सलीम जावेद की रंगीन दुनियाँ

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The Romantic
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Re: सलीम जावेद की रंगीन दुनियाँ

Unread post by The Romantic » 06 Nov 2014 15:00


चौधराइन
भाग 7 - चौधराइन का जलवा

अगले दिन बेला खुशी खुशी चौधराइन के घर की ओर दौड़ गई। उसके पेट मे अपनी ये सफ़लता पच नहीं रही थी। चौधराइन ने जब बेला को देखा तो, उसके चेहरे पर मुस्कान फैल गई। हँसती हुई बोली,
“क्या रे, कैसे रास्ता भुल गई ?…कहाँ गायब थी…?। थोड़ा जल्दी आती, अब तो मैंने नहा भी लिया..”

बेला बोली, -“का कहे मालकिन, घर का बहुत सारा काम …। फिर तालाब पर नहाने गई तो वहां…”

“क्यों, क्या हुआ तालाब पर…?”

“छोड़ो मालकिन, तालाब के किस्से को. आप कुर्सी पर बैठो ना, बिना तेल के ही सही थोड़ी बहुत तो सेवा कर ही दूँ ।”

“अरे कुछ नहीं, रहने दे …”

पर बेला के जोर देने पर माया देवी पर बैठ गई । बेला पास बैठ कर माया देवी के पैरों के तलवे को अपने हाथ में पकड़ हल्के हल्के मसलते हुए दबाने लगी।
महा बदमाश बेला ने माया देवी तालाब का जिक्र कर जिज्ञासा तो पैदाकर दी फ़िर मक्करी से इधर उधर की बकवास करने लगी । कुछ देर तक तो माया देवी उसकी बकवास सुनती रहीं फ़िर उनके पेट की खलबली ने उन्हें बेला से पूछने पर मजबूर कर दियाउन्होंने हँसते हुए पूछा –“ क्या हुआ तालाब पर…?”

“अरे कुछ नहीं मालकिन,,पता नही… जरा सी गलत्फ़हमी में बात कहाँसे कहाँ पहुँच जाती है । मैंने तो जो कुछ देखा उससे जो समझ में आया वो किया अब मुझे क्या पता था बात इतनी बढ़ जायेगी कि……!
“अरे कुछ बतायेगी भी या यों ही बक बक किये जायेगी……!”
चौधराइन ने डाँटा।
बेला –“ अब क्या बताऊँ मालकिन कल सुबह मैंने मदन बाबू को आम के बगीचे की तरफ से आते हुए देखा था, तो फिर…॥”

माया देवी चौंक कर बैठती हुई बोली,
“क्या मतलब है तेरा…? वो क्यों जायेगा सुबह-सुबह बगीचे में !?”

“अब मुझे क्या पता क्यों गये थे ?… मैंने तो सुबह में उधर से आते देखा, फ़िर मैंने मैंने लाजो और बसन्ती को भी आते हुए देखा ।… लाजो तो नई पायल पहन ठुमक-ठुमक कर चल रही थी …॥”
जब मैं नहाने तालाब पे गई वहाँ लाजो को देख मैंने पूछ दिया कि पायल कहाँ से आयी तो वो लड़ने लगी। बात आयी गई हो गई मैं तो शाम तक भूल भी गई थी शाम को जब मैं बगिया की तरफ़ से निकली तो मदन बाबू खड़े थे बहाने से मुझे बगिया वाले मकान में बुला ले गये और वही हुआ जिसका दर था। लगता है लाजो ने तालाब वाली बात मदन बाबू को बता दी थी ।”
“अरी! पर हुआ क्या ये तो बता न ।”
मेरी तो कहते जुबान कटती है कि मदन बाबू ने एक हाथ मेरी गरदन में डाला और एक मेरे चूतड़ों में और वहीं बिस्तर पर पटक के चोद दिया।”

बस इतना ही काफी था. माया देवी, नथुने फुला कर बोली,
“एक नंबर की छिनाल है तु,,, … हरामजादी,,,,, कुतिया, तु बाज नही आयी न … रण्डी … निकल अभी तु यहां से,,,,,,चल भाग …। दुबारा नजर मत आना..…”

माया देवी दांत पीस-पीस कर मोटी-मोटी गालियां निकाल रही थी। बेला समझ गई की अब रुकी तो खैर नही। उसने जो करना था कर दिया, बाकी चौधराइन की गालियां तो उसने कई बार खाई थी। बेला ने तुरन्त दरवाजा खोला, और भाग निकली।

बेला के जाने के बाद चौधराइन का गुस्सा थोड़ा शांत हुआ. ठन्डा पानी पी कर बिस्तर पर धम से गिर पड़ी। बेला सच ही बोल रही होगी?… उसकी आखिर मदन से क्या दुश्मनी है, जो झूठ बोलेगी। पिछली बार भी मैंने उसकी बातो पर विश्वास नही किया था।
कैसे पता चलेगा ?
दीनू को बुलाया, फिर उसे एक तरफ ले जाकर पुछा। वो घबरा कर चौधराइन के पैरो में गिर पड़ा, और गिडगिडाने लगा,
“मालकिन, मुझे माफ कर दो …। मैंने कुछ नहीं किया …मालकिन, मदन बाबू ने चाबी लेने के बाद मुझे बगीचे पर जाने से मना कर दिया ।”

माया देवी का सिर चकरा गया। एक झटके में सारी बात समझ में आ गई।

कमरे में वापस आ कर, आंखो को बन्द कर बिस्तर पर लेट गई। मदन के बारे में सोचते ही उसके दिमाग में एक नंग्धड़ंग नवजवान लड़के की तसवीर उभर आती थी. जो किसी भरी पूरी जवान औरत के ऊपर चढ़ा हुआ होता। उसकी कल्पना में मदन एक नंगे मर्द के रुप में नजर आ रहा था। माया देवी बेचैनी से करवटे बदल रही थी।

उनको सदानन्द पर गुस्सा भी आ रहा था, कि लड़के की तरफ़ ध्यान नहीं देता । लड़का इधर-उधर मुंह मारता फिर रहा है। फिर सोचती, मदन ने किसी के साथ जबरदस्ती तो की नही. अगर गांव की औरतें लड़कियाँ खुद चुदवाने के लिये तैयार है, तो वो भी अपने आप को कब तक रोकेगा । नया खून है, आखिर उसको भी गरमी चढ़ती होगी, छेद तो खोजेगा ही अगर घरेलू छेद मिल जाय तो बाहर क्यों मुंह मारेगा। आखिर सदानन्द भी तो पहले दिन में यहाँ वहाँ मुँह मारता फ़िरता था पर जब से दिन में यहाँ मेरे पास आने लगा और मेरी चूत मिलने लगी तब से दिन में यहाँ मेरी लेता है और रात में तो घर पे रह पण्डिताइन की रगड़ता ही है। पण्डिताइन बेचारी को भी आनन्द है और आदमी घर का घर में है। ऐसे ही अगर मदन का भी कुछ इन्तजाम हो जाय तो वो गाँव की बदमाश औरतों से बचा रह सकता है वो सोच रही थी कि मेरे बचपन के दोस्त का बेटा है। मुझे ही कुछ करना होगा। मुझे ही अपनी कुर्बानी देनी होगी। वैसे भी साले सदानन्द को एक दिन में दो चूतें, दोपहर में मेरी और रात में पण्डिताइन की मिलती हैं पण्डिताइन बता रही थी कि साला रात भर रगड़ता है । मैं जब जवान थी, तब भी चौधरी ज्यादा से ज्यादा रात भर में उसकी दो बार लेता था. वो भी शुरु के एक महिने तक। फिर पता नही क्या हुआ, कुछ दिन बाद तो वो भी खतम हो गया. हफ्ते में दो बार, फिर घट कर एक बार से कभी-कभार में बदल गया। और अब तो पता नही कितने दिन हो गये। जबकी अगर बेला की बातो पर विश्वास करे तो, गांव की हर औरत कम से कम दो लंडो से अपनी चूत की कुटाई करवा रही थी। मेरी ही किस्मत फूटी हुई है। कुछ रण्डियों ने तो अपने घर में ही इन्तजाम कर रखा था। यहां तो घर में भी कोई नही, ना देवर ना जेठ । मुझे साला ले दे के दोपहर में एक लण्ड सदानन्द का मिलता है ये कहाँ का न्याय है ।
मुझे एक और लण्ड मिलना ही चाहिये बेला ठीक कहती है मदन को फ़ाँस लेने से किसी को शक नहीं होगा । अपना काम भी हो जायेगा और लड़का गन्दी औरतों से भी बचा रहेगा।
इस तरह विचार कर चौधराइन ने मदन का शिकार करने का पक्का फ़ैसला कर लिया। फ़िर सोचने लगी, क्या सच में मदन का हथियार उतना बड़ा है ?, जितना बेला बता रही थी। सदानन्द के लण्ड का ख्याल कर उसे बेला की बात का विश्वास होने लगा। सदानन्द के लण्ड के बारे में सोचते ही उसकी चूत दुपदुपाने लगती है फ़िर बेला के हिसाब से मदन का लण्ड तो और भी जबर्दस्त है उसकी कल्पना कर उसके बदन में एक सिहरन सी दौड़ गई, साथ ही साथ उसके गाल भी लाल हो गये। करीब घंटा भर वो बिस्तर पर वैसे ही लेटी हुई. मदन के लण्ड, और पिछली बार बेला की सुनाई, चुदाई की कहानियों को याद करती, अपनी जांघो को भींचती करवटें बदलती रही।
माया देवी ने सदानन्द के यहाँ नौकर भेज कर मदन को बुलवाया । मदन घर लुंगी बांधे जैसा बैठा था हड़बड़ाया सा वैसे ही चला आया।
माया देवी ने मदन को लुंगी पहने हड़बड़ाया हुआ देखा तो मन ही मन मुस्कुराई और पुछा, –“ये लुंगी कैसी बांधी हुई है आम के बगीचे पर नहीं जाना क्या आज। तू जाता भी है या योंही ।
“हाँ जाता हूँ चाची । अभी आपने बुलाया इसलिए बगैर कपड़े बदले जल्दी से चला आया अभी घर जा के बदल लूँगा तब जाऊँगा ।”
“जब तू जाता है तो इतने आम कैसे चोरी हो रहे हैं ?” इसी तरह जमीन-जायदाद की देखभाल की जाती है बेटा? तुझसे अकेले नहीं सम्हलता तो नौकरों की मदद ले लेता…
“नौकर ही तो सबसे ज्यादा चोरी करवाते हैं …सब चोर है। इसीलिए तो मैं वहां अकेला ही जाता हूँ ।”
मदन को मौका मिल गया था, और उसने तपाक से बहाना बना लिया।

तभी माया देवी गम्भीरता से बोली …“तो ये बात तूने मुझे पहले क्यों नही बताई…? कोई बात नही, मगर मुझे बता देता तो कोई भरोसे का आदमी साथ कर देती…।”

“अरे नहीं चौधचाची, उसकी कोई जरुरत नही है… मैं सब सम्भाल लूँगा।”
कहते हुए मदन उठने लगा। माया देवी मदन की मजबुत बदन को घूरती हुई बोली,
“ना ना, अकेले तो जाना ही नहीं है…। मैं चलती हूँ तेरे साथ… मैं देखती हुँ चोरों को”
इस धमाके से मदन की ऊपर की साँस ऊपर और नीचे की नीचे रह गई । कुछ देर तक तो वो माया देवी का चेहरा भौचक्का सा देखता ही रह गया।
कल रात ही लाजो वादा करके गई थी, की एक नये माल को फ़ँसा कर लाऊँगी। सारा प्लान चौपट।

फिर अपने आप को सम्भालते हुए बोला,
“नहीं चौधराइन चाची, तुम वहां क्या करने जाओगी ?… मुझे अभी कपड़े भी बदलने हैं। …मैं अकेला ही…”

“नही, मैं भी चलती हुं और तेरे कपड़े ऐसे ही ठीक हैं।…बहुत टाईम हो गया…बहुत पहले गर्मीयों में कई बार चौधरी साहिब के साथ वहां पर जाती थी यहाँतक कि सोती भी थी…कई बार तो रात में ही हमने आम तोड़ के भी खाये थे…चल मैं चलती हूँ।.”

मदन विरोध नही कर पाया।

“ठहर जा, जरा टार्च तो ले लुं…”

फिर माया देवी टार्च लेकर मदन के साथ निकल पड़ी। माया देवी ने अपनी साड़ी बदल ली थी, और अपने आप को संवार लिया था। मदन ने अपनी चौधराइन चाची को नजर भर कर देखा एकदम बनी ठनी, बहुत खूबसुरत लग रही थी। मदन की नजरो को भांपते हुए वो हँसते हुए बोली,
“क्या देख रहा है…?”

हँसते समय माया देवी के गालो में गड्ढे पड़ते थे।

“ कुछ नही. मैं सोच रहा था, आपको कहीं और तो नही जाना था”

माया देवी के होठों पर मुस्कुराहट फैल गई। हँसते हुए बोली,
“ऐसा क्यों…?, मैं तो तेरे साथ बगीचे पर चल रही हूँ।”

“नहीं, तुमने साड़ी बदली हुई है, तो…”

“वो तो ऐसे ही बदल लिया…क्यों,,,अच्छा नही लग रहा…??”

“नही, बहुत अच्छा लग रहा है…आप बहुत सुंदर लग अ…”,
बोलते हुए मदन थोड़ा शरमाया तो माया देवी ने हल्के हँस दी। माया देवी के गालो में पड़ते गड्ढे देख, मदन के बदन में सिहरन दौड़ गई।
दर असल अपनी चौधराइन चाची को उस दिन मालिश देखने के दो-तीन दिन बाद तक मदन बाबू को कोई होश नही था। इधर उधर पगलाये घुमते रहते थे। हर समय दिमाग में वही चलता रहता थ। चौधरी के घर जाते तो चौधराइन से नजरे चुराने लगे थे। जब चौधराइन चाची इधर उधर देख रही होती, तो उसको निहारते। हालांकि कई बार दिमाग में आता की, अपनी चाची को देखना बड़ी गलत बात है , कच्ची उम्र के लड़के के दिमाग में ज्यादा देर ये बात टिकने वाली नही थी। मन बार-बार माया देवी के नशीले बदन को देखने के लिये ललचाता। उसको इस बात पर ताज्जुब होता की, इतने दिनो में उसकी नजर चौधराइन चाची पर कैसे नही पड़ी। फिर ये चाची ही नहीं चौधराइन भी हैं, जरा सा उंच-नीच होने पर चमड़ी उधेड के रख देगी। इसलिये ज्यादा हाथ पैर चलाने की जगह, अपने लण्ड के लिये गांव में जुगाड़ खोजना ज्यादा जरुरी है। किस्मत में होगा तो मिल जायेगा।
मदन थोड़ा धीरे चल रहा था। चौधराइन चाची के पीछे चलते हुए, उसके मस्ताने मटकते चूतड़ों पर नजर पड़ी तो, उसका मन किया की धीरे से पीछे से माया देवी को पकड़ ले, और लण्ड को चूतड़ों की दरार में लगा कर, प्यार से उसके गालो को चुसे। उसके गालो के गड्ढे में अपनी जीभ डाल कर चाट ले। पीछे से सारी उठा कर उसके अन्दर अपना सिर घुसा दे, और दोनो चूतड़ों को मुट्ठी में भर कर मसलते हुए, चूतड़ों की दरार में अपना मुंह घुसा दे।

आज तो लाजवन्ती का भी कोई चांस नही था। तभी ध्यान आया की लाजो को तो बताया ही नही। डर हुआ की, कहीं वो चौधराइन चाची के सामने आ गई तो क्या करूँगा। और वही हुआ. बगीचे पर पहुंच कर खलिहान या मकान जो भी कहिये उसका दरवाजा ही खोला था, की बगीचे की बाउन्ड्री का गेट खोलती हुई लाजो और एक ओर औरत घुसी।।
अन्धेरा तो बहुत ज्यादा था, मगर फिर भी किसी बिजली के खम्भे की रोशनी बगीचे में आ रही थी। चौधराइन ने देख लिया और चौधराइन माया देवी की आवाज गूँजी,
“कौन घुस रहा है बगीचे में,,,,,…?”

मदन ने भी पलट कर देखा, तुरन्त समझ गया कि लाजो होगी। इस से पहले की कुछ बोल पाता, कि चौधराइन की कड़कती आवाज इस बार पूरे बगीचे में गुंज गई,
“कौन है, रे ?!!!…ठहर. अभी बताती हूँ।”

इसके साथ ही माया देवी ने दौड़ लगा दी,
“ साली, आम चोर कुतिया,,,,,!। ठहर वहीं पर…!।”

भागते-भागते एक डन्डा भी हाथ में उठा लिया था। माया देवी की कड़कती आवाज जैसे ही लाजो के कानो में पड़ी, उसकी तो हवा खराब हो गई। अपने साथ लाई औरत का हाथ पकड़, घसीटती हुई बोली,
“ये तो चौधराइन…है…। चल भाग…”

दोनो औरतें बेतहाशा भागी। पीछे चौधराइन हाथ में डन्डा लिये गालियों की बौछार कर रही थी। दोनो जब बाउन्ड्री के गेट के बाहर भाग गई तो माया देवी रुक गई। गेट को ठीक से बन्द किया और वापस लौटी। मदन खलिहान के बाहर ही खड़ा था। माया देवी की सांसे फुल रही थी। डन्डे को एक तरफ फेंक कर, अन्दर जा कर धम से बिस्तर पर बैठ गई और लम्बी-लम्बी सांसे लेते हुए बोली,
“साली हरामजादियाँ,,,,,, देखो तो कितनी हिम्मत है !?? शाम होते ही आ गई चोरी करने !,,,,,अगर हाथ आ जाती तो सुअरनियों की चूतड़ों में डन्डा पेल देती…हरामखोर साली, तभी तो इस बगीचे से उतनी कमाई नही होती, जितनी पहले होती थी…। मादरचोदियां, अपनी चूत में आम भर-भर के ले जाती है…रण्डियों का चेहरा नही देख पाई…”
मदन माया देवी के मुंह से ऐसी मोटी-मोटी भद्दी गालियों को सुन कर सन्न रह गया। हालांकि वो जानता था कि चौधराइन चाची कड़क स्वभाव की है, और नौकर चाकरो को गरियाती रहती है. मगर ऐसी गन्दी-गन्दी गालियां उसके मुंह से पहली बार सुनी थी, हिम्मत करके बोला,

“अरे चौधराइन चाची, छोड़ो ना तुम भी…भगा तो दिया…अब मैं रोज इसी समय आया करूँगा ना. तो देखना इस बार अच्छी कमाई…”

“ना ना,,,,,ऐसे इनकी आदत नही छुटने वाली…जब तक पकड़ के इनकी चूत में मिर्ची ना डालोगे बेटा, तब तक ये सब भोसड़चोदीयां ऐसे ही चोरी करने आती रहेंगी…। माल किसी का, खा कोई और रहा है…”
मदन ने कभी चौधराइन चाची को ऐसे गालियां देते नही सुना था। बोल तो कुछ सकता नही था, मगर उसे अपनी वो सारी छिनाल, चुदक्कड़ औरतें याद आ गई. जो चुदवाते समय अपने सुंदर मुखड़े से जब गन्दी-गन्दी बाते करती थी, तब उसका लण्ड लोहा हो जाता था।

माया देवी के खूबसुरत चेहरे को वो एक-टक देखने लगा. भरे हुए कमानीदार होठों को बिचकाती हुई, जब माया देवी ने दो-चार और मोटी गालियां निकाली तो उनके इस छिनालपन को देख मदन का लण्ड खड़ा होने लगा। मन में आया उन भरे हुए होठों को अपने होठों में कस ले और ऐसा चुम्मा ले की होठों का सारा रस चूस ले। खड़े होते लण्ड को छुपाने के लिये जल्दी से बिस्तर पर चौधराइन चाची के सामने बैठ गया।
क्रमश:…………………


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Re: सलीम जावेद की रंगीन दुनियाँ

Unread post by The Romantic » 06 Nov 2014 15:14

चौधराइन
भाग-8 चौधराइन के आम


माया देवी की सांसे अभी काफ़ी तेज चल रही थी, और उसका आंचल नीचे उसकी गोद में गिरा हुआ था। बड़ी बड़ी छातियाँ हर सांस के साथ ऊपर नीचे हो रही थी। गोरा चिकना मांसल पेट। मदन का लण्ड पूरा खड़ा हो चुका था।
तभी माया देवी ने पैर पसार अपनी साड़ी को खींचते हुए घुटनों से थोड़ा ऊपर तक चढ़ा, एक पैर मोड़ कर, एक पैर पसार कर, अपने आंचल से माथे का पसीना पोंछती हुई बोली,
“हरामखोरो के कारण दौड़ना पड़ गया…बड़ी गरमी लग रही है. खिड़की तो खोल दे, बेटा।"

जल्दी से उठ कर खिड़की खोलने गया। लण्ड ने लुंगी के कपड़े को ऊपर उठा रखा था, और मदन के चलने के साथ हिल रहा था। माया देवी की आखों में अजीब सी चमक उभर आई थी. वो एकदम खा जाने वाली निगाहों से लुंगी के अन्दर के डोलते हुए हथियार को देख रही थी। मदन जल्दी से खिड़की खोल कर बिस्तर पर बैठ गया, बाहर से सुहानी हवा आने लगी। उठी हुई साड़ी से माया देवी की गोरी मखमली टांगे दिख रही थी।

माया देवी ने अपने गरदन के पसीने को पोंछते हुए, अपनी ब्लाउज के सबसे ऊपर वाले बटन को खोल दिया और साड़ी के पल्लु को ब्लाउज के भीतर घुसा पसीना पोंछने लगी। पसीने के कारण ब्लाउज का उपरी भाग भीग चुका था। ब्लाउज के अन्दर हाथ घुमाती बोली,
“बहुत गरमी है,,,,!! बहुत पसीना आ गया ।"
मदन मुंह फेर ब्लाउज में घुमते हाथ को देखता हुआ, भोंचक्का सा बोल पड़ा,
“हां,,,,!! अह,,, पूरा ब्लाउज भीग,,,,गया...”

“तु शर्ट खोल दे ना…बनियान तो पहन ही रखी होगी…?!।"

साड़ी को और खींचती, थोड़ा सा जांघो के ऊपर उठाती माया देवी ने अपने पैर पसारे.

“साड़ी भी खराब हो…। यहां रात में तो कोई आयेगा नही…”

“नही चाची, यहां…रात में कौन…”

“पता नही, कहीं कोई आ जाये…। किसी को बुलाया तो नही...?”

मदन ने मन ही मन सोचा, जिसको बुलाया था उसको तो तुमने भगा ही दिया, पर बोला, “नही,,,नही,,,!!…किसी को नही बुलाया...!”

“तो, मैं भी साड़ी उतार देती हुं…”
कहती हुई उठ गई और साड़ी खोलने लगी।

मदन भी गरदन हिलाता हुआ बोला,
“हां चौधराइन चाची,,,,फिर पेटिकोट और ब्लाउज…सोने में भी हल्का…”

“हां, सही है…। पर, तु यहां सोने के लिये आता है ?…सो जायेगा तो फिर रखवाली कौन करेगा…???”
“मैं, अपनी नही आपके सोने की बात कहाँ कर रहा हूँ !…आप सो जाइये…मैं रखवाली करूँगा…”

“मैं भी तेरे साथ जाग कर तुझे बताऊँगी कि रखवाली कैसे करनी है नहीं तो मेरे आने का फ़ायदा ही क्या हुआ?”

“तब तो हो गया काम…तुम तो सब के पीछे डन्डा ले कर दौड़ोगी…”

“क्यों, तु नही दौड़ता डान्डा ले कर…? मैंने तो सुना है, गांव की सारी छोरियों को अपने डन्डे से धमकाया हुआ है, तूने !!!?”
चौधराइन ने बड़े अर्थपूर्ण ढंग से उसकी तरफ़ देख मुस्कुराते हुए कहा।
मदन एकदम से झेंप गया,
“धत् चाची,,,,…क्या बात कर रही हो…?”
“इसमे शरमाने की क्या बात है ?… ठीक तो करता है. अपने आम हमें खुद खानें है…। सब चूतमरानियों को ऐसे ही धमकाया दिया कर…।”
चौधराइन ने रंग बदलते गिरगिट की तरह बात का मतलब बदल दिया।

मदन की रीड की हड्डियों में सिहरन दौड़ गई। माया देवी के मुंह से निकले इस चूत शब्द ने उसे पागल कर दिया। उत्तेजना में अपने लण्ड को जांघो के बीच जोर से दबा दिया। चौधराइन ने साड़ी खोल एक ओर फेंक दिया, और फिर पेटिकोट को फिर से घुटने के थोड़ा ऊपर तक खींच कर बैठ गई, और खिड़की के तरफ मुंह घुमा कर बोली,
“लगता है, आज बारिश होगी ।"

मदन कुछ नही बोला. उसकी नजरे तो माया देवी की गोरी-गठीली पिन्डलियों का मुआयना कर रही थी। घुमती नजरे जांघो तक पहुंच गई और वो उसी में खोया रहता, अगर अचानक माया देवी ना बोल पड़ती,
“बदन बेटा, आम खाओगे…!!?”

मदन ने चौंक कर नजर उठा कर देखा, तो उसे ब्लाउज के अन्दर कसे हुए दो आम नजर आये. इतने पास, की दिल में आया मुंह आगे कर चूचियों को मुंह में भर ले. दूसरे किसी आम के बारे में तो उसका दिमाग सोच भी नही पा रहा था. हड़बडाते हुए बोला,
“आम,,,,? कहाँ है, आम…? अभी कहाँ से…?”

माया देवी उसके और पास आ, अपनी सांसो की गरमी उसके चेहरे पर फेंकती हुई बोली,
“आम के बगीचे में बैठ कर…आम नहीं दिख रहे…!!!! बावला हो रहा है क्या?”
कह कर मुस्कुराई…...।
“पर, रात में,,,,,,आम !?”,
बोलते हुए मदन के मन में आया की गड्ढे वाले गालो को अपने मुंह में भर कर चूस ले।

धीरे से बोली,
“अरे रात में ही आम खाने में मजा आता है खा ले! खा ले! वैसे भी तेरा वो बाप सदानन्द कंजूस तो तुझे आम खिलाने से रहा।”
“नहीं चाची, पिताजी आम लाते हैं।”
चौधराइन ने मन ही मन कहा –“वो भी मेरे ही आम चूसता है रोज रात को दुखते हैं।” पर ऊपर से बोलीं –“अरे मुझे न बता वो भी मेरे ही आम से काम चलाता है। चल बाहर चलते हैं।”,
कहती हुई, मदन को एक तरफ धकेलते बिस्तर से उतरने लगी।

इतने पास से बिस्तर से उतर रही थी, की उसकी नुकिली चूचियों ने अपनी चोंच से मदन की बाहों को छु लिया। मदन का बदन गनगना गया। उठते हुए बोला,
“क्या चौधराइन चाची आपको भी इतनी रात में क्या-क्या सूझ रहा है…इतनी रात में आम कहाँ दिखेंगे?”

“ये टार्च है ना,,,,,,बारिश आने वाली है…नहीं तोड़ेंगे तो जितने भी पके हुए आम है, गिर कर खराब हो जायेंगे…।”
और टार्च उठा बाहर की ओर चल दी।
आज उनकी चाल में एक खास बात थी. मदन का ध्यान बराबर उसकी मटकती, गुदाज कमर और मांसल हिलते चूतड़ों की ओर चला गया। गांव की उनचुदी, जवान लौंडियों को चोदने के बाद भी उसको वो मजा नही आया था, जो उसे औरतों (जैसे लाजो, बेला) वगैरह ने दिया था।

इतनी कम उम्र में ही मदन को ये बात समझ में आ गई थी, की बड़ी उम्र की मांसल, गदराई हुई औरतों को चोदने में जो मजा है, वो मजा दुबली-पतली अछूती अनचुदी बुरों को चोदने में नही आता । खेली-खाई औरतें कुटेव करते हुए लण्ड डलवाती है, और उस समय जब उनकी चूत फच-फच…गच-गच अवाज निकालती है, तो फिर घंटो चोदते रहो…उनके मांसल, गदराये जिस्म को जितनी मरजी उतना रगड़ो।

एकदम गदराये-गठीले चूतड़, पेटिकोट के ऊपर से देखने से लग रहा था की हाथ लगा कर अगर पकड़े, तो मोटे मांसल चूतड़ों को रगड़ने का मजा आ जायेगा। ऐसे ठोस चूतड़ की, उसके दोनो भागों को अलग करने के लिये भी मेहनत करनी पड़ेगी। फिर उसके बीच चूतड़ों के बीच की नाली बस मजा आ जाये।

पायजामा के अन्दर लण्ड फनफाना रहा था। अगर माया देवी उसकी चौधराइन चाची नही होती तो अब तक तो वो उसे दबोच चुका होता। इतने पास से केवल पेटिकोट-ब्लाउज में पहली बार देखने का मौका मिला था। एकदम गदराई-गठीली जवानी थी। हर अंग फ़ड़फ़ड़ा रहा था। कसकती हुई जवानी थी, जिसको रगड़ते हुए बदन के हर हिस्से को चुमते हुए, दांतो से काटते हुए रस चूसने लायक था। रात में सो जाने पर साड़ी उठा के चूत देखने की कोशिश की जा सकती थी, ज्यादा परेशानी शायद ना हो, क्योंकि उसे पता था की गांव की औरतें कच्छी नही पहनती।
इसी उधेड़बुन में फ़ँसा हुआ, अपनी चौधराइन चाची के हिलते चूतड़ों और उसमें फँसे हुए पेटिकोट के कपड़े को देखता हुआ, पीछे चलते हुए आम के पेड़ों के बीच पहुंच गया। वहां माया देवी फ्लेश-लाईट (टार्च) जला कर, ऊपर की ओर देखते हुए बारी-बारी से सभी पेड़ों पर रोशनी डाल रही थी।

“इस पेड़ पर तो सारे कच्चे आम है…इस पर एक-आध ही पके हुए दिख रहे…”

“इस तरफ टार्च दिखाओ तो चौधराइन चाची,,…इस पेड़ पर …पके हुए आम…।”

“कहाँ है,,,? इस पेड़ पर भी नही है, पके हुए…तु क्या करता था, यहां पर…?? तुझे तो ये भी नही पता, किस पेड़ पर पके हुए आम है…???”
मदन ने माया देवी की ओर देखते हुए कहा,
“पता तो है, मगर उस पेड़ से तुम तोड़ने नही दोगी…!।"

“क्यों नही तोड़ने दूँगी,,?…तु बता तो सही, मैं खुद तोड़ कर खिलाऊँगी..”

फिर एक पेड़ के पास रुक गई,
“हां,,,!! देख, ये पेड़ तो एकदम लदा हुआ है पके आमों से…। चल ले, टार्च पकड़ के दिखा, मैं जरा आम तोड़ती हूँ…।”
कहते हुए माया देवी ने मदन को टार्च पकड़ा दिया। मदन ने उसे रोकते हुए कहा,
“क्या करती हो…?, कहीं गिर गई तो …? तुम रहने दो मैं तोड़ देता हुं…।”

“चल बड़ा आया…आम तोड़ने वाला…बेटा, मैं गांव में ही बड़ी हुई हुं…जब मैं छोटी थी तो अपनी सहेलियों में मुझसे ज्यादा तेज कोई नही था, पेड़ पर चढ़ने में…देख मैं कैसे चढ़ती हुं…”

“अरे, तब की बात और थी…”

पर मदन की बाते उसके मुंह में ही रह गई, और माया देवी ने अपने पेटिकोट को थोड़ा ऊपर कर अपनी कमर में खोस लिया, और पेड़ पर चढ़ना शुरु कर दिया।
मदन ने भी टार्च की रोशनी उसकी तरफ कर दी। थोड़ी ही देर में काफी ऊपर चढ़ गई, और पेर की दो डालो के ऊपर पैर जमा कर खड़ी हो गई, और टार्च की रोशनी में हाथ बढ़ा कर आम तोड़ने लगी. तभी टार्च फिसल कर मदन की हाथों से नीचे गिर गयी।

“अरे,,,,,क्या करता है तु…? ठीक से टार्च भी नही दिखा सकता क्या ?”

मदन ने जल्दी से नीचे झुक कर टार्च उठायी और फिर ऊपर की…

“ठीक से दिखा,,,इधर की तरफ…”

टार्च की रोशनी चौधराइन जहां आम तोड़ रही थी, वहां ले जाने के क्रम में ही रोशनी माया देवी के पैरो के पास पड़ी तो मदन के होश ही उड़ गये...॥
माया देवी ने अपने दोनो पैर दो डालो पर टिका के रखे हुए थे. उसका पेटिकोट दो भागो में बट गया था. और टार्च की रोशनी सीधी उसके दोनो पैरो के बीच के अन्धेरे को चीरती हुई पेटिकोट के अन्दर के माल को रोशनी से जगमगा दिया।

पेटिकोट के अन्दर के नजारे ने मदन की तो आंखो को चौंधिया दिया। टार्च की रोशनी में पेटिकोट के अन्दर कैद, चमचमाती मखमली टांगे पूरी तरह से नुमाया हो गई. रोशनी पूरी ऊपर तक चूत की काली काली झाँटों को भी दिखा रही थी। टार्च की रोशनी में कन्दली के खम्भे जैसी चिकनी मोटी जांघो और चूत की झाँटों को देख, मदन को लगा की उसका लण्ड पानी फेंक देगा. उसका गला सुख गया और हाथ-पैर कांपने लगे।
तभी माया देवी की आवाज सुनाई दी,
“अरे, कहाँ दिखा रहा है ? यहां ऊपर दिखा ना…!!।

हकलाते हुए बोला,
“हां,,,! हां,,,!, अभी दिखाता…वो टार्च गिर गयी थी…”

फिर टार्च की रोशनी चौधराइन के हाथों पर फोकस कर दी। चौधराइन ने दो आम तोड़ लिये फिर बोली,
“ले, केच कर तो जरा…”
और नीचे की तरफ फेंके, मदन ने जल्दी से टार्च को कांख में दबा, दोनो आम बारी-बारी से केच कर लिये और एक तरफ रख कर, फिर से टार्च ऊपर की तरफ दिखाने लगा…और इस बार सीधा दोनो टांगो के बीच में रोशनी फेंकी. इतनी देर में माया देवी की टांगे कुछ और फैल गई थी. पेटिकोट भी थोड़ा ऊपर उठ गया था और चूत की झाँटें और ज्यादा साफ दिख रही थी। मदन का ये भ्रम था या सच्चाई पर माया देवी के हिलने पर उसे ऐसा लगा, जैसे चूत के लाल लपलपाते होठों ने हल्का सा अपना मुंह खोला था। लण्ड तो लुंगी के अन्दर ऐसे खड़ा था, जैसे नीचे से ही चौधराइन की चूत में घुस जायेगा। नीचे अन्धेरा होने का फायदा उठाते हुए, मदन ने एक हाथ से अपना लण्ड पकड़ कर हल्के से दबाया। तभी माया देवी ने कहा,
“जरा इधर दिखा…।”

मदन ने वैसा ही किया. पर बार-बार वो मौका देख टार्च की रोशनी को उसकी टांगो के बीच में फेंक देता था। कुछ समय बाद माया देवी बोली,
“और तो कोई पका आम नही दिख रहा।…चल मैं नीचे आ जाती हुं. वैसे भी दो आम तो मिल ही गये…। तु खाली इधर उधर लाईट दिखा रहा है, ध्यान से मेरे पैरों के पास लाईट दिखाना।"

कहते हुए नीचे उतरने लगी।
मदन को अब पूरा मौका मिल गया. ठीक पेड़ की जड़ के पास नीचे खड़ा हो कर लाईट दिखाने लगा। नीचे उतरती चौधराइन के पेटिकोट के अन्दर रोशनी फेंकते हुए, मस्त चौधराइन माँसल, चिकनी जांघो को अब वो आराम से देख सकता था. क्योंकि चौधराइन का पूरा ध्यान तो नीचे उतरने पर था, हालांकि चूत की झाँटों का दिखना अब बन्द हो गया था, मगर चौधराइन का मुंह पेड़ की तरफ होने के कारण पीछे से उसके मोटे-मोटे चूतड़ों का निचला भाग पेटिकोट के अन्दर दिख रहा था। गदराई गोरी चूतड़ों के निचले भाग को देख लण्ड अपने आप हिलने लगा था।

एक हाथ से लण्ड पकड़ कस कर दबाते हुए, मदन मन ही मन बोला, “हाय ऐसे ही पेड़ पर चढी रह उफफ्फ्…क्या चूतड़ हैं ?…किसी ने आज तक नही रगड़ा होगा एकदम अछूते चूतड़ों होंगे…। हाय चौधराइन चाची…लण्ड ले कर खड़ा हूँ, जल्दी से नीचे उतर के इस पर बैठ जा ना…”

ये सोचने भर से लण्ड पनिया गया था। तभी चौधराइन का पैर फिसला और हाथ छुट गया। मदन ने हडबड़ा कर नीचे गिरती चौधराइन को कमर के पास से लपक के पकड़ लिया। मदन के दोनो हाथ अब उसकी कमर से लिपटे हुए थे और चौधराइन के दोनो पैर हवा में और मदन का लण्ड सीधा चौधराइन की मोटे गुदाज चूतड़ों को छु रहा था। हडबड़ाहट में दोनो की समझ में कुछ नही आ रहा था, कुछ पल तक मदन ने भी उसके भारी शरीर को ऐसे ही थामे रखा और माया देवी भी उसके हाथों को पकड़े अपनी चूतड़ों को उसके लण्ड पर टिकाये झुलती रही।
कुछ देर बाद, धीरे से शरमाई आवज में बोली,
“हाय,,,,, बच गई,,,,,, अभी गिर जाती. अब छोड़, ऐसे ही उठाये रखेगा क्या,,,,??”

मदन उसको जमीन पर खड़ा करता हुआ बोला
“मैंने तो पहले ही कहा था…”

माया देवी का चेहरा लाल पर गया था। हल्के से मुस्कुराती हुई, कनखियों से लुंगी में मदन के खड़े लण्ड को देखने की कोशिश कर रही थी। अन्धेरे के कारण देख नही पाई मगर अपनी चूतड़ों पर, अभी भी उसके लण्ड की चुभन का अहसास उसको हो रहा था। अपने पेट को सहलाते हुए धीरे से बोली,
“कितनी जोर से पकड़ता है तु ?,,,,लगता है, निशान पड़ गया…”

मदन तुरन्त टार्च जला कर, उसके पेट को देखते हुए बुदबुदाते हुए बोला,
“…वो अचानक ही…।”

मुस्कुराती हुई माया देवी धीरे कदमों से चलती मदन के एकदम पास पहुंच गई…इतने पास की उसकी दोनो चूचियों का अगला नुकिला भाग लगभग मदन की छातियों को टच कर रहा था, और उसकी बनियान में कसी छाती पर हल्के से हाथ मरती बोली,
“पूरा सांड़ हो गया है…तु… मैं इतनी भारी हुं…मुझे ऐसे फ़ूल सा टांग लिया…। चल आम उठा ले।"
क्रमश:………………………………


The Romantic
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Re: सलीम जावेद की रंगीन दुनियाँ

Unread post by The Romantic » 06 Nov 2014 15:16

चौधराइन
भाग 9- चौधराइन के आम चूसने के या खाने के


मदन का दिल किया कि, ब्लाउज में कसे दोनो आमो को अपनी मुठ्ठी में भर कर पूछे “इन्हें चाची।” पर टार्च चौधराइन के हाथ में पकड़ा, नीचे गिरे आमो को उठाकर अपनी मुठ्ठी में भर दबाता हुआ, उसकी पत्थर जैसी सख्त नुकिली चूचियों को घूरता हुआ बोला,
“पक गये है…चूस चूस…खाने में…।"

माया देवी मुस्कुराती हुई शरमाई सी बोली,
“हां,,,,चूस के खाने लायक,,,इसस्स्…ज्यादा जोर से मत दबा…। सारा रस निकल जायेगा…आराम से खाना ।"
चलते-चलते माया देवी ने एक दूसरे पेड़ की डाल पर टार्च की रोशनी को फोकस किया और बोली,
“इधर देख मदन…ये तो एकदम पका आम है…। इसको भी तोड़…थोड़ा ऊपर है…तु लम्बा है…जरा इस बार तु चढ़ के…”

मदन भी उधर देखते हुए बोला,
“हां,,, है तो एकदम पका हुआ, और काफ़ी बड़ा भी…है…तुम चढ़ो ना…अभी तो चढ़ने में एक्ष्पर्ट बता रही थी।”

“ना रे, गिरते-गिरते बची हुं…फिर तु ठीक से टार्च भी नही दिखाता…कहती हुं हाथ पर तो दिखाता है, पैर पर.”
“हाथ हिल जाता है…।”
धीरे से बोली मगर मदन ने सुन लिया,
“तेरा तो सब कुछ हिलता है…तु चढ़ना…ऊपर…”
मदन ने लुंगी को दोहरा करके लपेटा लिया। इस से लुंगी उसके घुटनो के ऊपर तक आ गई। लण्ड अभी भी खड़ा था, मगर अन्धेरा होने के कारण पता नही चल रहा था। माया देवी उसके पैरो पर टार्च दिखा रही थी।

थोड़ी देर में ही मदन काफी उंचा चढ़ गया था। अभी भी वो उस जगह से दूर था जहां आम लटका हुआ था। दो डालो के ऊपर पैर रख जब मदन खड़ा हुआ, तब माया देवी ने नीचे से टार्च की रोशनी सीधी उसकी लुंगी के बीच डाली। चौड़ी-चकली जांघो के बीच मदन का ढाई इंच मोटा लण्ड आराम से दिखने लगा। लण्ड अभी पूरा खड़ा नही था. पेड़ पर चढ़ने की मेहनत ने उसके लण्ड को ढीला कर दिया था, मगर अभी भी काफी लम्बा और मोटा दिख रहा था। माया देवी का हाथ अपने आप अपनी जांघो के बीच चला गया। नीचे से लण्ड लाल लग रहा था, शायद सुपाड़े पर से चमड़ी हटी हुई थी। जांघो को भींचती, होठों पर जीभ फेरती, अपनी नजरो को जमाये भुखी आंखो से देख रही थी।
“अरे,,,, आप रोशनी तो दिखाओ, हाथों पर…।”

“आ,,,हां,,हां,,,,,,तु चढ़ रहा था…। इसलिये पैरों पर दिखा…।”,
कहते हुए उसके हाथों पर दिखाने लगी। मदन ने हाथ बढ़ा कर आम तोड़ लिया।

“लो पकड़ो…।"

माया देवी ने जल्दी से टार्च को अपनी कांखो में दबा कर अपने दोनो हाथ जोड़ लिये. मदन ने आम फेंका और माया देवी ने उसको अपनी चूचियों के ऊपर, उनकी सहायता लेते हुए केच कर लिया। फिर मदन नीचे उतर गया और माया देवी ने उसके नीचे उतरते समय भी अपनी आंखो की उसके लटकते लण्ड और अंडकोशो को देख कर अच्छी तरह से सिकाई की। मदन के लण्ड ने चूत को पनिया दिया।

मदन के नीचे उतरते ही बारिश की मोटी बुंदे गिरने लगी। मदन हडबड़ाता हुआ बोला,
“चलो जल्दी,,,,,भीग जायेंगे........”
दोनो तेज कदमो से खलिहान की तरफ चल पडे। अन्दर पहुंचते पहुंचते थोड़ा बहुत तो भीग ही गये। माया देवी का ब्लाउज और मदन की बनियान दोनो पतले कपड़ों के थे. भीग कर बदन से ऐसे चिपक गये थे, जैसे दोनो उसी में पैदा हुए हो। बाल भी गीले हो चुके थे।

मदन ने जल्दी से अपनी बनियान उतार दी और पलट कर चौधराइन की तरफ देखा की वो अपने बालों को तौलिये से रगड़ रही थी। भीगे ब्लाउज में कसी चूचियाँ अब और जालिम लग रही थी। चूचियों की चोंच स्पष्ट दिख रही थी। ऊपर का एक बटन खुला था जिस के कारण चूचियों के बीच की गहरी घाटी भी अपनी चमक बिखेर रही थी। तौलिये से बाल रगड़ के सुखाने के कारण उसका बदन हिल रहा था और साथ में उसके बड़ी बड़ी चूचियाँ लक्का कबूतरों सी फ़ड़फ़ड़ा रहीं थीं। उसकी आंखे हिलती चूचियों ओर उनकी घाटी से हटाये नही हट रही थी। तभी माया देवी धीरे से बोली,
“तौलिया ले…और जा कर मुंह हाथ अच्छी तरह से धो कर आ…।"

मदन चुप-चाप बाथरुम में घुस गया और दरवाजा उसने खुला छोड़ दिया था। कमोड पर खड़ा हो चर-चर मुतने के बाद हाथ पैर धो कर वापस कमरे में आया, तो देखा की माया देवी बिस्तर पर बैठ अपने घुटनो को मोड़ बैठी थी, और एक पैर का पायल निकाल कर देख रही थीं।
मदन ने हाथ पैर पोंछे और बिस्तर पर बैठते हुए पुछा…,
“क्या हुआ…?”

“पता नही कैसे पायल का हुक खुल गया…!?”

“लाओ, मैं देखता हुं…”,
कहते हुए मदन ने पायल अपने हाथ में ले लिया।

“इसका तो हुक सीधा हो गया है, लगता है टूट…”
कहते हुए मदन हुक मोड़ के पायल को माया देवी के पैर में पहनाने की कोशिश करने लगा, पर वो फिट नही हो पा रहा था। माया देवी पेटिकोट को घुटनों तक चढ़ाये एक पैर मोड़ कर, दूसरे पैर को मदन की तरफ आगे बढ़ाये हुए बैठी थी।

मदन ने पायल पहनाने के बहाने माया देवी के कोमल पैरों को एक-दो बार हल्के से सहला दिया। माया देवी उसके हाथों को पैरों पर से हटा ते हुए, रुआंसी होकर बोली,
“रहने दे…ये पायल ठीक नही होगी…शायद टूट गयी है…”

“हां,,,,शायद टूट गयी…दूसरी मंगवा लेना……आप भी इतनी मामुली सी बात… कौन सी आप को पैसे की कमी है ।”

माया देवी मुंह बनाती हुई बोली,

“बात पैसे की नहीं शहर में मिलेगी कौन ला के देगा पायल,,,? …तेरे चाचा तो न जाने किस दुनिया में रहते हैं उनसे तो आशा है नही, और …तु तो,,,, !!! ?”,
कहते हुए एक ठंडी सांस भरी।

माया देवी की बात सुन एक बार मदन के चेहरे का रंग उड़ गया। फिर हकलाते हुए बोला,
“क्यों ऐसा क्या चौधराइन चाची,,,,?....मैं शहर चला जाऊँगा… वैसे भी इस शनिवार को शहर से…”

“रहने दे…तू कहाँ काम का हरजा कर परेशान होगा??”,
कहती हुई पेटिकोट के कपड़े को ठीक करती हुई बगल में रखे तकिये पर लेट गई। मदन पैर के तलवे को सहलाता और हल्के हल्के दबाता हुआ बोला,
“अरे, छोड़ो ना,,,,, चौधराइन चाची।
पर माया देवी ने कोई जवाब नही दिया। खिड़की खुली थी, कमरे में बिजली का बल्ब जल रहा था, बाहर जोरो की बारिश शुरु हो चुकी थी। मौसम एकदम सुहाना हो गया था और ठंडी हवाओं के साथ पानी की एक दो बुंदे भी अन्दर आ जाती थी। मदन कुछ पल तक उसके तलवे को सहलाता रहा फिर बोला,

“चौधराइन चाची,,,,, ब्लाउज तो बदल लो…। गीला ब्लाउज पहन…”

“ऊं…रहने दे, थोड़ी देर में सुख जायेगा. दूसरा ब्लाउज कहाँ लाई, जो…?”

“तौलिया लपेट लेना…”
मदन ने धीरे से झिझकते हुए कहा।
माया देवी ने कोई जवाब नही दिया।
मदन हल्के हल्के पैर दबाते हुए बोला,
“आम नही खाओगी…?”

“ना, रहने दे, मन नही है…”

“क्या चौधराइन चाची ?,,,, क्यों उदास हो रही हो…?”

“ना, मुझे सोने दे…तु आम,,,खा.....”

“ना,,,, पहले आप खाओ …!!।",
कहते हुए मदन ने आम के उपरी सिरे को नोच कर माया देवी के हाथ में एक आम थमा दिया, और उसके पैर फिर से दबाने लगा। माया देवी अनमने भाव से आम को हाथ में रखे रही। ये देख कर मदन ने कहा,
“क्या हुआ…? आम अच्छे नही लगते क्या ?,,,,,चूस ना…पेड़ पर चढ़ के तोड़ा और इतनी मेहनत की…चूसो ना...!!!!”
मदन की नजरे तो माया देवी की नारियल की तरह खड़ी चूचियों से हट ही नही रही थी। दोनो चूचियों को एक-टक घूरते हुए, वो अपनी चौधराइन चाची को देख रहा था। माया देवी ने बड़ी अदा के साथ अनमने भाव से अपने रस भरे होठों को खोला, और आम को एक बार चुसा फिर बोली,
“तु नही खायेगा…?”

“खाऊँगा ना…?!।”,
कहते हुए मदन ने दूसरा आम उठाया और उसको चुसा तो फिर बुरा सा मुंह बनाता हुआ बोला,
“ये तो एकदम खट्टा है…।"

“ये ले मेरा आम चूस…बहुत मीठा है…”,
धीमी आवाज में माया देवी अपनी एक चूची को ब्लाउज के ऊपर से खुजलाती हुई बोली, और अपना आम मदन को पकड़ा दिया।

“मुझे तो पहले ही पता था…तेरा वाला मीठा होगा…”,
धीरे से बोलते हुए मदन ने माया देवी के हाथ से आम ले लिया, और मुंह में ले कर ऐसे चूसने लगा, जैसे चूची चूस रहा हो।
माया देवी चेहरे पर अब हल्की सी मुस्कान लिये बोली,
“बड़े मजे से चूस रहा है !! मीठा है ना,,,,,,!? ”

माया देवी और मदन के दोनो के चेहरे पर हल्की मुस्कुराहट खेल रही थी।

मदन प्यार से आम चूसता हुआ बोला,
“हां चौधराइन चाची, आपका आम,,,,,,,,,बहुत मीठा है(!!!)..... ले ना, तू भी चूस…”

“ना, तू चूस,,… मुझे नही खाना…”,
फिर मुस्कुराती हुई, धीरे से बोली,
“देखा, मेरे बाग के आम कितने मीठे हैं खाया कर…”

“मिलते ही …नहीं…”
मदन उसकी चूचियों को घूरते हुए बोला।

“कोशिश…कर के देख…!!!!”,
उसकी आंखो में झांकती माया देवी बोली।

दोनो को अब दोहरे अर्थो वाली बातों में मजा आ रहा था। मदन अपने हाथ को लुंगी के ऊपर से लण्ड पर लगा हल्के से सहलाता हुआ, उसकी चूचियों को घूरता हुआ बोला,
“तू मेरा वाला,,,(!) चूस… खट्टा है….,,,,, औरतों को तो खट्टा…।”

“हां, ला मैं तेरा,,,(!) चूसती हुं…खट्टे आम भी अच्छे होते…”,
कहते हुए माया देवी ने खट्टा वाला आम ले लिया और चूसने लगी।
अब माया देवी के चेहरे पर हल्की मुस्कुराहट् आ गई थी, अपने रसीले होठों से धीरे-धीरे आम को चूस रही थी। उसके चूसने की इस अदा और दोहरे अर्थो वाली बात-चीत ने अब तक मदन और माया देवी दोनो की अन्दर आग लगा दी थी। दोनो अब उत्तेजित होकर वासना की आग में धीरे धीरे सुलग रहे थे। पेड़ के ऊपर चढ़ने पर दोनो ने एक दूसरे के पेटिकोट और लुंगी के अन्दर छुपे सामान को देखा था, ये दोनो को पता था। दोनो के मन में बस यही था, की कैसे भी करके पेटिकोट के माल का मिलन लुंगी के हथियार के साथ हो जाये।

मदन अब उसके कोमल पैरो को सहलाते हुए, उसके एक पैर में पड़ी पायल से खेल रहा था. माया देवी आम चूसते हुए उसको देख रही थी। बार-बार मदन का हाथ उसकी कोमल, चिकनी पिन्ड्लियों तक फिसलता हुआ चला जाता। पेटिकोट घुटनो तक उठा हुआ था। एक पैर पसारे, एक पैर घुटने के पास से मोडे हुए माया देवी बैठी हुई थी। कमरे में पूरा सन्नाटा पसरा हुआ था, दोनो चुप-चाप नजरो को नीचे किये बैठे थे। बाहर से तेज बारिश की आवाज आ रही थी।

आगे कैसे बढ़े ये सोचते हुए मदन बोला,
“कल सुबह शहर जा आपकी पायल मैं ले आऊँगा.,,,,,,।”

“रहने दे, मुझे नही मंगवानी तुझसे पायल…।”

“…मैं आप जैसी बताओगी वैसी पायल,,,,,ला,,,,,,“

“ना रहने दे, तू…पायल लायेगा,,,,,,फिर मेरे से…उसके बदले,,,,,,”,
धीरे से मुंह बनाते हुए माया देवी ने कहा, जैसे नाराज हो।
मदन के चेहरे क रंग उड़ गया। धीरे से हकलाता हुआ बोला,
“बदले में,,,,,,,क्या,,,???…मतलब…???”

आंखो को नचाती, मुंह फुलाये हुए धीरे से बोली,
“,,,,,लाजो को भी,,,,,पायल,,,,,”

इस से ज्यादा मदन सुन नही पाया, लाजो का नाम ही काफी था। उसका चेहरा कानो तक लाल हो गया, और दिमाग हवा में तैरने लगा. तभी माया देवी के होठों के किनारों पर लगा आम का रस छलक कर उसके सीने के उभार पर गिर पड़ा। माया देवी उसको जल्दी से से पोंछने लगी, तो मदन ने गीला तौलिया उठा अपने हाथ को आगे बढ़ाया तो उसके हाथ को रोकती हुई बोली,

“…ना, ना, रहने दे,,,(!?),, अभी तो मैंने तेरे से पायल मंगवाई भी नहीं, जो,,,,,,(!!!!!!!)…”

ये माया देवी की तरफ से दूसरा खुल्लम-खुल्ला सिग्नल था की आगे बढ़ । माया देवी के पैर की पिन्डलियों पर से कांपते हाथों को सरका कर उसके घुटनो तक ले जाते हुए धीरे से बोला,

“मतलब पा,,,,पायल ला दूँगा तो,,,,,,तो …(??!!)”

धीरे से माया देवी बोली,
“…पा,,,,,,यल लायेगा,,,,तो,,,,,क्या? ”

“आम,,,,,!! स…आफ…करने…दोगी…??”,
धीरे से मदन बोला। आम के रस की जगह, आम साफ करने की बात शायद मदन ने जानबूझ कर कही थी।

“तो तू गाँव का पायल एक्स्पर्ट है…सबको…पायल,,,,,,लाता है, क्या…?”,
सरसराती आवाज में माया देवी ने पुछा

“नही…”

“लाजो के लिए लाया था,,, …”

मदन चुप-चाप बैठा रहा।

“फ़िर उसके आ……म सा…फ… किये…तूने…?!!।”
क्रमश:……………………