रत्येक दमदार धक्के के साथ ही उसके मुँह से बड़ी अजीब से दबी हुई अस्पष्ट किलकारियाँ खुद-ब-खुद निकलने लगीं।

“ओह पापा अब मजा आ रहा है। मैने आपको कुँवारी चूत का तोहफ़ा दिया तो आप भी तो मुझे ऐसा मजा देकर तोहफ़ा दे रहे हैं। अब देखना मम्मी से इसमें भी कैसा कॉंपीटिशन करती हूँ। ओह पापा बताइये मम्मी की लेने में ज्यादा मजा है या मेरी लेने में?” सुदर्शन रंजना की मस्ती को और ज्यादा बढ़ाने की कोशिश में लग गया। वैसे इस समय की स्तिथी से वो काफ़ी परिचित होता जा रहा था। रंजना की मस्ती की ओट लेने के इरादे से वो चोदते चोदते उससे पूछने लगा, “कहो मेरी जान.. अब क्या हाल है? कैसे लग रहे हैं धक्के.. पहली बार तो दर्द होता ही है। पर मैं तुम्हारे दर्द से पिघल कर तुम्हें इस मजे से वँचित तो नहीं रख सकता था न मेरी जान, मेरी रानी, मेरी प्यारी।” उसके होंठ और गालों को बुरी तरह चूसते हुए, उसे जोरों से भींच कर उपर लेटे लेटे ज़ोरदार धक्के मारता हुआ वो बोल रहा था, बेचारी रंजना भी उसे मस्ती में भींच कर बोझिल स्वर में बोली, “बड़ा मज़ा आ रहा है मेरे प्यारे सा.... पापा, मगर दर्द भी बहुत ज्यादा हो रहा है..” फ़ौरन ही सुदर्शन ने लंड रोक कर कहा, “तो फिर धक्के धीरे धीरे लगाऊँ। तुम्हे तकलीफ़ में मैं नहीं देख सकता। तुम तो बोलते-बोलते रुक जाती हो पर देखो मैं बोलता हूँ मेरी सजनी, मेरी लुगाई।” ये बात वैसे सुदर्शन ने ऊपरी मन से ही कही थी। रंजना भी जानती थी कि वो मज़ाक के मूड में है और तेज़ धक्के मारने से बाज़ नहीं आयेगा, परन्तु फिर भी कहीं वो चूत से लंड न निकाल ले इस डर से वो चीख पड़ी, “नहीं.. नहीं।! ऐसा मत करना ! चाहे मेरी जान ही क्यों न चली जाये, मगर आप धक्कों की रफ़्तार कम नहीं होने देना.. इतना दर्द सह कर तो इसे अपने भीतर लिया है। आहह मारो धक्का आप मेरे दर्द की परवाह मत करो। आप तो अपने मन की करते जाओ। जितनी ज़ोर से भी धक्का लगाना चाहो लगा लो अब तो जब अपनी लुगाई बना ही लिया है तो मत रुको मेरे प्यारे सैंया.. मैं.. इस समय सब कुछ बर्दाश्त कर लूँगी.. अहह आई रिइइ.. पहले तो मेरा इम्तिहान था और अब आपका इम्तिहान है। यह नई लुगाई पुरानी लुगाई को भुला देगी।”



RohitKapoor
Rookie
Posts: 39
Joined: 22 Oct 2014 17:03

रद्दी वाला (रचयिता: काजल गुप्ता)

Unread post by RohitKapoor » 29 Oct 2014 00:49

मज़बूरन अपनी गाँड़ को रंजना उछालने पर उतर आयी थी। कुछ तो धक्के पहले से ही जबर्दस्त व ताकतवर उसकी चूत पर पड़ रहे थे और उसके यूँ मस्ती में बड़बड़ाने, गाँड़ उछालने को देख कर तो सुदर्शन ने और भी ज्यादा जोरों के साथ चूत पर हमला बोल दिया। हर धक्का चूत की धज्जियाँ उड़ाये जा रहा था। रंजना धीरे-धीरे कराहती हुई दर्द को झेलते हुए चुदाई के इस महान सुख के लिये सब कुछ सहन कर रही थी। और मस्ती में हल्की आवाज़ में चिल्ला भी रही थी, “आहह मैं मरीइई। पापा कहीं आपने मेरी फाड़ के तो नहीं रख दी न? ज़रा धीरे.. हाय! वाहह! अब ज़रा जोर से.. लगा लो । और लो.. वाहह प्यारे सच बड़ा मज़ा आ रहा है.. आह जोर से मारे जाओ, कर दो कबाड़ा मेरी चूत का।” इस तरह के शब्द और आवाज़ें न चाहते हुए भी रंजना के मुँह से निकल रहीं थीं। वो पागल जैसी हो गयी थी इस समय। वो दोनों ही एक दूसरे को बुरी तरह नोचने खासोटने लगे थे। सारे दर्द को भूल कर अत्यन्त घमासान धक्के चूत पर लगवाने के लिये हर तरह से रंजना कोशिश में लगी हुई थी। दोनों झड़ने के करीब पहुँच कर बड़बड़ाने लगे।

“आह मैं उड़ीई जा रही हूँ राज्जा ये मुझे क्या हो रहा है... मेरी रानी ले और ले फ़ाड़ दूँगा हाय क्या चूत है तेरी आहह ओह” और इस प्रकार द्रुतगति से होती हुई ये चुदाई दोनों के झड़ने पर जा कर समाप्त हुई। चुदाई का पूर्ण मज़ा लूटने के पश्चात दोनों बिस्तर पर पड़ कर हाँफ़ने लगे। थोड़ी देर सुस्ताने के बाद रंजना ने बलिहारी नज़रो से अपने पापा को देखा और तुनतुनाते हुए बोली, “आपने तो तो मेरी जान ही निकाल दी थी, जानते हो कितना दर्द हो रहा था, मगर पापा आपने तो जैसे मुझे मार डालने की कसम ही खा रखी थी।” इतना कह कर जैसे ही रंजना ने अपनी चूत की तरफ़ देखा तो उसकी गाँड़ फ़ट गयी, खून ही खून पूरी चूत के चारों तरफ़ फ़ैला हुआ था, खून देख कर वो रूँवासी हो गयी। चूत फ़ूल कर कुप्पा हो गयी थी। रुँवासे स्वर में बोली, “पापा आपसे कट्टी। अब कभी आपके पास नहीं आऊँगी।” जैसे ही रंजना जाने लगी सुदर्शन ने उसका हाथ पकड़ के अपने पास बिस्तर पर बिठा लिया और समझाया कि उसके पापा ने उसकी सील तोड़ी है इसलिये खून आया है। फिर सुदर्शन ने बड़े प्यार से नीट विलायती शराब से अपनी बेटी की चूत साफ़ की। इसके बाद शराबी अय्याश पापा ने बेटी की चूत की प्याली में कुछ पेग बनाये और शराब और शबाब दोनों का लुफ़्त लिया। अब रंजना पापा से पूरी खुल चुकी थी। उसे अपने पापा को बेटी-चोद गान्डु जैसे नामों से सम्बोधन करने में भी कोई हिचक नहीं होती थी।

********

अब आगे की कहानी आप रंजना की जुबान में सुनें।

मम्मी अभी पीहर से १५ दिन बाद आने वाली थी और इधर घर पर मेरे पापा ही मेरे सैंया बन चुके थे तो मुझे अब और किसकी फ़िकर हो सकती थी। अगले दो दिन तो मैं कॉलेज भी नहीं गई। दूसरे ही दिन मैं दोपहर में पापा के ऑफिस में पहुँच गई। पापा ने मेरा परिचय अपनी मस्त जवान प्राइवेट सेक्रेटरी शाज़िया से करवाया। शाज़िया को जब मैंने पहली बार देखा तो एकटक उसे देखती ही रह गई। उँचा छरहारा कद और बला की खूबसूरत। हालांकि शाज़िया और मेरी उम्र में काफ़ी फ़ासला था फिर भी शाज़िया मेरी अच्छी दोस्त बन गई। शाज़िया बहुत ही खुली किस्म की लड़की थी और तीन चार मुलाकातों के बाद ही वह मेरे से सेक्स की बातें भी करने लगी और मैं भी शाज़िया से पूरी तरह खुल गई। लेकिन न तो कभी मैंने अपने और पापा के सम्बंधों का जिक्र किया और न ही कभी शाज़िया ने अपने मुँह से यह कहा कि मेरे पापा उसके साथ जवानी के कैसे-कैसे खेल खेलते हैं।

मेरे पापा के पास दो कारें हैं। कार चलाना तो मैंने एक साल पहले ही सीख लिया था पर मम्मी मुझे ड्राईव करने से मना करती थी। अब कोइ रोक टोक नहीं थी और मैं पापा की कार लेके दो दिन बाद कॉलेज गई। मृदुल के पास एक अच्छी सी बाईक थी। मगर वो बाईक कभी-कभी ही लेकर आता था, जब भी वो बाईक लेकर आता मैं अकसर उसके पीछे बैठ कर उसके साथ घूमने जाती। मृदुल को मैं मन ही मन प्यार करती थी और मृदुल भी मुझसे प्यार करता था, मगर न तो मैंने कभी उससे प्यार का इज़हार किया और न ही उसने। उसके साथ प्यार करने में मुझे कोइ झिझक महसूस नहीं होती थी।

पिछले दो दिनों में मैं अपने पापा से कइ बार क्या चुदी कि मृदुल को देखने का मेरा नज़रिया ही बदल गया। एक बार जब मैं मृदुल को लेकर घर आई थी और उसका परिचय मेरी माँ ज्वाला देवी से करवाया था, तब मृदुल को देख कर जिस तरह मेरी माँ के मुँह से लार टपकी थी आज उसी तरह क्लास में मृदुल को देख कर मैं लार टपका रही थी। आज मृदुल बाईक लेके नहीं आया था। छुट्टी के बाद मैं और मृदुल कार में घूमने निकल पड़े। कार मृदुल चला रहा था और मैं मृदुल के पास बैठी हुई थी। मृदुल सदा की तरह कुछ कम बोलने वाला और शाँत था जबकि मैं और दिनों की अपेक्षा ज्यादा ही चहक रही थी। शायाद यह चूत में लंड जाने का नतीज़ा हो।

हम दोनों में और दिनों की तरह ही प्यार की रोमांटिक बातें हो रही थीं। अचानक ऐसी ही बातें करते हुए मैंने उसके गाल पर चूम लिया। ऐसा मैंने भावुक हो कर नहीं बल्कि उसकी झिझक दूर करने के लिये किया था। मेरे इस चुम्बन ने मृदुल को बिल्कुल बदल दिया। मैं जिसे शर्मिला समझती थी वह तो पूरा चालू निकला। वो इससे पहले प्यार की बात करने में भी बहुत झिझकता था। एक बार उसकी झिझक दूर होने के बाद मुझे लगा कि उसकी झिझक दूर करके मैंने उसकी भड़की हुई आग जगा दी है। क्योंकि उस दिन के बाद से तो उसने मुझसे इतनी शरारत करनी शुरु कर दी कि कभी तो मुझे मज़ा आ जाता था और कभी उस पर गुस्सा। मगर कुल मिलाकर मुझे उसकी शरारत बहुत अच्छी लगती थी। उसकी इन्ही सब बातों के कारण मैं उसे पसन्द करती थी और एक प्रकार से मैंने अपना तन मन उसके नाम कर दिया था।

अगले दो तीन दिन युँ ही गुजर गये। रात में मेरे पापा जानी मुझे जम के चोदते। मैं समय पर कॉलेज जाती। छुट्टी के बाद कुछ देर कार में मृदुल के साथ सैर सपाटे पर जाती। अब मृदुल मेरे लिये कुछ ज्यादा ही बेचैन रहने लगा। मैं उसकी बेचैनी का मजा लेते हुये कुछ समय उसके साथ गुजार पापा के ऑफिस में चली जाती। वहाँ शाज़िया से मेरी बहुत घुल घुल के बातें होने लगी थीं। बातों ही बातों में मैंने शाज़िया से अपने और मृदुल के प्यार का भी जिक्र कर दिया।

अभी तीन दिन पहले की बात थी कि मैं कॉलेज से पापा के ऑफिस में चली गई। पापा ऑफिस में अकेले थे और शाज़िया कहीं दिखाई नहीं पड़ी तो मैंने पापा को छेड़ते हुये पूछा, “क्यों पापा! आज आपकी तितली दिखाई नहीं पड़ रही।” यह सुनते ही पापा बोले, “तो शाज़िया ने तुम्हे सब कुछ बता दिया।” पापा की बात सुनते ही मेरे कान खड़े हो गये। जो शक का कीड़ा शाज़िया से मिलने के बाद मेरे मन में कुलबुला रहा था वह हकीकत था। मैंने पापा के गले में बाँहें डालते हुए कहा, “जब आपने बेटी को नहीं छोड़ा तो उसे कहां छोड़ने वाले थे।” पापा ने हड़बड़ा कर मुझे अलग किया। पापा और शाज़िया जब पापा के रूम में अकेले होते तो उनके बीच क्या चल रहा होगा इस बात का सब ऑफिस वालों को पता था पर एक दिखावे के लिये पऱदा पड़ा हुआ था। पर ऐसा कुछ मेरे और पापा के बीच भी उस ऑफिस में हो सकता है इसकी सोच का भी पापा किसी को मौका नहीं देना चाहते थे। मैं संयत होकर पापा के सामने कुर्सी पर बैठ गई।

तभी पापा ने बताया कि अगले सप्ताह मेरी मम्मी ज्वाल देवी अपने पीहर से वापस आ जायेगी। मैंने भी पापा को बता दिया कि अगर उन्होंने अपनी सेक्रेटरी को फाँस रखा है तो मैंने भी अपने साथ पढ़ने वाले एक लड़के को फाँस रखा है। हालाँकि यह बात मैंने पापा को जलाने के लिये कही थी पर पापा बहुत ही शाँत स्वर में बोले कि भई हमें भी अपने यार से मिलवावो। मैं भी पापा से पूरी खुल चुकी थी ओर बोली, “हाँ उसे तो मैं कल ही घर ले आऊँगी।”

“हूँ तो यह बात है, मम्मी के जाते ही अपने आशिक को घर में लाने की चाहत जोर मार रही है। यदि उसे ले आओगी तो हमारा क्या होगा?” जब पापा का लंड मेरी चूत तक में जा चुका था तो मैं भी पापा से पूरी खुल चुकी थी और पापा के अंदाज़ में ही बोली, “आप अपनी सेक्रेटरी का मजा लिजिये हम अपने यार का।” पापा ने कहा, “क्यों न हम सब साथ-साथ सारा मजा लूटें। तुम कहो तो शाज़िया को भी घर में रात भर रख लेंगे।” पापा की बात सुन के मैं सोच में पड़ गई। मेरे मन में सवाल उठने लगे कि मृदुल क्या सोचेगा। मैं कुछ देर पापा से हंसी मजाक करती रही और ऑफिस से चली आई।

जबसे यह रहास्योदघाटन हुआ कि पापा शाज़िया को भी चोदते हैं, मेरा मन बेचैन हो उठा। जब मैं कॉलेज जाती हूँ, मम्मी तब रद्दीवाले बिरजू से चुदवा सकती है और पापा अपनी सेक्रेटरी को चोद सकते हैं तो मैं भी जहाँ चाहूँ चुदवा सकती हूँ। उसी बेचैनी का नतिजा था कि मैंने मृदुल को ज्यादा लिफ्ट देनी शुरु कर दी। अब तो मैं जवानी का खेल खुल के खेलने के लिये छटपटा उठी।

आज फिर कॉलेज की छुट्टी के बाद मैं और मृदुल अपने रोजाना के सैर सपाटे पर निकले। कार वोही ड्राईव कर रहा था। एकाएक उसने कार का रुख शहर से बाहर जाने वाली सड़क पर कर दिया। फिर उसने कार एक पगडन्डी पर उतार दी। एक सुनसान जगह देखकर उसने कार रोक दी और मेरी ओर देखते हुए बोला, “अच्छी जगह है न! चारों तरफ़ अन्धेरा और पेड़ पौधे हैं। मेरे ख्याल से प्यार करने की इससे अच्छी जगह हो ही नहीं सकती।” यह कहते हुए उसने मेरे होंठों को चूमना चाहा तो मैं उससे दूर हटने लगी। उसने मुझे बाँहों में कस लिया और मेरे होंठों को ज़ोर से अपने होंठों में दबाकर चूसना शुरु कर दिया। मैं जबरन उसके होंठों की गिरफ़्त से आज़ाद हो कर बोली, “छोड़ो, मुझे साँस लेने में तकलीफ़ हो रही है।” उसने मुझे छोड़ तो दिया मगर मेरी चूची पर अपना एक हाथ रख दिया। मैं समझ रही थी कि आज इसका मन पूरी तरह रोमांटिक हो चुका है। मैंने कहा, “मैं तो उस दिन को रो रही हूँ जब मैंने तुम्हारे गाल पर किस करके अपने लिये मुसीबत पैदा कर ली। न मैं तुम्हे किस करती और न तुम इतना खुलते।”

“तुमसे प्यार तो मैं काफ़ी समय से करता था। मगर उस दिन के बाद से मैं यह पूरी तरह जान गया कि तुम भी मुझसे प्यार करती हो। वैसे एक बात कहूँ, तुम हो ही इतनी हसीन कि तुम्हे प्यार किये बिना मेरा मन नहीं मानता है।” वो मेरी चूची को दबाने लगा तो मैं बोली, “उफ़्फ़ क्यों दबा रहे हो इसे? छोड़ो न, मुझे कुछ-कुछ होता है।”

“क्या होता है?” वो और भी ज़ोर से दबाते हुए बोला। मैं क्या बोलती। ये तो मेरे मन की एक भावना थी जिसे शब्दों में कह पाना मेरे लिये मुश्किल था। इसे मैं केवल अनुभव कर रही थी। वो मेरी चूची को बादस्तूर मसलते दबाते हुए बोला, “बोलो न क्या होता है?”

“उफ़्फ़ मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि मैं इस भावन को कैसे व्यक्त करूँ। बस समझ लो कि कुछ हो रहा है।” वो मेरी चूची को पहले की तरह दबाता और मसलता रहा। फिर मेरे होंठों को चूमने लगा। मैं उसके होंठों के चूम्बन से पूरी गरम हो गई। जो मौका हमे संयोग से मिला था उसका फ़ायादा उठाने के लिये मैं भी व्याकुल हो गयी। तभी उसने मेरे कपड़ों को उतारने का उपक्रम किया। होंठ को मुक्त कर दिया था। मैं उसकी ओर देखते हुए मुसकराने लगी। ऐसा मैंने उसका हौंसला बढ़ाने के लिये किया था। ताकि उसे एहसास हो जाये कि उसे मेरा बढ़ावा मिल रहा है। मेरी मुसकरहाट को देखकर उसके चेहरे पर भी मुसकरहाट दिखायी देने लगी। वो आराम से मेरे कपड़े उतारने लगा, पहले उसका हाथ मेरी चूची पर था ही सो वो मेरी चूची को ही नंगा करने लगा। मैं हौले से बोली, “मेरा विचार है कि तुम्हे अपनी भावनाओं पर काबू करना चाहिये। प्यार की ऐसी दीवानगी अच्छी नहीं होती।”

उसने मेरे कुछ कपड़े उतार दिये। फिर मेरी ब्रा खोलते हुए बोला, “तुम्हारी मस्त जवानी को देखकर अगर मैं अपने आप पर काबू पा लूँ तो मेरे लिये ये एक अजूबे के समान होगा।” मैंने मन में सोचा कि अभी तुमने मेरी जवानी को देखा ही कहाँ है। जब देख लोगे तो पता नहीं क्या हाल होगा। मगर मैं केवल मुसकरायी। वो मेरे मम्मे को नंगा कर चुका था। दोनों चूचियों में ऐसा तनाव आ गया था उस वक्त तक कि उनके दोनों निपल अकड़ कर ठोस हो गये थे। और सुई की तरह तन गये थे। वो एक पल देख कर ही इतना उत्तेजित हो गया था कि उसने निपल समेत पूरी चूची को हथेली में समेटा और कस-कस कर दबाने लगा। अब मैं भी उत्तेजित होने लगी थी। उसकी हरकतों से मेरे अरमान भी मचलने लगे थे। मैंने उसके होंठों को चूमने के बाद प्यार से कहा, “छोड़ दो न मुझे मृदुल। तुम दबा रहे हो तो मुझे गुदगुदी हो रही है। पता नहीं मेरी चूचियों में क्या हो रहा है कि दोनों चूचियों में तनाव सा भरता जा रहा है। प्लीज़ छोड़ दो, मत दबाओ।”

वो मुसकरा कर बोला, “मेरे बदन के एक खास हिस्से में भी तो तनाव भर गया है। कहो तो उसे निकाल कर दिखाऊँ?” मैं समझ गई कि वह मुझे लंड निकाल कर दिखाने की बात कर रहा है। मैं उसे मना करती रह गयी मगर उसने अपना काम करने से खुद को नहीं रोका, और अपनी पैन्ट उतार कर ही माना। जैसे ही उसने अपना अंडरवीयर भी उतारा… मैं एक टक उसके खड़े लंड को देखने लगी। लंबा तो पापा के लंड जितना ही था पर मुझे लगा कि पापा के लंड से मृदुल का लंड मोटा है। उस लंड को अपनी चूत में लेने का सोच कर ही मैं रोमांचित हो उठी पर मृदुल को अपनी जवानी इतनी आसानी से मैं भी पहली बार चखाने वाली नही थी। तभी उसकी आवाज़ मेरे कानों में पड़ी, “छू कर देखो न। कितना तनाव आ गया है इसमें। तुम्हारे निपल से ज्यादा तन गया है ये।” मैंने अपना हाथ छुड़ाने की एक्टिंग भर की। सच तो ये था कि मैं उसे छूने को उतावली हो रही थी। मेरा दोस्त मृदुल यह बात बिल्कुल नहीं जानता था कि मैं इस खिलौने की पक्की खिलाड़ी हो चुकी हूँ और वह भी अपने सगे बाप के खिलौने की।

मैं मृदुल के सामने इसी तरह से पेश आ रही थी जैसे कि यह सब कुछ मेरे साथ पहली बार हो रहा है। उसने मेरे हाथ को बढ़ा कर अपने लंड पर रख दिया। मेरे दिल की धड़कन इतनी तेज़ हो गयी कि खुद मेरे कानो में भी गूँजती लग रही थी। मैं उसके लंड की जड़ की ओर हाथ बढ़ाने लगी तो एहसाह हुआ कि लंड-लंबा भी काफ़ी था। मोटा भी इस कदर कि उसे एक हाथ में ले पाना एक प्रकार से नामुमकिन ही था। मुझे एकाएक रद्दीवाले बिरजू के लंड का ख्याल आ गया जिससे मेरी माँ चुदती थी। वो मुझे गरम होता देख कर मेरे और करीब आ गया और मेरे निपलों को सहलाने लगा। एकाएक उसने निपल को चूमा तो मेरे बदन में खून का दौरा तेज़ हो गया, और मैं उसके लंड के ऊपर तेज़ी से हाथ फ़ेरने लगी। मेरे ऐसा करते ही उसने झट से मेरे निपल को मुँह में ले लिया और चूसने लगा। अब तो मैं पूरी मस्ती में आ गयी और उसके लंड पर बार बार हाथ फ़ेर कर उसे सहलाने लगी। बहुत अच्छा लग रहा था, मोटे और लम्बे गरम लंड पर हाथ फ़िराने में। एकाएक वो मेरे निपल को मुँह से निकाल कर बोला, “कैसा लग रहा है मेरे लंड पर हाथ फ़ेरने में?”

मैं उसके सवाल को सुनकर अपना हाथ हटाना चाही तो उसने मेरा हाथ पकड़ कर लंड पर ही दबा दिया और बोला, “तुम हाथ फ़ेरती हो तो बहुत अच्छा लगता है, देखो न, तुम्हारे द्वारा हाथ फ़ेरने से और कितना तन गया है।”

मुझसे रहा नहीं गया तो मैं मुसकरा कर बोली, “मुझे दिखायी कहाँ दे रहा है?”

“देखोगी! ये लो।” कहते हुए वो मेरे बदन से दूर हो गया और अपनी कमर को उठा कर मेरे चेहरे के समीप किया तो उसका मोटा तगड़ा लंड मेरी निगाहों के आगे आ गया। लंड का सुपाड़ा ठीक मेरी आँखों के सामने था और उसका आकर्षक रूप मेरे मन को विचलित कर रहा था। उसने थोड़ा सा और आगे बढ़ाया तो मेरे होंठों के एकदम करीब आ गया। एक बार तो मेरे मन में आया कि मैं उसके लंड को गप से पूरा मुख में ले लूँ मगर अभी मैं उसके सामने पूरी तरह से खुलना नहीं चाहती थी। वो मुसकरा कर बोला, “मैं तुम्हारी आँखों में देख रहा हूँ कि तुम्हारे मन में जो है उसे तुम दबाने की कोशिश कर रही हो। अपनी भावनाओं को मत दबाओ, जो मन में आ रहा है, उसे पूरा कर लो।” उसके यह कहने के बाद मैंने उसके लंड को चूमने का मन बनाया मगर एकदम से होंठ आगे न बढ़ा कर उसे चूमने की पहल नहीं की। तभी उसने लंड को थोड़ा और आगे मेरे होंठों से ही सटा दिया, उसके लंड के दहकते हुए सुपाड़े को होंठों पर अनुभव करने के बाद मैं अपने आप को रोक नहीं पायी और लंड के सुपाड़े को जल्दी से चूम लिया। एक बार चूम लेने के बाद तो मेरे मन की झिझक काफ़ी कम हो गयी और मैं बार बार उसके लंड को दोनों हाथों से पकड़ कर सुपाड़े को चूमने लगी। एकएक उसने सिसकारी लेकर लंड को थोड़ा सा और आगे बढ़ाया तो मैंने उसे मुँह में लेने के लिये मुँह खोल दिया और सुपाड़ा मुँह में लेकर चूसने लगी।

इतना मोटा सुपाड़ा और लंड था कि मुँह में लिये रखने में मुझे परेशानी का अनुभव हो रहा था, मगर फिर भी उसे चूसने की तमन्ना ने मुझे हार मानने नहीं दी और मैं कुछ देर तक उसे मज़े से चूसती रही। एकाएक उसने कहा, “हाय रंजना! तुम इसे मुँह में लेकर चूस रही हो तो मुझे कितना मज़ा आ रहा है, मैं तो जानता था कि तुम मुझसे बहुत प्यार करती हो, मगर थोड़ा झिझकती हो। अब तो तुम्हारी झिझक समाप्त हो गयी, क्यों है न?” मैंने हाँ में सिर हिला कर उसकी बात का समर्थन किया और बदस्तूर लंड को चूसती रही। अब मैं पूरी तरह खुल गयी थी और चुदाई का आनंद लेने का इरादा कर चुकी थी। वो मेरे मुँह में धीरे-धीरे धक्के लगाने लगा। मैंने अंदाज़ लगा लिया कि ऐसे ही धक्के वो चुदाई के समय भी लगायेगा। चुदाई के बारे में सोचाने पर मेरा ध्यान अपनी चूत की ओर गया, जिसे अभी उसने निर्वस्त्र नहीं किया था। जबकि मुझे चूत में भी हल्की-हल्की सिहरन महसूस होने लगी थी। मैं कुछ ही देर में थकान का अनुभव करने लगी। लंड को मुँह में लिये रहने में परेशानी का अनुभव होने लगा। मैंने उसे मुँह से निकालने का मन बनाया मगर उसका रोमांच मुझे मुँह से निकालने नहीं दे रहा था। मुँह थक गया तो मैंने उसे अंदर से तो निकाल लिया मगर पूरी तरह से मुक्त नहीं किया। उसके सुपाड़े को होंठों के बीच दबाये उस पर जीभ फ़ेरती रही। झिझक खत्म हो जाने के कारण मुझे ज़रा भी शर्म नहीं लग रही थी। तभी वो बोला, “हाय मेरी जान, अब तो मुक्त कर दो, प्लीज़ निकाल दो न।” वो मिन्नत करने लगा तो मुझे और भी मज़ा आने लगा और मैं प्रयास करके उसे और चूसने का प्रयत्न करने लगी। मगर थकान की अधिकता हो जाने के कारण, मैंने उसे मुँह से निकाल दिया। उसने एकाएक मुझे धक्का दे कर गिरा दिया और मेरी जींस खोलने लगा और बोला, “मुझे भी तो अपनी उस हसीन जवानी के दर्शन करा दो, जिसे देखने के लिये मैं बेताब हूँ।”

मैं समझ गयी कि वो मेरी चूत को देखने के लिये बेताब था। और इस एहसास ने कि अब वो मेरी चूत को नंगा करके देख लेगा साथ ही शरारत भी करेगा, मैं रोमांच से भर गयी। मगर फिर भी दिखावे के लिये मैं मना करने लगी। वो मेरी जींस को उतार चुकने के बाद मेरी पैंटी को खींचने लगा तो मैं बोली, “छोड़ो न! मुझे शर्म आ रही है।”

“लंड मुँह में लेने में शर्म नहीं आयी और अब मेरा मन बेताब हो गया है तो सिर्फ़ दिखाने में शर्म आ रही है।” वो बोला। उसने खींच कर पैंटी को उतार दिया और मेरी चूत को नंगा कर दिया। चूत ही क्या... अब तो मैं पूरी नंगी थी... बस पैरों में हील वाले सैंडल थे। मेरे बदन में बिजली सी भर गयी। यह एहसास ही मेरे लिये अनोखा था कि उसने मेरी चूत को नंगा कर दिया था। अब वो चूत के साथ शरारत भी करेगा। वो चूत को छूने की कोशिश करने लगा तो मैं उसे जाँघों के बीच छिपाने लगी। वो बोला, “क्यों छुपा रही हो। हाथ ही तो लगाऊँगा। अभी चूमने का मेरा इरादा नहीं है। हाँ अगर प्यारी लगी तो जरूर चूमुँगा।” उसकी बात सुनकार मैं मन ही मन रोमांच से भर गयी। मगर प्रत्यक्ष में बोली, “तुम देख लोगे उसे, मुझे दिखाने में शर्म आ रही है। आँख बंद करके छुओगे तो बोलो।”

“ठीक है ! जैसी तुम्हारी मर्ज़ी। मैं आँख बंद करता हूँ। तुम मेरा हाथ पकड़ कर अपनी चूत पर रख देना।” मैंने हाँ में सिर हिलाया। उसने अपनी आँखें बंद कर ली तो मैं उसका हाथ पकड़ कर बोली, “चोरी छिपे देख मत लेना, ओके, मैं तुम्हारा हाथ अपनी चूत पर रख रही हूँ।” मैंने चूत पर उसका हाथ रख दिया। फिर अपना हाथ हटा लिया। उसके हाथ का स्पर्श चूत पर लगते ही मेरे बदन में सनसनाहट होने लगी। गुदगुदी की वजह से चूत में तनाव बढ़ने लगा। उस पर से जब उसने चूत को छेड़ना शुरु किया तो मेरी हालत और भी खराब हो गयी। वो पूरी चूत पर हाथ फ़ेरने लगा। फिर जैसे ही चूत के अंदर अपनी अंगुली घुसाने की चेष्टा की तो मेरे मुँह से सिसकारी निकल गयी। वो चूत में अंगुली घुसाने के बाद चूत की गहराई नापने लगा। मुझे इतना मज़ा आने लगा कि मैंने चाहते हुए भी उसे नहीं रोका। उसने चूत की काफ़ी गहराई में अँगुली घुसा दी थी।

मैं लगातार सिसकारी ले रही थी। मेरी बाप से चुदी हुई चूत का कोना कोना जलने लगा। तभी उसने एक हाथ मेरी गाँड के नीचे लगाया और कमर को थोड़ा ऊपर करके चूत को चूमना चाहा। उसने अपनी आँख खोल ली थी और होंठों को भी इस प्रकार खोल लिया था जैसे चूत को होंठों के बीच में दबाने का मन हो। मेरी हल्की झाँटों वाली चूत को होंठों के बीच दबा कर जब उसने चूसना शुरु किया तो मैं और भी बुरी तरह छटपटाने लगी। उसने कस कस कर मेरी चूत को चूसा और चन्द ही पलों में चूत को इतना गरम कर डाला कि मैं बर्दाश्त नहीं कर पायी और होंठों से कामुक सिसकारी निकालने लगी। इसके साथ ही मैं कमर को हिला-हिला कर अपनी चूत उसके होंठों पर रगड़ने लगी।

उसने समझ लिया कि उसके द्वारा चूत चूसे जाने से मैं गरम हो रही हूँ। सो उसने और भी तेज़ी से चूसना शुरु किया, साथ ही चूत के सुराख के अंदर जीभ घुसा कर गुदगुदाने लगा। अब तो मेरी हालत और भी खराब होने लगी। मैं ज़ोर से सिसकारी ले कर बोली, “मृदुल यह क्या कर रहे हो। इतने ज़ोर से मेरी चूत को मत चूसो और ये तुम छेद के अंदर गुदगुदी... उई... मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा है। प्लीज़ निकालो जीभ अंदर से, मैं पागल हो जाऊँगी।” मैं उसे निकालने को जरूर कह रही थी मगर एक सच यह भी था कि मुझे बहुत मज़ा आ रहा था। चूत की गुदगुदाहट से मेरा सारा बदन कांप रहा था। उसने तो चूत को छेद-छेद कर इतना गरम कर डाला कि मैं बर्दाश्त नहीं कर पायी। मेरी चूत का भीतरी हिस्सा रस से गील हो गया। उसने कुछ देर तक चूत के अंदर तक के हिस्से को गुदगुदाने के बाद चूत को मुक्त कर दिया। मैं अब एक पल भी रुकने की हालत में नहीं थी। जल्दी से उसके बदन से लिपट गयी और लंड को पकड़ने का प्रयास कर रही थी कि उसे चूत में डाल लूंगी कि उसने मेरी टांगों को पकड़ कर एकदम ऊँचा उठा दिया और नीचे से अपना मोटा लंड मेरी चूत के खुले हुए छेद में घुसाने की कोशिश की।

वैसे तो चूत का दरवाज़ा आम तौर पर बंद होता था। मगर उस वक्त क्योंकि उसने टांगों को ऊपर की ओर उठा दिया था इसलिये छेद पूरी तरह खुल गया था। रस से चूत गीली हो रही थी। जब उसने लंड का सुपाड़ा छेद पर रखा तो ये भी एहसास हुआ कि छेद से और भी रस निकलने लगा। मैं एक पल को तो सिसकिया उठी। जब उसने चूत में लंड घुसाने की बजाये हल्का सा रगड़ा, मैं सिसकारी लेकर बोली, “घुसाओ जल्दी से। देर मत करो प्लीज़।” उसने लंड को चूत के छेद पर अड़ा दिया। मैंने जानबूझ कर अपनी टाँगें थोड़ी बंद कर ली जिससे कि लंड चूत में आसानी से न घुसाने पाये। मेरी हालत तो ऐसी हो चुकी थी कि अगर उसने लंड जल्दी अंदर नहीं किया तो शायाद मैं पागल हो जाऊँ। वो अंदर डालने की कोशिश कर रहा था। मैं बोली, “क्या कर रहे हो जल्दी घुसाओ न अंदर। उफ़ उम्म अब तो मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा है। प्लीज़ जल्दी से अंदर कर दो।”

वो बार-बार लंड को पकड़ कर चूत में डालने की कोशिश करता और बार-बार लंड दूसरी तरफ़ फ़िसल जाता। मैं उससे एक प्रकार का खेल खेल रही थी कि लंड चूत में आसानी से न जाने पाये। वो परेशान हो रहा था और मुझे मजा आ रहा था। मैं सिसकियाने लगी, क्योंकि चूत के भीतरी हिस्से में ज़ोरदार गुदगुदी सी हो रही थी। मैं बार बार उसे अंदर करने के लिये कहे जा रही थी। तभी उसने कहा, “उफ़्फ़ तुम्हारी चूत का सुराख तो इस कदर छोटा है कि लंड अंदर जाने का नाम ही नहीं ले रहा है मैं क्या करूँ?”

“तुम तेज़ झटके से घुसाओ अगर फिर भी अंदर नहीं जाता है तो फ़ाड़ दो मेरी चूत को।” मैं जोश में आ कर बोल बैठी। मेरी बात सुनकार वो भी बहुत जोश में आ गया और उसने ज़ोर का धक्का मारा। एकदम जानलेवा धक्का था, भक से चूत के अंदर पूरा लंड समा गया, इसके साथ ही मेरे मुँह से एक मस्ती की सिसकारी निकल गई। चूत के एकदम बीचो बीच धंसा हुआ उसका लंड खतरनाक लग रहा था। मैं ऐसी एक्टिंग करने लगी जैसे कि पहली बार चुद रही हूँ। “मॉय गॉड! मेरी चूत तो सचमुच फ़ट गयी उफ़्फ़ दर्द सहन नहीं हो रहा है। ओह मृदुल धीरे-धीरे करना, नहीं तो मैं मर जाऊँगी।”

“नहीं यार! मैं तुम्हे मरने थोड़ी ही दूँगा।” वो बोला और लंड को हिलाने लगा तो मुझे ऐसा अनुभव हुआ जैसे चूत के अंदर बवन्डर मच हुआ हो। जब मैंने कहा कि थोड़ी देर रुक जाओ, उसके बाद धक्के माराना तो उसने लंड को जहाँ का तहाँ रोक दिया और हाथ बढ़ा कर मेरी चूची को पकड़ कर दबाने लगा। चूची में कठोरता पूरे शबाब पर आ गयी थी और जब उसने दबाना शुरु किया तो मैं और उत्तेजित हो गई। कारण मुझे चूचियों का दबवाया जाना अच्छा लग रहा था। मेरा तो यह तक दिल कर रहा था कि वो मेरे निपल को मुँह में लेकर चूसटा। इससे मुझे आनंद भी आता और चूत की ओर से ध्यान भी बंटता। मगर टाँग उसके कंधे पर होने से उसका चेहरा मेरे निपल तक पहुँच पाना एक प्रकार से नामुमकिन ही था। तभी वो लंड को भी हिलाने लगा। पहले धीरे-धीरे उसके बाद तेज़ गति से। चूची को भी एक हाथ से मसल रहा था। चूत में लंड की हल्की-हल्की सरसराहट अच्छी लगने लगी तो मुझे आनंद आने लगा। पहले धीरे और उसके बाद उसने धक्कों की गति तेज़ कर दी। एकाएक मृदुल बोला, “तुम्हारी चूत इतनी कमसिन और टाईट है कि क्या कहूँ?”

उसकी बात सुनकार मैं मुसकरा कर रह गयी। मैंने कहा, “मगर फिर भी तो तुमने फ़ाड़ कर लंड घुसा ही दिया।”

“अगर नहीं घुसाता तो मेरे ख्याल से तुम्हारे साथ मैं भी पागल हो जाता।” मैं मुसकरा कर रह गयी। वो तेज़ी से लंड को अंदर बाहर करने लगा था। उसके मुकाबले मुझे ज्यादा मज़ा आ रहा था। कुछ देर में ही उसका लंड मेरी चूत की गहराई को नाप रहा था। उसके बाद भी जब और ठेल कर अंदर घुसाने लगा तो मैं बोली, “और अंदर कहाँ करोगे, अब तो सारा का सारा अंदर कर चुके हो। अब बाकी क्या रह गया है?”

“रंजना जान! जी तो कर रहा है कि बस मैं घुसाता ही जाऊँ।” यह कह कर उसने एक जोरदार थाप लगाई। उसके लंड के ज़ोरदार प्रहार से मैं मस्त हो कर रह गयी थी। ऐसा आनंद आया कि लगा उसके लंड को चूत की पूरी गहरायी में ही रहने दूँ। उसी में मज़ा आयेगा। यह सोच कर मैंने कहा, “हाय। और अंदर। घुसाओ। गहरायी में पहुँचा दो।” मृदुल अब कस कस के धक्के मारने लगा, तो एहसास हुआ कि वाकय जो मज़ा चुदाई में है वो किसी और तरीके से मौज-मस्ती करने में नहीं है। उसका ८ इन्च का लंड अब मेरी चूत की गहराई को पहले से काफ़ी अच्छी तरह नाप रहा था। मैं पूरी तरह मस्त होकर मुँह से सिसकारी निकालने लगी। पता नहीं कैसे मेरे मुँह से एकदम गन्दी-गन्दी बात निकलने लगी थी। जिसके बारे में मैंने पहले कभी सोचा तक नहीं था।

“फाड़ड़... दो मेरी चूत को आहह प...पेलो और तेज़ पेलो टुकड़े टुकड़े कर दो मेरी चूत के।” एकाएक मैं झड़ने के करीब पहुँच गयी तो मैंने मृदुल को और तेज़ गति से धक्के मारने को कह दिया। अब लंड मेरी चूत को पार कर मेरी बच्चेदानी से टकराने लगा था। तभी चूत में ऐसा संकुचन हुआ कि मैंने खुद-ब-खुद उसके लंड को ज़ोर से चूत के बीच में कस लिया। पूरी चूत में ऐसी गुदगुदाहट होने लगी कि मैं बर्दाश्त नहीं कर पायी और मेरे मुँह से ज़ोरदार सिसकारी निकलने लगी। उसने लंड को रोका नहीं और धक्के मारता रहा। मेरी हालत जब कुछ अधिक खराब होने लगी तो मेरी रुलायी छुट निकली। वो झड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था। मेरे रो देने पर उसने लंड को रोक लिया और मुझे मनाने का प्रयास करने लगा। मैं उसके रुक जाने पर खुद ही शाँत हो गयी और धीरे-धीरे मैं अपने बदन को ढीला छोड़ने लगी। कुछ देर तक वो मेरी चूत में ही लंड डाले मेरे ऊपर पड़ा रहा। मैं आराम से कुछ देर तक साँस लेती रही। फिर जब मैंने उसकी ओर ध्यान दिया तो पाया कि उसका मोटा लंड चूत की गहराई में वैसे का वैसा ही खड़ा और अकड़ा हुआ पड़ा था। मुझे नॉर्मल देखकर उसने कहा, “कहो तो अब मैं फिर से धक्के माराने शुरु करूँ।”

“मारो, मैं देखती हूँ कि मैं बर्दाश्त कर पाती हूँ या नहीं।” उसने दोबारा जब धक्के मारने शुरु किये तो मुझे लगा जैसे मेरी चूत में काँटे उग आये हों। मैं उसके धक्के झेल नहीं पायी और उसे मना कर दिया। मेरे बहुत कहने पर उसने लंड बाहर निकालना स्वीकार कर लिया। जब उसने बाहर निकाला तो मैंने राहत की साँस ली। उसने मेरी टांगों को अपने कंधे से उतार दिया और मुझे दूसरी तरफ़ घुमाने लगा तो पहले तो मैं समझ नहीं पायी कि वो करना क्या चाहता है। मगर जब उसने मेरी गाँड को पकड़ कर ऊपर उठाया और उसमें लंड घुसाने के लिये मुझे आगे की ओर झुकाने लगा तो मैं उसका मतलब समझ कर रोमाँच से भर गयी। मैंने खुद ही अपनी गाँड को ऊपर कर लिया और कोशिश की कि गाँड का छेद खुल जाये। उसने लंड को मेरी गाँड के छेद पर रखा और अंदर करने के लिये हल्का सा दबाव ही दिया था कि मैं सिसकी लेकर बोली, “थूक लगा कर घुसाओ।” उसने मेरी गाँड पर थूक चुपड़ दिया और लंड को गाँड पर रखकर अंदर डालने लगा। मैं बड़ी मुशकिल से उसे झेल रही थी। दर्द महसूस हो रहा था। कुछ देर में ही उसने थोड़ा सा लंड अंदर करने में सफ़लता प्राप्त कर ली थी। फिर धीरे-धीरे धक्के मारने लगा, तो लंड मेरी गाँड के अंदर रगड़ खाने लगा ।

तभी उसने अपेक्षाकृत तेज़ गति से लंड को अंदर कर दिया। मैं इस हमले के लिये तैयार नहीं थी, इसलिये आगे की ओर गिरते-गिरते बची। सीट की पुश्त को सख्ती से पकड़ लिया था मैंने। अगर नहीं पकड़ती तो जरूर ही गिर जाती। मगर इस झटके का एक फ़ायादा यह हुआ कि लंड आधा के करीब मेरी गाँड में धंस गया था। मेरे मुँह से दर्द भरी सिसकारियां निकलने लगीं, “उफ़... आहह... मर गयी। फ़ट गयी मेरी गाँड। हाय ओह।” उसने अपना लंड जहाँ का तहाँ रोक कर धीरे-धीरे धक्के लगाने शुरु किये। मुझे अभी आनंद आना शुरु ही हुआ था कि तभी वो तेज़-तेज़ झटके मारता हुआ काँपने लगा। लंड का सुपाड़ा मेरी गाँड में फूल और पिचक रहा था।

“आहह मेरी जान मज़ा आ..आया... आईई” कहता हुआ वो मेरी गाँड में ही झड़ गया। मैंने महसूस किया कि मेरी गाँड में उसका गाढ़ा और गरम वीर्य टपक रहा था। उसने मेरी पीठ को कुछ देर तक चूमा और अपने लंड को झटके देता रहा। उसके बाद पूरी तरह शाँत हो गया। मैं पूरी तरह गाँड मरवाने का आनंद भी नहीं ले पायी थी। एक प्रकार से मुझे आनंद आना शुरु ही हुआ था। उसने लंड निकाल लिया। मैं कपड़े पहनते हुए बोली, “तुम बहुत बदमाश हो। शादी से पहले ही सब कुछ कर डाला।” वो मुसकराने लगा। बोला, “क्या करता, तुम्हारी कमसिन जवानी को देख कर दिल पर काबू रखना मुश्किल हो रहा था। कईं दिनों से चोदने का मन था, आज अच्छा मौका था तो छोड़ने का मन नहीं हुआ। वैसे तुम इमानदारी से बताओ कि तुम्हे मज़ा आया या नहीं?” उसकी बात सुनकार मैं चुप हो गयी और चुपचाप अपने कपड़े पहनती रही। मैं मुसकरा भी रही थी। वो मेरे बदन से लिपट कर बोला, “बोलो न! मज़ा आया?”

“हाँ” मैंने हौले से कह दिया।

“लेकिन रंजना डार्लिंग मेरा तो अभी पूर मन नहीं भरा है। दिल करता है कि इस सुनसान जगह पर हम दोनों पूरी रात यूँ ही गुजार दें।”

“दोनों तरफ़ का बाजा बजा चुके हो फिर भी मन नहीं भरा तुम्हारा?”

“नहीं ! बल्कि अब तो और ज्यादा मन बेचैन हो गया है। पहले तो मैंने इसका स्वाद नहीं लिया था, इसलिये मालूम नहीं था कि चूत और गाँड चोदने में कैसा मज़ा आता है। एक बार चोदने के बाद और चोदने का मन कर रहा है। और मुझे यकीन है कि तुम्हारा भी मन कर रहा होगा।”

“नहीं मेरा मन नहीं कर रहा है”

“तुम झूठ बोल रही हो। दिल पर हाथ रख कर कहो।”

मैंने दिल की झूठी कसम नहीं खायी। सच कह दिया कि वाकय मेरा मन नहीं भरा है। मेरी बात सुनने के बाद वो और भी ज़िद करने लगा। कहने लगा कि “प्लीज़ मान जाओ न! बड़ा मज़ा आयेगा। सारी रात रंगीन हो जायेगी।”

मैंने कहा, “नहीं मृदुल आज नहीं। फिर कभी पूरी रात रंगीन करेंगे। लेकिन यह काम अकेले सम्भव नहीं, कुछ साथियों की भी मदद लेनी होगी। अभी तो हमें घर जाना चाहिये।”

एकाएक उसने मेरे हाथ में अपना लंड पकड़ा दिया और बोला, “घर के बारे में नहीं, इसके बारे में सोचो। यह तुम्हारी चूत और गाँड का दिवाना है। और तुम्हारी चूत माराने को उतावला हो रहा है।” यह कहते हुये उसने मुझे लंड पकड़ा दिया। उसके लंड को पकड़ने के बाद मेरा मन फिर उसके लंड की ओर मुड़ने लगा। उसे मैं सहलाने लगी। उसके लंड को जैसे ही मैंने हाथ में लिया था, उसमें उत्तेजना आने लगी। वो बोला, “देखो फिर खड़ा हो रहा है। अगर मन कर रहा है तो बताओ चलते-चलते एक बार और चुदाई का मज़ा ले लिया जाये।” यह कहते हुए उसने लंड को आगे बढ़ कर चूत से सटा दिया। उस वक्त तक मैंने जींस और पैंटी नहीं पहनी थी। वो चूत पर लंड को रगड़ने लगा। उसके रगड़ने से मेरी चूत पानी छोड़ने लगी। मेरे मन में चुदाई का विचार आने लगा था। मगर मैंने अपनी भावनाओं पर काबू पाने का प्रयास किया। उसने मेरी चूत में लंड घुसाने के लिये हल्का सा धक्का मारा। मगर लंड एक ओर फ़िसल गया। मैंने जल्दी से लंड को दोनों हाथों से पकड़ लिया, और बोली, “चूत में मत डालो। या तो इसे ठंडा कर लो या फिर मैं किसी और तरीके से इसे ठंडा कर देती हूँ।”



RohitKapoor
Rookie
Posts: 39
Joined: 22 Oct 2014 17:03

रद्दी वाला (रचयिता: काजल गुप्ता)

Unread post by RohitKapoor » 29 Oct 2014 00:52

“तुम किसी और तरीके से ठंडा कर दो। क्योंकि ये खुद तो ठंडा होने वाल नहीं है।” मैं उसके लंड को पकड़ कर दो पल सोचती रही फिर उस पर तेज़ी से हाथ फ़िराने लगी। वो बोला, “क्या कर रही हो?”

“मैंने एक सहेली से सुना है कि लड़के लोग इस तरह झटका देकर मूठ मारते हैं और झड़ जाते हैं।”

वो मेरी बात सुनकार मुसकरा कर बोला, “ऐसे मज़ा तो लिया जाता है मगर तब, जब कोइ प्रेमिका न हो। जब तुम मेरे पास हो तो मुझे मूठ मारने की क्या जरूरत है?”

“समझो कि मैं नहीं हूँ?”

“ये कैसे समझ लूँ। तुम तो मेरी बाँहों में हो।” कह कर वो मुझे बांहों में लेने लगा। मैंने मना किया तो उसने छोड़ दिया। वो बोला, “कुछ भी करो। अगर चूत में नहीं तो गाँड में।” कह कर वो मुसकराने लगा। मैं इठला कर बोली, “धत्त।” “तो फिर मुँह से चूस कर मुझे झाड़ दो।” मैं “नहीं-नहीं” करने लगी।

आखिर में मैंने गाँड मराना पसन्द किया। फिर मैं घोड़ी बनकार गाँड उसकी तरफ़ कर घूम गयी। उसने मेरी गाँड पर थोड़ा सा थूक लगाया और अपने लंड पर भी थोड़ा सा थूक चुपड़ा और लंड को गाँड के छेद पर टिका कर एक ज़ोरदार धक्का मारा और अपना आधा लंड मेरी गाँड में घुसा दिया। मेरे मुँह से कराह निकल गयी, “आइई मम्मीई मार दिया फ़ाड़ दी। बचा लो मुझे मेरी गाँड ऊफ़ उउम बहुत दर्द कर रहा है।” उसने दो तीन झटको में ही अपना लंड मेरी गाँड के आखिरी कोने तक पहुँचा दिया। ऐसा लगा जैसे उसका लंड मेरी अंतड़ियों को चीर डाल रहा हो। मैंने गाँड में लंड डलवाना इसलिये पसन्द किया था, कि पिछली बार मैं गाँड मरवाने का पूरा आनंद नहीं ले पायी थी और मेरा मन मचलता ही रह गया था, वो झड़ जो गया था। अब मैं इसका भी मज़ा लूंगी ये सोच कर मैं उसका साथ देने लगी। गाँड को पीछे की ओर धकेलने लगी। वो काफ़ी देर तक तेज़ तेज़ धक्के मारता हुआ मुझे आनन्दित करता रहा। मैं खुद ही अपनी २ अंगुलियां चूत में डाल कर अंदर बाहर करने लगी। एक तो गाँड में लंड का अंदर बाहर होना और दूसरा मेरा अंगुलियों से अपनी चूत को कुचलना; दो तरफ़ा आनंद से मैं जल्द ही झड़ने लगी और झड़ते हुए बड़बदने लगी, “आह मृदुल मेरे यार मज़ा आ गया चोदो राजा ऐसे ही चोदो मुझे। मेरी गाँड का बाजा बजा दो। हाय कितना मज़ा आ रहा है।” कहते हुए मैं झड़ने लगी, वो भी ३-४ तेज़ धक्के मारता हुआ बड़बड़ाता हुआ झड़ने लगा, “आहह ले मेरी रानी आज तो फ़ाड़ दूँगा तेरी गाँड, क्या मलाई है तेरी गाँड में... आह लंड कैसे कस कस कर जा रहा है.. म्म्म” कहता हुआ वो मेरी पीठ पर ही गिर पड़ा और हांफ़ने लगा। थोड़ी देर ऐसे ही पड़े रहने के बाद, हम दोनों ने अपने अपने कपड़े पहने। तभी मृदुल ने पूछा, “रंजना तुम ने कहा था कि कुछ साथियों की मदद लेनी होगी, उस समय मैं कुछ समझा नहीं।”

मैंने कहा, “देखो मृदुल तुम एक लड़के हो। घर से रात भर बाहर रहने का अपने घर वालों से सौ बहाने बना सकते हो। पर मैं एक लड़की हूँ और मेरे लिये ऐसा सम्भव नहीं।” अब मैंने मृदुल का मन टटोलने का निश्चय किया। “मृदुल आज तो तुमने जवानी का ऐसा मजा चखाया कि अब तो मैं तुम्हारी दिवानी हो गई हूँ। मैं तो ऐसा मजा रात भर खुल के चखने के लिये कुछ भी कर सकती हूँ। बोलो तुम ऐसा कर सकते हो?” मृदुल मेरे से भी ज्यादा इस मजे को लेने के लिये पागल था, फ़ौरन बोला, “अरे तुम बन्दोबस्त तो करो। जिन साथियों की मदद लेनी है लो। तुम कहोगी तो उन से गाँड भी मरवा लुँगा।”

उसकी बात सुनते ही मुझे बरबस हँसी आ गई। मैंने कहा, “देखो आज तुमने मेरी गाँड का बाजा बजाया है तो इसके लिये तुम्हें गाँड तो मरवानी पड़ेगी, फिर पीछे मत हट जाना।” मेरी बात सुन के मृदुल ओर व्याकुल हो गया और बोला। “रंजना! अभी तो तुम्हारी माँ भी घर पर नहीं है क्यों न मुझे घर ले चलो और अपने कमरे में छुपा लो।” मुझे अचानक पापा की कही बात याद आ गई कि क्यों न हम सब मिलके इस खेल का मजा लूटें। फिर भी मैंने मृदुल से कहा, “देखो मृदुल तुम अब मेरे सब कुछ हो। घर पर पापा से बच के तुम रात मेरे साथ नहीं गुजार सकते। पर मैं अपने पापा को इसके लिये भी राजी कर सकती हूँ।” मेरी बात सुन के मृदुल हक्का बक्का सा मेरे मुँह की तरफ़ देखने लगा। “देखो हमारा परिवार बहुत खुला हुआ है और हमारे घर के बंद कमरों में बहुत कुछ होता रहाता है। तुम यदि मुझे हमेशा के लिये अपनी बनाना चाहते हो तो तुम्हें भी हमारे परिवार का एक हिस्सा बनना होगा।” मेरी बात सुन के मृदुल पहले से भी ज्यादा असमंजस की स्थिति में आ गया। तभी मैंने चुटकी ली, “अभी तो कह रहे थे कि मेरे लिये तुम्हें अपनी गाँड मरवानी भी मँजूर है। अब क्या देख रहे हो। आज रात मेरे घर आ जाओ। साथ ही खाना पीना करेंगे और तुम्हारा पापा से परिचय भी करवा दूँगी। फिर पापा की मर्जी... हमें रात भर साथ रहने दें या न दें।”

मेरी बात सुनते ही मृदुल का चेहरा कमल सा खिल उठा। मैंने जैसे उसके मन की बात कह दी हो। अब मृदुल की बारी थी। “तो यह कहो न कि मुझे तेरे बाप से गाँड मरवानी होगी।” मैंने उसके गाल को चूमते हुये कहा। “अरे नहीं यार। देखो मैं अभी पापा से मोबाइल पर बात करती हूँ और सारे इन्तज़ाम हो जायेंगे।”

“सारे इन्तज़ाम से तुम्हारा क्या मतलब?”

“मतलब खाने पीने से है।” मैंने मुसकरा कर कहा। मैंने कार से ही पापा से मोबाइल पर बात की और कहा कि आज मेरा दोस्त खाने पर घर आने वाला है। पापा ने बताया कि वे शाज़िया को ले कर सारा इन्तज़ाम करके घर जल्द पहुँच जायेंगे। मैंने मृदुल को यह बात बता दी। तब मृदुल ने कहा कि, “यार रंजना तुम तो बड़ी छुपी रुस्तम निकलीं। मैं तो अभी से हवा में उड़ने लगा हूँ। पर एक बात तो बताओ... तुम्हारे पापा का मिजाज कैसा है। मैं तो पहली बार उनसे मिलूँगा। मेरा तो अभी से दिल धड़कने लगा है।” तब मैंने हँस कर कहा, “अरे मेरे पापा बहुत ही खुले दिमाग के और फ्रेंक है। मेरे लिये तो वैसे ही हैं जैसे तुम मेरे लिये हो।” मेरी इस द्विअर्थी बात को मृदुल ठीक से नहीं समझ सका पर उसके चेहरे पर तसल्ली के भाव आगये। फिर मेरे मन में ख्याल आया कि अभी तो पापा के घर पहुँचने में काफी देर है... क्यों न दोनों सज-धज के एक साथ घर पहुँच के पापा को सरप्राइज़ दें। मैंने मन की बात मृदुल को बताई तो उसने मोबाइल से अपने घर में खबर दे दी कि आज रात वह अपने दोस्त के घर रहेग। वहाँ से हम कार ड्राईव करके शहर के सबसे शानदार ब्यूटी पार्लर में पहुँचे। ब्यूटी पार्लर से फ़ारिग होते होते रात के ९ बज चुके थे। ब्यूटी पार्लर से निकल के मैंने कार अपने घर की तरफ़ मोड़ दी।

घर पर पापा ने ही दरवाजा खोला। पापा हम दोनों को लेके ड्राइंग रूम में आ गये। वहाँ शाज़िया पहले से ही बैठी थी। पापा ने कहा, “हम तुम दोनों की ही राह देख रहे थे, वह भी बड़ी बेचैनी से।” उसके बाद मैंने मृदुल का परिचय पापा से करवाया। मैं देख रही थी कि पापा गहरी निगाहों से मृदुल की ओर देखे जा रहे थे। पापा के चेहरे को देख कर लग रहा था कि वो मृदुल से मिलके बहुत खुश हैं। फिर मैंने मृदुल का परिचय शाज़िया से करवाया। मृदुल शाज़िया को एक टक देखे जा रहा था। साफ़ ज़ाहिर हो रहा था कि शाज़िया उसे बहुत पसन्द आ रही है। एकाएक मैं बोली, “मृदुल शाज़िया मेरी भी बहुत अच्छी दोस्त है और पापा की तो खासम खास है।” तभी पापा ने कहा, “यार, रंजना तुम्हारी पसन्द लाजबाब है। तुम दोनों ने एक दूसरे को पसन्द कर लिया है तो फिर तुम दोनों दूर दूर क्यों खड़े हो। साथ बैठो, इंजॉय करो।” पापा की बात सुन के मैं मृदुल के साथ एक सोफ़े पर बैठ गई और दूसरे सोफ़े पर पापा शाज़िया के साथ बैठ गये।

करीब आधे घन्टे तक हम चारों सोफ़े पर बैठे हुये बातें करते रहे। इस दौरान मृदुल पापा और शाज़िया से बहुत खुल गया। मृदुल पापा के खुलेपन से बहुत प्रभावित था और बार बार पापा की प्रसंशा कर रहा था। फिर हम सबने खाने पीने का प्लान बनाया। पापा ने पूरी तैयारी कर रखी थी। मैं और शाज़िया मिल के डायनिंग टेबल पर खाना सजाने लगे। सारा सामान मौजूद था। मैंने जिस दिन जिन्दगी में पहली बार शराब चखी थी उसी दिन अपने पापा से चुद गई थी और आज फिर मुझे वही व्हिस्की पेश की जा रही थी। मुझे आश्चर्य हुआ कि मृदुल मंझे हुये शराबी की तरह पापा और शाज़िया का साथ दे रहा था। खाना पीना समाप्त होने के बाद पापा हम सब को लेके अपने आलिशान रूम में आ गये। पापा ने मौन भंग किया। “भई अब हम चारों पक्के दोस्त हैं और दोस्ती में किसी का भी कुछ किसी से छुपा हुआ नहीं होना चाहिये। ज़िन्दगी इंजॉय करने के लिये है और अपने अपने तरीके से सब खुल के इंजॉय करो।” मृदुल को शराब पूरी चढ़ गई थी और झूमते हुए बोला, “हाँ पापा ठीक कहते हैं।” पापा ने मृदुल से कहा, “भइ हमें तुम्हारी और रंजना की जोड़ी बहुत पसन्द आई। अभी तक कुछ किया या नहीं, या बिल्कुल कोरे हो।” मृदुल हंसते हुये बोला, “सर आपकी और शाज़िया जी की जोड़ी भी क्या कम है।” पापा ने नहले पर दहला मारा, “पर हम तो कोरे नहीं है।” मृदुल भी नशे की झौंक में बोल पड़ा, “कोरे तो हम भी नहीं हैं।”

मृदुल की बात सुनते ही पापा ने मेरी आँखों में आँखें डाल के देखा। “पापा वो सब आज ही हुआ है। इसका जी नहीं भरा तो मुझे आपको फोन करना पड़ा।”

“हूँ तो तुम दोनों पूरा मजा लूट के आये हो। खैर अब क्या इरादा है अकेले-अकेले या दोस्ती में मिल बाँट के?” पापा ने जब मृदुल की निगाहों में झांका तो मृदुल मुझसे बोला, “क्यों रन्जू डार्लिंग क्या इरादा है।” अब मैं भी रंग में आ गई थी और बोली, “मैंने तो तुम्हें पहले ही कहा था कि हमारे यहाँ सब चलता है। देखना चाहते हो तो देखो।” यह कहते हुए मैंने शाज़िया को पापा की ओर धकेल दिया। पापा ने जल्दी ही उसे बाँहों में ले लिया। मेरी ओर मृदुल की झिझक दूर करने के लिये शाज़िया पापा से लिपट गयी और उनके होंठों को चूमने लगी। फिर पापा शाज़िया को गोद में ले सोफ़े पर बैठ गये और बोले, “देखो हम तो अपनी जोड़ीदार को अपनी गोद में खिलाते हैं। अब तुम लोगों को भी ज़िन्दगी का लुत्फ़ लेना है तो खुल के लो। इस खेल का असली मजा खुल के खेलने में ही आता है।” मृदुल पहले ही शराब के नशे में पागल था और पापा का खुला निमंत्रण पाके वो मुझे भी खींच के अपनी गोद में बिठा लिया और मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिये। मृदुल मेरी चूची दबाने लगा तो पापा ने भी शाज़िया के मम्मो पर हाथ रख दिया और उसकी चूचियों को सहलाने लगे। मैं शाज़िया की ओर देखकर मुसकराई। शाज़िया भी मुसकरा दी और फिर पापा के बदन से लिपट कर उन्हें चूमने लगी। फिर शाज़िया मेरी ओर देख के, सोफ़े के नीचे पापा के कदमों में बैठ गई और पापा की पैंट उतार दी। फिर उसने पापा का अंडरवीयर भी उनकी टांगों से निकाल दिया। फिर उसने झुक कर पापा का लंड दोनों हाथों में पकड़ा और सुपाड़े को चाटने लगी।

अब मुझ से ओर बर्दाश्त नहीं हुआ ओर मैंने भी उसकी देखा देखी, मृदुल के सारे कपड़े उतार दिये और उसके लंड को मुँह में ले लिया और उसके सुपाड़े को चूसने लगी। मुझे जितना मज़ा आ रहा था उससे कहीं ज्यादा मज़ा शाज़िया को पापा का लंड चूसने में आ रहा था, यह मैंने उसके चेहरे को देखकर अंदाज़ लगाया था। वो काफ़ी खुश लग रही थी। बड़े मज़े से लंड के ऊपर मुँह को आगे पीछे करते हुए वो चूस रही थी। थोड़ी देर बाद उसने लंड को मुँह से निकाला और जल्दी-जल्दी अपने निचले कपड़े उतारने लगी। मुझसे नज़र टकराते ही मुसकरा दी। मैं भी मुसकराई और मस्ती से मृदुल के लंड को चूसने में लग गयी। कुछ देर बाद ही मैं भी शाज़िया की तरह मृदुल के बदन से अलग हो गयी और अपने कपड़े उतारने लगी। कुछ देर बाद हम चारों के बदन पर कोई कपड़ा नहीं था।

पापा शाज़िया की चूत को चूसने लगे तो मेरे मन में भी आया कि मृदुल भी मेरी चूत को उसी तरह चूसे। क्योंकि शाज़िया बहुत मस्ती में लग रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे वो बिना लंड घुसवाये ही चुदाई का मज़ा ले रही है। उसके मुँह से बहुत ही कामुक सिसकारियाँ निकल रही थीं। मृदुल भी मेरी टांगों के बीच में झुक कर मेरी चूत को चाटने चूसने लगा तो मेरे मुँह से भी कामुक सिसकारियाँ निकलने लगी। कुछ देर तक चूसने के बाद ही मेरी चूत बुरी तरह गरम हो गयी। मेरी चूत में जैसे हज़ारों कीड़े रेंगने लगे। मैंने जब शाज़िया की ओर देखा तो पाया उसका भी ऐसा ही हाल था। मेरे कहने पर मृदुल ने मेरी चूत चाटना बंद कर दिया। एकाएक मेरी निगाह पापा के लंड की ओर गयी, जिसे थोड़ी देर पहले शाज़िया चूस रही थी। लंड उसके मुँह के अंदर था इसलिये मैं उसे ठीक से देख नहीं पायी थी। अब जब मैंने अच्छी तरह देखा तो मुझे पापा का लंड बहुत पसन्द आया। और क्यों न पसन्द आता। यही तो वह था जिसने मुझे ज़िन्दगी में पहली बात इस अनोखे मजे से अवगत कराया था। बस मेरा मन कर रहा था कि एक बार मैं पापा का लंड मुँह में लेकर चूसूँ। यह सोच कर मैंने कहा, “यार ! क्यों न हम चारों एक साथ मज़ा लें। जैसे ब्लू फिल्म में दिखाया जाता है।”

अब पापा और शाज़िया भी मेरी ओर देखने लगे। शाज़िया बोली, “हम चारों दोस्त हैं। इसलिये आज अगर कोई भी किसी के साथ जैसे मन चाहे वैसे मजा ले सकता है। क्यों मृदुल, मैं गलत कह रही हूँ?”

“नहीं, यह तो और अच्छा है। तब तो हमें भी पापा की अमानत पर हाथ साफ करने का मौका मिलेगा।” मृदुल ने अपने मन की बात कह दी।

मैंने कहा, “मान लो मृदुल अगर तेरी चूत चाटे तो मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ना चाहिये। उसी प्रकार अगर मैं पापा का लंड मुँह में ले लूँ तो बाकी तुम तीनों को फ़र्क नहीं पड़ेगा। मैं ठीक कह रही हूँ न?” मेरी बात का तीनों ने समर्थन किया। मैं जानती थी कि किसी को मेरी बात का कोई ऐतराज़ नहीं होगा। क्योंकि एक प्रकार से मैंने सबके मन की इच्छा पूरी करने की बात कही थी। सब राजी हो गये तो मैंने आइडिया दिया कि बिल्कुल ब्लू फ़िल्म की तरह से जब मर्ज़ी होगी तब लड़का या लड़की बदल लेंगे। मेरी यह बात भी सबको पसन्द आ गयी। उसी समय मृदुल ने शाज़िया को खींचकर अपने सीने से लगा लिया और उसके सीने पर कशमीरी सेब की तरह उभरे हुए मम्मों को चूसने लगा। और मैं सीधे पापा के लंड को चूसने में लग गयी। उनके मोटे लंड का साइज़ था तो मृदुल जैसा ही मगर मुझे पापा के लंड को चूसने में कुछ ज्यादा ही आनंद आ रहा था। मैं मज़े से लंड को मुँह में काफ़ी अंदर डाल कर अंदर-बाहर करने लगी। उधर शाज़िया भी मृदुल के लंड को चूसने में लग गयी थी। तभी पापा ने मेरे कान में कहा, “तुम्हारी चूत मुझे अपनी ओर खींच रही है। कहो तो मैं तुम्हारी चूत अपने होंठों में दबाकर चूस लूँ?” यह उन्होंने इतने धीमे स्वर में कहा था कि मेरे अलावा कोई और सुन ही नहीं सकता था। मैंने मुसकरा कर हाँ में सिर हिला दिया। वो मेरी जाँघों पर झुके तो मैंने अपनी टांगों को थोड़ा सा फ़ैला कर अपनी चूत को खोल दिया। वो पहले तो मेरी चूत के छेद को जीभ से सहलाने लगे। मुझे बहुत मज़ा आने लगा था। मैं उन्हें काट-काट कर चूसने के लिये कहने वाली थी, तभी उन्होंने ज़ोर से चूत को होंठों के बीच दबा लिया और खुद ही काट काट कर चूसने लगे। मेरे मुँह से कामुक सिसकारियां निकलने लगीं। “आह ऊफ़्फ़्फ़ पापा धीरे काटो। आहह हाय..मम्मम्म बहुत मज़ा आ रहा है।” अब तो मैं और भी मस्त होने लगी और मेरी चूत रस से गीली होने लगी। वो फाँकों को मुँह में लेकर जीभ रगड़ रहे थे। मैंने मृदुल की ओर देखा तो पाया कि वो भी शाज़िया की चूत को चूसने में लगा हुआ था। शाज़िया के मुँह से इतनी ज़ोर से सिसकारियाँ निकल रही थीं कि अगर बिलकुल सटा हुआ कोई घर होता तो उस तक आवाज़ पहुँच जाती और वो जान जाते कि यहाँ क्या हो रहा है। “खा जाओ चूसो और ज़ोर से। साले काट ले मेरी चूत। हाय माज़ा आ रहा है... उफ़्फ़ ऊह। हाय मृदुल चूसो मेरी चूत। मैं भी देखूँ तुम मेरे सर की बेटी को खुश रखोगे या नहीं।”

खैर मेरी चूत को चूसते हुए जब पापा ने चूत को बहुत गरम कर दिया तो मैं जल्दी से उनके कान में बोली, “अब और मत चूसो। मैं पहले ही बहुत गरम हो चुकी हूँ। आप जल्दी से अपना लंड मेरी चूत में डाल दो वरना मृदुल का दिल आ जाएगा। जल्दी से एक ही झटके में घुसा दो।” वो भी मेरी चूत में अपना लंड डालने को उतावले हो रहे थे। मैंने पापा के साथ चुदवाने का इसलिये मन बन लिया था ताकि मुझे एक नये तरीके का मज़ा मिल सके। पापा ने लंड को चूत के छेद पर रख कर अंदर की ओर ढकेलना शुरु किया तो मैं इस डर में थी कि कहीं मृदुल मेरे पास आकर यह न कह दे कि वो मुझे पहले चोदना चाहता है। मैंने जब उसकी ओर देखा तो वो अब तक शाज़िया की चूत को ही चूस रहा था। उसका ध्यान पूरी तरह चूत चूसने की ओर ही था। मैंने इस मौके का लाभ उठाने का मन बनाया और चूत की फाँकों को दोनों हाथों से पकड़ कर फ़ैला दिया ताकि पापा का लंड अंदर जाने में किसी प्रकार की परेशानी न हो। और जब उन्होंनें मेरी चूत में लंड का सुपाड़ा डाल कर ज़ोर का धक्का मारा तो मैं सिसकिया उठी। उनका लंड चूत के अंदर लेने के लिये एकाएक मन कुछ ज्यादा ही बेताब हो गया। मैंने जल्दी से उनका लंड एक हाथ से पकड़ कर अपनी चूत में डालने की कोशिश करनी शुरु कर दी। एक तरफ़ मेरी मेहनत और दूसरी तरफ़ उनके धक्के, उन्होंनें एकदम से तेज़ धक्का मार कर लंड चूत के अंदर आधा पहुँचा दिया। ज्यादा मोटा न होने के बावजूद भी मुझे उनके लंड का झटका बहुत आनंद दे गया और मैं कमर उछाल-उछाल कर उनका लंड चूत की गहराई में उतरवाने के लिये उतावली हो गयी।

तभी मैंने मृदुल की ओर देखा। वो भी शाज़िया को चोदने की तैयारी कर रहा था। उसने थूक लगा कर शाज़िया की चूत में लंड घुसाया तो शाज़िया सिसकारी लेकर बोली, “हाय अल्लाह! कितना मोटा है। हाय रंजना तू तो निहाल हो गई। देख रही है तेरे लवर का लंड क्या मुस्टन्डा है। ये तो मेरी नाज़ुक चूत को फ़ाड़ ही देगा। ओहहह हाय अल्लाह… इसे धीरे धीरे घुसाओ। मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा है।” वो मेरी ओर देख कर कह रही थी। उसकी हालत देखकर मुझे हँसी आ रही थी। क्योंकि मुझे मालूम था कि वो जरूर एक्टिंग कर रही होगी। क्योंकि वो पक्की खेली खाई राँड थी। इसका सबूत ज़रा ही देर में मिल गया, जब वो सिसकारी लेते हुए मृदुल के लंड को जड़ तक पहुंचाने के लिये कहने लगी। मृदुल ने ज़ारेदार धक्का मार कर अपना लंड उसकी चूत की जड़ तक पहुँचा दिया था। इधर मेरी चूत में भी पापा के लंड के ज़ोर्दार धक्के लग रहे थे।

कुछ देर बार मृदुल ने कहा, “अब हम लोग पार्टनर बदल लें तो कैसा रहेगा?” वैसे तो मुझे मज़ा आ रहा था मगर फिर भी तैयार हो गयी। पापा ने मेरी चूत से लंड निकाल लिया। मैं मृदुल के पास चली गयी। उसने शाज़िया की चूत से लंड निकाल कर मुझे घोड़ी बनाकर मेरे पीछे से चूत में लंड पेल दिया। एक झटके में आधा लंड मेरी चूत में समा गया। इस आसन में लंड चूत में जाने से मुझे थोड़ी परेशानी हुई मगर मैं झेल गयी। उधर मैंने देखा कि पापा ने शाज़िया की चूत में लंड घुसाया और फिर तेज़ी से धक्के मारने लगे। साथ ही उसकी चूचियों को भी मसलने लगे। कुछ ही देर बाद हमने फिर पार्टनर बदल लिये। अब मेरी चूत में फिर से पापा का लंड था। उधर मैंने देखा कि शाज़िया अब मृदुल की गोद में बैठ कर उछल रही थी, और नीचे से मृदुल का मोटा लंड उसकी चूत के अंदर बाहर हो रहा था। वो सिसकारी लेकर उसकी गोद में एक प्रकार से झूला झूल रही थी। मैंने पापा की ओर इशारा किया तो उन्होंनें भी हामी भर दी। मैं उनकी कमर से लिपट गयी। दोनों टाँगें मैंने उनकी कमर से लपेट दी थीं और उनके गले में बाँहें डाले मैं झूला झूलते हुए चुदवा रही थी। बहुत मस्ती भरी चुदाई थी। कुछ देर बाद लंड के धक्के खाते खाते मैं झड़ने लगी। मेरी चूत में सँकुचन होने लगा जिससे पापा भी झड़ने लगे। उनका वीर्य रस मेरी चूत के कोने कोने में ठंडक दे रहा था, बहुत आनंद आ रहा था। उसके बाद उन्होंनें मेरी चूत से लंड बाहर निकाल लिया।

उधर वो दोनों भी झड़-झड़ा कर अलग हो चुके थे। मस्ती करते-करते ही मैंने फ़ैसला कर लिया था कि इस बार गाँड में लंड डालवायेंगे। जब मैंने पापा और मृदुल को अपनी मंशा के बारे में बताया तो वो दोनों राज़ी हो गये। शाज़िया तो पहले से ही राज़ी थी शायाद। हम सबने तेल का इन्तज़ाम किया। तेल लगा कर गाँड मरवाने का यह आइडिया शाज़िया का था। शायाद वो पहले भी इस तरीके से गाँड मरवा चुकी थी। तेल आ जाने के बाद मैंने मृदुल के लंड को पहले मुँह में लेकर चूस कर खड़ा किया और उसके बाद उसके खड़े लंड पर तेल चुपड़ दिया और मालिश करने लगी। उसके लंड की मालिश करके मैंने उसके लंड को एकदम चिकना बना दिया था। उधर शाज़िया पापा के लंड को तेल से तर करने में लगी हुई थी। मृदुल के लंड को पकड़ कर मैंने कहा, “इस बार तेल लगा हुआ है, पूरा मज़ा देना मुझे।”

“फ़िक्र मत करो मेरी रंजना जान।” वो मुसकरा कर बोला और वह मेरी गाँड के सुराख पर लंड रगड़ता रहा। उसके बाद एक ही धक्के में अपना आधा लंड मेरी गाँड में डाल दिया। मेरे मुँह से न चाहते हुए भी सिसकारी निकलने लगी। जितनी आसानी से उसका लंड अपनी चूत में मैं डलवा लेती थी, उतनी आसानी से गाँड में नहीं। खैर जैसे ही उसने दूसरा धक्का मार कर लंड को और अंदर करना चाहा, मैं अपने पर काबू नहीं रख पायी और आगे की ओर गिरी ओर वो भी मेरे साथ मेरे बदन से लिपटा मेरे ऊपर गिर पड़ा। एकाएक वो नीचे की ओर हो गया और मैं उसके ऊपर, दबाव से उसका सारा लंड मेरी गाँड में समा गया। मैं मारे दर्द के चीखने लगी। “हाय फ़ाड़ दी मेरी। आह गाँड। कोईई बचा लो म...मुझे उफ़्फ़ ऊह। पापा देखो न तुम्हारा दामाद तेरी बेटी की गाँड फाड़ रहा है। हाय बचाओओ...” मैं उससे छूटने के लिये हाथ पैर माराने लगी तो उसने मुझे खींच कर अपने से लिपटा लिया और तेज़ी से उछल-उछल कर गाँड में घुसे पड़े लंड को हरकत देन शुरु कर दिया। मेरी तो जान जा रही थी। ऐसा लग रहा था कि आज मेरी गाँड जरूर फ़ट जायेगी। मैं बहुत मिन्नत करने लगी तो उसने मुझे बराबर लिटा दिया और तेज़ी से मेरी गाँड मारने लगा। बगल में होने से वैसे तो मुझे उतना दर्द नहीं हो रहा था मगर उसका मोटा लंड तेज़ी से गाँड के अंदर बाहर होने में मुझे परेशानी होने लगी।

मैं शाज़िया की ओर नहीं देख पायी कि वो कैसे गाँड मराई का मज़ा ले रही है, क्योंकि मुझे खुद के दर्द से फ़ुरसत नहीं थी। मृदुल काफ़ी देर से धक्के मार रहा था मगर वो झड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था। तभी मैंने पाया कि शाज़िया ज़ोर ज़ोर से उछल रही थी और पापा को बार बार मुक्त करने की लिये कह रही थी। इस तरह सुबह तक हमने कुल मिलाकर चार बार चुदाई का आनंद लिया।

॥॥।समाप्त॥॥