Holi sexi stories-होली की सेक्सी कहानियाँ

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The Romantic
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Re: Holi sexi stories-होली की सेक्सी कहानियाँ

Unread post by The Romantic » 26 Dec 2014 08:31

ससुराल की पहली होली-3

" क्यों देवर जी तुम्हे ऐसा ही विदा कर दें "

लेकिन अबकी चमेली भाभी रवी की और से बोल उठीं।

" अरे ऐसा गजब मत करियेगा। इतना चिकना माल , ऐसी कसी कसी गांड ( और अपनी बात सिद्ध करने के लिए रवी के दोनों चूतड़ों को फैला के गांड का छेद दिखाया भी , वास्तव में खूब कसा था। )

और इंहा इतने लौंडेबाज रहते हैं , फिर होली का दिन ,… मार मार के इनकी गांड फुकना कर देंगे। महीना भर गौने के दुल्हिन कि तरह टांग फैला के चलेंगे। "

" फिर तो ,… यही हो सकता है की हम लोग इनको अपने कपडे पहना दें , साडी , चोली। कम से कम इज्जत तो बच जायेगी। " भोली बन के मैंने सुझाव दिया , जिसे सर्वसम्मति से मान लिया गया।

फिर देवर जी का श्रृंगार शुरू हो गया।
और साथ में गाना भी

" अरे देवर को नार बनाओ रे देवर को "


सबसे पहले मैंने अपनी पैंटी में उस तन्नाये खूंटे को बंद किया। फिर कपडे पहनाने का काम चमेली और नीरा भाभी ने सम्हाला , और श्रृंगार का काम मेरे जिम्मे।

चमेली भाभी ने अपना पेटीकोट उतार के उन्हें पहना दिया तो एक पुरानी गुलाबी साडी , नीरा भाभी ने उन्हें पहना दी।

मैंने पैरों में महावर लगाया , घुँघर वाली चौड़ी पायल पहनायी , बिछुए पहनाये , और फिर हाथ में कुहनी तक हरी हरी चूड़ियाँ। कान नाक में छेद नहीं होने की परेशानी नहीं थी।

मेरे पास स्प्रिंग वाली छोटी सी नथ थी और बड़े बड़े झुमके , बस वो पहना दिए। गले में मटर माला। होंठो पे गाढ़ी लाल लिपस्टिक , आँखों में काजल , मस्कारा , और सब मेकअप खूब गाढ़ा , जैसे मेरे ससुराल की रेड लाइट एरिया , कालीनगंज में बैैठने वाली लग रही हों।

चमेली भाभी ने ब्रा और चोली पहनायी लेकिन मुझे कुछ 'मिसिंग' लग रहा था और ऩीने दो रंग भरे गुबारे , ब्रा के अंदर ऐडजस्ट कर दिए।

बाल भी फिर से काढ़ के मैंने औरतों की तरह सीधी मांग निकाल दी।

मस्त रंडी लग रही है , मुस्करा के नीरा भाभी ने बोला। फिर उन्हें कुछ याद आया ,

" एक कसर बाकी है " उन्होंने आँख नचा के मुझसे कहा।
" क्या भाभी ," मैंने पूछा।

" सिन्दुरदान " वो बोलीं।
छुटकी भौजी मैं थी तो ये काम भी मैंने कर दिया और नीरा भाभी से कहा , "

" भाभी , सिन्दुरदान तो हो गया , अब सुहागरात भी तो मनानी चाहिए "
" एकदम निहुरा साली को " अबकी जवाब चमेली भाभी ने दिया और जबरन पकड़ा के निहुरा भी दिया और पेटीकोट भी उठा दिया।
नीरा भाभी ने पैंटी घुटने तक सरका दी और मुझसे कहा ,

" मार लो साल्ली की , सिन्दुरदान तूने किया पहला हक़ तेरा है "

और मेरे कुछ समझने के पहले , चमेली भाभी ने एक गुलाल भरा मोटा कम से कम ७ इंच लम्बा कंडोम मेरे हाथ में थमा दिया।

और मेरे कुछ समझने के पहले , चमेली भाभी ने एक गुलाल भरा मोटा कम से कम ७ इंच लम्बा कंडोम मेरे हाथ में थमा दिया।

बस क्या था , घचाघच , घचाघच, पूरी ताकत से मैंने पेल दिया।


एक बात तो अब तक मैं सीख ही चुकी थी की बुर चोदने में भले कोई रहम दिखा दे , गांड मारने में कतई रहम नहीं दिखाना चाहिए।

न मारने वाले को मजा आता है और न मरवाने वाले को।

और सबसे बड़ी बात ये थी की चमेली और नीरा भाभी ने जिस तरह से उनसे निहुरा रखा था , वो एक सूत भी हिल डुल नहीं सकता था।

गुलाल से भरा कंडोम का डिल्डो आलमोस्ट ७ इंच अंदर था। और अब मैं उसे गोल गोल घुमा रही थी।

" कल मैंने क्या कहा था , आज देखेंगे कौन डालता है , कौन डलवाता है। " नीरा भाभी , मेरी जेठानी ने देवर को छेड़ा।

गुलाल भरा कंडोम आलमोस्ट बाहर निकाल के एक धक्के में पूरा अंदर डाल के मैंने पूछा , " बोल भेजेगा न , शाम को अपनी उस रंडी बहन को "

" हाँ भाभी , हाँ " रवी बोला और मैंने अब डिल्डो , अपनी जेठानी के हाथ में पकड़ा दिया।

लेकिन सबसे हचक के गांड मारी चमेली भाभी ने , पूरी ताकत से। और फिर उसे अंदर ठेल के पैंटी पहना के खड़ा कर दिया।

हम तीनो ने उन्हें नारी वेश में बाहर कर के दरवाजा बंद कर लिया।

"जाके अपनी बहन से निकलवाना इसे " पीछे से नीरा भाभी बोलीं।

हमने थोड़ी देर सांस ली होगी , अपने कपडे ठीक किये होंगे ,बाल्टी में फिर से रंग घोला होगा की दरवाजे पे फिर से खट खट हुयी।

रेहन और नितिन थे , दोनों इनके लंगोटिया यार , इसलिए मेरे 'स्पेशल ' देवर।

हमने थोड़ी देर सांस ली होगी , अपने कपडे ठीक किये होंगे ,बाल्टी में फिर से रंग घोला होगा की दरवाजे पे फिर से खट खट हुयी।

रेहन और नितिन थे , दोनों इनके लंगोटिया यार , इसलिए मेरे 'स्पेशल ' देवर।

रिसेप्शन में इनके सामने ही दोनों ने कहा था , " साले इत्ता मस्त माल ले आया है , हम छोड़ेंगे नहीं" और मुझसे बोला " भौजी , आने दो होली , बचोगी नहीं आप। "


मैं कौन मजाक में पीछे रहने वाली थी , मैंने भी बोला।
" अरे फागुन में देवर से बचना कौन चाहता है , "


पिछली होली मायके में मनी इसलिए मैं बच गयी थी। और मैं जानती थी अबकी ये दोनों छोड़ने वाले नहीं।


दोनों कि निगाह इनके सामने भी मेरे चोली फाड़ जोबन पे रहती थी , और मैं भी कभी झुक के कभी उभार के ललचाती रहती थी।

हम तीन थे और ये दो , लेकिन अमिन समझ गयी की वो पक्का प्लान बना के आये हैं।

नितिन ने चमेली भाभी और नीरा भाभी को उलझाया और बची मैं और रेहन।


मैंने समझती थी कि उससे अकेले पर पाना मुश्किल है , इसलिए मैंने भागने में ही भलाई समझी।

आगे आगे मैं पीछे रेहन।

और मैं स्टोर रूम में घुस गयी.
और यही मेरी गलती थी। ( लेकिन एक मीठी सी गलती)

स्टोर रूम घर के ऐसे कोने में था , जहाँ कुछ भी हो , पूरे घर में उसका अंदाज भी नहीं लग सकता था।

छोटा सा कमरा , वहाँ कुछ पुराने फर्नीचर पड़े थे। आलमोस्ट अँधेरा , बस एक बहुत छोटा सा रोशनदान।

दौड़ते भागते मैं थक गयी थी , कुछ सांस भी फूल गयी थी। मैं एक पुरानी मेज का सहारा लेके झुक के खड़ी थी।
और तब तक दरवाजा बंद होने कि आवाज हुयी , रेहन। वो ठीक मेरे पीछे था।
और जब तक मैं कुछ करती , उसके रंग लगे हाथ मेरे गोरे मुलायम गालों पे थे।

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Re: Holi sexi stories-होली की सेक्सी कहानियाँ

Unread post by The Romantic » 26 Dec 2014 08:31



गालों पे लाल रंग रगड़ते , रेहन ने चिढ़ाया।
" भाभी मैंने बोला था न की , इस होली में नहीं छोडूंगा। "

" वो देवर असली देवर नहीं है , जो भाभी को होली में छोड़ दे " मैंने भी होली के मूड में जवाब दिया।
वो इस तरह मुझसे पीछे से चिपका था की मैं हिल डुल भी नहीं सकती थी। मेरे दोनों हाथ अभी भी मेज पे थे।


और रेहन का एक हाथ मेरे गोरे चिकने पेट पे था जहाँ वहा काही नीला रंग लगा रहा था।


मेरा आँचल कब का ढलक चूका था और चोली फाड़ जोबन लो कट ब्लाउज से खुल के झाँक रहे थे , रेहन को ललचा रहे थे।

लेकिन रेहन ने ब्लाउज में हाथ डालने की कोशिश नहीं की। पेटे पे रंग रहे उसके हाथ ने बस ब्लाउज के सारे बटन खोल दिए। बड़े बड़े जोबन के चलते ऊपर के दो बटन तो बंद ही नहीं थे , रवी से होली के चक्कर में एक बटन गायब हो चूका था , बस तिन बचे जो रेहन ने खोल दिए


और साथ ही फ्रंट परं ब्रा का हुक भी।

मेरी दोनों रसीली चूंचिया , छलक कर बाहर आ गयीं।




" भाभी जान , होली के दिन भी इन्हे बंद कर के , देवरों से छुपा के रखना एकदम गलत है। "

दोनों जोबन को कस के रगड़ते मसलते वो बोला।

बड़ी बेरहमी से वो मेरी चूंची मसल रहा था। राजीव भी रगड़ते थे लेकिन प्यार से।

पूरी ताकत से , मेरी चूंची वो दबा रहा था , कुचल रहा था , पीस रहा था।

दर्द हो रहा था मुझे मैं हलके हलके चीख भी रही थी।


लेकिन ये मैं भी जानती थी और रेहन भी की अगर में खूब जोर से चिलाउं तो भी घर में नहीं सुनायी पड़ने वाला था और इस समय तो होली का हंगामा , बाहर से लाउड स्पीकर पे होली के गानो की आवाज
, कोई सवाल ही नहीं था।


और अब मुझे उस दर्द में भी एक नया मजा मिलने लगा। एक ऐसा मजा , जिसे मैं आज तक जानती भी नहीं थी।
और उसी समय , रेहन ने पूरी ताकत से मेरे खड़े निपल्स को पुल कर दिया।

दर्द से मैं चीख उठी। " नहीं देवर जी ऐसे नहीं प्लीज लगता है " मैंने बोला।

" " तो क्या भाभी जान ऐसे " उसने दूसरा निपल पहले से भी ज्यादा जोर से पुल किया , और मेरी आँखों से आंसू का एक कतरा , मेरे गालों पे छलक पड़ा

रेहन ने पहले तो उसे चाटा , फिर कचकचा के काट लिया।

" अरे देवर जी क्या करते हो निशाँ पड़ जाएगा। " मैं बोली।

" अरे भाभी जान यही तो मैं चाहता हूँ की आपके इस देह पे आपके देवर रेहन का निशान हर जगह पड़ जाये , जिससे आपको अपने इस प्यारे देवर की याद आती रहे "

और उसी के साथ कचकचा के एक चूंची पे उसने पूरी ताकत से काट लिया और दूसरी पे अपने सारे नाखूनों के निशान गोद दिए।

मजे की बात ये थी कि अब मुझे ये सब बहुत अच्छा लग रहा था।

और साथ उसने एक हाथ से मेरा पेटीकोट और साडी कमर तक उठा दी और अब मैंने ऊपर और नीचे दोनो ओर से नंगी थी।

" अरे होली भाभी से खेलनी है , भाभी के कपड़ों से थोड़े ही खेलनी है। " रेहन बोला।

रंग अब आगे पीछे दोनों और लग रहा था। उसका बल्ज मेरे नंगे चूतड़ों से रगड़ खा रहा था। और रेहन ने मेरा हाथ खीच के अपने बल्ज पे रख के जोर से दबाया ,

" भाभी जान देखिये , कितना रंग है आपके देवर की पिचकारी में ".
मस्ती से मेरी भी हालत ख़राब थी। तब तक रेहन कि जींस सरसराती नीचे गिर गयी और उसका मोटा खूंटा ,

मैंने उसे पकड़ने में थोड़ी आनाकानी कि उसने चार जबरदस्त हाथ मेरे चूतड़ों पे जड़ दिए। फूल खिल आये गुलाबी वहाँ।

मैंने फिर लंड हाथ में पकड़ने की कोशिश की। इतना मोटा था कि मुश्कल से हाथ में समां रहा था , और लम्बा भी खूब।

थोड़ी देर तक वो चूतड़ और चूत के बीच रगड़ता रहा , मस्ती से मेरी आँखे मुंदी जा रही थीं। बस मन कर रहा था चोद दे हचक कर ,

रवी मेरे देवर के साथ मस्ती से हालत खरा ब हो रही थी। उसके पहले सुबह जान का बम्बू देख चुकी थी।

रेहन भी न , अब वो जोर जोर से मेरे बूब्स और क्लिट साथ साथ रगड़ रहा था , बस मन कर रहा था की , लेकिन रेहन को तड़पाने में मुझे मजा आ रहा था।

अंत में उसने मेरे मुंह से कहलवा ही लिया की मैं उससे चुदना चाह रही हं।


लेकिन उसने मुझे नीचे बैठाया और बोला ,

"भाभी जरा पिचकारी को चूम चाट तो लो और लंड से ही जोर से एक बार मेरे गाल पे , चांटे कि तरह लगा.

और मैंने मुंह खोल के उसका सुपाड़ा अंदर ले लिया , और जोर जोर से चूसने लगी।


कुछ ही देर में वो मेरा सर पकड़ के जोर जोर से मेरा मुंह चोद रहा था।

मैं लाख गों गों करतीं रही लेकिन वो हलक़ तक धकेल के ही माना।

मैं भी जोर जोर से चूसतीं रही , और जो वो झडने को हुआ , तो लड पूरा बाहर निकालकर , सारी की सारी मलायी , मेरे चेहरे , बालों पे और रस लगे सुपाड़े को मेरी चूंचियों पे जोर जोर से मसल के लगाया।

"मैंने ये तय किया था कि आप से पहली होली लंड के रंग से ही खेलूंगा " मुस्करा के रेहन ने बोला।

तब तक रोशनदान से मैंने देखा की कुछ औरतों का झुण्ड हमारे घर की ओर आ रहा है।

मैंने रेहन को बोला चलो निकलो लगता है ये सब यही आ रही हैं और फिर मुझे ढूँढ़ेंगीं।

निकळते निकलते रेहन बोला भाभी ये होली का ट्रेलर था , असली होली चुन्मुनिया के साथ खेलनी है , मेरी चूत मसलते हुए बोला।

" अरे देवर जी , अभी तो शाम को होली होनी है , यहाँ तो होली रंगपंचमी तक चलती है , मैं ही कौन छोड़ने वालीं हूँ , आपकी पिचकारी को पिचका के ही दम लुंगी। "


मैंने भी जोर से उसके लंड को दबाते हुए जवाब दिया।

बाहर निकल कर उसका दोस्त मिला , और जिस तरह उसने इशारा किया लग रहा था की , नीरा भाभी के साथ वो 'एक राउण्ड खेल 'चूका है।

इतने देवर आये मैंने गिन नहीं सकती थी।


पड़ोस के लड़के , इनके दोस्त , दूर दराज के रिश्तेदार , बस एक चीज कामन थी ,शायद ही कोई ऐसा देवर बचा हो जिसने मेरे ब्लाउज के अंदर हाथ डाल के जोबन का रस न लिया हो और अपना खूंटा न पकड़वाया हो।


और जो थोड़े बहुत हिम्मती होते थे , वो रामप्यारी को भी सहला देते ऊँगली कर देते। लेकिन मैं , चमेली भाभी और नीरा भाभी के साथ मिल के बराबर का मुकाबला कर रही थी , कितनो के कपडे फटे , अगवाड़े पिछवाड़े हर जगह रंग ही नहीं लगा , कई देवर चमेली भाभी के ऊँगली के भी शिकार हुए।


और देवरों के लंड मुठियाने में नीरा भाभी भी हम लोगों से पीछे नहीं थी।

एक बिचारा छोटा देवर , ८-९ में पढता होगा , नीरा भाभी ने उसकी हाफ पैंट सरका के नीचे कर दी और मुठियाने के साथ उसी से उसकी बहनो को एक से एक गालियां दिलवायी और फिर बोला , " खड़ा मैने कर दिया है , झड़वाना चुन्नी से जा के "


लेकिन उस के निकलने के पहले चमेली भाभी ने उसे निहुरा दिया और मुझसे बोला ,

" कोमल देख , अभी इस साल्ले ने गांड मरवाना शुरू किया है कि नहीं। "

मैं क्यों पीछे रहती , इतना चिकना देवर था। मैंने भी घचाक से एक ऊँगली अंदर की , और बोला

नहीं भाभी अभी तो एकदम कच्ची कली है। "

नीरा भाभी ने मुझे ललकारा , " अरे तो कर दे न निवान साल्ले काओ , अच्छा मुहूरत है। होली के दिन गांड मरवाना शुरू करेगा तो उमर भर के लिए गांडू बनेगा। कितने लौण्डेबाजों का भला करेगा।

अपनी जिठानी कि बात भला मैं कैसे टालती।

लेकिन जो मजा औरतों कि होली में आया वो इससे भी १० गुना था।

न कोई रिश्ते का बंधन , न कोई उमर का लिहाज।

चमेली भाभी की भाषा में बोलूं तो कच्चे टिकोरे वालियों से लेकर बड़े रसीले आमों वाली तक।


ननदों की जो टोली आयी उसमें कुछ फ्राक में थी , कुछ टॉप स्कर्ट में और कुछ शलवार कुर्ते वाली। ज्यादातर कुँवारी थी लेकिन कुछ शादी शुदा भी , साडी में।


एक ननद कि शादी अभी कुछ महीने पहले ही हुयी थी। उसके हस्बेंड कल आने वाले थे। चमेली भाभी ने उसी को धर दबोचा और साडी उठा के सीधे अपनी चूत से चूत रगड़ते हुए बोलीं

" अरे ननदोई नहीं है तो क्या चल भौजी से मजा ले ".



नीरा भाभी ने मुझे एक टिकोरे वाली की और इशारा किया , लाली पड़ोस की थी अभी दसवें में गयी थी।

मैंने उसे पीछे से धर दबोचा और एक झटके में फ्राक का ऊपर का हिस्सा फाड़ के अलग , सफेद ब्रा मेरे लाल रंग के रंगे हाथों से लाल हो गयी और थोड़ी देर में जमीन पे थे।

कस कस के मैंने उसकी चूंची मलते पूछा ,

" क्यों मेरे देवरों से दबवाना अभी शुरू किया कि नहीं "
" नहीं भाभी " शर्मा के वो बोली।
" अरे मैंने तो सूना था कि मेरी सारी ननदें , चौदह की होते ही चुदवाना शुरू कर देती है , और तू ,…चल मैं ही अपने किसी देवर से तेरी सेटिंग कराती हूँ। " और ये कह के मैंने उसकी चड्ढी भी खींच दी।


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Re: Holi sexi stories-होली की सेक्सी कहानियाँ

Unread post by The Romantic » 26 Dec 2014 08:33

ससुराल की पहली होली-4

झांटें बस आना शुरू ही हुयी थीं। मैंने थोड़ी देर तक तो उस कच्ची कली की मक्खन सी चूत को सहलाया फिर एक झटके में उंगली अंदर पेल दी।

लेकिन तब तक खूब जोर का शोर हुआ , और मैंने देखा की चमेली भाभी के यहाँ बाजी पलट चुकी थी। ५-६ ननदें एक साथ , और अब चमेली भाभी नीचे थीं।

एक शलवार वाली उनकी खुली जांघो के बीच धीमे धीमे एक पूरी लाल रंग कि बाल्टी उड़ेल रही थी। " भाभी अब तोहार चूत की गरमी कुछ शांत होई।

एक शादी शुदा ननद , अपनी बुर उनके मुंह में रगड़ रही थी और दो चार कम उम्र कि ननदे भाभी की चूंचियों पे रंग लगा रहै थी।

और मेरी भी खूब दूरगत हुयी , आखिर नयकी भौजी जो थी।

लेकिन मुझे मजा भी बहुत आया। कोई ननद नहीं बची होगी , ज्सिकी चूत में मैंने उंगली न की हो। और कोई ननद नहीं होगी जिसने मेरी चूंचियों पे रंग नहीं लगाया और चूत नहीं मसली।

लेकिन तबक तक कालोनी से भाभियों की एक टोली आयी और फिर बाजी पलट गयी।

और भाभियों की टोली में एक ग्रूप , ' इन्हे ' ढूंढते हुए , मेरे कमरे में पहुंचा।

बिचारे निर्वस्त्र घेर लिए गए। बस मेरी ब्रा पैटी थी उसी में उन्हें पहना कर भाभियाँ उनके हाथ पैर पकड़ के , घर के पीछे बने एक चहबच्चे में ले जा के डाल दिया। वहाँ पहले से ही रंग कीचड़ सब भरा था।




चार पांच भाभियाँ उसी में उतर गयी और उनकी वो रगडयाइ हुयी कि पूछिए मत। बड़ी देर के बाद जब वो निकल पाये , और मुश्किल से नीरा भाभी ने उन्हें कपडे दिए और साथ में रंग की एक बड़ी सी ट्यूब।

" भौजाइयों के साथ बहुत होली खेल लिए अब जरा अपनी बहन के साथ भी अपनी पिचकारी की ताकत जा के दिखाओ और हाँ ये पेंट की ट्यूब ले जाओ उस मीता छीनार की चूंचियों पे जम के लगाना और बोलना शाम को जरूर आये। "

उनकी जान बची और वो भागे।

मैं भी छत पे ऊपर चली गयी।

करीब बारह बज रहा था और चार घंटे से लगातार , होली चल रही थी। थोड़ी देर के अल्प विराम के लिए मैं छत पे चली गयी

और छत पहुँच के घर के बाहर का होली का हंगामा देखने को मिला।

क्या नजारा था।

बगल कालोनी लड़कियों औरतो की होली चल रही थी। रंग से सराबोर कपडे , देह से चिपके , सारे कटाव उभार दिखातीं , ललचाती।

जो कभी जरा सा दुपट्टे के सरकने पे परेशान हो जाती थीं , वो आज जवानी के सारे मंजर दिखा रही थीं। उभरती चूंचिया , भरे भरे चूतड़ , सब कुछ शलवार , साडी से चिपक के जान मार रहा था। लेकिन एक तेज शोर ने मेरा ध्यान सड़क की खींचा।


ढेर सारे हुरियारे , एक ठेले पे माइक लगाए शोर मचाते , टीन , कनस्तर , ढोल बजाते , कबीर गाते , गन्दी गन्दी गालियां , और वो भी मोहल्ले की औरतों का नाम ले ले के , और बीच बीच में जोर जोर से नारे लगाते ,

ये भी बुर में जायेंगे लौंडे का धक्का खायँगे

होलिका रानी ज़र गयीं , बुर चोदा , ई कह गयीं।

और सबसे मजेदार था एक आदमी जो सबसे आगे था और गधे पे बैठा था और जोर जोर से गालियां दे रहा था।

कुछ औरतें घर की छतों पर से उन पर बाल्टी , पिचकारी से रंग फ़ेंक रही थी और उन औरतों का नाम ले ले के वो एक से एक गन्दी गालियां दे रहे लेकिन वो सब मजे ले रही थीं

अचानक की उस हुजूम ने मुझे उन्हें देखते हुए देख लिया। फिर तो तुफान मच गया।

ले गाली ले गाली ,

अरे कोमल भौजी , खोला केवाड़ी , उठावा तू साडी ,

तोहरी बुर में चलायब हम गाडी

और फिर कबीर,…

चना करे चुरमुरुर , चिवड़ा मचामच अरे चिवड़ा मचामच ,

अरे कोमल भौजी टांग उठावा , अरे चोदब घचागच , अरे चोदब गचागच।

हो कबीरा सारर साररर , खूब चली जा हो खूब चली जा


एक पल के लिए मैंने सोच हट जाऊं , लेकिन होली की मस्ती मुझे भी पागल कर दे रही थी।

जैसे ही वो गधे वाला मेरी छत के सामने से निकला , मैंने रंग भरे गुब्बारे एक के बाद एक उन सबो पे मारे और उधर से भी पिचकारी की बौछार सीधे मेरी चोली पे ,

जाते जाते वो बोला , " अरे भौजी , तानी चोली का गुब्बारा दा न

औ दो गुबारे भीगे देह से एकदम चिपके ब्लाउज से रगड़े और उस के पिछवाड़े दे मारा

" हे भौजी , तनी चोली क गुब्बरवा हमहुँ के दे देती न " पीछे से जोरदार बाहों ने सीधे मेरे कहा।

मुड़ कर देखा तो और कौन, मेरा फेवरिट देवर जान
स्ट्रांग , मैनली , मस्क्युलर , जिम टोंड सिक्स पैक्स ,

जोर से उसने अपनी बांहो के नागपाश में भींच लिया और मेरे गालो पे चुम्बन के गुलाब खिलाता बोला ,

मैंने सोचा आज तो पास से हैप्पी होली बोल दूँ।

कुछ नाराजगी , कुछ मुस्कान के साथ मैंने उसे मुड़ के देखा।

सिर्फ एक टी शर्ट और छोटे से बाक्सर शार्ट में वो ,

" हे कोई देख लेगा तो और आये कैसे "

' अरे भौजी घबड़ाओ मत , छत का दरवाजा मैंने बंद कर दिया है , और वैसे भी नीचे आँगन में जो उधम है आधे एक घंटे तक किसी को आपको सध लेने की फुरसत नहीं होगी। और जहाँ तक आने का सवाल है , सिम्पल छत लांघ के "